खामोश चीखों
से
हौसलों
की
उड़ान
तक
जब जिंदगी बिखरी, तब मां चट्टान बन गई…
सुरेश गांधी
रात जब बहुत गहरी हो जाती है, तब इंसान की सबसे सच्ची आवाज उसके भीतर सुनाई देती है। वह आवाज जो दुनिया नहीं सुन पाती... वह चीख जो होंठों तक नहीं आती... वह दर्द जो आंखों से कम और आत्मा से ज्यादा बहता है। कुछ ऐसी ही खामोश चीखों के साथ पिछले आठ वर्षों से जी रही हैं निधि मिश्रा। बाहर से देखने पर वह एक सामान्य कामकाजी महिला दिखाई देती हैं, ऑफिस जाती हैं, बच्चों की पढ़ाई की चिंता करती हैं, मुस्कुराकर लोगों से मिलती हैं, जिम्मेदारियों को संभालती हैं। लेकिन उनके भीतर एक ऐसा खालीपन है, जो हर दिन उन्हें उस जीवन की याद दिलाता है, जो कभी उनका सबसे खूबसूरत सच था।
एक समय था
जब उनका संसार बिल्कुल
सामान्य था। वर्ष 2002 में
शुरू हुआ वैवाहिक जीवन
सामान्य खुशियों के साथ आगे
बढ़ रहा था। परिवार
में हंसी थी, बच्चों
की किलकारियां थीं और सपनों
से भरा एक संसार
था।
छोटे-छोटे सपनों
से भरा एक परिवार
था। जीवन में संघर्ष
थे, लेकिन साथ था, भरोसा
था और एक दूसरे
की मौजूदगी से हर मुश्किल
आसान लगती थी।
मैंने बस जीना सीख लिया है, तुम्हारे बिना।”
बच्चे अब उनकी ताकत बन चुके हैं
दरअसल, समाज अक्सर यह मान लेता है कि समय हर घाव भर देता है। लेकिन सच यह है कि कुछ दर्द खत्म नहीं होते, इंसान सिर्फ उनके साथ जीना सीख जाता है।
निधि मिश्रा ने भी यही किया। उन्होंने अपने बच्चों के लिए खुद को फिर से गढ़ा। आज बड़ी बेटी संस्कृति मिश्रा एमबीए कर रही हैं।
छोटी बेटी सुकृति मिश्रा बी-फार्मा की पढ़ाई कर रही हैं और बेटा संस्कार मिश्रा इस वर्ष 12वीं में है। इन बच्चों की उपलब्धियां सिर्फ शैक्षणिक सफलताएं नहीं हैं। यह एक मां की तपस्या का परिणाम हैं।
कभी मां की उंगलियां पकड़कर चलने वाले बच्चे अब उनकी ताकत बन चुके हैं। निधि कहती हैं कि कई रातें ऐसी थीं जब फीस भरने की चिंता में नींद नहीं आती थी।
कई बार खुद की जरूरतों को खत्म करके बच्चों की जरूरतें पूरी करनी पड़ीं।
लेकिन जब बच्चों को आगे बढ़ते देखती हैं, तो लगता है कि संघर्ष व्यर्थ नहीं गया। इन
वर्षों ने उन्हें पूरी तरह बदल दिया। निधि कहती हैं, “जिंदगी किसी के जाने से खत्म नहीं होती... लेकिन उसके बाद जीना फिर से सीखना पड़ता है।”काशी उनकी पुनर्जन्म की भूमि है
ो महिला कभी अकेले बाजार जाने से डरती थी, आज हर परिस्थिति का सामना आत्मविश्वास के साथ करती है।
आज हर कठिन परिस्थिति का सामना मुस्कुराकर करती है। दर्द अब भी है, यादें अब भी हैं, लेकिन अब उन्होंने आंसुओं के साथ जीना सीख लिया है।
जो कभी खुद को असहाय समझती थी, वही आज दूसरों के लिए प्रेरणा बन चुकी है।
काशी
अब उनके लिए सिर्फ
शहर नहीं है। यह
उनकी दूसरी जिंदगी है, पुनर्जन्म की
भूमि है। जहां उन्होंने
टूटकर भी खुद को
संभाला।
जहां उन्होंने सीखा कि मां कभी हारती नहीं। काशी एक ऐसा शहर जिसने उन्हें टूटने नहीं दिया। वह कहती हैं, “काशी ने मुझे सिर्फ रोजगार नहीं दिया, बल्कि गिरकर फिर संभलना सिखाया।”
सच भी यही है।
बनारस सिर्फ आध्यात्मिक शहर नहीं, यह
टूटे हुए लोगों को
फिर से जीना सिखाने
वाला शहर भी है।
यहां की गंगा सिर्फ
पाप नहीं धोती, कई
बार मन का दुःख
भी बहा ले जाती
है।
मां सिर्फ प्यार नहीं संघर्ष होती है
मदर्स डे के अवसर पर निधि मिश्रा की कहानी सिर्फ एक महिला की व्यक्तिगत यात्रा नहीं है। यह उस भारतीय मां का चेहरा है, जो हर कठिन परिस्थिति में अपने बच्चों के लिए खुद को खड़ा कर लेती है। समाज अक्सर मां को सिर्फ ममता के रूप में देखता है। लेकिन मां सिर्फ प्यार नहीं होती।
वह संघर्ष होती है, त्याग होती है, जिम्मेदारी होती है, और कई बार अपने टूटे हुए सपनों पर बच्चों का भविष्य खड़ा करने वाली सबसे मजबूत दीवार भी होती है। निधि मिश्रा की जिंदगी यही बताती है कि स्त्री की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सहनशीलता नहीं, बल्कि हर बार टूटकर फिर खड़े हो जाने की क्षमता है। आज जब वह पीछे मुड़कर देखती हैं, तो शायद दर्द अब भी उतना ही है। पति की यादें अब भी हैं। मां की कमी अब भी महसूस होती है। लेकिन अब उन्होंने जिंदगी से शिकायत करना छोड़ दिया है। उन्होंने जीना सीख लिया है। अपने बच्चों के लिए। अपने अधूरे सपनों के लिए। और उन तमाम स्त्रियों के लिए, जिन्हें यह समाज अक्सर कमजोर समझ लेता है। अंत में उनकी लिखी ये पंक्तियां मानो पूरे संघर्ष का सार बन जाती हैं, “सफर कठिन था मगर हौसलों ने हार नहीं मानी, मैं मां थी साहब... इसलिए जिंदगी फिर संभाल ली।” हार मानने के बजाय संघर्ष को ही अपनी पहचान बना लिया। और शायद यही एक मां की सबसे बड़ी पहचान भी है।












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