Saturday, 16 May 2026

कभी नाम से कांपता था पूर्वांचल, अब जगन्नाथ धाम से जुड़ रही पहचान की दस्तक

कभी नाम से कांपता था पूर्वांचल, अब जगन्नाथ धाम से जुड़ रही पहचान की दस्तक 

काशी केवल धर्म की राजधानी नहीं, बल्कि समय के बदलते चेहरों की भी साक्षी रही है। इस शहर ने तपस्वियों को भी देखा है और ताकत के प्रतीक बने चेहरों को भी। यहां गंगा के घाटों ने संतों की वाणी भी सुनी है और सत्ता की आहट भी महसूस की है। शायद यही वजह है कि काशी में जब कोई कहानी बदलती है तो वह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं रहती, बल्कि समाज के भीतर चल रही नई हलचलों का विषय बन जाती है। पूर्वांचल की राजनीति और प्रभाव की दुनिया में एक ऐसा नाम लंबे समय तक चर्चा का केंद्र रहा, जिसकी पहचान कभी शक्ति, वर्चस्व और संघर्षों के साथ जोड़ी जाती रही। लेकिन समय के साथ तस्वीर के कुछ रंग बदलते दिखाई दे रहे हैं। धार्मिक आयोजनों में बढ़ती सक्रियता, सामाजिक कार्यक्रमों में भागीदारी और अब अस्सी स्थित प्राचीन जगन्नाथ धाम के पुनरोद्धार से जुड़ाव ने एक नई बहस को जन्म दिया है। कभी प्रभाव और दबदबे की राजनीति से जुड़ा चेहरा अब मंदिर, आध्यात्म और सेवा के बीच दिखाई दे रहा है। ऐसे में काशी की गलियों में एक सवाल बार-बार गूंज रहा है, क्या यह केवल समय का बदलाव है या सचमुच एक नई कहानी लिखी जा रही है

सुरेश गांधी

पूर्वांचल के प्रभाव, राजनीति, अपराध और अध्यात्म के बीच खड़ी एक नई बहस, काशी के जगन्नाथ धाम से उठता सवाल, क्या समय सचमुच आदमी को बदल देता है? जी हां, काशी सदियों से केवल एक शहर नहीं रही, वह समय की साक्षी रही है। यहां गंगा बहती ही नहीं, इतिहास भी बहता है। यहां घाटों की सीढ़ियां केवल श्रद्धालुओं के कदमों की आहट नहीं सुनतीं, बल्कि समाज के बदलते चेहरे भी देखती हैं। इसी काशी ने राजाओं को भी देखा, संतों को भी, सत्ता के शिखर पर बैठे लोगों को भी और संघर्षों की आग में तपे चेहरों को भी। आज इन्हीं गलियों में एक नई चर्चा चल रही है। चर्चा किसी राजनीतिक चुनाव की नहीं, किसी अदालत के फैसले की नहीं, बल्कि बदलती पहचान की है। कभी पूर्वांचल में प्रभाव, शक्ति और टकराव की कहानियों के बीच चर्चा में रहने वाला एक चेहरा आज अस्सी स्थित भगवान जगन्नाथ धाम के पुनरोद्धार अभियान में सक्रिय दिखाई देता है।

वो नाम है बृजेश सिंह. धौरहरा गांव के इस युवा की धार्मिक आयोजनों में भागीदारी, सामाजिक कार्यक्रमों में बढ़ती मौजूदगी और काशी की एक पुरानी धार्मिक विरासत को नए स्वरूप
में विकसित करने की कोशिशों ने एक नई बहस को जन्म दिया है। यह बहस केवल किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस सामाजिक मनोविज्ञान की भी है जो पूछता है, क्या आदमी बदलता है या समय उसकी भूमिका बदल देता है? आज काशी के अस्सी घाट स्थित प्राचीन जगन्नाथ धाम के पुनरोद्धार और धार्मिक गतिविधियों के बीच एक ऐसा चेहरा चर्चा में है, जिसे कभी पूर्वांचल की अपराध और राजनीतिक दुनिया के प्रभावशाली नामों में गिना जाता था। यह वही नाम है, जिसकी कहानी वाराणसी के एक साधारण छात्र से शुरू होकर पूर्वांचल के बाहुबली, फिर राजनीति और अब धार्मिक सक्रियता तक पहुंचती दिखाई देती है। 


बता दें, पूर्वांचल में बृजेश सिंह का नाम दशकों तक राजनीतिक और आपराधिक संघर्षों के संदर्भ में लिया जाता रहा। लेकिन जगन्नाथ धाम में उनकी सक्रियता एक बिल्कुल अलग तस्वीर प्रस्तुत कर रही है। पिछले कुछ वर्षों में मंदिर परिसर में आयोजित धार्मिक कार्यक्रमों में उनकी निरंतर उपस्थिति दिखाई दी। मंदिर के जीर्णोद्धार की योजनाओं से लेकर प्रशासनिक स्तर पर संवाद और ट्रस्ट से जुड़े प्रयासों तक, उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई है। ट्रस्ट से जुड़े दीपक शाहपुरी और आलोक शाहपुरी का कहना है कि भगवान जगन्नाथ की कृपा से मंदिर का भविष्य बेहतर दिशा में बढ़ रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्षों तक जो आयोजन केवल परंपरा निभाने तक सीमित होते जा रहे थे, उनमें अब फिर से उत्साह लौटने लगा है। श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ी है, धार्मिक आयोजनों में रौनक बढ़ी है और मंदिर परिसर के प्रति लोगों का जुड़ाव गहरा हुआ है।

अब बनेगा जगन्नाथ कॉरिडोर

जगन्नाथ धाम के पुनर्विकास के लिए बड़े स्तर पर योजना तैयार की गई है। कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य स्वामी विजयेंद्र सरस्वती की मौजूदगी में इस परियोजना की आधारशिला रखी गई। योजना के तहत, शुरुआती चरण में लगभग 30 करोड़ रुपये का बजट तय किया गया है। मंदिर के शिखर की ऊंचाई 36 फीट से बढ़ाकर 108 फीट की जाएगी। श्रद्धालुओं के लिए अन्नक्षेत्र बनाया जाएगा। निराश्रितों के लिए भोजन व्यवस्था होगी। यात्रियों के ठहरने की आधुनिक सुविधाएं विकसित होंगी। पूरे परिसर को धार्मिक और सांस्कृतिक कॉरिडोर के रूप में विकसित किया जाएगा। इस परियोजना को तीन वर्षों में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।

जब एक सपना दूसरी दिशा में मुड़ गया

कभी हाथों में किताबें थीं, आंखों में नौकरी और बेहतर भविष्य के सपने थे। गांव का एक साधारण युवक अपने पिता की इच्छाओं को पूरा करने के लिए पढ़ाई की राह पर आगे बढ़ रहा था। लेकिन नियति कई बार ऐसी पटकथा लिखती है, जिसमें एक घटना पूरी जिंदगी की दिशा बदल देती है। एक तरफ पिता की हत्या का दर्द, दूसरी तरफ प्रतिशोध की आग, और फिर धीरे-धीरे अपराध, बाहुबल, राजनीति और प्रभाव के लंबे गलियारों में प्रवेश, यह केवल किसी व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि पूर्वांचल के उस दौर की भी कहानी है, जब बंदूकें सिर्फ हथियार नहीं बल्कि सत्ता की भाषा बन गई थीं। समय बीतता गया, चेहरे बदलते गए, राजनीतिक समीकरण बदलते गए और जीवन ने एक नया मोड़ लिया। कभी जिसका नाम जरायम की दुनिया के प्रभावशाली चेहरों में लिया जाता था, वही अब धार्मिक आयोजनों, मंदिरों और आध्यात्मिक गतिविधियों के बीच दिखाई देता है। काशी के जगन्नाथ धाम के पुनरोद्धार से लेकर धार्मिक आयोजनों में बढ़ती सक्रियता तक, एक नया दृश्य सामने है। ऐसे में सवाल केवल व्यक्ति का नहीं, बल्कि समाज की उस सोच का भी है जो पूछती है, क्या आदमी सचमुच बदलता है या समय केवल उसकी भूमिका बदल देता है. वैसे भी हर कहानी किसी बड़ी शुरुआत से नहीं, एक साधारण सपने से शुरू होती है। लेकिन कई बार एक घटना पूरी जिंदगी का रास्ता बदल देती है। जीवन के कुछ मोड़ ऐसे होते हैं जहां व्यक्ति निर्णय नहीं लेता, परिस्थितियां उसके लिए रास्ता चुन लेती हैं। इसके बाद शुरू हुआ संघर्ष, प्रभाव और शक्ति का वह दौर, जिसने पूर्वांचल की राजनीति और सामाजिक समीकरणों पर लंबे समय तक असर डाला।

पूर्वांचल का वह दौर, जहां शक्ति ही पहचान थी

1980 और 1990 का दशक उत्तर प्रदेश, विशेषकर पूर्वांचल के लिए केवल राजनीतिक परिवर्तन का दौर नहीं था। यह वह समय भी था जब ठेकेदारी, स्थानीय प्रभाव, आर्थिक संसाधनों और राजनीतिक संरक्षण के समीकरण तेजी से बदल रहे थे। कोयला, स्क्रैप, बालू, सरकारी ठेके और स्थानीय प्रभाव क्षेत्र, ये केवल कारोबार नहीं थे, बल्कि शक्ति के केंद्र बन चुके थे। ऐसे में संघर्ष केवल आर्थिक नहीं रहाय वह सामाजिक और राजनीतिक पहचान का हिस्सा भी बन गया। यही वह समय था जब पूर्वांचल में कई प्रभावशाली समूहों और व्यक्तियों के बीच टकराव ने बड़े रूप लेना शुरू किया। तब कई क्षेत्रों में प्रभाव का अर्थ केवल सामाजिक सम्मान नहीं था, बल्कि वर्चस्व भी था। शक्ति का प्रदर्शन कई बार राजनीतिक ताकत में बदलता था और राजनीतिक ताकत सामाजिक स्वीकार्यता का माध्यम बन जाती थी। यहीं से पूर्वांचल में कई ऐसे चेहरे उभरे जिनकी पहचान केवल एक दायरे तक सीमित नहीं रही।

राजनीति: प्रभाव को वैध मंच देने का रास्ता

भारतीय लोकतंत्र की एक रोचक विशेषता रही है कि समय के साथ प्रभावशाली स्थानीय चेहरे राजनीति में प्रवेश करते रहे हैं। राजनीति केवल चुनाव नहीं होती, वह सामाजिक स्वीकार्यता का भी मंच बनती है। धीरे-धीरे परिवारों की राजनीतिक भागीदारी बढ़ी, चुनावी सफलताएं मिलीं और स्थानीय प्रभाव ने संगठित रूप लेना शुरू किया। और अब काशी के जगन्नाथ धाम में एक नया अध्याय. लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे चर्चित पहलू अब काशी के प्राचीन जगन्नाथ मंदिर से जुड़ा दिखाई देता है। अस्सी घाट स्थित लगभग ढाई सौ वर्ष पुराने जगन्नाथ धाम के पुनर्विकास की योजना केवल मंदिर के सौंदर्यीकरण तक सीमित नहीं है। इसे एक व्यापक धार्मिक और सांस्कृतिक परिसर के रूप में विकसित करने की परिकल्पना की जा रही है। परिसर में श्रद्धालुओं के लिए बेहतर सुविधाएं, अन्नक्षेत्र, यात्रियों के ठहरने की व्यवस्था, धार्मिक गतिविधियों के लिए विस्तृत परिसर, मंदिर शिखर के विस्तार की योजना जैसी बातें चर्चा में हैं। भूमि पूजन के कार्यक्रमों से लेकर धार्मिक आयोजनों तक सक्रियता ने लोगों का ध्यान खींचा है।

धार्मिक मंचों पर बढ़ती सक्रियता

हाल के वर्षों में सामाजिक और धार्मिक आयोजनों में उनकी बढ़ती उपस्थिति भी चर्चा का विषय रही है। सार्वजनिक कार्यक्रमों, धार्मिक मंचों और सामाजिक आयोजनों में दिखाई देने वाली सक्रियता ने लोगों के बीच यह चर्चा तेज कर दी है कि क्या यह जीवन की नई दिशा है। हालांकि किसी सार्वजनिक मंच पर मौजूदगी और व्यक्तिगत संबंधों के बीच अंतर भी समझना आवश्यक है। लेकिन इतना जरूर है कि सार्वजनिक जीवन में उनकी भूमिका का दायरा बदला हुआ दिखाई देता है।

क्या अध्यात्म आदमी को बदल देता है?

भारतीय परंपरा हमेशा से परिवर्तन की संभावना में विश्वास करती रही है। महर्षि वाल्मीकि से लेकर अंगुलिमाल तक अनेक कथाएं बताती हैं कि परिवर्तन संभव है। लेकिन समाज हमेशा दो हिस्सों में खड़ा रहता है। एक पक्ष कहता है कि हर व्यक्ति को नया अवसर मिलना चाहिए। दूसरा पक्ष पूछता है कि क्या नया अध्याय पुराने पन्नों को मिटा देता है? शायद इसका उत्तर इतना सीधा नहीं है। खास यह है कि काशी हर प्रश्न का उत्तर तर्क से नहीं देती। वह उत्तर अनुभव से देती है। यहां गंगा किनारे बैठा साधु भी जीवन के अर्थ खोजता है और संघर्षों से लौटकर आया व्यक्ति भी। यह शहर किसी की पुरानी पहचान पूछकर अपने दरवाजे बंद नहीं करता, लेकिन इतिहास के पन्ने भी इतनी आसानी से नहीं बदलते। फिलहाल काशी की गलियों में चर्चा यही है, क्या यह केवल बदलती छवि की कहानी है? या वास्तव में एक नया अध्याय लिखा जा रहा है? इस प्रश्न का उत्तर समय देगा। लेकिन इतना तय है कि काशी के जगन्नाथ धाम की घंटियों के बीच एक नई कहानी जरूर लिखी जा रही है।

अस्सी का जगन्नाथ धाम: जहां इतिहास सांस लेता है

अस्सी और गंगा के संगम तट पर स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि काशी की धार्मिक धरोहर का महत्वपूर्ण अध्याय है। लगभग एक लाख वर्गफुट भूमि पर फैले इस मंदिर की स्थापना वर्ष 1780 में पंडित बेनीराम ने कराई थी। लखौरिया ईंटों से निर्मित इस मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की काष्ठ प्रतिमाएं स्थापित हैं। कहा जाता है कि पुरी के बाद यह देश का दूसरा ऐसा महत्वपूर्ण जगन्नाथ धाम है, जहां भगवान की परंपरा लगभग उसी विधि-विधान से जीवित है। वर्ष 1802 में यहां पुरी की तर्ज पर रथयात्रा मेले की शुरुआत हुई। जहां रथ स्थापित हुआ, वही स्थान आज ष्रथयात्राष् क्षेत्र के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर पंचक्रोशी यात्रा मार्ग का भी हिस्सा है। काशी आने वाले तीर्थयात्री बाबा विश्वनाथ के दर्शन के साथ भगवान जगन्नाथ का आशीर्वाद भी लेते रहे हैं।

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