रामनवमी : दर्द को धर्म बना देने वाले श्रीराम
भारत की आत्मा में कुछ नाम केवल उच्चारित नहीं होते, वे जिए जाते हैं। राम नवमी का पर्व ऐसा ही एक अवसर है, जब समय की धारा मानो ठहर जाती है और समूचा समाज उस आदर्श को याद करता है, जिसने मानव जीवन को मर्यादा का अर्थ समझाया। यह केवल एक जन्मोत्सव नहीं, बल्कि उस चेतना का पुनर्जागरण है, जिसने हर युग में सत्य, त्याग और धर्म के मार्ग को प्रकाशित किया है। राम का नाम लेते ही मन में एक ऐसे व्यक्तित्व की छवि उभरती है, जिसने सत्ता को सेवा, संबंधों को समर्पण और संघर्ष को साधना बना दिया। आज जब आधुनिकता की चकाचौंध में मूल्य धुंधले पड़ रहे हैं, तब राम नवमी हमें ठहरकर यह सोचने का अवसर देती है कि क्या हमने विकास की दौड़ में अपने नैतिक आधार खो दिए हैं? यह पर्व मंदिरों की घंटियों और भक्ति गीतों तक सीमित नहीं है, यह आत्ममंथन का क्षण है। यह पूछता है कि क्या हमारे भीतर भी वह साहस है, जो कठिन परिस्थितियों में भी सही का साथ दे सके। राम नवमी दरअसल एक स्मरण है कि राम का जन्म इतिहास की घटना नहीं, बल्कि हर उस हृदय में होता है, जहां सत्य और कर्तव्य का निवास
सुरेश गांधी
भारतीय सभ्यता में कुछ तिथियां
केवल कैलेंडर का हिस्सा नहीं
होतीं, वे समय के
प्रवाह में स्थायी प्रकाशस्तंभ
बन जाती हैं। राम
नवमी ऐसी ही एक
तिथि हैकृजब त्रेतायुग में अयोध्या की
पावन धरती पर जन्म
हुआ उस पुरुष का,
जिसे इतिहास ने भगवान कहा,
समाज ने आदर्श माना
और युगों ने “मर्यादा पुरुषोत्तम”
के रूप में स्थापित
किया। लेकिन क्या राम नवमी
केवल भगवान श्रीराम के जन्म का
उत्सव है? या यह
उस विचार, उस मर्यादा, उस
संघर्ष और उस संतुलन
का उत्सव है, जिसकी आज
के समय में सबसे
अधिक आवश्यकता है? यह प्रश्न
ही इस पर्व की
आत्मा को समझने की
कुंजी है।
राम का जीवन
किसी चमत्कारी कथा का विस्तार
भर नहीं है। यह
एक ऐसे आदर्श की
प्रस्तुति है, जिसमें मनुष्य
के हर रूप, पुत्र,
भाई, पति, मित्र, राजाकृका
सर्वोत्तम स्वरूप दिखाई देता है। राम
के जीवन की सबसे
बड़ी विशेषता यह है कि
उन्होंने कभी भी “सही”
और “सुविधाजनक” के बीच भ्रम
नहीं किया। उन्होंने हमेशा “सही” को चुना,
भले ही वह सबसे
कठिन क्यों न हो। राज्याभिषेक
के क्षण में वनवास
स्वीकार करना, यह केवल एक
पुत्र का त्याग नहीं
था, यह समाज के
लिए एक संदेश था
कि धर्म का पालन
व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं से
ऊपर होता है। आज
जब राजनीति से लेकर व्यक्तिगत
जीवन तक, हर जगह
समझौते और अवसरवाद का
बोलबाला है, राम का
यह निर्णय हमें आईना दिखाता
है।
रामराज्य केवल एक पौराणिक
कल्पना नहीं है, बल्कि
एक ऐसा आदर्श शासन
तंत्र है, जिसकी चर्चा
आज भी राजनीतिक विमर्श
में होती है। रामराज्य
की विशेषताएं :- न्यायपूर्ण प्रशासन, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व, समाज
के अंतिम व्यक्ति तक सुख-सुविधाओं
की पहुंच, धर्म और नीति
का संतुलन. आज जब शासन
व्यवस्था पर सवाल उठते
हैं, भ्रष्टाचार और असमानता की
चर्चा होती है, तब
रामराज्य एक मानक के
रूप में सामने आता
है। यह हमें याद
दिलाता है कि सत्ता
का उद्देश्य शासन नहीं, सेवा
होना चाहिए। राम कथा में
माता सीता का स्थान
अत्यंत महत्वपूर्ण है। सीता केवल
एक पात्र नहीं, बल्कि नारी शक्ति, धैर्य
और त्याग का प्रतीक हैं।
राम का सीता के
प्रति सम्मान और उनका साथ
यह दर्शाता है कि समाज
में नारी का स्थान
केवल “सहायक” का नहीं, बल्कि
“समान भागीदारी” का है।
हालांकि सीता के वनवास
जैसे प्रसंगों पर आधुनिक दृष्टिकोण
से सवाल भी उठते
हैं, लेकिन यह भी सत्य
है कि राम ने
अपने व्यक्तिगत जीवन को भी
राजधर्म के अधीन रखा.
यह द्वंद्व ही राम कथा
को जीवंत बनाता है, जहां आदर्श
और यथार्थ का संघर्ष दिखाई
देता है। राम के
जीवन में हनुमान, सुग्रीव
और विभीषण जैसे पात्र केवल
सहयोगी नहीं, बल्कि समर्पण के उदाहरण हैं।
हनुमान की भक्ति, सुग्रीव
की मित्रता और विभीषण का
सत्य के पक्ष में
खड़ा होना, ये सभी हमें
यह सिखाते हैं कि संबंध
केवल लाभ पर नहीं,
विश्वास और धर्म पर
आधारित होने चाहिए। आज
के दौर में जहां
रिश्ते अक्सर स्वार्थ के तराजू पर
तौले जाते हैं, राम
कथा हमें सच्चे संबंधों
का मूल्य समझाती है। राम नवमी
के दिन मंदिरों में
भीड़, भजन-कीर्तन और
झांकियां इस पर्व की
बाहरी अभिव्यक्ति हैं। लेकिन इसका
आंतरिक पक्ष कहीं अधिक
गहरा है। यह दिन
हमें अपने भीतर झांकने
का अवसर देता है,
क्या हम अपने कर्तव्यों
के प्रति ईमानदार हैं? क्या हम
अपने संबंधों में मर्यादा का
पालन करते हैं? क्या
हम समाज के प्रति
अपनी जिम्मेदारी समझते हैं? अगर इन
प्रश्नों का उत्तर “नहीं”
है, तो राम नवमी
केवल एक औपचारिकता बनकर
रह जाती है।
राम नवमी पर
अयोध्या में उमड़ने वाली
श्रद्धा और काशी के
घाटों पर गूंजती रामधुन
यह दर्शाती है कि राम
केवल एक स्थान विशेष
के नहीं, बल्कि पूरे भारत की
आत्मा हैं। गंगा के
तट पर बैठा एक
साधक जब “राम नाम”
का जाप करता है,
तो वह केवल ईश्वर
का स्मरण नहीं करता, बल्कि
अपने भीतर के विकारों
को भी शुद्ध करता
है। आज का समाज
अनेक चुनौतियों से जूझ रहा
है, नैतिक मूल्यों का ह््रास, सामाजिक
विभाजन, स्वार्थ और अवसरवाद की
प्रवृत्ति. ऐसे समय में
राम का जीवन एक
मार्गदर्शक के रूप में
सामने आता है। राम हमें सिखाते
हैं, शक्ति का उपयोग संरक्षण
के लिए होना चाहिए,
दमन के लिए नहीं.
नेतृत्व का आधार सेवा
होना चाहिए, स्वार्थ नहीं, धर्म का अर्थ
केवल पूजा नहीं, बल्कि
कर्तव्य पालन है.
राम नवमी केवल
एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि
एक सामाजिक और नैतिक आंदोलन
है। यह हमें यह
संकल्प लेने का अवसर
देती है कि हम
अपने जीवन में मर्यादा
को स्थान देंगे. हम अपने कर्तव्यों
का पालन करेंगे. हम
समाज के प्रति अपनी
जिम्मेदारी समझेंगे. राम का जन्म
त्रेतायुग में हुआ था,
लेकिन “रामत्व” हर युग में
जन्म ले सकता है,
जरूरत है तो केवल
उसे पहचानने और अपनाने की।
राम को “मर्यादा पुरुषोत्तम”
क्यों कहा गया? क्योंकि
उन्होंने हर संबंध की
एक सीमा तय की
और उस सीमा का
पालन किया। पुत्र के रूप में,
उन्होंने पिता के वचन
को सर्वोपरि रखा. भाई के
रूप में, भरत और
लक्ष्मण के प्रति समर्पण
दिखाया. पति के रूप
मेंकृसीता के प्रति आदर्श
निष्ठा रखी. राजा के
रूप मेंकृप्रजा के हित को
सर्वोच्च स्थान दिया. यह मर्यादा ही
राम को देवत्व के
करीब ले जाती है।
आज के दौर में
जब “सीमाओं का अतिक्रमण” आधुनिकता
का प्रतीक माना जाने लगा
है, राम का जीवन
हमें यह सिखाता है
कि सीमाएं बंधन नहीं, बल्कि
संतुलन का आधार होती
हैं।


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