जब दर्पण ही धुंधला हो जाए, तो समाज अपना चेहरा कैसे देखेगा?
कभी पत्रकारिता सत्ता के सामने सच की मशाल लेकर खड़ी होती थी। कलम की एक चोट साम्राज्य की नींद उड़ा देती थी और अखबार जनता की आवाज हुआ करते थे। लेकिन आज वही पत्रकारिता बाजार, टीआरपी और राजनीतिक गठजोड़ के भंवर में फंसती दिखाई दे रही है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाने वाला मीडिया अब खुद विश्वास के संकट से गुजर रहा है। खबरें अब जनसरोकार से ज्यादा मुनाफे के तराजू पर तौली जाने लगी हैं। विज्ञापन खबर बन रहे हैं और बहसें प्रायोजित एजेंडों में बदलती जा रही हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि समाज में पत्रकारों के प्रति सम्मान भी लगातार घट रहा है। इसकी वजह सिर्फ बाहरी दबाव नहीं, बल्कि पत्रकारिता के भीतर घुस आई दलाली, ब्लैकमेलिंग और स्वार्थ की संस्कृति भी है। कुछ लोगों ने कलम को जनसेवा नहीं, बल्कि सुरक्षा कवच और कमाई का हथियार बना लिया है। ऐसे दौर में यह सवाल बेहद जरूरी हो जाता है कि क्या पत्रकारिता अब भी लोकतंत्र की प्रहरी है या फिर सत्ता और बाजार के बीच समझौतों का माध्यम बनती जा रही है। हिंदी पत्रकारिता दिवस आत्ममंथन का भी अवसर है
सुरेश गांधी
आज हिंदी पत्रकारिता
दिवस के अवसर पर
यह प्रश्न पहले से कहीं
अधिक प्रासंगिक दिखाई देता है। लोकतंत्र
का चौथा स्तंभ कहे
जाने वाली पत्रकारिता आज
स्वयं विश्वास के संकट से
जूझ रही है। कभी
यह पेशा जनजागरण, स्वतंत्रता
और सामाजिक परिवर्तन का सबसे बड़ा
माध्यम था, लेकिन बदलते
दौर में इसके स्वरूप,
सरोकार और चरित्र पर
गंभीर सवाल खड़े हो
रहे हैं। मिशन की
पत्रकारिता अब धीरे-धीरे
बाजार और मुनाफे की
चकाचौंध में सिमटती दिखाई
दे रही है। भारतीय
पत्रकारिता का इतिहास संघर्ष,
साहस और जनसेवा की
मिसाल रहा है। जब
अंग्रेजी हुकूमत भारतीयों की आवाज दबाने
में लगी थी, तब
पंडित जुगल किशोर शुक्ल
ने “उदन्त मार्तण्ड” के माध्यम से
हिंदी पत्रकारिता की नींव रखी।
राजा राममोहन राय, गणेश शंकर
विद्यार्थी, अज्ञेय, राजेंद्र माथुर जैसे पत्रकारों ने
अपनी कलम को समाज
परिवर्तन का हथियार बनाया।
उस दौर में पत्रकारिता
सत्ता की दलाली नहीं,
बल्कि सत्ता से सवाल पूछने
का साहस थी। अखबार
हाथ से लिखे जाते
थे, संसाधन सीमित थे, लेकिन शब्दों
में इतनी ताकत थी
कि साम्राज्यवादी शासन की नींद
उड़ जाती थी। आज
स्थिति पूरी तरह बदल
चुकी है। आधुनिक तकनीक,
रंगीन प्रिंटिंग, डिजिटल मीडिया, चौबीस घंटे चलने वाले
समाचार चैनल और सोशल
मीडिया की बाढ़ ने
पत्रकारिता को बेहद तेज
और प्रभावशाली बना दिया है।
लेकिन इसी रफ्तार में
उसकी आत्मा कहीं खोती हुई
नजर आती है। खबर
अब जनहित से ज्यादा टीआरपी
और क्लिक की वस्तु बन
चुकी है। विज्ञापन खबर
का रूप ले रहे
हैं और विचार भी
बिकाऊ हो चुके हैं।
जनता तक वही समाचार
पहुंचाए जा रहे हैं,
जिनसे संस्थानों का आर्थिक हित
जुड़ा हो।
सबसे बड़ा संकट
पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर
आया है। समाज में
पत्रकार का सम्मान धीरे-धीरे कम होता
जा रहा है। इसका
कारण केवल बाहरी दबाव
नहीं, बल्कि पत्रकारिता के भीतर पैदा
हुई विकृतियां भी हैं। कुछ
लोग अवैध कारोबार और
व्यक्तिगत स्वार्थों की सुरक्षा के
लिए पत्रकारिता का चोला ओढ़
लेते हैं। कई तथाकथित
पत्रकारों ने इस पेशे
को ब्लैकमेलिंग और दलाली का
माध्यम बना दिया है।
दुर्भाग्य यह है कि
ऐसे लोगों को कई बार
संस्थानों का संरक्षण भी
मिल जाता है, क्योंकि
वे सत्ता और पैसे के
समीकरण साधने में माहिर होते
हैं। आज पत्रकारिता के सामने सबसे
बड़ा प्रश्न यही है कि
क्या वह अब भी
समाज और लोकतंत्र के
प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा
रही है? लोकतंत्र के
अन्य स्तंभ यदि भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और सत्ता के
दबाव से प्रभावित हैं,
तो पत्रकारिता की जिम्मेदारी और
अधिक बढ़ जाती है।
लेकिन दुखद यह है
कि अब समाचारों की
सत्यता पर भी संदेह
होने लगा है। राजनीतिक
दलों और बड़े कारोबारी
घरानों से गठजोड़ ने
कई मीडिया संस्थानों की निष्पक्षता को
प्रभावित किया है। जब
मालिकान ही राजनीतिक सौदों
का हिस्सा बनने लगें, तब
नीचे तक व्यवस्था का
दूषित होना स्वाभाविक है।
पत्रकारिता का यह पतन
केवल संस्थागत नहीं, नैतिक भी है। कभी
पत्रकारिता को समाज सेवा
और जनचेतना का माध्यम माना
जाता था। आज यह
एक बड़ा उद्योग बन
चुका है। इसमें प्रोफेशनलिज्म
आना गलत नहीं, लेकिन
हर प्रोफेशन का एक नैतिक
आधार भी होता है।
पत्रकारिता की आत्मा सत्य,
निष्पक्षता और जनपक्षधरता में
बसती है। यदि यह
समाप्त हो जाए, तो
पत्रकारिता केवल सूचना बेचने
का कारोबार बनकर रह जाएगी।
इसके बावजूद पूरी तस्वीर निराशाजनक
नहीं है। आज भी
हजारों ऐसे पत्रकार हैं
जो सीमित संसाधनों और जोखिमों के
बीच सच्चाई के लिए लड़
रहे हैं। गांव-कस्बों
के स्ट्रिंगर, सीमावर्ती क्षेत्रों में रिपोर्टिंग करने
वाले संवाददाता, बाढ़, दंगे, महामारी और नक्सल प्रभावित
इलाकों में जान जोखिम
में डालकर खबरें जुटाने वाले पत्रकार—ये
आज भी पत्रकारिता के
असली चेहरे हैं। कम वेतन
या बिना वेतन के
बावजूद वे इसलिए टिके
हैं क्योंकि उनके भीतर मिशन
की भावना अभी जीवित है।
पत्रकारिता कभी आसान पेशा
नहीं रही। यह सचमुच
“तलवार की धार पर
दौड़ने” जैसा कार्य है।
भ्रष्टाचार का खुलासा करने
वाले पत्रकारों को आज भी
धमकियां मिलती हैं। कई बार
उनकी हत्या तक कर दी
जाती है। दुनिया भर
में हर वर्ष दर्जनों
पत्रकार सच दिखाने की
कीमत अपनी जान देकर
चुकाते हैं। भारत भी
इससे अछूता नहीं है। ऐसे
में पत्रकारिता केवल नौकरी नहीं,
बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी और साहस का
नाम है। आज आवश्यकता इस बात की
है कि पत्रकारिता अपने
मूल स्वभाव की ओर लौटे।
मीडिया संस्थानों को यह समझना
होगा कि विश्वसनीयता ही
उनकी सबसे बड़ी पूंजी
है। पत्रकारों को भी आत्ममंथन
करना होगा कि वे
सत्ता और स्वार्थ के
साथ खड़े हैं या
समाज और सच के
साथ। पीत पत्रकारिता, फर्जी
खबरों और दलाली की
संस्कृति से दूरी बनाकर
ही इस पेशे की
गरिमा बचाई जा सकती
है। हिंदी पत्रकारिता दिवस केवल उत्सव
का अवसर नहीं, बल्कि
आत्मविश्लेषण का भी दिन
है। यह संकल्प लेने
का समय है कि
पत्रकारिता को फिर से
जनविश्वास का माध्यम बनाया
जाए। कलम बिके नहीं,
झुके नहीं और समाज
के प्रति अपनी जवाबदेही को
कभी न भूले। क्योंकि
यदि चौथा स्तंभ कमजोर
होगा, तो लोकतंत्र की
पूरी इमारत हिलने लगेगी। आज जरूरत सिर्फ खबर लिखने की
नहीं, बल्कि सच के पक्ष
में खड़े होने की
है। पत्रकारिता का भविष्य तकनीक
से नहीं, उसकी नैतिकता से
तय होगा। मिशन की वही
लौ यदि फिर प्रज्ज्वलित
हुई, तो लोकतंत्र का
यह चौथा स्तंभ दोबारा
अपनी पूरी ताकत के
साथ खड़ा दिखाई देगा।
जब कलम दलाली की गिरफ़्त में हो
सबसे दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति
यह है कि समाज
में पत्रकारों के प्रति सम्मान
लगातार घट रहा है।
इसका कारण केवल बाहरी
दबाव नहीं, बल्कि पत्रकारिता के भीतर पैदा
हुई विकृतियां भी हैं। कुछ
लोगों ने पत्रकारिता को
कमाई का जरिया बना
लिया है। ऐसे लोग
कलम को समाज सेवा
नहीं, बल्कि निजी स्वार्थ, दबाव
और सौदेबाजी का हथियार बना
चुके हैं। अवैध कारोबार
करने वाले कई लोग
पत्रकारिता का चोला ओढ़कर
उसे सुरक्षा कवच की तरह
इस्तेमाल कर रहे हैं।
यही वजह है कि
आज “पत्रकार” शब्द की गरिमा
पर भी सवाल उठने
लगे हैं। स्थिति इतनी
भयावह हो चुकी है
कि कई तथाकथित पत्रकार
अपने ही साथियों को
नुकसान पहुंचाने में पीछे नहीं
हटते। पैसे और स्वार्थ
के लिए साथी पत्रकारों
की बलि चढ़ाने तक
की घटनाएं सामने आती हैं। प्रशासन
और पुलिस से सांठगांठ कर
सच उजागर करने वाले पत्रकारों
को ही निशाना बनाया
जाता है। कुछ मामलों
में तो पत्रकारिता की
आड़ में ब्लैकमेलिंग और
दलाली का ऐसा नेटवर्क
खड़ा हो चुका है,
जिसने पूरे पेशे की
साख को चोट पहुंचाई
है।
संकट भरोसे का
विडंबना यह भी है
कि इस गंदगी को
रोकने के बजाय कई
मीडिया संस्थान ऐसे तत्वों को
संरक्षण देते दिखाई देते
हैं। कारण साफ है—वे संस्थान के
आर्थिक और राजनीतिक हित
साधने में उपयोगी साबित
होते हैं। जब गंगोत्री
ही मैली हो जाए,
तो गंगा के स्वच्छ
रहने की उम्मीद भी
कैसे की जा सकती
है? पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर
आज सबसे बड़ा संकट
भीतर से ही खड़ा
हुआ है। पत्रकारों के
हितों की रक्षा का
दावा करने वाले कई
संगठन भी अब सवालों
के घेरे में हैं।
मंचों से बड़ी-बड़ी
बातें करने वाले ये
संगठन अक्सर वास्तविक संघर्ष के समय गायब
नजर आते हैं। पत्रकारों
की सुरक्षा, न्यूनतम वेतन, उत्पीड़न या संस्थागत शोषण
जैसे मुद्दों पर उनकी आवाज
कमजोर पड़ जाती है।
कई संगठन केवल सदस्यता, चंदाखोरी
और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं तक सीमित होकर
रह गए हैं।
पत्रकारिता की असली आत्मा
हालांकि इस अंधेरे के बीच उम्मीद की रोशनी भी मौजूद है। आज भी हजारों पत्रकार ऐसे हैं जो सीमित संसाधनों में, जान जोखिम में डालकर सच सामने ला रहे हैं। गांवों, बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों, नक्सल प्रभावित इलाकों और संघर्षपूर्ण परिस्थितियों में काम करने वाले पत्रकार आज भी पत्रकारिता की असली आत्मा को जिंदा रखे हुए हैं। उनका सबसे बड़ा मानदेय वेतन नहीं, बल्कि सच के साथ खड़े होने का आत्मसंतोष है। पत्रकारिता कोई साधारण पेशा नहीं है। यह लोकतंत्र की सांस है। जब न्यायपालिका, कार्यपालिका और राजनीति पर सवाल उठते हैं, तब समाज की निगाहें मीडिया की ओर जाती हैं। लेकिन यदि मीडिया ही अविश्वसनीय हो जाए, तो लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर होने लगती है। इसलिए पत्रकारिता के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती अपनी विश्वसनीयता को बचाने की है। जरूरत इस बात की है कि पत्रकारिता फिर से अपने मूल स्वभाव की ओर लौटे। पीत पत्रकारिता, ब्लैकमेलिंग और दलाली की संस्कृति से दूरी बनाकर ही चौथे स्तंभ की साख बचाई जा सकती है। क्योंकि जिस दिन जनता का भरोसा पूरी तरह टूट गया, उस दिन पत्रकारिता केवल व्यवसाय रह जाएगी—लोकतंत्र का प्रहरी नहीं।


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