डिजिटल दानव
का
शिकंजा
फेसबुकिया जाल में फंसती बेटियां, बिखरते परिवार और बेबस कानून!
डिजिटल युग में फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म ने जहां संवाद और अभिव्यक्ति के नए रास्ते खोले, वहीं इसके दुरुपयोग ने समाज के सामने गंभीर संकट भी खड़ा कर दिया है। फर्जी प्रोफाइल, अश्लील कंटेंट और ऑनलाइन रिश्तों के नाम पर बढ़ते शोषण ने खासकर महिलाओं और युवाओं को असुरक्षा के दायरे में ला खड़ा किया है। यूपी, बिहार, एमपी, महाराष्ट्र सहित देश के विभिन्न शहरों की ग्राउंड रिपोर्ट यह संकेत देती है कि यह समस्या अब व्यक्तिगत नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक संकट बन चुकी है। इसी बीच सरकार और मार्क जुकरबर्ग के नेतृत्व वाली मेटा प्लेटफार्म के संबंधों को लेकर भी सवाल उठते हैं, क्या नियमन कमजोर है या तकनीकी तंत्र ही नियंत्रण से बाहर होता जा रहा है? सच्चाई यह है कि कानून मौजूद हैं, लेकिन क्रियान्वयन, प्लेटफॉर्म की जवाबदेही और समाज की जागरूकता, तीनों की कमी इस संकट को गहरा कर रही है। यह केवल तकनीक का मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन और सुरक्षा का प्रश्न है, जहां अब निर्णायक हस्तक्षेप की आवश्यकता है
सुरेश गांधी
कभी दुनिया को
जोड़ने का सपना दिखाने
वाला फेसबुक आज एक नए
तरह के खतरे के
रूप में देखा जाने
लगा है। मेटा प्लेटफार्म
के दावे अपनी जगह
हैं, कड़े नियम, एआई
मॉडरेशन, ट्रांसपेरेंसी रिपोर्ट, लेकिन जमीन पर हालात
कुछ और ही कहानी
कहते हैं। देश के
विभिन्न शहरों से लेकर छोटे
कस्बों तक, सोशल मीडिया
अब सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं,
बल्कि फर्जी पहचान का हथियार, भावनात्मक
शोषण का जरिया, और
अश्लीलता का प्रसारक बनता
दिख रहा है। यह
अलग बात है कि
सोशल मीडिया अपने आप में
न तो अच्छा है,
न बुरा। यह एक उपकरण
है, जिसका उपयोग उसे दिशा देता
है। लेकिन जब : लाभ की
दौड़, एल्गोरिदम का दबाव और
यूज़र की लापरवाही, तीनों
मिल जाते हैं, तो
परिणाम होता है, एक
ऐसा डिजिटल माहौल, जो समाज के
लिए खतरा बन जाता
है।
ये उदाहरण नहीं हकीकत
फेसबुकिया अराजकता पर कौन जिम्मेदार?”
जब पीएम मोदी
और मार्क जुकरबर्ग एक मंच साझा
करते हैं, डिजिटल इंडिया
की बात होती है,
निवेश की चर्चा होती
है, तो यह स्वाभाविक
है कि लोगों के
मन में भरोसा भी
बनता है और शंका
भी। लेकिन आज जब फेसबुक
पर अश्लीलता, फर्जी आईडी, और ऑनलाइन शोषण
के आरोप बढ़ रहे
हैं, तो यह सवाल
उठना लाजिमी है : क्या सरकार
सख्त नहीं हो रही?
या प्लेटफॉर्म बेलगाम है? आलोचकों का
तर्क है : मेटा प्लेटफार्म
भारत में एक बड़ा
डिजिटल निवेशक है. सरकार “डिजिटल
ग्रोथ” के नाम पर
कंपनियों पर ज्यादा सख्ती
नहीं करती. आपत्तिजनक कंटेंट पर कार्रवाई धीमी,
फर्जी अकाउंट आसानी से सक्रिय, शिकायतों
का निस्तारण कमजोर. इस आधार पर
कुछ लोग यह नैरेटिव
बनाते हैं कि सरकार
और कंपनियों के बीच नजदीकी
का असर नियमों पर
दिखता है. ऐसे में
बड़ा सवाल तो यही
है क्या सरकार ने
सख्ती नहीं की? यह
आरोप पूरी तस्वीर नहीं
दिखाते। सरकार के कदम : इनफार्मेशन
टेक्नोलॉजी रुल्स 2021 लागू किए गए,
सोशल मीडिया कंपनियों को : ग्रिवांस ऑफिसर
नियुक्त करना, 24 घंटे में शिकायत
दर्ज करना, 72 घंटे में डेटा
उपलब्ध कराना. कई मौकों पर
सरकार और मेटा प्लेटफार्म
के बीच, कंटेंट हटाने
को लेकर टकराव भी
सामने आया, यानी यह
कहना कि “सरकार कुछ
नहीं कर रही” भी
अधूरा सच है। असली
समस्या, सिस्टम की सीमाएं. 1. टेक्नोलॉजी
की सीमा : हर सेकंड लाखों
पोस्ट, एआई मॉडरेशन की
अपनी सीमाएं, 2. अपराध का बदलता तरीका
: फर्जी आईडी, वीपीएन. अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क. 3. कानून बनाम क्रियान्वयन : कानून
मौजूद, लेकिन जांच और पकड़
धीमी यानी समस्या “दोस्ती”
नहीं, बल्कि “जटिल डिजिटल इकोसिस्टम”
है। ताबड़तोड बढ़ रही घटनाएं
यह बताने के लिए काफी
है : अपराध बढ़ रहे, पीड़ित
बढ़ रहे, लेकिन न्याय
की गति धीमी है.
यहां आम नागरिक यह
नहीं देखता कि कानून किसका
है या प्लेटफॉर्म किसका,
उसे चाहिए सुरक्षा।
कंटेंट की गिरती मर्यादा : “वायरल” के नाम पर अश्लीलता
सोशल मीडिया की
सबसे बड़ी ताकत है,
“वायरल होने की क्षमता”। लेकिन यही
ताकत अब उसकी सबसे
बड़ी कमजोरी बनती जा रही
है। आज प्लेटफॉर्म पर
बड़ी संख्या में ऐसा कंटेंट
मौजूद है जो : अश्लीलता
की सीमा को छूता
या पार करता है.
महिलाओं को वस्तु की
तरह प्रस्तुत करता है. युवा
मन पर गलत प्रभाव
डालता है. हालांकि मेटा
प्लेटफार्म की नीतियां स्पष्ट
रूप से नग्नता और
पोर्नोग्राफी पर प्रतिबंध लगाती
हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि
“सजेस्टिव कंटेंट” और “बॉर्डरलाइन अश्लीलता”
एल्गोरिदम के जरिए तेजी
से फैलती है। सवाल यह
है कि : क्या प्लेटफॉर्म
की प्राथमिकता “नैतिकता” है या “एंगेजमेंट”?
क्योंकि जितना ज्यादा यूज़र रुकता है,
उतना ज्यादा विज्ञापन और उतनी ज्यादा
कमाई। आंकड़ों में देखा जाएं
तो भारत में डिजिटल
व्यवहार पर हुए कई
सर्वे इस चिंता को
पुष्ट करते हैं : इंटरनेट
एंड मोबाइल एसोसिएशन आफ इंडिया के
अनुसार : लगभग 35 से 40 फीसदी यूज़र्स ने स्वीकार किया
कि उन्हें सोशल मीडिया पर
आपत्तिजनक या अश्लील कंटेंट
देखने को मिलता है.
नेशनल कमिशन फार वोमेन के
पास ऑनलाइन उत्पीड़न की शिकायतों में
लगातार वृद्धि हुई है. मतलब
साफ है साइबर अपराधों
में सोशल मीडिया की
भूमिका तेजी से बढ़
रही है. खासकर महिलाओं
और युवतियों को निशाना बनाने
वाले मामलों में वृद्धि हुई
है. समस्या काल्पनिक नहीं, यह व्यापक, गहरी
और चिंताजनक है। सोशल मीडिया
की सबसे खतरनाक खामी
है, “पहचान की अस्थिरता”।
इंडियन साइबर क्राइम कोआरडिनेशन सेंटर के अनुसार : आधे
से अधिक साइबर अपराधों
में फर्जी प्रोफाइल का उपयोग होता
है. इन फर्जी आईडी
का उपयोग : दोस्ती और रिश्ते का
झांसा देने, निजी जानकारी हासिल
करने, ब्लैकमेल और आर्थिक ठगी
के लिए किया जाता
है. यह केवल तकनीकी
समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक संकट
है।
एल्गोरिदम, मुनाफे का खेल
मेटा प्लेटफार्म का
एल्गोरिदम : “ज्यादा समय = ज्यादा मुनाफा” इसलिए : उत्तेजक कंटेंट ज्यादा फैलता है, नैतिक कंटेंट
पीछे छूटता है. यही डिजिटल
अर्थव्यवस्था का कड़वा सच
है।
महिलाएं, सबसे बड़ी पीड़ित
नेशनल कमिशन फार वोमेन के
अनुसार : ऑनलाइन उत्पीड़न के मामले लगातार
बढ़े, ग्राउंड में : मॉर्फ्ड फोटो, अश्लील मैसेज, ट्रोलिंग, यह “डिजिटल हिंसा”
है।
समाज पर गहरा असर
परिवार टूट रहे, युवा
भ्रमित, मानसिक तनाव, अपराध का विस्तार. यह
संकट अब व्यक्तिगत नहीं,
सामाजिक बन चुका है।
जिम्मेदारी तय करनी होगी
मेटा प्लेटफॉर्म को
: फर्जी अकाउंट पर तत्काल कार्रवाई,
एल्गोरिदम में सुधार, सरकार,
साइबर पुलिस को मजबूत, स्कूल
स्तर पर डिजिटल शिक्षा,
समाज, सतर्कता, जागरूकता.
राजनीतिक और नीतिगत टकराव
भारत में कई
बार सरकार और सोशल मीडिया
कंपनियों के बीच टकराव
सामने आया है : कंटेंट
हटाने को लेकर विवाद,
डेटा और प्राइवेसी पर
सवाल, यह लड़ाई “अभिव्यक्ति
की स्वतंत्रता” बनाम “सुरक्षा” के बीच फंसी
है।
मुनाफा बनाम मर्यादा : असली टकराव
मेटा प्लेटफार्म का
मॉडल : यूज़र जितना रुकेगा,
उतना मुनाफा, इसलिए, उत्तेजक कंटेंट तेजी से फैलता
है, विवादास्पद चीजें ज्यादा दिखती हैं, यही वह
जगह है जहां सरकार
और कंपनी के बीच असली
टकराव होना चाहिए, लेकिन
अक्सर यह टकराव अधूरा
रह जाता है।
जनता की धारणा : ‘दोस्ती’ क्यों दिखती है?
इसके पीछे तीन
कारण हैं : 1. हाई-प्रोफाइल मीटिंग्स,
मोदी - जुकरबर्ग मुलाकातें चर्चा में रहती हैं.
2. डिजिटल इंडिया का नैरेटिव, सरकार
टेक कंपनियों को प्रोत्साहित करती
है. 3. जमीनी समस्याओं का समाधान धीमा,
जब समस्या हल नहीं होती,
तो लोग कारण “नजदीकी”
में खोजने लगते हैं, मतलब
साफ है दोस्ती नहीं,
जवाबदेही का सवाल है,
न तो यह पूरी
तरह “दोस्ती का खेल” है
और न ही “सरकार
पूरी तरह बेबस, असल
सच्चाई : प्लेटफॉर्म मुनाफे के दबाव में,
सरकार संतुलन के दबाव में
और जनता असुरक्षा के
बीच फंसी है.
अब क्या होना चाहिए?
सरकार को : कानून का
कड़ाई से पालन कराना
होगा, साइबर पुलिस को टेक्नोलॉजी से
लैस करना होगा, मेटा
प्लेटफार्म को : एल्गोरिदम पारदर्शी
बनाना होगा, फर्जी अकाउंट पर तुरंत कार्रवाई
करनी होगी. समाज को : डिजिटल
साक्षरता बढ़ानी होगी, अंधविश्वास से बचना होगा.
मतलब साफ है सवाल
‘दोस्ती’ का नहीं, जवाबदेही
का है। अगर सरकार
सख्त नहीं होगी, तो
प्लेटफॉर्म बेलगाम होंगे। और अगर प्लेटफॉर्म
जिम्मेदार नहीं बने, तो
समाज इसकी कीमत चुकाएगा।
डिजिटल भारत का सपना
तभी सुरक्षित होगा, जब ‘डेटा’ नहीं,
‘नागरिक’ सबसे ऊपर होंगे।
फेसबुक बन चुका है समाज का कुरुप चेहरा
सामाजिक कार्यकर्ता लेनिन रघुवंशी कहते है : यहां
फेसबुक पर बने रिश्ते
कई बार घर टूटने
की वजह बन जाते
हैं, लेकिन लोग खुलकर बोलते
नहीं। हाल यह है
कि फेसबुकिया जाल अब सिर्फ
एक ऐप नहीं रहा,
यह एक ऐसा दर्पण
बन चुका है, जिसमें
समाज का सबसे कुरूप
चेहरा दिखने लगा है। अगर
समय रहते इसे नहीं
रोका गया, तो यह
‘वर्चुअल जहर’ आने वाली
पीढ़ियों के भविष्य को
खोखला कर देगा। स्थानीय
स्तर पर बातचीत में
सामने आया कि : कॉलेज
जाने वाली छात्राएं सोशल
मीडिया पर बने रिश्तों
में जल्दी विश्वास कर लेती हैं.
कई मामलों में यह “प्यार”
धीरे-धीरे “प्रेशर” में बदल जाता
है. शिक्षक आशुतोश मिश्रा का कहना है
: बच्चों को यह समझ
ही नहीं कि स्क्रीन
के पीछे कौन है...
वे भावनाओं में बह जाते
हैं। सोशल मीडिया की
टाइमलाइन अब सिर्फ जानकारी
नहीं दिखाती, बल्कि उत्तेजना और सनसनी का
मिश्रण बनती जा रही
है। छोटे वीडियो, रील्स
और फोटो के जरिए
“वायरल” होने की होड़
में मर्यादा की सीमाएं टूट
रही हैं.
ऑनलाइन रिश्ते : प्यार या जाल?
सोशल मीडिया ने
रिश्तों की परिभाषा बदल
दी है। जहां पहले
रिश्ते समय, विश्वास और
सामाजिक दायरे में बनते थे,
अब वे : कुछ चैट,
कुछ फोटा और कुछ
वादों पर आधारित हो
गए हैं. कई मामलों
में देखा गया है
: युवतियों को प्रेम और
विवाह का झांसा, निजी
तस्वीरों का दुरुपयोग, मानसिक
और आर्थिक शोषण. यहां एक जरूरी
तथ्य भी समझना होगा
: हर अपराध को किसी एक
समुदाय या विशेष शब्दावली
से जोड़ना तथ्यात्मक और कानूनी रूप
से सही नहीं होता।
असल समस्या है : धोखाधड़ी, शोषण
और डिजिटल अनभिज्ञता.
“एल्गोरिदम” : अदृश्य नियंत्रक
सोशल मीडिया का
असली खेल “एल्गोरिदम” चलाता
है। यह तय करता
है कि : आपको क्या
दिखेगा, कितना दिखेगा, और कितनी बार
दिखेगा. समस्या यह है कि
: एल्गोरिदम “एंगेजमेंट” को प्राथमिकता देता
है, “संवेदनशीलता” को नहीं. इसका
परिणाम : सनसनीखेज और उत्तेजक कंटेंट
ज्यादा फैलता है. नैतिक और
संतुलित कंटेंट पीछे छूट जाता
है. यानी प्लेटफॉर्म भले
सीधे अश्लीलता न परोसे, लेकिन
उसका सिस्टम उसे बढ़ावा जरूर
देता है।
महिलाओं और युवाओं पर असर
इस डिजिटल अराजकता
का सबसे बड़ा असर
पड़ता है, महिलाओं और
किशोरियों पर. यूएन वोमेन
के अनुसार : ऑनलाइन उत्पीड़न महिलाओं के लिए एक
बड़ी चुनौती बन चुका है.
भारत में : ब्लैकमेल, ट्रोलिंग और मानसिक उत्पीड़न
के मामले तेजी से बढ़े
हैं. कई मामलों में
यह स्थिति इतनी गंभीर हो
जाती है कि पीड़ित
आत्मघाती कदम तक उठा
लेते हैं.
समाज पर व्यापक प्रभाव
यह केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक संकट है : 1. नैतिक गिरावट : अश्लील और भ्रामक कंटेंट से सामाजिक मूल्यों पर असर. 2. रिश्तों में अविश्वास : ऑनलाइन धोखाधड़ी से वास्तविक रिश्ते भी प्रभावित. 3. मानसिक स्वास्थ्य संकट : डिप्रेशन, चिंता और असुरक्षा की भावना. 4. अपराध में वृद्धि.




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