Thursday, 7 May 2026

जब जिंदगी बिखरी, तब मां चट्टान बन गई…

खामोश चीखों से हौसलों की उड़ान तक

जब जिंदगी बिखरी, तब मां चट्टान बन गई… 

पति की मौत के बाद अक्सर जिंदगी सिर्फ यादों में बदल जाती है। लेकिन निधि मिश्रा ने अपने आंसुओं को बच्चों की ताकत बना दिया। वर्ष 2018 में माउथ कैंसर से पति विनोद मिश्रा को खोने के बाद उनके सामने तीन छोटे बच्चों की जिम्मेदारी थी, आर्थिक संकट था और भविष्य का गहरा अंधेरा। उस समय बड़ी बेटी संस्कृति स्कूल में थीं, छोटी बेटी सुकृति मासूम उम्र में थी और बेटा संस्कार दुनिया को समझने के लिए बहुत छोटा। पति के निधन के कुछ ही समय बाद निधि काशी आईं। अनजान शहर, नई जिम्मेदारियां और भीतर गहरा खालीपन, सब कुछ एक साथ था। लेकिन बाबा विश्वनाथ की नगरी ने उन्हें टूटने नहीं दिया। हिंदुस्तान परिवार से मिली नौकरी और स्कूल में पढ़ाने के काम ने उन्हें सहारा दिया। संघर्ष के बीच उन्होंने बच्चों के सपनों को कभी टूटने नहीं दिया। आज बड़ी बेटी संस्कृति एमबीए कर रही हैं, छोटी बेटी सुकृति बी-फार्मा की पढ़ाई में जुटी हैं और बेटा संस्कार 12वीं का छात्र है। यही निधि की सबसे बड़ी जीत है। हाल ही में पति की याद में लिखी उनकी भावुक कविता सोशल मीडिया पर वायरल हो गई।मैंने बस जीना सीख लिया है, तुम्हारे बिना...” जैसी पंक्तियों ने हजारों लोगों को भावुक कर दिया। मदर्स डे पर निधि मिश्रा की कहानी सिर्फ एक मां की कहानी नहीं, बल्कि उस साहस की मिसाल है जो टूटकर भी अपने बच्चों के लिए हर सुबह फिर खड़ा हो जाता है 

सुरेश गांधी

रात जब बहुत गहरी हो जाती है, तब इंसान की सबसे सच्ची आवाज उसके भीतर सुनाई देती है। वह आवाज जो दुनिया नहीं सुन पाती... वह चीख जो होंठों तक नहीं आती... वह दर्द जो आंखों से कम और आत्मा से ज्यादा बहता है। कुछ ऐसी ही खामोश चीखों के साथ पिछले आठ वर्षों से जी रही हैं निधि मिश्रा। बाहर से देखने पर वह एक सामान्य कामकाजी महिला दिखाई देती हैं, ऑफिस जाती हैं, बच्चों की पढ़ाई की चिंता करती हैं, मुस्कुराकर लोगों से मिलती हैं, जिम्मेदारियों को संभालती हैं। लेकिन उनके भीतर एक ऐसा खालीपन है, जो हर दिन उन्हें उस जीवन की याद दिलाता है, जो कभी उनका सबसे खूबसूरत सच था। एक समय था जब उनका संसार बिल्कुल सामान्य था। वर्ष 2002 में शुरू हुआ वैवाहिक जीवन सामान्य खुशियों के साथ आगे बढ़ रहा था। परिवार में हंसी थी, बच्चों की किलकारियां थीं और सपनों से भरा एक संसार था। छोटे-छोटे सपनों से भरा एक परिवार था। जीवन में संघर्ष थे, लेकिन साथ था, भरोसा था और एक दूसरे की मौजूदगी से हर मुश्किल आसान लगती थी।

समय के साथ तीन बच्चों - संस्कृति, सुकृति और संस्कार, ने उस घर को खुशियों से भर दिया। लेकिन जिंदगी हमेशा चेतावनी देकर नहीं बदलती। दिसंबर 2017 में अचानक पता चला कि विनोद मिश्रा को माउथ कैंसर है। यह खबर परिवार के लिए किसी भूकंप से कम नहीं थी। जिस व्यक्ति ने हमेशा परिवार की ढाल बनकर जिंदगी जी, वही अचानक अस्पतालों और दवाइयों के बीच जिंदगी की लड़ाई लड़ने लगा। कानपुर के जेके कैंसर हॉस्पिटल में इलाज शुरू हुआ। उम्मीदें थीं, दुआएं थीं, विश्वास था कि सब ठीक हो जाएगा। लेकिन बीमारी हर उम्मीद से बड़ी साबित हुई। 22 फरवरी 2018 की वह तारीख निधि मिश्रा की जिंदगी में हमेशा के लिए ठहर गई। विनोद मिश्रा दुनिया छोड़ गए। उस पल के बाद सिर्फ एक पति नहीं गया था... एक स्त्री का सहारा चला गया था। तीन बच्चों के सिर से पिता का साया उठ गया था। और एक परिवार अचानक अधूरा हो गया था। उस समय बड़ी बेटी संस्कृति मिश्रा स्कूल में थीं, छोटी बेटी सुकृति मिश्रा अभी बचपन और समझदारी के बीच खड़ी थी और सबसे छोटा बेटा संस्कार मिश्रा दुनिया की सच्चाइयों को समझने के लिए बहुत छोटा था। घर में सन्नाटा था। रिश्तेदार थे, लोग थे, सांत्वनाएं थीं... लेकिन जो खालीपन भीतर पैदा हुआ था, उसे कोई भर नहीं सकता था। तीनों बच्चों की आंखों में सिर्फ एक सवाल था, “अब क्या होगा?” और शायद वहीं एक मां का दूसरा जन्म होता है।

निधि मिश्रा कहती हैं कि पति के जाने के बाद कई दिनों तक उन्हें समझ ही नहीं आता था कि अब आगे क्या करना है। हर सुबह एक डर लेकर आती थी, बच्चों का भविष्य, घर का खर्च, जिम्मेदारियां, समाज, अकेलापन... सब कुछ एक साथ सामने खड़ा था। सबसे ज्यादा तकलीफ तब हुई, जब कठिन समय में अपेक्षित पारिवारिक सहयोग भी नहीं मिला। रिश्तों की भीड़ में अक्सर इंसान सबसे ज्यादा अकेला हो जाता है। मानसिक रूप से उनकी मां उनका सहारा बनीं। मां उन्हें टूटने नहीं देती थीं। लेकिन नियति शायद अभी और परीक्षा लेना चाहती थी। 8 अक्टूबर 2022 को उनकी मां का भी कैंसर से निधन हो गया। यह दूसरा ऐसा आघात था, जिसने भीतर की आखिरी मजबूती भी हिला दी। जिस मां के कंधे पर सिर रखकर वह रो लेती थीं, वह सहारा भी चला गया। लेकिन शायद मां की सबसे बड़ी ताकत यही होती है कि वह अपने बच्चों के सामने पूरी तरह टूट नहीं सकती। निधि मिश्रा बताती हैं कि कई रातें ऐसी थीं जब बच्चों की फीस, घर के खर्च और भविष्य की चिंता उन्हें सोने नहीं देती थी। लेकिन हर सुबह बच्चों का चेहरा देखकर वह खुद को फिर से मजबूत कर लेती थीं। भीतर से टूटती रहीं, लेकिन बच्चों के सामने कभी बिखरने नहीं दिया। अपने आंसुओं को बच्चों की कमजोरी नहीं बनने दिया। उन्होंने तय किया कि चाहे जिंदगी कितनी भी कठिन क्यों हो जाए, बच्चों के सपने नहीं टूटने देंगी।

काशी ने संभाला, मां ने घर बचा लिया

7 मई 2018 को वह काशी आईं। एक ऐसा शहर, जिसे उन्होंने पहले कभी अपने जीवन का हिस्सा नहीं सोचा था। बनारस उस समय उनके लिए सिर्फ एक शहर था, अनजान गलियों वाला, भीड़भाड़ वाला, मंदिरों की घंटियों और घाटों की आवाजों से भरा हुआ शहर। लेकिन उन्हें क्या पता था कि यही शहर आगे चलकर उनके टूटे हुए जीवन को संभालने वाला है। काशी की सुबहें धीरे-धीरे उनके भीतर उतरने लगीं। घाटों पर बहती गंगा, मंदिरों की आरती, बाबा विश्वनाथ का आशीर्वाद और बनारस की आत्मीयता ने उन्हें भीतर से सहारा देना शुरू किया। उन्होंने नौकरी शुरू की। हिंदुस्तान परिवार ने मुश्किल समय में उनका साथ दिया। उनके पति विनोद मिश्रा गाजीपुर में हिंदुस्तान के ब्यूरो चीफ रहे थे। संस्थान ने निधि को अवसर दिया। यह सिर्फ रोजगार नहीं था, बल्कि जिंदगी को फिर से संभालने का पहला सहारा था। इसके साथ ही उन्होंने स्कूल में पढ़ाना भी शुरू किया। सुबह घर, फिर नौकरी, बच्चों की पढ़ाई, बाजार, फीस, जिम्मेदारियां, रात की चिंता और अगले दिन की तैयारी... जिंदगी एक निरंतर संघर्ष बन चुकी थी। लेकिन इस संघर्ष की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें शोर नहीं था। वह चुपचाप लड़ रही थीं। शायद इसी मौन संघर्ष ने एक दिन शब्दों का रूप लिया। संघर्ष इतना शांत था कि दुनिया को सिर्फ उनकी मुस्कान दिखाई दी, भीतर की थकान नहीं।

मैंने बस जीना सीख लिया है, तुम्हारे बिना।

कुछ समय पहले उन्होंने अपने मन की पीड़ा को एक कविता में लिखा और फेसबुक पर पोस्ट कर दिया। कविता की शुरुआत थी, “एक दर्द भरी चीख, सबको सुनाई देती है। लेकिन जो चीख बेआवाज होती है, वही सबसे ज्यादा जला देती है...” यह सिर्फ कविता नहीं थी। यह आठ वर्षों से भीतर दबे दर्द का विस्फोट था। उन्होंने लिखा कि बच्चों के बीच बैठकर जब वह हंसती हैं, तब भी उन्हें लगता है कि उस हंसी की परछाईं में पति की कमी खड़ी है। बच्चों की बातों में वह उनकी आवाज ढूंढती हैं। रात के सन्नाटे में आज भी कई बार ऐसा लगता है कि दरवाजा खुलेगा और वह सामने खड़े होंगे। लेकिन फिर वही सन्नाटा लौट आता है। उनकी कविता सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। हजारों लोगों ने उसे पढ़ा, साझा किया और महसूस किया। क्योंकि वह सिर्फ निधि मिश्रा की कहानी नहीं थी। वह उन लाखों महिलाओं की कहानी थी, जो अपने हिस्से का दुःख चुपचाप जीती हैं। कविता की सबसे मार्मिक पंक्तियां थीं, “लोग समझते हैं निधि संभल गई है। पर सच्चाई ये है, मैंने बस जीना सीख लिया है, तुम्हारे बिना।इन शब्दों ने लोगों को भीतर तक झकझोर दिया।

बच्चे अब उनकी ताकत बन चुके हैं  

दरअसल, समाज अक्सर यह मान लेता है कि समय हर घाव भर देता है। लेकिन सच यह है कि कुछ दर्द खत्म नहीं होते, इंसान सिर्फ उनके साथ जीना सीख जाता है। निधि मिश्रा ने भी यही किया। उन्होंने अपने बच्चों के लिए खुद को फिर से गढ़ा। आज बड़ी बेटी संस्कृति मिश्रा एमबीए कर रही हैं। छोटी बेटी सुकृति मिश्रा बी-फार्मा की पढ़ाई कर रही हैं और बेटा संस्कार मिश्रा इस वर्ष 12वीं में है। इन बच्चों की उपलब्धियां सिर्फ शैक्षणिक सफलताएं नहीं हैं। यह एक मां की तपस्या का परिणाम हैं। कभी मां की उंगलियां पकड़कर चलने वाले बच्चे अब उनकी ताकत बन चुके हैं। निधि कहती हैं कि कई रातें ऐसी थीं जब फीस भरने की चिंता में नींद नहीं आती थी। कई बार खुद की जरूरतों को खत्म करके बच्चों की जरूरतें पूरी करनी पड़ीं। लेकिन जब बच्चों को आगे बढ़ते देखती हैं, तो लगता है कि संघर्ष व्यर्थ नहीं गया। इन वर्षों ने उन्हें पूरी तरह बदल दिया। निधि कहती हैं, “जिंदगी किसी के जाने से खत्म नहीं होती... लेकिन उसके बाद जीना फिर से सीखना पड़ता है।

काशी उनकी पुनर्जन्म की भूमि है

महिला कभी अकेले बाजार जाने से डरती थी, आज हर परिस्थिति का सामना आत्मविश्वास के साथ करती है। आज हर कठिन परिस्थिति का सामना मुस्कुराकर करती है। दर्द अब भी है, यादें अब भी हैं, लेकिन अब उन्होंने आंसुओं के साथ जीना सीख लिया है। जो कभी खुद को असहाय समझती थी, वही आज दूसरों के लिए प्रेरणा बन चुकी है। काशी अब उनके लिए सिर्फ शहर नहीं है। यह उनकी दूसरी जिंदगी है, पुनर्जन्म की भूमि है। जहां उन्होंने टूटकर भी खुद को संभाला। जहां उन्होंने सीखा कि मां कभी हारती नहीं। काशी एक ऐसा शहर जिसने उन्हें टूटने नहीं दिया। वह कहती हैं, “काशी ने मुझे सिर्फ रोजगार नहीं दिया, बल्कि गिरकर फिर संभलना सिखाया।सच भी यही है। बनारस सिर्फ आध्यात्मिक शहर नहीं, यह टूटे हुए लोगों को फिर से जीना सिखाने वाला शहर भी है। यहां की गंगा सिर्फ पाप नहीं धोती, कई बार मन का दुःख भी बहा ले जाती है।

मां सिर्फ प्यार नहीं संघर्ष होती है

मदर्स डे के अवसर पर निधि मिश्रा की कहानी सिर्फ एक महिला की व्यक्तिगत यात्रा नहीं है। यह उस भारतीय मां का चेहरा है, जो हर कठिन परिस्थिति में अपने बच्चों के लिए खुद को खड़ा कर लेती है। समाज अक्सर मां को सिर्फ ममता के रूप में देखता है। लेकिन मां सिर्फ प्यार नहीं होती। वह संघर्ष होती है, त्याग होती है, जिम्मेदारी होती है, और कई बार अपने टूटे हुए सपनों पर बच्चों का भविष्य खड़ा करने वाली सबसे मजबूत दीवार भी होती है। निधि मिश्रा की जिंदगी यही बताती है कि स्त्री की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सहनशीलता नहीं, बल्कि हर बार टूटकर फिर खड़े हो जाने की क्षमता है। आज जब वह पीछे मुड़कर देखती हैं, तो शायद दर्द अब भी उतना ही है। पति की यादें अब भी हैं। मां की कमी अब भी महसूस होती है। लेकिन अब उन्होंने जिंदगी से शिकायत करना छोड़ दिया है। उन्होंने जीना सीख लिया है। अपने बच्चों के लिए। अपने अधूरे सपनों के लिए। और उन तमाम स्त्रियों के लिए, जिन्हें यह समाज अक्सर कमजोर समझ लेता है। अंत में उनकी लिखी ये पंक्तियां मानो पूरे संघर्ष का सार बन जाती हैं, “सफर कठिन था मगर हौसलों ने हार नहीं मानी, मैं मां थी साहब... इसलिए जिंदगी फिर संभाल ली।हार मानने के बजाय संघर्ष को ही अपनी पहचान बना लिया। और शायद यही एक मां की सबसे बड़ी पहचान भी है।

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