प्रधान या प्रशासक? पंचायतों पर सियासत तेज, पूर्वांचल में बढ़ा असंतोष
ग्राम प्रधानों
को
प्रशासक
बनाने
के
फैसले
पर
गांव-गांव
बहस
| राजभर
बोले-
सपा
भ्रम
फैला
रही,
विपक्ष
ने
उठाए
लोकतंत्र
पर
सवाल
सुरेश गांधी
वाराणसी. उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों
का कार्यकाल समाप्त होने के बाद
ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए
जाने का मुद्दा अब
केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि बड़ा राजनीतिक विवाद
बन गया है। मामला
न्यायालय तक पहुंच चुका
है और पूर्वांचल के
गांवों में इसे लेकर
तीखी बहस छिड़ गई
है। कहीं प्रधानों में
राहत का भाव है
तो कहीं विपक्षी दल
इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ बताकर
सरकार को घेर रहे
हैं।
पूर्वांचल के कई जिलों
में ग्रामीणों और पंचायत प्रतिनिधियों
से बातचीत में यह साफ
दिखा कि पंचायत चुनाव
की संभावित देरी और प्रशासक
व्यवस्था को लेकर लोगों
में जिज्ञासा के साथ-साथ
असमंजस भी है। ग्राम
प्रधानों का एक वर्ग
मानता है कि यदि
कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं होती तो
विकास कार्य पूरी तरह ठप
पड़ जाते। वहीं विपक्ष समर्थक
ग्रामीणों का कहना है
कि समय पर चुनाव
कराना ही लोकतांत्रिक व्यवस्था
का सबसे बेहतर विकल्प
है।
इस बीच प्रदेश
सरकार के सहयोगी दल
ओम प्रकाश राजभर ने समाजवादी पार्टी
पर तीखा हमला बोला
है। राजभर का कहना है
कि पंचायतों में विकास कार्यों
की निरंतरता बनाए रखने के
लिए यह व्यवस्था की
गई है, लेकिन सपा
इसे राजनीतिक मुद्दा बनाकर गांवों में भ्रम फैलाने
का प्रयास कर रही है।
राजभर ने कहा कि जब
तक परिसीमन, आरक्षण और चुनावी प्रक्रिया
पूरी नहीं हो जाती,
तब तक ग्रामीण विकास
योजनाओं को रुकने नहीं
दिया जा सकता। उनके
अनुसार सपा को गांवों
के विकास से अधिक राजनीतिक
लाभ की चिंता है।
उन्होंने आरोप लगाया कि
विपक्ष पंचायतों को लेकर अनावश्यक
भय और भ्रम का
वातावरण तैयार कर रहा है।
दूसरी ओर समाजवादी पार्टी
के नेताओं का कहना है
कि पंचायत लोकतंत्र की सबसे मजबूत
इकाई है और चुनाव
में देरी लोकतांत्रिक मूल्यों
के अनुरूप नहीं मानी जा
सकती। पार्टी का तर्क है
कि प्रशासक व्यवस्था अस्थायी हो सकती है,
लेकिन इसका लंबा खिंचना
उचित नहीं होगा। पूर्वांचल
के कई गांवों में
प्रधानों का कहना है
कि उनके पास अभी
भी अधूरे विकास कार्य हैं। सड़क, नाली,
पेयजल और सामुदायिक भवन
जैसी योजनाओं का काम चल
रहा है। यदि कोई
प्रशासनिक व्यवस्था नहीं रहती तो
इन योजनाओं पर सीधा असर
पड़ता। वहीं कुछ ग्रामीणों
का मत है कि
पंचायतों को जनता से
नया जनादेश लेने का अवसर
जल्द मिलना चाहिए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है
कि पंचायत चुनाव से पहले यह
मुद्दा ग्रामीण राजनीति का बड़ा केंद्र
बन सकता है। पूर्वांचल
में पंचायतें केवल विकास की
इकाई नहीं बल्कि राजनीतिक
प्रभाव का आधार भी
हैं। ऐसे में ग्राम
प्रधानों को प्रशासक बनाए
जाने का निर्णय आने
वाले दिनों में भाजपा और
सपा के बीच बड़े
सियासी संघर्ष का कारण बन
सकता है। अब सबकी
निगाहें अदालत की सुनवाई पर
टिकी हैं। न्यायालय का
फैसला न केवल इस
व्यवस्था की वैधानिकता तय
करेगा, बल्कि यह भी स्पष्ट
करेगा कि पंचायत चुनावों
की दिशा और समय-सीमा क्या होगी।
तब तक गांव की
चौपाल से लेकर राजनीतिक
मंचों तक एक ही
सवाल गूंज रहा है—गांव का शासन
प्रशासक चलाएगा या जनता फिर
से अपना प्रधान चुनेगी?
काम
रुकना नहीं चाहिए, इसलिए
कोई व्यवस्था जरूरी है। – बनवारी राम ग्राम प्रधान,
चंदौली
चुनाव
समय पर होना चाहिए,
लोकतंत्र की यही मांग
है। –चंद्रेश यादव ग्रामीण, बलिया
विकास
और लोकतंत्र दोनों जरूरी हैं, अदालत का
फैसला अहम होगा। –अत्री
भारद्वाज राजनीतिक विश्लेषक, वाराणसी
क्या है पूरा विवाद?
ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त
हो चुका है। सरकार
ने अंतरिम व्यवस्था के तहत प्रधानों
को प्रशासक बनाने का निर्णय लिया।
फैसले को अदालत में
चुनौती दी गई है।
भाजपा इसे विकास कार्यों
की निरंतरता से जोड़ रही
है। सपा चुनाव में
देरी और लोकतांत्रिक प्रक्रिया
पर सवाल उठा रही
है। पूर्वांचल में यह मुद्दा
तेजी से राजनीतिक रंग
लेता जा रहा है।

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