Thursday, 19 March 2026

विश्वनाथ धाम में उतरी सुरों की आराधना: ध्रुपद, भजन और कथक में साकार हुई दिव्यता

विश्वनाथ धाम में उतरी सुरों की आराधना: ध्रुपद, भजन और कथक में साकार हुई दिव्यता 

नवरात्रि के प्रथम दिवस पर शिवार्चनम मंच बना साधना का केंद्र, सुर-लय-नृत्य ने रचा आध्यात्मिक आलोक

सुरेश गांधी

वाराणसी। चैत्र नवरात्रि के शुभारंभ के साथ श्री काशी विश्वनाथ धाम में गुरुवार की संध्या कुछ अलग ही आभा लिए अवतरित हुई। शिवार्चनम मंच पर सजी सांस्कृतिक संध्या केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि वह दिव्य क्षण था जब संगीत, भक्ति और कला ने मिलकर ईश्वर के साक्षात स्वरूप का अनुभव कराया।

दीपों की कोमल लौ के साथ जब कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ, तो मानो काशी की प्राचीन परंपराएं वर्तमान में जीवंत हो उठीं। मंच पर विराजमान कलाकारों की साधना और श्रद्धालुओं की आस्था ने मिलकर ऐसा वातावरण रचा, जिसमें हर श्वास शिवमय प्रतीत हो रही थी।

संध्या की पहली प्रस्तुति में पद्मश्री सम्मानित ध्रुपद गायक ऋत्विक सान्याल ने अपनी गहन और आध्यात्मिक शैली से पूरे धाम को ध्यान की अवस्था में पहुंचा दिया। उनके स्वरों की गूंज जैसे गंगा की धारा के समान अविरल बहती रही, जिसमें हर श्रोता स्वयं को डुबोता चला गया। यह केवल संगीत नहीं, बल्कि साधना का वह स्वरूप था, जिसमें आत्मा और परमात्मा का संवाद सुनाई देता है।

इसके बाद मंच पर आईं सुप्रसिद्ध गायिका सुनंदा शर्मा, जिनके भजनों ने वातावरण को भाव-विभोर कर दिया। उनकी आवाज में वह करुणा और भक्ति थी, जिसने हर श्रोता के अंतर्मन को स्पर्श किया। मां शक्ति के प्रति समर्पण के भाव से गूंजते उनके भजन, नवरात्रि की आध्यात्मिकता को और भी गहन बना गए।

सांस्कृतिक संध्या का उत्कर्ष उस समय देखने को मिला जब कथक के प्रख्यात आचार्य राजेंद्र गंगानी मंच पर आए। उनके सधे हुए कदम, भावपूर्ण अभिव्यक्ति और लयकारी ने मानो समय को थाम लिया। हर घुंघरू की झंकार में कथा थी, हर मुद्राओं में परंपरा का सौंदर्य और हर गति में काशी की आत्मा सजीव हो उठी।

गंगा तट की पावन हवा, मंदिर की घंटियों की अनुगूंज और सुरों की साधनाइन सबने मिलकर ऐसी दिव्यता रची कि उपस्थित श्रद्धालु केवल दर्शक नहीं रहे, बल्कि इस आध्यात्मिक यात्रा के सहभागी बन गए। इस आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और कला-प्रेमियों की उपस्थिति रही, जो देर रात तक इस अद्भुत संध्या के साक्षी बने रहे। हर किसी के मन में एक ही भाव थाभक्ति, संतोष और काशी के प्रति अटूट आस्था।

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास द्वारा आयोजित यह सांस्कृतिक संध्या इस बात का जीवंत प्रमाण है कि काशी केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि वह जीवित परंपरा है, जहां हर दिन, हर उत्सव में संस्कृति और आध्यात्म का नवसृजन होता है। नवरात्रि की इस प्रथम संध्या ने यह स्पष्ट कर दिया कि जब काशी में आराधना होती है, तो वह केवल पूजा नहीं रहतीवह एक अनुभव बन जाती है, जिसमें सुर ही साधना बन जाते हैं और हर क्षण शिव की उपस्थिति का आभास कराता है।

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