Wednesday, 8 April 2026

जब सुर बने संकल्प: मोहन वीणा से विश्व शांति की पुकार!

जब सुर बने संकल्प: मोहन वीणा से विश्व शांति की पुकार! 

वाराणसी के संकट मोचन मंदिर का पावन प्रांगण मंगलवार की रात केवल संगीत का साक्षी नहीं बना, बल्कि वह एक वैश्विक संदेश का केंद्र बन गया। जब दुनिया के कोने-कोने में युद्ध, तनाव और अस्थिरता की खबरें गूंज रही हैं, ठीक उसी समय पद्म भूषण पंडित विश्व मोहन भट्ट ने अपनी मोहन वीणा के सुरों से मानो विश्व को ठहरने का आह्वान किया। उनके साथ सात्विक वीणा पर पंडित सलिल भट्ट की संगति ने इस संदेश को और भी प्रभावशाली बना दिया। रागविश्व रंजनीकी प्रस्तुति केवल एक संगीत रचना नहीं थी, बल्कि वह एक भावपूर्ण प्रार्थना थी, मानवता के लिए, शांति के लिए, संतुलन के लिए। आलाप से लेकर झाला तक हर सुर में एक बेचैनी भी थी और उसे शांत करने की साधना भी। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो सुरों के माध्यम से युद्ध के वातावरण पर नियंत्रण पाने और विश्व को एक नई दिशा देने की कोशिश की जा रही हो। संकट मोचन की यह प्रस्तुति इस बात का सशक्त प्रमाण बन गई कि जब शब्द विफल हो जाते हैं, तब संगीत ही वह भाषा बनता है जो सीधे हृदय से संवाद करता है

सुरेश गांधी

दुनिया जब युद्ध, तनाव और अनिश्चितताओं के दौर से गुजर रही हो, जब मनुष्य के भीतर का संतुलन डगमगाने लगे और सभ्यताओं के बीच संवाद की जगह टकराव ले ले, तब कोई एक स्वर, कोई एक धुन, कोई एक साधना ऐसी भी होती है जो इस कोलाहल को चीरते हुए सीधे हृदय तक पहुंचती है। काशी के संकट मोचन मंदिर में आयोजित संगीत समारोह की वह रात कुछ ऐसी ही थी, जब सुरों ने केवल वातावरण को ही नहीं, बल्कि समय को भी थाम लिया। यह प्रस्तुति केवल एक सांगीतिक आयोजन नहीं थी, बल्कि वह एक गूढ़ आध्यात्मिक अनुभव थी, एक ऐसी साधना, जिसमें सुर प्रार्थना बन गए, राग संदेश बन गया और वादन एक वैश्विक संवाद। पद्म भूषण पंडित विश्व मोहन भट्ट और उनके सुपुत्र पंडित सलिल भट्ट की जुगलबंदी ने इस अनुभव को चरम तक पहुंचाया।

संकट मोचन मंदिर का संगीत समारोह केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि एक परंपरा है, एक ऐसी परंपरा, जिसमें कलाकार मंच पर नहीं, बल्कि आराधना के भाव से उपस्थित होता है। यहां प्रस्तुत हर सुर, हर लय, हर ताल सीधे पवनपुत्र हनुमान के चरणों में समर्पित होती है। इस पावन वातावरण में जब पंडित विश्व मोहन भट्ट ने मोहन वीणा के तारों को स्पर्श किया, तो वह केवल वादन नहीं था। वह एक प्रार्थना थी, एक आह्वान था, एक ऐसे समय में जब दुनिया को सबसे अधिक शांति की आवश्यकता है। पिता और पुत्र की जुगलबंदी भारतीय शास्त्रीय संगीत की परंपरा में कोई नई बात नहीं, लेकिन पंडित विश्व मोहन भट्ट और पंडित सलिल भट्ट की संगति में एक विशेष गहराई दिखाई देती है। यह केवल सुरों का मेल नहीं, बल्कि अनुभव और नवाचार का संवाद है। मोहन वीणा और सात्विक वीणा का यह संगम परंपरा और आधुनिकता के बीच एक सेतु का कार्य करता है। जहां एक ओर पिता के सुरों में दशकों की साधना और गहराई है, वहीं पुत्र के वादन में नवीनता और विस्तार का साहस। 

इस प्रस्तुति का केंद्र रहा रागविश्व रंजनी”, एक ऐसा राग, जो केवल संगीत की दृष्टि से नहीं, बल्कि अपने भाव और संदेश के कारण भी विशेष बन गया। आज जब विश्व युद्ध जैसे हालात, राजनीतिक तनाव और सामाजिक अस्थिरता चारों ओर व्याप्त है, तब इस राग की प्रस्तुति एक संयोग नहीं, बल्कि एक सुसंगत संकल्प प्रतीत होती है। आलाप की गंभीरता से शुरू होकर जोड़ और झाला की गतिशीलता तक, और फिर विलंबित एवं द्रुत लय की रचनाओं में विकसित होता यह राग मानो एक कथा कहता है, अशांति से शांति की यात्रा की कथा। संगीत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह भाषा और सीमाओं से परे होता है। जब शब्द विफल हो जाते हैं, तब सुर ही वह माध्यम बनते हैं, जो सीधे मन और आत्मा से संवाद करते हैं। संकट मोचन की इस प्रस्तुति में यही अनुभव बार-बार उभर कर सामने आया। हर आलाप, हर तान, हर झंकार में एक ऐसी पुकार थी, जो मानो कह रही होकृरुको, ठहरो, सोचो और शांति की ओर लौटो।

पंडित विश्व मोहन भट्ट का सबसे बड़ा योगदान केवल उनका वादन नहीं, बल्कि उनका नवाचार भी है। उन्होंने गिटार को भारतीय शास्त्रीय संगीत के अनुरूप ढालकरमोहन वीणाका निर्माण किया, एक ऐसा वाद्य, जिसने भारतीय संगीत को एक नई पहचान दी। उनकी यह साधना केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि भारतीय संगीत की वैश्विक प्रतिष्ठा का आधार भी बनी। 1993 मेंमीटिंग बाई दी रीवरके लिए प्राप्त ग्रैमी पुरस्कार इसका प्रमाण है। पंडित सलिल भट्ट ने अपने पिता की इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुएसात्विक वीणाका निर्माण किया। यह वाद्य केवल ध्वनि के स्तर पर समृद्ध है, बल्कि उसमें एक आध्यात्मिक गहराई भी है। उनका वादन इस बात का प्रमाण है कि परंपरा स्थिर नहीं होती, बल्कि वह समय के साथ विकसित होती रहती है।

जयपुर में प्रस्तुत वह अद्भुत क्षण, जब पंडित विश्व मोहन भट्ट ने 35 मिनट में 52 राग प्रस्तुत किए, उनकी साधना और कौशल का चरम उदाहरण है। हर राग का अपना एक अलग भाव, एक अलग आत्मा होती है। एक राग में पूरी तरह डूबकर फिर अगले राग में प्रवेश करना केवल तकनीकी कौशल नहीं, बल्कि एक गहन मानसिक और आध्यात्मिक अनुशासन की मांग करता है। इस प्रस्तुति में तबले पर बनारस घराने के पंडित राम कुमार मिश्रा और असम के कौशिक कंवर की संगत ने संगीत को और भी ऊंचाई प्रदान की। तबला केवल लय का आधार नहीं रहा, बल्कि उसने वादन को एक नई ऊर्जा और गति दी। प्रस्तुति के अंतिम चरण में जब श्रीराम भजन की धुन गूंजी, तो पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। यह केवल एक समापन नहीं था, बल्कि एक पूर्ण समर्पण था, एक ऐसी साधना का, जो संगीत के माध्यम से ईश्वर तक पहुंचती है। आज के समय में जब मनुष्य बाहरी प्रगति के बावजूद आंतरिक शांति से दूर होता जा रहा है, तब संगीत एक ऐसी शक्ति के रूप में सामने आता है, जो उसे उसके मूल से जोड़ सकता है।

पंडित विश्व मोहन भट्ट और पंडित सलिल भट्ट की यह प्रस्तुति इस बात का प्रमाण है कि संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि वह एक ऐसी साधना है, जो मानवता को एक सूत्र में बांध सकती है। संकट मोचन की वह रात केवल एक सांगीतिक स्मृति नहीं, बल्कि एक संदेश है, एक ऐसा संदेश, जो हमें यह याद दिलाता है कि चाहे दुनिया कितनी भी अशांत क्यों हो, एक सुर, एक राग, एक साधना ऐसी होती है, जो उसे फिर से संतुलन की ओर ले जा सकती है। यह प्रस्तुति केवल कलाकारों की नहीं, बल्कि उस भारतीय सांस्कृतिक परंपरा की विजय है, जो आज भी विश्व को शांति, संतुलन और सह-अस्तित्व का मार्ग दिखाने में सक्षम है। और शायद यही संगीत का सबसे बड़ा उद्देश्य भी है, मनुष्य को मनुष्य से जोड़ना, और उसे स्वयं से मिलाना।

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