अपराध, जाली नोट और सत्ता के खेल से देश को पहुंचाया घाव
शहाबुद्दीन, मुख्तार, अतीक, विजय का काला साम्राज्य, देश की जड़ों पर वार
ये तीनों
सिर्फ
अपराधी
नहीं,
समाज
व
देश
विरोधी
तंत्र
की
धुरी
थी
सुरेश गांधी
वाराणसी. ‘धुरंधर’ फिल्म ने उस संगठित अपराध की परतें उधेड़ दी हैं, जिसने वर्षों तक समाज ही नहीं, बल्कि देश की आर्थिक और प्रशासनिक व्यवस्था को भी अपनी गिरफ्त में रखा। साथ ही अपराध, राजनीति और पैसा मिलकर एक समानांतर सत्ता भी खड़ी करते हैं। रिटायर्ड आईपीएस डॉ. सूर्य कुमार शुक्ला के दावों ने इस पूरे नेटवर्क को लेकर नई बहस छेड़ दी है। उनके मुताबिक फिल्म ने अपराध जगत के उस गठजोड़ को सामने रखा है, जिसमें सत्ता, पैसा और बंदूक का खतरनाक मेल दिखता है। यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि उन घटनाओं की परछाईं है, जो वर्षों तक उत्तर भारत के कई इलाकों में आम लोगों की जिंदगी को प्रभावित करती रहीं। फिल्म की तारीफ करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें दिखाया गया नेटवर्क न सिर्फ वास्तविकता के काफी करीब है, बल्कि उस स्याह सच को उजागर कर दिया है, जिसे वर्षों तक राजनीति और भय के साये में दबाकर रखा गया।
डॉ. शुक्ला के
अनुसार बिहार के शहाबुद्दीन, यूपी
के मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद और
विजय मिश्रा जैसे नाम केवल
अलग-अलग व्यक्ति नहीं,
बल्कि एक बड़े आपराधिक
नेटवर्क की कड़ियां थे।
इनके बीच तालमेल और
संसाधनों का साझा इस्तेमाल
इस बात की ओर
इशारा करता है कि
अपराध को सुनियोजित ढंग
से संचालित किया जा रहा
था। उनके दावों ने
यह सवाल खड़ा कर
दिया है कि क्या
ये माफिया सिर्फ अपराधी थे या फिर
देश की जड़ों को
खोखला करने वाला संगठित
तंत्र? डॉ. शुक्ला के
मुताबिक बिहार के शहाबुद्दीन, यूपी
के मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद
के बीच गहरे संबंध
थे। यह तिकड़ी अलग-अलग राज्यों में
रहते हुए भी एक
साझा आपराधिक रणनीति पर काम करती
थी। गैंग ऑपरेशन का
विस्तार, संसाधनों का साझा इस्तेमाल,
नेटवर्क के जरिए दबदबा
कायम रखना. इन तीनों ने
मिलकर अपराध को उद्योग का
रूप दे दिया था।
जाली नोट से कोयला-रेलवे तक : काले कारोबार का जाल
यह नेटवर्क केवल
जाली नोटों तक सीमित नहीं
था, बल्कि देश के कई
अहम सेक्टरों में अपनी पैठ
बना चुका था, जाली
नोटों की तस्करी और
बाजार में खपाना, कोयला
कारोबार में अवैध वसूली
और दबदबा, रेलवे ठेकों और सप्लाई सिस्टम
में हस्तक्षेप, निर्माण कार्यों और सरकारी ठेकों
पर कब्जा, ट्रांसपोर्ट, खनन और जमीन
कब्जे का खेल. इन
सबके जरिए यह गिरोह
न सिर्फ पैसा कमा रहा
था, बल्कि देश की आर्थिक
व्यवस्था को भी भीतर
से प्रभावित कर रहा था।
खून, खौफ और कानून पर दबाव
फिल्म में जिन घटनाओं
को दिखाया गया है, वे
इस नेटवर्क की क्रूरता व
काले कारनामों को सामने लाती
हैं. वे समाज के
उस डरावने सच को उजागर
करते है. अपहरण और
फिरौती का संगठित तंत्र,
गवाहों को धमकाना और
खत्म करना, सरकारी ठेकों पर कब्जा और
रंगदारी, पुलिस-प्रशासन पर दबाव बनाना,
विरोध करने वालों को
रास्ते से हटाना. इस
खौफ के चलते आम
आदमी के लिए न्याय
पाना बेहद मुश्किल हो
गया था।
जब माफिया बने ‘नेता’ और वोटबैंक
सबसे बड़ा सवाल
यह है कि ऐसे
लोगों को राजनीतिक संरक्षण
कैसे मिला? समाजवादी पार्टी समेत कई दलों
पर आरोप लगते रहे
कि उन्होंने इन चेहरों को
वोटबैंक के रूप में
इस्तेमाल किया। अपराध के बावजूद चुनावी
टिकट देकर ‘वैधता’ दी गई, ‘जनप्रतिनिधि’
बनाया गया, जनता के
बीच ‘जनसेवक’ की छवि, कानून
से ऊपर होने का
एहसास. यह स्थिति लोकतंत्र
के लिए गंभीर खतरा
बनती चली गई।
समाज से आगे, देश के लिए खतरा
यह तिकड़ी, यह
गिरोह केवल अपराधी नहीं
था, बल्कि अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने
वाला तंत्र, युवाओं को अपराध की
ओर मोड़ने वाला प्रभाव, सामाजिक
संतुलन को बिगाड़ना, प्रशासनिक
ढांचे को कमजोर करने
वाली ताकत, देश की आंतरिक
सुरक्षा के लिए चुनौती.
ऐसे नेटवर्क किसी भी राष्ट्र
की जड़ों को खोखला
कर सकते हैं।
‘धुरंधर’ की चेतावनी
फिल्म ‘धुरंधर’ केवल अतीत का
आईना नहीं, बल्कि वर्तमान के लिए चेतावनी
भी है। यह बताती
है कि जब अपराध
और सत्ता का गठजोड़ मजबूत
होता है, तो सबसे
ज्यादा नुकसान आम नागरिक को
उठाना पड़ता है। या
यूं कहे फिल्म यह
साफ संदेश देती है कि
अगर अपराध और सत्ता का
गठजोड़ नहीं टूटा, तो
इसका खामियाजा पूरे समाज को
भुगतना पड़ेगा।
अब सख्ती ही एकमात्र रास्ता
डॉ. सूर्य कुमार
शुक्ला के दावे और
‘धुरंधर’ जैसी फिल्में यह
संकेत देती हैं कि
अब समय आ गया
है, अपराध और राजनीति के
गठजोड़ को तोड़ने का,
कानून के शासन को
सख्ती से लागू करने
का, समाज को ऐसे
तत्वों के खिलाफ जागरूक
करने का. क्योंकि जब
अपराधी सत्ता के करीब होते
हैं, तो सबसे बड़ा
नुकसान देश और उसके
आम नागरिक को ही उठाना
पड़ता है।
जाली नोट : देश की अर्थव्यवस्था पर सीधा हमला
सबसे गंभीर आरोप
जाली नोटों के नेटवर्क को
लेकर है। डॉ. शुक्ला
के अनुसार, यह गैंग बड़े
स्तर पर नकली करेंसी
को बाजार में उतारता था।
इसके खतरनाक परिणाम : आम जनता की
मेहनत की कमाई पर
चोट, बाजार में अविश्वास का
माहौल, देश की आर्थिक
व्यवस्था को कमजोर करना.
जाली नोटों से हुई कमाई
को फिर गैंग की
ताकत बढ़ाने में लगाया जाता
था, यानी अपराध खुद
को लगातार मजबूत करता रहा।
अपराध और सियासत का गठजोड़ तोड़ना ही होगा
डॉ. सूर्य कुमार
शुक्ला के बयान और
फिल्म ‘धुरंधर’ ने उस बहस
को फिर जिंदा कर
दिया है, जिसे अक्सर
दबा दिया जाता है।
जरूरत है, अपराधियों को
राजनीति से दूर रखा
जाए, कानून का राज हर
हाल में कायम हो,
समाज ऐसे तत्वों को
नकारे. क्योंकि जब माफिया ‘ताकत’
बन जाते हैं, तब
लोकतंत्र कमजोर और आम आदमी
सबसे ज्यादा असहाय हो जाता है।



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