सियासत का कड़वा सच? "मैदान में महाभारत, कमरे में मुस्कान"
गाजीपुर की राजनीति ने बहुत कुछ देखा है, नारों की तल्खी, चुनावी जंग की गर्मी, मंचों से बरसते शब्दबाण और समर्थकों के बीच खिंचती ऐसी लकीरें, जो कई बार रिश्तों तक को निगल जाती हैं। लेकिन राजनीति का सबसे बड़ा व्यंग्य तब जन्म लेता है, जब वर्षों तक एक-दूसरे के खिलाफ खड़े दिखाए गए चेहरे अचानक एक ही फ्रेम में मुस्कुराते नजर आते हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हुई एक तस्वीर ने पूर्वांचल की राजनीति में कुछ ऐसे ही सवालों को फिर जिंदा कर दिया है। तस्वीर में गाजीपुर की राजनीति के दो ऐसे किरदार हैं, जिनके नाम वर्षों तक अलग-अलग राजनीतिक ध्रुवों का प्रतिनिधित्व करते रहे। एक तरफ वह नेता, जिसे कभी उत्तर प्रदेश का संभावित मुख्यमंत्री माना गया, जिसने केंद्र सरकार में मंत्री रहते हुए विकास की राजनीति का चेहरा बनने का प्रयास किया। दूसरी तरफ वह नेता, जिसका नाम पूर्वांचल की सबसे प्रभावशाली और विवादित राजनीतिक विरासतों में गिना जाता है। तस्वीर में न कोई तल्खी है, न कोई आरोप, न कोई चुनावी भाषण। केवल मुस्कान है, शिष्टाचार है और एक-दूसरे के प्रति सम्मान का भाव है। लेकिन यही मुस्कान सबसे बड़ा सवाल भी बन जाती है। क्या राजनीति में वास्तव में दुश्मनियां होती हैं, या दुश्मनी केवल समर्थकों के हिस्से लिखी जाती है? क्या मंचों पर दिखाई देने वाला संघर्ष वास्तव में उतना गहरा होता है, जितना कार्यकर्ता मान लेते हैं? या फिर राजनीति के अनुभवी खिलाड़ी हमेशा एक ऐसा दरवाजा खुला छोड़ देते हैं, जहां विरोध के बाद भी संबंध जीवित रहते हैं? गाजीपुर की यह तस्वीर केवल दो नेताओं की मुलाकात नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति के उस अनकहे सच का आईना है, जिसे कार्यकर्ता अक्सर सबसे आखिर में समझ पाते हैं
सुरेश गांधी
वैसे भी राजनीति
में तस्वीरें कभी सिर्फ तस्वीरें
नहीं होतीं। कई बार वे
भाषणों से ज्यादा बोलती
हैं, घोषणापत्रों से ज्यादा संकेत
देती हैं और नेताओं
के हजार बयानों से
ज्यादा गहरे सवाल छोड़
जाती हैं। गाजीपुर की
राजनीति में इन दिनों
वायरल हो रही यह
तस्वीर भी कुछ ऐसा
ही कर रही है।
एक तरफ पूर्व केंद्रीय
मंत्री, तीन बार के
सांसद और जम्मू-कश्मीर
के उपराज्यपाल रहे मनोज सिन्हा।
दूसरी तरफ पूर्वांचल की
सबसे चर्चित राजनीतिक विरासतों में से एक
अंसारी परिवार के प्रमुख चेहरे
अफजाल अंसारी। दोनों के चेहरे पर
मुस्कान है और दोनों
के हाथों में एक स्मृति-चिह्न। दोनों एक-दूसरे का
सम्मान कर रहे हैं।
दोनों के चेहरों पर
कोई राजनीतिक तल्खी नहीं दिखती। और
यही तस्वीर सबसे बड़ा राजनीतिक
व्यंग्य बन जाती है।
क्योंकि यह वही गाजीपुर
है जहां वर्षों तक
दोनों धाराओं के समर्थकों ने
एक-दूसरे को राजनीतिक शत्रु
माना। यह वही इलाका
है जहां चुनाव केवल
चुनाव नहीं होते, प्रतिष्ठा,
जातीय समीकरण, वर्चस्व और भावनाओं का
युद्ध बन जाते हैं।
लेकिन राजनीति का पुराना नियम
आज भी कायम है,
नेता लड़ते कम हैं,
लड़ाते ज्यादा हैं। और जब
समय बदलता है तो वही
नेता सबसे पहले हाथ
मिला लेते हैं। फिरहाल,
तस्वीर में सब कुछ
सामान्य दिखता है। न कोई
चुनावी मंच है, न
कोई राजनीतिक बयान, न आरोप-प्रत्यारोप
का शोर। लेकिन राजनीति
को जानने वाले समझते हैं
कि तस्वीरें अक्सर शब्दों से ज्यादा बोलती
हैं।
दिलचस्प संयोग देखिए। यही दो चेहरे
कभी गाजीपुर की सबसे प्रतिष्ठित
चुनावी लड़ाई के केंद्र
में थे। एक-दूसरे
के खिलाफ तीखे बयान दिए
गए। समर्थकों ने मोर्चे संभाले।
गांवों में बहसें हुईं।
सोशल मीडिया पर राजनीतिक सेनाएं
उतरीं। लेकिन वर्षों बाद उसी संघर्ष
की स्मृतियों पर मुस्कान की
परत चढ़ी दिखाई दे
रही है। तस्वीर का
सबसे दिलचस्प पहलू वह लाल
डिब्बा नहीं है, जो
दोनों नेताओं के हाथ में
है। असली सवाल यह
है कि आखिर उसमें
क्या है, स्मृति-चिह्न,
शिष्टाचार, राजनीतिक परिपक्वता या फिर राजनीति
का वह पुराना संदेश
कि चुनाव खत्म होते ही
दुश्मनी भी खत्म हो
जानी चाहिए? गाजीपुर के हजारों कार्यकर्ता
इस तस्वीर को देखकर शायद
अलग-अलग निष्कर्ष निकालें,
लेकिन राजनीति का अनुभवी खिलाड़ी
इसे देखकर केवल मुस्कुराएगा। क्योंकि
वह जानता है कि सियासत
में स्थायी दुश्मनी नहीं होती। स्थायी
होते हैं केवल हित,
संवाद और समय के
साथ बदलते समीकरण। यही कारण है
कि तस्वीर में दिखाई दे
रही यह मुस्कान केवल
दो नेताओं की मुस्कान नहीं,
बल्कि भारतीय राजनीति के उस शाश्वत
सत्य की झलक है,
जहां मंच पर प्रतिद्वंद्विता
और मंच के बाहर
सौहार्द साथ-साथ चलते
हैं। मतलब साफ है
तस्वीर में दिख रही
मुस्कान ने राजनीतिक गलियारों
में नई चर्चाओं को
जन्म दे दिया है।
जिनके समर्थक वर्षों तक खेमों में
बंटे रहे, वे आज
एक ही फ्रेम में
मुस्कुरा रहे हैं। राजनीति
का शायद यही सबसे
बड़ा व्यंग्य है. जिनके लिए
समर्थक लड़ते रहे, वे
आज भी मुस्कुराकर मिल
लेते हैं...
2019: जब गाजीपुर देश की सबसे चर्चित सीटों में था
2019 का लोकसभा चुनाव
गाजीपुर में सामान्य चुनाव
नहीं था। एक तरफ
केंद्र सरकार के प्रभावशाली मंत्री
मनोज सिन्हा थे। दूसरी तरफ
सपा-बसपा गठबंधन के
उम्मीदवार अफजाल अंसारी। राष्ट्रीय मीडिया तक इस मुकाबले
को पुराने प्रतिद्वंद्वियों की सीधी लड़ाई
बता रहा था। उस
समय भाजपा पूरे चुनाव को
विकास बनाम बाहुबल के
नैरेटिव में बदलना चाहती
थी। मनोज सिन्हा ने
चुनाव प्रचार के दौरान खुलकर
कहा था, यह लड़ाई
एक आईआईटीएन और बाहुबली के
बीच है। यह लड़ाई
एक शिक्षित इंजीनियर और अपराध की
राजनीति के बीच है।
यह बयान उस चुनाव
का सबसे चर्चित राजनीतिक
हमला बन गया था।
उधर अफजाल अंसारी भी पीछे नहीं
थे। वे लगातार यह
कहते रहे कि वर्षों
से अलग-अलग लड़
रही सपा और बसपा
अब साथ आ चुकी
हैं और यह गठबंधन
कई राजनीतिक किलों को ध्वस्त कर
देगा। उन्होंने कहा था, सपा
और बसपा पहले नदी
के दो किनारों की
तरह थीं, अब दोनों
साथ हैं तो कई
किले ढहेंगे। यानी चुनाव केवल
वोटों का नहीं था।
यह दो राजनीतिक कथाओं
का टकराव था। एक तरफ
विकास का दावा। दूसरी
तरफ सामाजिक समीकरणों की ताकत। एक
तरफ भाजपा का विकास पुरुष।
दूसरी तरफ गठबंधन का
जातीय गणित। और फिर गाजीपुर
ने सबको चैंका दिया...
23 मई 2019 को परिणाम आया।
केंद्रीय मंत्री मनोज सिन्हा चुनाव
हार गए। अफजाल अंसारी
ने लगभग 1.19 लाख वोटों के
बड़े अंतर से जीत
दर्ज की। अफजाल अंसारी
को 5.66 लाख से अधिक
वोट मिले जबकि मनोज
सिन्हा लगभग 4.46 लाख वोटों पर
रुक गए। जिस सीट
पर 2014 में भाजपा जीती
थी, वही सीट 2019 में
गठबंधन के सामाजिक समीकरणों
के सामने फिसल गई। उस
समय राजनीतिक विश्लेषकों ने साफ कहा
कि गाजीपुर में विकास का
मुद्दा जातीय अंकगणित के सामने कमजोर
पड़ गया। विडंबना देखिए।
जिस चुनाव में मनोज सिन्हा
को हराया गया, उसी मनोज
सिन्हा का राष्ट्रीय कद
बाद में और बढ़
गया। और जिन अफजाल
अंसारी ने चुनाव जीता,
उनके राजनीतिक जीवन के साथ
मुकदमों, कानूनी लड़ाइयों और विवादों की
छाया लगातार चलती रही। यानी
राजनीति ने एक बार
फिर साबित किया, चुनावी हार हमेशा राजनीतिक
हार नहीं होती। और
चुनावी जीत हमेशा अंतिम
विजय नहीं होती।
2017 का वह अधूरा अध्याय...
इस तस्वीर की
चर्चा इसलिए भी ज्यादा हो
रही है क्योंकि उत्तर
प्रदेश की राजनीति का
एक पुराना अध्याय आज भी लोगों
को याद है। 2017 में
भाजपा को प्रचंड बहुमत
मिला था। उस समय
राष्ट्रीय मीडिया में लगातार खबरें
चल रही थीं कि
मनोज सिन्हा मुख्यमंत्री पद की दौड़
में सबसे आगे हैं।
उनका नाम गंभीर दावेदार
माना जा रहा था।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा थी
कि अंतिम क्षण तक उनका
नाम सबसे मजबूत माना
जा रहा था। फिर
अचानक राजनीतिक पटकथा बदली। और मुख्यमंत्री बने
योगी आदित्यनाथ। यही वह मोड़
था जिसने उत्तर प्रदेश की राजनीति की
दिशा बदल दी। आज
भी जब मनोज सिन्हा
की कोई राजनीतिक तस्वीर
चर्चा में आती है
तो उसके भीतर लोग
पुराने राजनीतिक संकेत खोजने लगते हैं। हालांकि
किसी तस्वीर को किसी विशेष
नेता को संदेश या
चिढ़ाने का प्रयास बताना
तथ्यात्मक रूप से उचित
नहीं होगा, क्योंकि इसका कोई प्रत्यक्ष
प्रमाण नहीं है। लेकिन
राजनीति में प्रतीकों की
अपनी भाषा होती है।
और अनुभवी नेता अक्सर बिना
बोले भी बहुत कुछ
कह देते हैं। सबसे
बड़ा व्यंग्य तस्वीर में नहीं, कार्यकर्ताओं
में छिपा है... असल
दर्दनाक दृश्य तस्वीर नहीं है। दर्दनाक
दृश्य वह कार्यकर्ता है
जिसने वर्षों तक अपने नेता
के लिए रिश्ते तोड़े।
जिसने गांव में दुश्मनी
पाल ली। जिसने सोशल
मीडिया पर युद्ध लड़ा।
जिसने अपने नेता की
लड़ाई को धर्मयुद्ध समझ
लिया। और आज वही
नेता मुस्कुराकर एक-दूसरे को
गुलदस्ता दे रहे हैं।
राजनीति का सबसे बड़ा
सच यही है, नेता
चुनाव को रणनीति की
तरह लड़ते हैं। कार्यकर्ता
उसे जीवन-मरण का
प्रश्न बना लेते हैं।
नेता अवसर देखकर दोस्ती
कर लेते हैं। कार्यकर्ता
वर्षों तक दुश्मनी निभाते
रहते हैं। नेता सत्ता
के हिसाब से रिश्ते बनाते
हैं। कार्यकर्ता भावनाओं के हिसाब से
शत्रु चुन लेते हैं।
गाजीपुर की तस्वीर क्या कहती है?
यह तस्वीर शायद
सिर्फ शिष्टाचार हो। शायद पुरानी
पहचान का सम्मान हो।
शायद राजनीतिक परिपक्वता हो। लेकिन यह
तस्वीर एक सवाल जरूर
पूछती है, जिन नेताओं
के लिए समर्थक एक-दूसरे को दुश्मन मान
बैठे थे, क्या वे
नेता कभी खुद एक-दूसरे के दुश्मन थे
भी? या फिर लड़ाई
केवल मंच पर थी
और रिश्ते हमेशा मंच के पीछे
सुरक्षित रखे गए थे?
गाजीपुर की राजनीति का
इतिहास शायद इस सवाल
का जवाब जानता है।
सियासत का सबसे सफल
खिलाड़ी वही होता है
जो मंच पर तलवार
और ड्राइंग रूम में गुलदस्ता
दोनों संभालना जानता हो। दुर्भाग्य सिर्फ
इतना है कि नेता
हर चुनाव के बाद रिश्ते
बचा लेते हैं, लेकिन
कार्यकर्ता हर चुनाव में
अपने रिश्ते गंवा बैठते हैं।
गाजीपुर में 2019 की लड़ाई में
समर्थक खेमों में बंट गए
थे, लेकिन 2026 की एक तस्वीर
ने बता दिया कि
राजनीति में स्थायी दुश्मनी
नहीं होती, स्थायी होती है सिर्फ
कार्यकर्ताओं की भावनात्मक भूल।
गुलदस्ता, गाजीपुर और गहरी सियासत
जिनके समर्थक लड़ते रहे, वे
मुस्कुराते रहे... राजनीति बड़ी निर्मम होती
है। यहां मंच पर
जो दिखाई देता है, असली
कहानी अक्सर उसके पीछे लिखी
जाती है। इस वायरल
तस्वीर ने पुराना सच
फिर सामने ला दिया है।
गाजीपुर की राजनीतिक पृष्ठभूमि
में यह तस्वीर सिर्फ
तस्वीर नहीं रह जाती,
बल्कि एक राजनीतिक प्रतीक
बन जाती है। क्योंकि
यह वही गाजीपुर है
जहां वर्षों तक मनोज सिन्हा
और अंसारी परिवार की राजनीति आमने-सामने खड़ी रही। यह
वही गाजीपुर है जहां समर्थकों
ने अपने-अपने नेताओं
के लिए राजनीतिक रिश्ते
तोड़े, गांवों में खेमे बने,
चुनावों में कटुता बढ़ी
और सोशल मीडिया पर
शब्दों की तल वारें चलीं।
लेकिन आज तस्वीर में
दोनों नेता मुस्कुरा रहे
हैं। मेरा मानना है
2019 का लोकसभा चुनाव केवल एक संसदीय
चुनाव नहीं था। यह
पूर्वांचल की दो राजनीतिक
धाराओं की सीधी टक्कर
थी। केंद्र सरकार के प्रभावशाली मंत्री
मनोज सिन्हा, जिन्हें भाजपा का विकासवादी चेहरा
माना जाता था। उनकी
लड़ाई सपा-बसपा गठबंधन
के उम्मीदवार अफजाल अंसारी से थी, जिनके
पीछे पूरे अंसारी परिवार
की राजनीतिक विरासत और गठबंधन का
सामाजिक समीकरण खड़ा था। चुनाव
में विकास बनाम समीकरण का
नैरेटिव खड़ा किया गया
था, वहां अंततः सामाजिक
गणित राजनीतिक रसायन पर भारी पड़
गया। और फिर बदल
गई पटकथा....विडंबना देखिए। जिस मनोज सिन्हा
को गाजीपुर की जनता ने
चुनाव में हरा दिया,
कुछ ही समय बाद
वही राष्ट्रीय नेतृत्व के भरोसे के
सबसे महत्वपूर्ण चेहरों में शामिल हो
गए और बाद में
जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील केंद्र
शासित प्रदेश की जिम्मेदारी उन्हें
सौंप दी गई। राजनीति
का यह विरोधाभास हमेशा
दिलचस्प रहता है। यूपी
के संभावित मुख्यमंत्री चेहरे के रूप में
चर्चा में रहे मनोज
सिन्हा का राष्ट्रीय राजनीति
में भी कद कम
नहीं होता। जबकि अफजाल अंसारी
चुनाव जीतते हैं, लेकिन उनके
राजनीतिक सफर के साथ
विवाद, मुकदमे और न्यायालयी लड़ाइयों
की छाया लगातार बनी
रहती है। वायरल तस्वीर
भी कुछ ऐसे ही
सवाल छोड़ गई है।
तस्वीर में दोनों नेता
मुस्कुराते हुए दिखाई दे
रहे हैं, मानो राजनीति
की सारी तल्खियां कैमरे
के फ्लैश के साथ गायब
हो गई हों। दिलचस्प
यह नहीं कि दोनों
मिले। लोकतंत्र में मिलना चाहिए।
संवाद होना चाहिए। शिष्टाचार
भी होना चाहिए। दिलचस्प
यह है कि जिन
राजनीतिक धाराओं के बीच वर्षों
तक संघर्ष की कहानी लिखी
गई, जिनके समर्थकों ने सोशल मीडिया
से लेकर सड़क तक
एक-दूसरे के खिलाफ मोर्चे
खोले, जिन कार्यकर्ताओं ने
अपने नेताओं के लिए रिश्ते
तक दांव पर लगा
दिए, वे आज इस
तस्वीर को देखकर क्या
सोच रहे होंगे? भारतीय
राजनीति का यह सबसे
पुराना और सबसे कम
समझा गया अध्याय है,
नेताओं की लड़ाई अक्सर
वैचारिक से ज्यादा प्रतीकात्मक
होती है, जबकि कार्यकर्ता
उसे व्यक्तिगत युद्ध मान बैठते हैं।
सियासत के पुराने खिलाड़ी
जानते थे कि चुनावी
मंच पर विरोध करना
है, लेकिन व्यक्तिगत पुल नहीं तोड़ने
हैं। संसद में बहस
होगी, मंच पर हमला
होगा, प्रेस कॉन्फ्रेंस में कटाक्ष होगा,
लेकिन शाम को चाय
भी साथ पी जाएगी।
आज की पीढ़ी इसे
अवसरवाद कहती है, पुरानी
पीढ़ी इसे राजनीतिक परिपक्वता
कहती थी। इस तस्वीर
ने एक और पुरानी
राजनीतिक कथा को फिर
जीवित कर दिया है।
राजनीति की बिसात पर
मोहरे अलग-अलग, लेकिन
रिश्तों की डोर बरकरार...
पुराने खिलाड़ी जानते हैं कि विरोध
और वैर में कितना
फर्क होता है।


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