“तीन दिन में भुखमरी?” : सोने की चमक फीकी पड़ते ही क्यों कांप उठा बाजार!
प्रधानमंत्री के एक आह्वान पर अगर कारोबार डगमगा जाए, तो फिर कोरोना जैसे संकट में देश ने आखिर कैसे खुद को संभाला था? मतलब साफ है
देश में इस समय बहस सोने की नहीं, सोच की है। प्रधानमंत्री की एक अपील के बाद जिस तरह कुछ कारोबारी वर्ग और अखबारों ने “भुखमरी” का शोर मचाना शुरू किया, उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या वास्तव में देश का इतना बड़ा व्यापार केवल तीन दिन की मंदी भी नहीं झेल सकता? और यदि हालात कोरोना जैसे लंबे संकट में बदल जाएं, तब क्या होगा? यह वही भारत है जहां गरीब मजदूर महीनों भूख सहकर भी राष्ट्रहित के साथ खड़ा रहा। ऐसे में कुछ दिनों की सुस्ती पर मातम यह बताता है कि बाजार की चमक के पीछे धैर्य और राष्ट्रीय संवेदना कितनी कमजोर पड़ चुकी है
सुरेश गांधी
देश जब-जब किसी बड़े आर्थिक या राष्ट्रीय मोड़ पर खड़ा होता है, तब-तब यह भी साफ हो जाता है कि कौन राष्ट्रहित में खड़ा है और कौन सिर्फ अपने मुनाफे की चमक बचाने में जुटा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से देशवासियों से एक वर्ष तक सोना न खरीदने और पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने की अपील क्या हुई, कुछ अखबारों और कारोबारी वर्ग के एक हिस्से ने ऐसा माहौल खड़ा करना शुरू कर दिया मानो देश में आर्थिक आपातकाल आ गया हो। कहीं कहा गया कि “सोनारों और ज्वेलरी कारोबारियों के सामने भुखमरी की नौबत आ गई है”, तो कहीं इसे व्यापार पर सीधा हमला बताने की कोशिश हुई। लेकिन असली सवाल यही है कि आखिर यह कैसी अर्थव्यवस्था और कैसा कारोबार है, जो प्रधानमंत्री के एक आह्वान के महज तीन दिन के भीतर “भुखमरी” की दहलीज पर पहुंच जाता है? यदि केवल अपील से बाजार की सांस फूलने लगे, तो फिर कोरोना महामारी जैसा लंबा संकट आने पर क्या हाल होगा? उस दौर को देश ने देखा है, जब महीनों तक दुकानें बंद रहीं, मजदूर पैदल घर लौटे, छोटे व्यापारी कर्ज में डूबे, होटल-पर्यटन से लेकर कपड़ा बाजार तक तबाह हो गया, लेकिन तब भी देश ने धैर्य रखा। राष्ट्रहित सर्वोपरि था। आज वही देश यह सुन रहा है कि सोना न खरीदने की अपील ने कुछ दिनों में ही “भुखमरी” ला दी। यह बयान जितना अतिशयोक्तिपूर्ण है, उतना ही चिंताजनक भी। क्योंकि यह केवल आर्थिक संकट का रोना नहीं, बल्कि उस मानसिकता का आईना है जिसमें राष्ट्रहित से पहले निजी मुनाफा खड़ा दिखाई देता है।
सोना सिर्फ आभूषण नहीं, विदेशी मुद्रा पर बोझ भी
भारत दुनिया के सबसे बड़े स्वर्ण उपभोक्ता देशों में है। हर साल भारी मात्रा में सोना आयात होता है और इसके बदले देश की विदेशी मुद्रा बाहर जाती है। जब वैश्विक परिस्थितियां अस्थिर हों, डॉलर मजबूत हो रहा हो, पेट्रोलियम आयात का दबाव बढ़ रहा हो और आर्थिक चुनौतियां सामने हों, तब सरकारें नागरिकों से संयम और संतुलन की अपील करती हैं। यह कोई पहला अवसर नहीं है। पहले भी देशहित में लोगों ने कई त्याग किए हैं। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि कुछ वर्गों ने इस अपील को “राष्ट्रहित” के बजाय सीधे “व्यापार विरोध” के चश्मे से देखना शुरू कर दिया। मानो देश की अर्थव्यवस्था नहीं, केवल सोने का बाजार ही राष्ट्र की धुरी हो।
काशी में उठ रहे तीखे सवाल
काशी की गलियों में भी इस बयानबाजी को लेकर तीखे कटाक्ष सुनाई देने लगे हैं। लोग पूछ रहे हैं कि जब देश कोरोना में महीनों बंद रहा तब लाखों गरीब परिवारों ने भूख, बेरोजगारी और अपनों की मौत झेली, लेकिन उन्होंने देशहित के खिलाफ ऐसा शोर नहीं मचाया। फिर सोने के कारोबार में कुछ दिनों की सुस्ती आते ही “भुखमरी” का रोना क्यों? बनारस के पुराने बाजारों में व्यापारी भी मानते हैं कि व्यापार में उतार-चढ़ाव सामान्य बात है। कभी शादी का सीजन बाजार को चमका देता है, तो कभी वैश्विक हालात मंदी ला देते हैं। लेकिन केवल एक अपील के बाद इस तरह का भय फैलाना यह दिखाता है कि कुछ लोगों की चिंता देश नहीं, केवल नकदी प्रवाह है।
देश संकट में हो तो संयम भी देशभक्ति है
भारतीय समाज ने हमेशा संकट के समय त्याग की मिसाल पेश की है। युद्धकाल में लोगों ने गहने दान किए, अकाल में भोजन बचाया, कोरोना में जरूरतमंदों की मदद की। यही भारतीय संस्कृति है। लेकिन आज यदि सरकार नागरिकों से थोड़े संयम की अपील करे और उसके जवाब में “भुखमरी” का नैरेटिव खड़ा किया जाए, तो यह समाज के उस त्यागमय चरित्र पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।
व्यापार जरूरी है, बाजार भी जरूरी है, लेकिन राष्ट्र उससे बड़ा है। यदि देश आर्थिक दबाव से जूझ रहा हो, विदेशी मुद्रा बचाने की जरूरत हो, तो कुछ समय का संयम कोई बलिदान नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिकता है।
चमक गहनों में है या जज्बे में?
इस पूरे विवाद ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या हमारे बाजार इतने खोखले हो चुके हैं कि तीन दिन की अपील भी उन्हें “भुखमरी” दिखाने लगे? यदि हां, तो यह केवल व्यापार की कमजोरी नहीं, मानसिकता की भी कमजोरी है। देश आज भी त्याग और आत्मसंयम की उसी भावना की अपेक्षा करता है, जिसने हर संकट में भारत को मजबूत बनाया। वरना जनता यह पूछने लगी है कि चमक आखिर गहनों में ज्यादा है या देशभक्ति के जज्बे में कम पड़ गई है।


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