आस्था के आगे आतंक की हर चाल बौनी
अमरनाथ यात्रा केवल बर्फ की गुफा तक पहुंचने का मार्ग नहीं है, बल्कि यह भारतीय आत्मा की उस अनंत यात्रा का प्रतीक है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी कभी नहीं रुकती। आतंकवाद हर वर्ष इस यात्रा के उत्साह को चुनौती देने की कोशिश करता है, क्योंकि उसे मालूम है कि भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सांस्कृतिक एकता और आध्यात्मिक चेतना है। आज जब एक ओर बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए लाखों श्रद्धालु निकल रहे हैं और दूसरी ओर सुरक्षा एजेंसियां हर मोर्चे पर मुस्तैद हैं, तब पूरा देश एक ही संदेश देता दिखाई देता है—आस्था निर्भय है और भारत सजग है। बारूद की गंध क्षणिक होती है, लेकिन विश्वास की सुगंध शाश्वत होती है। गोलियां कुछ पल के लिए सन्नाटा पैदा कर सकती हैं, पर "हर-हर महादेव" का उद्घोष पीढ़ियों तक गूंजता रहता है
सुरेश गांधी
हिमालय की बर्फीली चोटियों
के बीच जब प्रकृति
स्वयं भगवान शिव का दरबार
सजाती है, तब करोड़ों
श्रद्धालुओं के कदम स्वतः
ही बाबा बर्फानी की
ओर बढ़ पड़ते हैं।
यह केवल एक धार्मिक
यात्रा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, सनातन आस्था और राष्ट्रीय एकात्मता
का ऐसा महापर्व है,
जिसने सदियों की कठिनाइयों और
दशकों की आतंकी चुनौतियों
के बावजूद अपना तेज कभी
मंद नहीं होने दिया।
मतलब साफ है हिमालय की
गोद में स्थित बाबा
बर्फानी की यात्रा केवल
धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक
चेतना, राष्ट्रीय एकता और अटूट
आस्था का विराट उत्सव
है। यही कारण है
कि भारत विरोधी ताकतें
समय-समय पर इस
यात्रा को भय और
हिंसा के प्रतीक में
बदलने की कोशिश करती
रही हैं। लेकिन इतिहास
गवाह है कि आतंक
की गोलियां कभी श्रद्धा की
पदयात्रा को रोक नहीं
सकीं।
अमरनाथ यात्रा पर मंडराने वाला
हर खतरा केवल सुरक्षा
का प्रश्न नहीं, बल्कि भारत की आत्मा
को चुनौती देने का प्रयास
भी है। इसलिए सुरक्षा
एजेंसियों की हर सफलता
केवल चार आरोपियों की
गिरफ्तारी भर नहीं, बल्कि
उस सोच पर प्रहार
है जो मासूम श्रद्धालुओं
के रक्त से दहशत
फैलाना चाहती है। जबकि बाबा बर्फानी
की यात्रा हर वर्ष यह
संदेश देती है कि
बर्फ पिघल सकती है,
पर्वत झुक सकते हैं,
लेकिन भारत की आस्था
नहीं। आतंक का उद्देश्य
भय पैदा करना है,
जबकि श्रद्धा का स्वभाव भय
को परास्त करना है। यही
कारण है कि हर
चुनौती के बाद अमरनाथ
यात्रा और अधिक विश्वास,
अधिक उत्साह और अधिक राष्ट्रीय
एकता के साथ आगे
बढ़ती है। आज आवश्यकता
केवल सुरक्षा बलों की मुस्तैदी
की नहीं, बल्कि पूरे समाज की
सजगता की भी है।
अफवाहों से बचना, प्रशासन
के निर्देशों का पालन करना
और किसी भी संदिग्ध
गतिविधि की सूचना तुरंत
देना भी उतना ही
महत्वपूर्ण है। आस्था और
सुरक्षा जब साथ चलते
हैं, तभी आतंकवाद की
सबसे बड़ी हार होती
है। इस बार भी
करोड़ों श्रद्धालु बाबा बर्फानी के
दर्शन के लिए निकलेंगे।
उनके कदमों के साथ पूरे
राष्ट्र का विश्वास चलेगा
और सुरक्षा बलों की चौकसी
यह संदेश देगी कि भारत
में आस्था की राह पर
आतंक का साया नहीं,
बल्कि राष्ट्र की सजग शक्ति
का पहरा है। ऐसे समय
में जब शुक्रवार से
अमरनाथ यात्रा का शुभारंभ हो
रहा है, उससे ठीक
पहले सुरक्षा एजेंसियों द्वारा पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी
आईएसआई से जुड़े कथित आतंकी मॉड्यूल
का भंडाफोड़ और चार आरोपियों
की गिरफ्तारी राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति बढ़ती
सतर्कता का संकेत है।
जांच एजेंसियों के
अनुसार प्रारंभिक पूछताछ में सीमा पार
बैठे हैंडलरों से संपर्क, हथियारों
की आपूर्ति और आतंकी गतिविधियों
की योजना के संकेत मिले
हैं। पूरे नेटवर्क की
परतें खोली जा रही
हैं और जांच अभी
जारी है। यह संयोग
नहीं है। अमरनाथ यात्रा
वर्षों से उन ताकतों
की आंखों में खटकती रही
है जो भारत की
सांस्कृतिक चेतना को कमजोर करना
चाहती हैं। आतंकवादियों का
लक्ष्य केवल निर्दोष श्रद्धालुओं
का रक्त बहाना नहीं
होता, बल्कि वे उस विश्वास
को चोट पहुंचाना चाहते
हैं जो भारत को
एक सूत्र में बांधता है।
वे जानते हैं कि यदि
आस्था डगमगा गई तो समाज
में भय और अविश्वास
फैलाना आसान होगा। किंतु
भारत का इतिहास बताता
है कि आतंक हर
बार पराजित हुआ है और
श्रद्धा हर बार पहले
से अधिक दृढ़ होकर
लौटी है।
सन 2000 से लेकर बाद
के वर्षों तक अमरनाथ यात्रा
पर कई आतंकी हमले
हुए। अनेक श्रद्धालुओं और
सुरक्षा कर्मियों ने अपने प्राण
न्योछावर किए। लेकिन न
तो यात्रा रुकी और न
ही श्रद्धालुओं का उत्साह कम
हुआ। कठिन पहाड़ों से
गुजरते कदमों ने हर बार
आतंक को यही संदेश
दिया कि बारूद आस्था
को परास्त नहीं कर सकती।
इस वर्ष सुरक्षा व्यवस्था
अपने सबसे आधुनिक स्वरूप
में दिखाई दे रही है।
जम्मू से लेकर पहलगाम,
बालटाल और पवित्र गुफा
तक सुरक्षा का बहुस्तरीय घेरा
तैयार किया गया है।
हजारों सुरक्षाकर्मी, सेना, केंद्रीय अर्धसैनिक बल, जम्मू-कश्मीर
पुलिस, खुफिया एजेंसियां और विशेष कमांडो
इकाइयां तैनात हैं। ड्रोन से
निगरानी, हाई-रिजोल्यूशन कैमरे,
इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस, बम निरोधक दस्ते,
डॉग स्क्वॉड, एंटी-ड्रोन सिस्टम
और त्वरित प्रतिक्रिया दल चौबीसों घंटे
सक्रिय हैं। प्रत्येक काफिले
की निगरानी, डिजिटल पंजीकरण और संवेदनशील इलाकों
में लगातार गश्त इस बात
का प्रमाण है कि इस
बार सुरक्षा में कोई समझौता
नहीं होगा।
बीते कुछ वर्षों
में भारत की आतंकवाद
विरोधी नीति भी निर्णायक
रूप से बदली है।
अब रणनीति केवल हमले के
बाद जवाब देने की
नहीं, बल्कि हमले से पहले
साजिश को ध्वस्त करने
की है। खुफिया सूचनाओं
का बेहतर समन्वय, सीमा पार से
संचालित नेटवर्क पर लगातार दबाव,
आतंकी फंडिंग पर कार्रवाई और
स्थानीय मॉड्यूल का समय रहते
भंडाफोड़—इसी नीति का
परिणाम है कि अनेक
संभावित घटनाएं घटित होने से
पहले ही विफल कर
दी जाती हैं। आतंकवाद
का सबसे बड़ा हथियार
भय है, जबकि लोकतंत्र
का सबसे बड़ा हथियार
नागरिकों का विश्वास। बीते
वर्षों में आतंकवादियों ने
अनेक बार अमरनाथ यात्रा
को निशाना बनाने का प्रयास किया।
निर्दोष श्रद्धालुओं पर हमले किए
गए, भय का वातावरण
बनाने की कोशिश हुई,
लेकिन हर बार भारत
की आस्था आतंक के इरादों
पर भारी पड़ी।
श्रद्धालुओं की संख्या घटी
नहीं, बल्कि बढ़ती चली गई। आतंकवादियों
की गोलियां श्रद्धा के कदमों को
डिगा नहीं सकीं। यही
भारत की सबसे बड़ी
शक्ति है। भारत ने बार-बार
साबित किया है कि
आतंक की बारूद आस्था
के दीप को बुझा
नहीं सकती। सीमा पर तैनात
जवानों की चौकसी, खुफिया
एजेंसियों की सतर्कता और
करोड़ों श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास
मिलकर यह संदेश देते
हैं कि नए भारत
में आतंक की हर
साजिश का जवाब केवल
शब्दों से नहीं, बल्कि
ठोस कार्रवाई से दिया जाएगा।
जब हिमालय की वादियों में
"हर-हर महादेव" का
उद्घोष गूंजेगा, तब यह केवल
धार्मिक स्वर नहीं होगा,
बल्कि उस राष्ट्र के
आत्मविश्वास की प्रतिध्वनि होगी
जिसने अनेक चुनौतियों के
बावजूद अपने विश्वास, अपनी
संस्कृति और अपनी एकता
को कभी झुकने नहीं
दिया। यही अमरनाथ यात्रा
का संदेश है और यही
भारत की सबसे बड़ी
ताकत।


No comments:
Post a Comment