‘खास दिन’ का सच : जिनके लिए था जश्न, वही रोटी की जंग में सड़कों पर पसीना बहाते मिले
आठ घंटे
काम,
आठ
घंटे
आराम
और
आठ
घंटे
मनोरंजन
की
हकीकत
बयां
करती
तस्वीरें
सुरेश गांधी
वाराणसी. सुबह के आठ बजते ही शहर की सड़कों पर चहल-पहल बढ़ने लगती है। कहीं मंच सज रहे हैं, कहीं बैनर टंग चुके हैं, कहीं भाषणों की तैयारी है—“आज का दिन खास है”, यह वाक्य हर ओर गूंज रहा है। लेकिन इसी शोर-शराबे से कुछ ही कदम दूर, उन्हीं सड़कों और गलियों में एक और सच्चाई पसरी हुई है—खामोश, लेकिन चुभने वाली। यह रिपोर्ट उन्हीं चेहरों की है, जिनके नाम पर यह ‘खास दिन’ मनाया जा रहा है।
पसीने में भीगी सुबह, पेट की चिंता पहले
जश्न के पोस्टर, लेकिन ज़मीनी सच्चाई अलग
मेहनत की आवाज़, जो भाषणों में नहीं सुनाई देती
इन सड़कों पर
सिर्फ बड़े ही नहीं,
बच्चे भी उसी संघर्ष
का हिस्सा हैं। कोई चाय
की दुकान पर काम कर
रहा है, कोई कूड़ा
बीन रहा है, कोई
रिक्शा में मदद कर
रहा है। जब पूछा
कि स्कूल क्यों नहीं जाते, तो
एक बच्चे ने सीधा जवाब
दिया— “घर में पैसे
नहीं हैं, काम करेंगे
तो ही खाना मिलेगा।”
यह जवाब किसी भी
जश्न से ज्यादा भारी
पड़ता है।
‘खास दिन’ और ‘कठिन जीवन’ के बीच की खाई
सवाल जो हर साल उठता है
क्या ‘खास दिन’ सिर्फ
एक औपचारिकता बनकर रह गया
है? क्या जश्न और
भाषण उन लोगों तक
पहुंच पा रहे हैं,
जिनके नाम पर ये
सब होता है? हो
जो भी हकीकत तो
यही है जश्न से ज्यादा जरूरी
बदलाव हो. अगर जश्न के दिन
भी हालात नहीं बदलते, तो
फिर इस ‘खास दिन’
का असली मतलब क्या
है? जिनके लिए यह दिन
समर्पित है, अगर वे
ही सड़कों पर पसीना बहाकर
दो जून की रोटी
के लिए संघर्ष कर
रहे हैं, तो जरूरत
सिर्फ जश्न मनाने की
नहीं, बल्कि व्यवस्था में वास्तविक बदलाव
लाने की है। क्योंकि असली
‘खास दिन’ वही होगा,
जब इन सड़कों पर
पसीना नहीं, संतोष दिखेगा।
8 घंटे की शिफ्ट के पीछे का संघर्ष
आज दफ्तरों या कारखानों में 8 घंटे काम करने का नियम हमें बहुत मामूली बात लगती है, लेकिन यह अधिकार किसी ने तोहफे में नहीं दिया है। 19वीं सदी में औद्योगिक क्रांति के दौर में मजदूरों से जानवरों की तरह 12 से 16 घंटे काम लिया जाता था। इस भयानक शोषण के खिलाफ 1 मई 1886 को अमेरिका में एक बड़ा आंदोलन भड़का। मजदूरों की मांग साफ थी- "आठ घंटे काम, आठ घंटे आराम और आठ घंटे मनोरंजन।"शिकागो के हैमार्केट स्क्वायर में इसी मांग को लेकर इकट्ठा हुए मजदूरों पर हिंसा हुई और कई बेगुनाह मारे गए। इस शहादत ने पूरी दुनिया की आंखें खोल दीं। इसी घटना की याद में 1889 में पेरिस के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में यह तय किया गया कि हर साल 1 मई को 'अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस' के रूप में मनाया जाएगा।





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