दो जून की तलाश में जिंदगी : सभ्यता का पहला सपना, मनुष्य की अंतिम चिंता
पेट की आग बुझाने को गांव से शहर तक भटकता आदमी, रोटी के लिए हर दिन लिखी जा रही संघर्ष की नई इबारत. रोटी की तलाश में कितनी ही युवावस्थाएं समय से पहले बूढ़ी हो जाती हैं। कितनी ही आंखों के सपने जिम्मेदारियों की भट्ठी में जल जाते हैं। रोटी का यह पक्ष अक्सर आंकड़ों में नहीं दिखता, लेकिन समाज की आत्मा में दर्ज रहता है। भारत जैसे देश में रोटी का महत्व और भी अधिक है। यहां आज भी करोड़ों लोग अपने दिन की शुरुआत इस चिंता से करते हैं कि शाम का चूल्हा कैसे जलेगा। सरकारी योजनाएं, रोजगार कार्यक्रम, आर्थिक नीतियां और विकास के बड़े-बड़े दावे अंततः इसी कसौटी पर परखे जाते हैं कि आम आदमी की थाली में रोटी कितनी सहजता से पहुंच रही है। फिर भी रोटी की कहानी केवल अभाव की कहानी नहीं है। यह श्रम और सृजन की कहानी भी है। किसान के खेत से लेकर मजदूर के पसीने तक, गृहिणी की रसोई से लेकर सैनिक की चौकी तक, हर जगह रोटी एक अदृश्य सूत्र की तरह समाज को जोड़ती है। यह हमें बताती है कि मनुष्य चाहे जितनी ऊंचाइयों पर पहुंच जाए, उसकी सबसे बुनियादी जरूरतें उसे धरती से जोड़े रखती हैं। आज जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष अभियान और डिजिटल क्रांति की बातें हो रही हैं, तब भी दुनिया का सबसे बड़ा प्रश्न वही है—क्या हर व्यक्ति को सम्मानपूर्वक रोटी मिल रही है? यदि नहीं, तो विकास की कोई भी कहानी अधूरी है। दो जून की इस तारीख पर रोटी को याद करना दरअसल उस श्रम को प्रणाम करना है, जो खेतों में पसीना बहाता है; उस मजदूर को नमन करना है, जो शहरों को खड़ा करता है; और उस संघर्ष को स्वीकार करना है, जो हर दिन करोड़ों लोगों को जीवन से जोड़े रखता है। क्योंकि सच यही है कि मनुष्य की सभ्यता चाहे जितनी आधुनिक हो जाए, उसकी सबसे बड़ी चिंता आज भी वही है जो हजारों साल पहले थी—रोटी। और शायद उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि भी वही है—सम्मान की रोटी...
सुरेश गांधी
आज दो जून
है। कैलेंडर में दर्ज एक
साधारण-सी तारीख। लेकिन
हिंदी समाज में यह
तारीख आते ही अनायास
एक वाक्य स्मृति में कौंध जाता
है—"दो जून की
रोटी"। यह केवल
एक मुहावरा नहीं, बल्कि भारतीय समाज की सबसे
बड़ी आकांक्षा, सबसे पुराना संघर्ष
और सबसे गहरी पीड़ा
का नाम है। देश के
करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की
हकीकत है। शहरों की
चमक के पीछे, ऊंची
इमारतों और चौड़ी सड़कों
के पीछे, ऐसे ही लाखों
चेहरे हैं जिनकी पूरी
जिंदगी रोटी की तलाश
में गुजर जाती है।
सुबह के छह
बजे हैं। शहर अभी
पूरी तरह जागा नहीं
है, लेकिन रेलवे स्टेशन के बाहर मजदूरों
का जमघट लग चुका
है। किसी के कंधे
पर फावड़ा है, किसी के
हाथ में पुराना झोला।
कोई ठेकेदार का इंतजार कर
रहा है तो कोई
इस उम्मीद में खड़ा है
कि आज काम मिल
जाएगा। इन चेहरों पर
कोई बड़ी महत्वाकांक्षा नहीं
दिखती। इनके सपनों का
आकार बहुत छोटा है—बस इतना कि
शाम को घर लौटते
समय बच्चों के लिए रोटी
का इंतजाम हो जाए।
वाराणसी के कैंट स्टेशन
के बाहर मिले चंदौली
के रामअवध यादव बताते हैं
कि खेती से परिवार
का गुजारा नहीं होता। सुबह
चार बजे गांव से
निकलकर शहर आते हैं।
अगर काम मिल गया
तो दिन अच्छा, नहीं
मिला तो शाम को
खाली हाथ घर लौटना
पड़ता है। वह कहते
हैं, "साहब, हमारी जिंदगी में सबसे बड़ा
सवाल यही है कि
आज रोटी कैसे चलेगी।"
रामअवध अकेले नहीं हैं। पूर्वांचल
के हजारों गांवों से रोज लोग
शहरों की ओर नि
कलते हैं। कोई निर्माण स्थल
पर मजदूरी करता है, कोई
रिक्शा चलाता है, कोई ठेला
लगाता है। दिन भर
की कमाई और शाम
की रोटी के बीच
उनका पूरा जीवन सिमटा
हुआ है।
बनारस की गलियों में
सुबह-सुबह चूल्हे जलाने
वाली महिलाओं की दुनिया भी
इससे अलग नहीं। भेलूपुर
की रहने वाली गीता
देवी बताती हैं कि महंगाई
बढ़ने के साथ रसोई
का गणित बिगड़ गया
है। पहले महीने भर
का राशन आसानी से
चल जाता था, अब
हर सप्ताह हिसाब लगाना पड़ता है। वह कहती
हैं, "रोटी सिर्फ आटा
नहीं होती, उसके साथ दाल,
सब्जी, तेल और नमक
भी चाहिए।"
रोटी मनुष्य की
पहली जरूरत है। जब सभ्यता
का इतिहास लिखा गया, तब
उसके पहले पन्ने पर
किसी साम्राज्य, किसी राजा या
किसी युद्ध का नहीं, बल्कि
भोजन की तलाश में
भटकते मनुष्य का नाम दर्ज
था। खेती का जन्म
भी रोटी के लिए
हुआ, गांव बसे तो
रोटी के लिए, बाजार
बने तो रोटी के
लिए और उद्योगों का
विस्तार भी अंततः रोटी
की ही कहानी है।
दुनिया के अधिकांश संघर्षों,
क्रांतियों और आंदोलनों की
जड़ में कहीं न
कहीं रोटी की चिंता
ही रही है। लेकिन
रोटी केवल भोजन नहीं
है। वह श्रम का
सम्मान है, आत्मनिर्भरता का
प्रतीक है और मनुष्य
की गरिमा का आधार भी
है। जिस व्यक्ति के
पास अपनी मेहनत की
रोटी है, उसके भीतर
आत्मविश्वास होता है। और
जब रोटी छिनती है,
तो केवल भूख नहीं
बढ़ती, मनुष्य का आत्मसम्मान भी
घायल होता है।
दरअसल, रोटी केवल भूख
का सवाल नहीं है।
यह सम्मान का भी प्रश्न
है। गांव छोड़कर महानगरों
में गए लाखों प्रवासी
मजदूरों की जिंदगी इसका
सबसे बड़ा उदाहरण है।
मुंबई, दिल्ली, सूरत और लुधियाना
जैसे शहरों में काम करने
वाले पूर्वांचल के मजदूर साल
भर परिवार से दूर रहते
हैं। त्योहारों पर घर लौटते
हैं और फिर कुछ
दिनों बाद उसी संघर्ष
में वापस चले जाते
हैं। उनके लिए रोटी
केवल भोजन नहीं, परिवार
के भविष्य की कीमत है।
समाजशास्त्री मानते
हैं कि भारत की
विकास यात्रा को समझना है
तो रोटी की कहानी
समझनी होगी। देश ने आर्थिक
प्रगति की है, तकनीक
में आगे बढ़ा है,
लेकिन आज भी बड़ी
आबादी की पहली चिंता
रोजगार और भोजन ही
है। यही कारण है
कि रोजगार, मजदूरी और महंगाई जैसे
मुद्दे सीधे आम आदमी
की थाली से जुड़ते
हैं।
शहरों में काम करने
वाले युवाओं की कहानी भी
कम अलग नहीं। पढ़ाई
पूरी करने के बाद
नौकरी की तलाश में
भटकते युवाओं के लिए रोटी
अब केवल पेट भरने
का साधन नहीं, बल्कि
अस्तित्व की लड़ाई बन
चुकी है। डिग्रियां हाथ
में हैं, सपने आंखों
में हैं, लेकिन रोजगार
की अनिश्चितता उन्हें लगातार बेचैन करती है। इस बीच
गांवों में बुजुर्गों की
एक पीढ़ी है, जिसने पूरी
जिंदगी खेती और मेहनत
में गुजार दी। उनसे पूछिए
तो वे कहेंगे कि
जिंदगी की असली परिभाषा
रोटी ही है। सम्मान
मिला या नहीं, पद
मिला या नहीं, लेकिन
घर का चूल्हा जलता
रहा तो जीवन सफल
माना गया। दो जून
की इस तारीख पर
जब देश विकास और
प्रगति की नई ऊंचाइयों
की बात कर रहा
है, तब यह याद
रखना भी जरूरी है
कि करोड़ों लोगों के लिए आज
भी सबसे बड़ा सपना
बहुत साधारण है—घर में
चूल्हा जले, बच्चे भूखे
न सोएं और मेहनत
की कमाई से सम्मानपूर्वक
रोटी मिल जाए।
आखिरकार, मनुष्य की सारी यात्राओं,
उपलब्धियों और महत्वाकांक्षाओं का
अंतिम पड़ाव शायद यही है।
रोटी आज भी उतनी
ही जरूरी है जितनी सदियों
पहले थी। फर्क सिर्फ
इतना है कि समय
बदल गया है, लेकिन
दो जून की रोटी
की तलाश में भटकता
आदमी आज भी वहीं
खड़ा है, जहां इतिहास
के पहले पन्ने पर
खड़ा था। फिर भी रोटी की
कहानी केवल अभाव की
कहानी नहीं है। यह
श्रम और सृजन की
कहानी भी है। किसान
के खेत से लेकर
मजदूर के पसीने तक,
गृहिणी की रसोई से
लेकर सैनिक की चौकी तक,
हर जगह रोटी एक
अदृश्य सूत्र की तरह समाज
को जोड़ती है। यह हमें
बताती है कि मनुष्य
चाहे जितनी ऊंचाइयों पर पहुंच जाए,
उसकी सबसे बुनियादी जरूरतें
उसे धरती से जोड़े
रखती हैं।


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