मंदिर, महोत्सव और मिशन बंगाल… भाजपा का नया हिंदुत्व
चक्रव्यू
अरब सागर के तट पर जब सोमनाथ मंदिर की घंटियां गूंजीं, तो उसकी प्रतिध्वनि केवल गुजरात तक सीमित नहीं रही। वह काशी के घाटों तक पहुंची, बंगाल की राजनीतिक गलियों में सुनाई दी और देश की सियासत में एक नए वैचारिक संग्राम का संकेत बन गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब सोमनाथ को “भारत के स्वाभिमान का पुनर्जागरण” बताया और इतिहास के आक्रांताओं का उल्लेख किया, तब यह साफ हो गया कि भाजपा अब केवल विकास, योजनाओं और चुनावी वादों की राजनीति नहीं कर रही, बल्कि वह भारत की सांस्कृतिक स्मृति को राजनीतिक शक्ति में बदलने की कोशिश कर रही है। काशी विश्वनाथ धाम में योगी आदित्यनाथ और आनंदीबेन पटेल की मौजूदगी, देशभर में निकली कलश यात्राएं, सनातन स्वाभिमान के नारों से भरा माहौल और बंगाल में हिंदुत्व सरकार के दावों ने इस आयोजन को सीधे राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया है। सवाल अब केवल मंदिर का नहीं, बल्कि उस वैचारिक लड़ाई का है, जिसमें भाजपा खुद को “भारत की सभ्यता की संरक्षक” के रूप में स्थापित करना चाहती है। ऐसे में बड़ा सवाल तो यही है हिंदुत्व व सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की सबसे बड़ी रणभेरी बज चुकी है? काशी में योगी, सोमनाथ में मोदी और सड़कों पर कलश यात्राएं... क्या देश की राजनीति अब ‘सभ्यता बनाम आक्रांता’ के निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है? मंदिर, महोत्सव और राष्ट्रवाद... क्या भाजपा “सभ्यता आधारित राजनीति” के नए शिखर पर पहुंच रही है? ये ऐसे सवाल है जो हिन्दुस्तान के सियासी आवोहवा में हर जुबान पर है...
सुरेश गांधी
अरब सागर की
लहरों के किनारे खड़ा
सोमनाथ केवल पत्थरों से
बना मंदिर नहीं है। वह
भारत की उस सभ्यता
का जीवित प्रतीक है, जिसे तलवारों
ने तोड़ने की कोशिश की,
लेकिन मिटा नहीं सके।
इतिहास के धूल भरे
पन्नों में दर्ज है
कि इस मंदिर को
बार-बार ध्वस्त किया
गया, उसके वैभव को
लूटने की कोशिश हुई,
उसकी आस्था को कुचलने का
प्रयास हुआ, लेकिन हर
बार वह पहले से
अधिक तेजस्वी होकर खड़ा हो
गया। आज जब सोमनाथ
मंदिर के पुनर्निर्माण के
75 वर्ष पूरे होने पर
“सोमनाथ अमृत महोत्सव” मनाया
जा रहा है, तब
यह आयोजन केवल धार्मिक उत्सव
नहीं रह गया है।
यह भारत की राजनीति,
सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रवाद के
नए विमर्श का केंद्र बन
चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र
मोदी ने जब सोमनाथ
को “भारत के स्वाभिमान
का प्रतीक” बताया और आक्रांताओं का
उल्लेख करते हुए कहा
कि “सनातन को मिटाने वाली
ताकतें स्वयं इतिहास में मिट गईं”,
तब यह स्पष्ट हो
गया कि भाजपा अब
केवल चुनावी राजनीति नहीं, बल्कि “सभ्यता की राजनीति” का
नया अध्याय लिख रही है।
सोमनाथ... जहां इतिहास आज भी सांस लेता है
सोमनाथ का इतिहास भारत
की पीड़ा और पुनर्जागरण
दोनों की कहानी है।
महमूद गजनवी से लेकर कई
विदेशी आक्रांताओं ने इस मंदिर
को तोड़ा। उसका उद्देश्य केवल
धन लूटना नहीं था, बल्कि
उस आत्मविश्वास को तोड़ना था,
जो भारतीय सभ्यता की आत्मा में
बसता था। लेकिन भारत
की संस्कृति की सबसे बड़ी
शक्ति यही रही कि
उसने पराजय को भी पुनर्जन्म
में बदल दिया। स्वतंत्रता
के बाद सरदार वल्लभभाई
पटेल ने सोमनाथ पुनर्निर्माण
का संकल्प लिया। वह केवल मंदिर
निर्माण नहीं था, बल्कि
गुलामी की मानसिकता से
बाहर निकलने का राष्ट्रीय संकल्प
था। आज प्रधानमंत्री मोदी
उसी इतिहास को नए राजनीतिक
और सांस्कृतिक संदर्भ में स्थापित कर
रहे हैं। भाजपा यह
संदेश देने की कोशिश
कर रही है कि
सदियों तक जिस इतिहास
को दबाया गया, अब उसे
“राष्ट्रीय चेतना” का हिस्सा बनाया
जाएगा।
काशी में योगी-आनंदीबेन की मौजूदगी... केवल संयोग नहीं
बंगाल... जहां हिंदुत्व की सबसे बड़ी परीक्षा
सोमनाथ महोत्सव का राजनीतिक संदेश
सबसे अधिक पश्चिम बंगाल
की ओर भी जाता
दिखाई देता है। भाजपा
जानती है कि बंगाल
केवल एक राज्य नहीं,
बल्कि वैचारिक संघर्ष की भूमि बन
चुका है। रामनवमी की
शोभायात्राएं, दुर्गा पूजा पर विवाद,
हिंदू पलायन का मुद्दा, सीमा
पार घुसपैठ और तुष्टिकरण की
राजनीति... भाजपा इन सभी मुद्दों
को “सांस्कृतिक असुरक्षा” से जोड़कर देखती
है। यही कारण है
कि अब बंगाल में
“योगी मॉडल” की चर्चा तेज
हो गई है। भाजपा
के कई नेता खुलकर
कह रहे हैं कि
यदि बंगाल में भाजपा सरकार
बनी तो “दंगाइयों, माफियाओं
और कट्टरपंथियों” के खिलाफ वैसी
ही कार्रवाई होगी जैसी उत्तर
प्रदेश में हुई। दरअसल
भाजपा बंगाल में केवल सत्ता
नहीं चाहती, वह “हिंदुत्व की
वैचारिक विजय” चाहती है।
कलश यात्राएं... आस्था या राजनीतिक जनसंपर्क?
सोना कम खरीदो, पेट्रोल बचाओ... इसके पीछे का संदेश
प्रधानमंत्री मोदी ने इस
दौरान सोने की खरीद
कम करने, पेट्रोल-डीजल बचाने और
आत्मनिर्भरता बढ़ाने की बात भी
कही। सतह पर यह
आर्थिक अपील लग सकती
है, लेकिन इसके भीतर राजनीतिक
संदेश छिपा है। मोदी
दरअसल “त्याग आधारित राष्ट्रवाद” की भावना को
फिर जीवित करना चाहते हैं।
जिस तरह स्वतंत्रता आंदोलन
में स्वदेशी आंदोलन हुआ था, उसी
तरह अब आर्थिक राष्ट्रवाद
को जनचेतना से जोड़ने का
प्रयास दिखाई देता है। सोना
कम खरीदने की अपील आयात
कम करने से जुड़ी
है। पेट्रोल बचाने की बात विदेशी
निर्भरता घटाने से जुड़ी है।
यानी राष्ट्रभक्ति अब केवल सीमा
पर सैनिकों तक सीमित नहीं,
बल्कि आम नागरिक के
व्यवहार से भी जोड़ी
जा रही है।
जनता पर क्या असर पड़ेगा?
इस पूरे अभियान
का सबसे बड़ा असर
भावनात्मक स्तर पर दिखाई
देगा। हिंदू समाज का एक
बड़ा वर्ग इसे अपनी
सांस्कृतिक पहचान के पुनर्जागरण के
रूप में देख रहा
है। उन्हें लगता है कि
सदियों तक जिस इतिहास
को दबाया गया, अब उसे
सम्मान मिल रहा है।
युवा वर्ग में भी
“सभ्यता आधारित राष्ट्रवाद” तेजी से लोकप्रिय
हो रहा है। सोशल
मीडिया पर “हजार वर्षों
बाद हिंदू स्वाभिमान” जैसे संदेश व्यापक
रूप से फैल रहे
हैं। हालांकि आलोचक इसे धार्मिक ध्रुवीकरण
की राजनीति भी बता रहे
हैं। उनका कहना है
कि इतिहास के आक्रमणों को
वर्तमान राजनीति से जोड़ना सामाजिक
विभाजन बढ़ा सकता है।
लेकिन भाजपा की रणनीति स्पष्ट
है, विकास के साथ भावनात्मक
राष्ट्रवाद... इन्फ्रास्ट्रक्चर के साथ सांस्कृतिक
पुनर्जागरण... और चुनावी राजनीति
के साथ सभ्यता की
कहानी।
भाजपा अब केवल पार्टी नहीं, “विचार” बनने की कोशिश में
राम मंदिर, काशी विश्वनाथ धाम, महाकाल लोक, केदारनाथ पुनर्निर्माण और अब सोमनाथ अमृत महोत्सव... यह केवल परियोजनाएं नहीं हैं। यह उस वैचारिक ढांचे का हिस्सा हैं, जिसके जरिए भाजपा भारत की राजनीति को “सभ्यता आधारित राष्ट्रवाद” की दिशा में ले जाना चाहती है। भाजपा अब केवल यह नहीं कह रही कि उसने सड़कें और एक्सप्रेसवे बनाए। वह यह भी कहना चाहती है कि उसने “भारत की आत्मा” को पुनर्जीवित किया। और शायद यही कारण है कि सोमनाथ से उठी यह गूंज अब केवल मंदिरों तक सीमित नहीं रही... वह देश की राजनीति, समाज और आने वाले चुनावों की दिशा तय करने लगी है। राम मंदिर के समय की तरह ही सोमनाथ का विमर्श भी विपक्ष के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है, क्योंकि इसका विरोध करना आस्था के विरोध की तरह पेश किया जा सकता है और समर्थन देना भाजपा के नैरेटिव को मजबूती देता है।








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