नीलाचल का अनंत रहस्य : जहाँ ईश्वर स्वयं बदलते हैं शरीर, लेकिन अमर रहता है ब्रह्म
भारत
की
सांस्कृतिक
चेतना
में
कुछ
तीर्थ
ऐसे
हैं,
जहाँ
पहुँचकर
केवल
दर्शन
नहीं
होते,
बल्कि
मनुष्य
स्वयं
अपने
भीतर
झाँकने
लगता
है।
पूर्वी
समुद्र
के
तट
पर
स्थित
ओडिशा
का
जगन्नाथ
धाम
ऐसा
ही
एक
दिव्य
केंद्र
है,
जहाँ
इतिहास
और
पुराण,
दर्शन
और
लोकविश्वास,
विज्ञान
और
आध्यात्मिकता
एक-दूसरे
से
ऐसे
मिलते
हैं
कि
उनके
बीच
की
सीमाएँ
धुंधली
पड़
जाती
हैं।
यहाँ
भगवान
विष्णु
श्रीकृष्ण
के
रूप
में
विराजते
हैं,
पर
उनकी
प्रतिमा
पारंपरिक
देवमूर्तियों
जैसी
नहीं
है;
यहाँ
देवता
हर
कुछ
वर्षों
में
नया
शरीर
धारण
करते
हैं,
पर
उनका
'ब्रह्म'
कभी
नहीं
बदलता;
यहाँ
रथयात्रा
केवल
उत्सव
नहीं,
बल्कि
यह
घोषणा
है
कि
ईश्वर
स्वयं
अपने
भक्तों
के
बीच
आने
को
उत्सुक
हैं।
जगन्नाथ
पुरी
का
रहस्य
केवल
उसके
मंदिर
की
ऊँचाई,
ध्वज,
चक्र
या
महाप्रसाद
तक
सीमित
नहीं
है।
सबसे
बड़ा
रहस्य
स्वयं
भगवान
जगन्नाथ
हैं—उनका
अधूरा
स्वरूप,
उनकी
रहस्यमयी
आँखें,
उनकी
अनूठी
पूजा-पद्धति
और
उनके
भीतर
प्रतिष्ठित
वह
दिव्य
'ब्रह्म
पदार्थ',
जिसके
बारे
में
आज
भी
केवल
चुनिंदा
सेवायत
ही
जानते
हैं।
यह
धाम
जितना
श्रद्धा
का
केंद्र
है,
उतना
ही
शोधकर्ताओं,
इतिहासकारों
और
दार्शनिकों
के
लिए
भी
आकर्षण
का
विषय
रहा
है।
आख़िर
कैसे
एक
वनदेव
'नीलमाधव'
पूरे
भारत
के
'जगन्नाथ'
बन
गए?
क्यों
उनकी
मूर्ति
अधूरी
रह
गई?
और
क्यों
आज
भी
करोड़ों
लोग
उन्हें
केवल
भगवान
नहीं,
बल्कि
भारत
की
आत्मा
मानते
हैं
सुरेश गांधी
जगन्नाथ की सबसे बड़ी
विशेषता उनकी प्रतिमा का
स्वरूप नहीं, बल्कि उनका संदेश है।
उनके अधूरे हाथ मानो कहते
हैं—"मैं हर उस
हाथ में हूँ, जो
सेवा के लिए उठता
है।" उनकी विशाल आँखें
मानो हर दिशा में
देखती हैं—"मैं सबका हूँ।"
उनका रथ मानो हर
वर्ष यह घोषणा करता
है—"चलते रहो, रुकना
मत; सभ्यता की यात्रा निरंतर
है।" और उनका नवकलेवर
याद दिलाता है कि शरीर
बदलते हैं, युग बदलते
हैं, व्यवस्थाएँ बदलती हैं, लेकिन यदि
मूल चेतना जीवित रहे, तो संस्कृति
अमर रहती है। नीलाचल
की ऊँची पताका आज
भी समुद्री हवाओं के बीच उसी
विश्वास के साथ लहरा
रही है, जैसे सदियों
पहले लहराती थी। समय बदला,
राजवंश बदले, साम्राज्य आए और चले
गए, आक्रमण हुए, तकनीक बदली,
जीवन की गति बदली—पर जगन्नाथ की
रथयात्रा नहीं रुकी। शायद
इसलिए जगन्नाथ केवल ओडिशा के
आराध्य नहीं, बल्कि भारत की उस
सनातन चेतना के प्रतीक हैं
जो समय के साथ
स्वयं को नया रूप
देती है, पर अपने
मूल को कभी नहीं
छोड़ती। जगन्नाथ हमें बताते हैं
कि संस्कृति पत्थरों में नहीं, परंपराओं
में जीवित रहती है; आस्था
केवल मंदिरों में नहीं, मनुष्यता
में बसती है; और
भारत केवल एक भूभाग
नहीं, बल्कि एक निरंतर चलती
हुई रथयात्रा है—जिसका सारथी
कोई राजा नहीं, बल्कि
स्वयं "जगन्नाथ" हैं।
नीलाचल के वे रहस्य, जहाँ विज्ञान ठहर
जाता है और आस्था मुस्कुरा उठती है
समुद्र की अनंत लहरों
के बीच, ओडिशा के
नीलाचल पर खड़ा श्रीजगन्नाथ
मंदिर केवल पत्थरों का
स्थापत्य नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान, विज्ञान, कला, खगोल, दर्शन
और आध्यात्मिक चेतना का ऐसा विराट
ग्रंथ है, जिसके अनेक
पृष्ठ आज भी पूरी
तरह पढ़े नहीं जा
सके हैं। आज का
श्रीजगन्नाथ मंदिर 12वीं शताब्दी में
पूर्वी गंग वंश के
महान शासक अनंतवर्मन चोडगंग
देव द्वारा आरंभ कराया गया,
जिसे बाद में अनंगभीम
देव ने पूर्ण कराया।
लगभग 214 फुट ऊँचा यह
मंदिर कलिंग स्थापत्य शैली का सर्वोच्च
उदाहरण माना जाता है।
करीब आठ लाख वर्गफुट
परिसर में फैला यह
धाम केवल पूजा का
केंद्र नहीं, बल्कि मध्यकालीन भारत की वास्तु-कुशलता, शिल्पकला और नगर-योजना
का जीवंत दस्तावेज है। मुख्य मंदिर
के चारों ओर छोटे-बड़े
सैकड़ों देवालय, विशाल प्राचीर, मंडप, भोगशाला, रसोई, आनंद बाज़ार और
सेवायत परंपरा—सब मिलकर इसे
एक जीवंत धार्मिक नगर का स्वरूप
देते हैं।
चार द्वार, चार संदेश
मंदिर के चार प्रवेश
द्वार भारतीय जीवन-दर्शन का
प्रतीक माने जाते हैं—
सिंह द्वार — साहस और धर्म
का प्रतीक। अश्व द्वार — शक्ति
और कर्म का प्रतीक।
व्याघ्र द्वार — तेज और आत्मबल
का प्रतीक। हस्ति द्वार — समृद्धि और स्थिरता का
प्रतीक। मुख्य प्रवेश पर स्थित अरुण
स्तंभ मूलतः कोणार्क सूर्य मंदिर का हिस्सा था।
बाद में इसे यहाँ
स्थापित किया गया। श्रद्धालु
पहले इस स्तंभ को
प्रणाम करते हैं, फिर
भगवान के दर्शन के
लिए आगे बढ़ते हैं।
सुदर्शन चक्र—हर दिशा से आपकी ओर देखता हुआ
मंदिर के शिखर पर
स्थापित लगभग 20 फीट ऊँचा और
एक टन से अधिक
वजनी नीलचक्र सदियों से आकर्षण का
विषय बना हुआ है।
लोकविश्वास है कि पुरी
नगर के किसी भी
कोने से इसे देखने
पर ऐसा प्रतीत होता
है कि चक्र आपकी
ही ओर मुख किए
हुए है। वास्तु विशेषज्ञ
इसे शिल्प और ज्यामितीय विन्यास
का अद्भुत उदाहरण मानते हैं। वहीं श्रद्धालुओं
के लिए यह संदेश
है कि भगवान की
दृष्टि अपने प्रत्येक भक्त
पर समान रूप से
रहती है।
ध्वज... जो मानो हवा से संवाद करता है
जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर
प्रतिदिन नया ध्वज चढ़ाया
जाता है। यह परंपरा
सदियों से निरंतर चली
आ रही है। लोकमान्यता
है कि ध्वज हवा
की सामान्य दिशा के विपरीत
लहराता हुआ प्रतीत होता
है। इसे भक्त ईश्वरीय
चमत्कार मानते हैं। वैज्ञानिक दृष्टि
से इस दृश्य के
पीछे ऊँचे शिखर, समुद्री
हवाओं, वायु-भंवर (एयर
करंट) और देखने के
कोण जैसी बातें भी
प्रभाव डाल सकती हैं।
किंतु यह विषय आज
भी लोगों के बीच कौतूहल
और चर्चा का कारण बना
हुआ है। एक और
अद्भुत तथ्य यह है
कि सेवायत बिना किसी आधुनिक
सुरक्षा उपकरण के प्रतिदिन शिखर
पर चढ़कर ध्वज बदलते हैं।
यह परंपरा केवल कौशल नहीं,
बल्कि अटूट श्रद्धा का
प्रतीक मानी जाती है।
क्या सचमुच मंदिर के ऊपर पक्षी नहीं उड़ते?
यह जगन्नाथ धाम
से जुड़ी सबसे चर्चित मान्यताओं
में से एक है।
अक्सर कहा जाता है
कि मंदिर के ठीक ऊपर
पक्षी या विमान नहीं
उड़ते। उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर
यह कहना उचित नहीं
होगा कि ऐसा कभी
नहीं होता। सामान्यतः बड़े पक्षी शिखर
के ऊपर बहुत कम
दिखाई देते हैं, जिसका
संबंध ऊँचाई, समुद्री हवाओं और स्थानीय परिस्थितियों
से जोड़ा जाता है। फिर
भी श्रद्धालुओं के लिए यह
विश्वास आज भी भगवान
के अलौकिक प्रभाव का प्रतीक है।
यही जगन्नाथ धाम की विशेषता
है—जहाँ लोकविश्वास और
जिज्ञासा साथ-साथ चलते
हैं।
सिंहद्वार पर रुक जाती है समुद्र की गर्जना?
मंदिर के बाहर समुद्र
की लहरों का शोर स्पष्ट
सुनाई देता है। लोकमान्यता
है कि जैसे ही
श्रद्धालु सिंहद्वार के भीतर प्रवेश
करता है, समुद्र की
गर्जना क्षीण हो जाती है
और बाहर निकलते ही
फिर सुनाई देने लगती है।
वास्तु विशेषज्ञ मानते हैं कि विशाल
दीवारों, प्रवेश मार्ग की बनावट, ध्वनि-तरंगों की दिशा और
स्थापत्य की संरचना के
कारण ऐसा अनुभव हो
सकता है। परंतु श्रद्धालु
इसे भगवान जगन्नाथ की लीला के
रूप में देखते हैं।
दुनिया की सबसे विशाल रसोई—जहाँ प्रसाद कभी कम नहीं पड़ता
यदि जगन्नाथ धाम
का कोई चमत्कार सबसे
अधिक लोगों को विस्मित करता
है, तो वह है
इसकी महान रसोई। सैकड़ों
रसोइये और सेवायत प्रतिदिन
हजारों श्रद्धालुओं के लिए भोजन
तैयार करते हैं। मिट्टी
के बर्तनों में लकड़ी की
आँच पर पकने वाला
महाप्रसाद केवल भोजन नहीं,
बल्कि समानता और समरसता का
प्रतीक है। सबसे रोचक
बात यह है कि
एक के ऊपर एक
रखे कई मिट्टी के
बर्तनों में ऊपर वाला
बर्तन पहले पक जाता
है—यह लोकविश्वास लंबे
समय से प्रचलित है।
वैज्ञानिक इसे भाप, ताप
के प्रवाह और बर्तनों की
संरचना से जोड़कर समझाने
का प्रयास करते हैं, जबकि
भक्त इसे भगवान की
कृपा मानते हैं। एक और
प्रसिद्ध विश्वास है कि चाहे
श्रद्धालुओं की संख्या कम
हो या लाखों में,
महाप्रसाद न कम पड़ता
है और न ही
व्यर्थ जाता है। यह
मंदिर की सुव्यवस्थित व्यवस्था
और सदियों से विकसित प्रबंधन
प्रणाली का भी अद्भुत
उदाहरण है।
रथयात्रा—जब भगवान स्वयं निकलते हैं भक्तों के बीच
यदि नवकलेवर जीवन
और मृत्यु का दर्शन है,
तो रथयात्रा समता और लोकमंगल
का दर्शन है। वर्ष में
एक बार भगवान अपने
सिंहासन से उतरकर नगर
भ्रमण पर निकलते हैं।
तीन भव्य रथ— नंदीघोष
— भगवान जगन्नाथ. तालध्वज — बलभद्र. दर्पदलन (देवदलन) — देवी सुभद्रा. इन रथों
को खींचने का अधिकार किसी
एक वर्ग का नहीं,
बल्कि हर श्रद्धालु का
होता है। यही कारण
है कि जगन्नाथ को
'लोकदेवता' भी कहा जाता
है।
क्या अधूरी प्रतिमा वास्तव में अधूरी है?
यही वह प्रश्न
है जिसने सदियों से दार्शनिकों और
विद्वानों को आकर्षित किया
है। कुछ विद्वान कहते
हैं कि यह रूप
बताता है—ईश्वर किसी
पूर्ण आकार में सीमित
नहीं किए जा सकते।
कुछ इसे आदिवासी काष्ठ-देव परंपरा और
वैष्णव दर्शन के अद्भुत समन्वय
का प्रतीक मानते हैं। कुछ इसे
यह संदेश मानते हैं कि मनुष्य
की दृष्टि में जो अधूरा
है, वह ईश्वर की
दृष्टि में पूर्ण हो
सकता है। और शायद
यही कारण है कि
जगन्नाथ की प्रतिमा विश्व
की किसी भी अन्य
देवमूर्ति से बिल्कुल भिन्न
दिखाई देती है।
जब भगवान स्वयं धारण करते हैं नया शरीर
भारतीय दर्शन कहता है— "वासांसि
जीर्णानि
यथा
विहाय..."
अर्थात जैसे मनुष्य पुराने
वस्त्र त्यागकर नए धारण करता
है, वैसे ही आत्मा
नया शरीर ग्रहण करती
है। पुरी में यह
श्लोक केवल पढ़ा नहीं
जाता, बल्कि जीया जाता है।
जब आषाढ़ मास से पहले
ऐसा वर्ष आता है
जिसमें अधिक आषाढ़ (पुरुषोत्तम
मास) पड़ता है, तब नवकलेवर
का आयोजन होता है। यह
सामान्यतः 12 से 19 वर्षों के अंतराल पर
होता है। उस समय
भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन की
नई काष्ठ-प्रतिमाएँ बनाई जाती हैं।
मंदिर—जिसने आक्रमणों को भी झुका दिया
जगन्नाथ मंदिर केवल आध्यात्मिक आस्था
का केंद्र नहीं रहा, बल्कि
भारतीय अस्मिता का भी प्रतीक
रहा है। मध्यकाल में
इस मंदिर पर अनेक बार
आक्रमण हुए। इतिहास में
कालापहाड़ का नाम विशेष
रूप से उल्लेखित है,
जिसने मंदिर को क्षति पहुँचाने
का प्रयास किया। किंतु हर बार सेवायतों
और स्थानीय लोगों ने भगवान की
प्रतिमाओं को सुरक्षित स्थानों
पर पहुँचाकर परंपरा को जीवित रखा।
यही कारण है कि
जगन्नाथ केवल एक देवता
नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति की अदम्य जीवटता
के प्रतीक भी बन गए।
जहाँ आस्था और विवेक साथ-साथ चलते हैं
जगन्नाथ धाम के अनेक
प्रसंग लोकविश्वासों से जुड़े हैं।
इनमें से कुछ के
वैज्ञानिक स्पष्टीकरण प्रस्तुत किए जाते हैं,
जबकि कुछ आज भी
शोध और चर्चा का
विषय हैं। यही इस
धाम की विशिष्टता है—यह श्रद्धा को
भी स्थान देता है और
जिज्ञासा को भी।
जब एक राजा ने स्वप्न में देखे भगवान...
कहानी आरंभ होती है
मालवा के धर्मपरायण राजा
इंद्रद्युम्न से। पुराणों में
वर्णित है कि राजा
ने एक दिन एक
अद्भुत देवता नीलमाधव के बारे में
सुना, जिनकी पूजा किसी घने
वन में एक भील-प्रमुख विश्ववसु अत्यंत गोपनीय ढंग से करते
थे। कहा जाता था
कि नीलमाधव के दर्शन मात्र
से मोक्ष प्राप्त होता है, किंतु
उनका स्थान किसी को ज्ञात
नहीं था। राजा का
मन व्याकुल हो उठा। उन्होंने
अपने विश्वस्त ब्राह्मण विद्यापति को नीलमाधव की
खोज में भेजा। यहीं
से आरंभ होती है
भारतीय लोककथाओं की सबसे रोमांचकारी
यात्राओं में से एक।
विश्ववसु, ललिता और आँखों पर बंधी पट्टी का रहस्य
कई महीनों तक
भटकने के बाद विद्यापति
की भेंट वनवासी प्रमुख
विश्ववसु से हुई। विश्ववसु
अपनी पुत्री ललिता के साथ रहते
थे। ललिता और विद्यापति का
विवाह हुआ, किंतु विश्ववसु
फिर भी नीलमाधव का
स्थान बताने को तैयार नहीं
हुए। बहुत आग्रह करने
पर वे विद्यापति को
साथ ले चले, पर
एक शर्त रखी—पूरे
मार्ग में उनकी आँखों
पर पट्टी बँधी रहेगी। विद्यापति
ने बुद्धिमानी दिखाई। उन्होंने अपने वस्त्र में
सरसों के दाने बाँध
लिए। चलते-चलते वे
उन्हें गिराते रहे। कुछ समय
बाद उन्हीं दानों से उगे पीले
फूलों ने उस गुप्त
मार्ग का संकेत दे
दिया। यह प्रसंग भारतीय
परंपरा में ज्ञान, धैर्य
और बुद्धिमत्ता का सुंदर प्रतीक
भी माना जाता है।
जब भगवान स्वयं अदृश्य हो गए...
विद्यापति लौटकर राजा इंद्रद्युम्न को
पूरा वृत्तांत सुनाते हैं। राजा विशाल
सेना और ऋषियों के
साथ नीलमाधव के दर्शन के
लिए निकल पड़ते हैं।
लेकिन जब वे वहाँ
पहुँचते हैं, तो नीलमाधव
की प्रतिमा अदृश्य हो चुकी होती
है। राजा शोकाकुल हो
उठते हैं। अनेक दिनों
तक उपवास और तपस्या करते
हैं। तभी दिव्य आकाशवाणी
होती है— "हे राजन! निराश
मत हो। समुद्र से
एक दिव्य दारु (पवित्र लकड़ी) निकलेगी। उसी से मेरा
नया स्वरूप प्रकट होगा।" यहीं से प्रारंभ
होती है भगवान जगन्नाथ
की कथा।
समुद्र से निकली दिव्य दारु...
कुछ समय बाद
समुद्र तट पर एक
विशाल, सुगंधित और अलौकिक लकड़ी
का लट्ठा बहकर आता है।
आश्चर्य यह कि उसे
कोई हिला नहीं पाता।
राजा, सैनिक, हाथी—सभी असफल
हो जाते हैं। तब
ऋषि बताते हैं कि यह
सामान्य लकड़ी नहीं, 'दारु-ब्रह्म' है।
जब विश्ववसु और विद्यापति दोनों
मिलकर श्रद्धा से उसे स्पर्श
करते हैं, तभी वह
सहज ही उठ जाती
है। यह संदेश अत्यंत
गहरा है—ईश्वर किसी
एक जाति, वर्ग या परंपरा
के नहीं हैं; वे
वनवासी और वैदिक, दोनों
के समन्वय में प्रकट होते
हैं। शायद इसी कारण
जगन्नाथ को भारत की
सांस्कृतिक समरसता का सबसे बड़ा
प्रतीक कहा जाता है।
विश्वकर्मा बढ़ई बनकर आए...
अब प्रश्न था—इस दिव्य दारु
से भगवान की मूर्ति कौन
बनाए? कथा कहती है
कि एक वृद्ध शिल्पी
राजदरबार पहुँचा। उसने कहा— "मैं
प्रतिमा बनाऊँगा, लेकिन एक शर्त है।
इक्कीस दिन तक कोई
भी द्वार नहीं खोलेगा। यदि
किसी ने बीच में
द्वार खोला, तो मैं काम
अधूरा छोड़ दूँगा।" राजा
सहमत हो गए। लोकविश्वास
है कि वह वृद्ध
कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि स्वयं देवशिल्पी विश्वकर्मा थे। और यहीं
जन्म लेता है सबसे
बड़ा रहस्य... कई दिन बीत
गए। भीतर से औजारों
की आवाज़ आती रही। फिर
अचानक सब शांत हो
गया। रानी गुंडिचा चिंतित
हो उठीं। उन्हें लगा कि कहीं
वृद्ध शिल्पी की मृत्यु तो
नहीं हो गई। राजा
ने पहले तो धैर्य
रखा, पर अंततः द्वार
खुलवा दिया। द्वार खुलते ही भीतर कोई
नहीं था। विश्वकर्मा अदृश्य
हो चुके थे। और
सामने थीं—तीन अधूरी
प्रतिमाएँ। हाथ पूर्ण नहीं।
पैर नहीं। केवल विशाल नेत्र।
अद्भुत मुखाकृति। राजा पछताने लगे
कि उनसे अधीरता में
भूल हो गई। लेकिन
तभी दिव्य वाणी हुई— "यही
मेरा पूर्ण स्वरूप है। मैं जैसा
हूँ, उसी रूप में
संसार मेरी पूजा करेगा।"
महाप्रसाद—जहाँ मिट जाती हैं सामाजिक दूरियाँ
जगन्नाथ धाम का महाप्रसाद
केवल भोजन नहीं, भारतीय
समाज-दर्शन का जीवंत पाठ
है। सदियों से यहाँ यह
परंपरा रही कि महाप्रसाद
को ग्रहण करने में जाति,
वर्ग और सामाजिक भेदभाव
का कोई स्थान नहीं।
आनंद बाज़ार में श्रद्धालु एक
साथ प्रसाद ग्रहण करते हैं। इतिहास
के विभिन्न कालखंडों में इस परंपरा
को सामाजिक समरसता का महत्वपूर्ण प्रतीक
माना गया। यह व्यवस्था
हमें याद दिलाती है
कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में भोजन केवल
पेट भरने का माध्यम
नहीं, बल्कि समानता, सहभागिता और साझा संस्कृति
का उत्सव भी है।
रथयात्रा का दर्शन—ईश्वर स्वयं जनता के द्वार पर
सामान्यतः श्रद्धालु मंदिर जाकर भगवान के
दर्शन करता है, किंतु
पुरी की रथयात्रा इस
परंपरा को उलट देती
है। यहाँ भगवान स्वयं
अपने भक्तों के बीच आते
हैं। इस प्रतीक का
संदेश अत्यंत गहरा है—ईश्वर
किसी ऊँचे सिंहासन तक
सीमित नहीं हैं; वे
समाज के प्रत्येक व्यक्ति
तक पहुँचने वाले लोकनायक हैं।
रथ की रस्सी को
खींचते लाखों हाथ यह बताते
हैं कि सभ्यता आगे
तभी बढ़ती है, जब सब
मिलकर उसे आगे बढ़ाएँ।
दारु की खोज—जब जंगल बन जाता है तीर्थ
नई प्रतिमाओं के
लिए कोई भी लकड़ी
नहीं चुनी जाती। इसके
लिए विशेष नीम (दारु) वृक्ष
की खोज होती है।
यह कार्य बनयागा यात्रा कहलाता है। दैतापति सेवायत,
ब्राह्मण, पुरोहित और मंदिर के
अधिकारी कई दिनों तक
तप, उपवास और मंत्रोच्चार के
साथ निकलते हैं। जिस वृक्ष
से प्रतिमा बननी है, उसमें
अनेक विशेष लक्षण देखे जाते हैं—
समीप नदी या जलस्रोत
हो। पास में श्मशान
या देवस्थान हो। वृक्ष पर
पक्षियों का घोंसला न
हो। उस पर प्राकृतिक
रूप से शंख, चक्र,
गदा या पद्म जैसे
चिह्न दिखाई दें (लोकमान्यता)।
वृक्ष स्वस्थ और विशिष्ट आयु
का हो। इन मानकों
के आधार पर ही
दारु का चयन किया
जाता है।
दैतापति—जो स्वयं को भगवान का परिवार मानते हैं
जगन्नाथ मंदिर की सबसे अनूठी
परंपराओं में दैतापति सेवायतों
की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। लोकपरंपरा के
अनुसार उनका संबंध उसी
वनवासी परंपरा से माना जाता
है, जिसके प्रमुख विश्ववसु नीलमाधव की आराधना करते
थे। नवकलेवर के समय भगवान
की सेवा का मुख्य
दायित्व इन्हीं के हाथों में
रहता है। यह परंपरा
इस बात का जीवंत
प्रमाण है कि जगन्नाथ
केवल राजाओं या ब्राह्मणों के
नहीं, बल्कि जनजातीय और लोक-संस्कृति
के भी आराध्य हैं।
'ब्रह्म पदार्थ'—भारत का सबसे रहस्यमय धार्मिक अनुष्ठान?
नवकलेवर का सबसे रहस्यमय
क्षण वह होता है,
जिसे 'ब्रह्म परिवर्तन' कहा जाता है।
आधी रात... पूरा मंदिर अंधकार
में डूबा होता है।
द्वार बंद कर दिए
जाते हैं। सुरक्षा अत्यंत
कड़ी रहती है। कहा
जाता है कि इस
समय जिन सेवायतों को
यह दायित्व मिलता है, उनकी आँखों
पर पट्टी बाँधी जाती है और
हाथों में कपड़ा लपेटा
जाता है। वे पुरानी
प्रतिमा से उस दिव्य
तत्व को निकालकर नई
प्रतिमा में प्रतिष्ठित करते
हैं, जिसे परंपरा में
'ब्रह्म पदार्थ' कहा जाता है।
उस ब्रह्म पदार्थ का स्वरूप क्या है?
इस प्रश्न का
उत्तर सार्वजनिक रूप से किसी
को ज्ञात नहीं। मंदिर की परंपरा इस
रहस्य की रक्षा करती
है। अनेक दावे और
किवदंतियाँ प्रचलित हैं, किंतु उनके
समर्थन में कोई प्रमाणित
ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। इसलिए
इसे श्रद्धा और परंपरा का
संरक्षित रहस्य ही माना जाता
है।
पुरानी प्रतिमाओं का अंतिम संस्कार
ब्रह्म परिवर्तन के बाद पुरानी
प्रतिमाओं को मंदिर परिसर
के कोइली वैकुंठ में पूरे वैदिक
विधि-विधान से समाधि दी
जाती है। यह दृश्य
अत्यंत भावुक होता है। दैतापति
सेवायत शोक मनाते हैं,
जैसे परिवार का कोई प्रिय
सदस्य विदा हो गया
हो। इसके बाद नई
प्रतिमाओं के साथ उत्सव
प्रारंभ होता है। यह
संसार का शायद एकमात्र
ऐसा धार्मिक आयोजन है, जहाँ ईश्वर
के शरीर का अंतिम
संस्कार भी होता है।
महाप्रभु चैतन्य और जगन्नाथ का प्रेम
पुरी का इतिहास
महाप्रभु श्रीचैतन्य के बिना अधूरा
है। उन्होंने अपने जीवन का
बड़ा हिस्सा यहीं बिताया। उनके
लिए जगन्नाथ केवल पूज्य देव
नहीं, बल्कि साक्षात श्रीकृष्ण थे। कहा जाता
है कि रथयात्रा के
समय उनका कीर्तन और
भक्ति-भाव देखकर हजारों
लोग भाव-विभोर हो
उठते थे। वैष्णव भक्ति
आंदोलन को जन-जन
तक पहुँचाने में पुरी की
इस परंपरा की बड़ी भूमिका
रही।
आदि शंकराचार्य से गुरु नानक तक
जगन्नाथ धाम भारतीय आध्यात्मिक
परंपराओं का संगम भी
है। आदि शंकराचार्य ने
यहाँ गोवर्धन पीठ की स्थापना
की। रामानुजाचार्य ने यहाँ वैष्णव
परंपरा को नई दृष्टि
दी। गुरु नानक देव
भी पुरी आए और
यहाँ की आध्यात्मिक परंपरा
से संवाद किया। संत कबीर सहित
अनेक संतों ने जगन्नाथ को
किसी एक संप्रदाय की
सीमा में नहीं बाँधा।
यही कारण है कि
जगन्नाथ धाम भारतीय सांस्कृतिक
समन्वय का एक अद्वितीय
केंद्र बन गया।
क्या जगन्नाथ केवल कृष्ण हैं?
यही वह प्रश्न
है जिस पर विद्वानों
में लंबे समय से
विमर्श होता रहा है।
कुछ उन्हें श्रीकृष्ण का स्वरूप मानते
हैं। कुछ विष्णु का।
कुछ विद्वान उनकी जड़ों को
प्राचीन जनजातीय परंपराओं से जोड़ते हैं,
जिनका आगे चलकर वैष्णव
परंपरा से समन्वय हुआ।
कई इतिहासकार मानते हैं कि जगन्नाथ
भारतीय संस्कृति की उस अद्भुत
क्षमता के प्रतीक हैं,
जिसने विभिन्न लोकधाराओं को अपने भीतर
समाहित कर लिया।
आज के भारत के लिए जगन्नाथ का संदेश
तेजी से बदलती दुनिया, तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उपभोक्तावाद के इस दौर में जगन्नाथ धाम का संदेश पहले से अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है। यह धाम हमें सिखाता है— परिवर्तन से मत डरो—भगवान भी नवकलेवर धारण करते हैं। परंपरा को जीवित रखो—पर उसे समय के साथ आगे भी बढ़ाओ। विविधता को स्वीकार करो—जगन्नाथ अनेक सांस्कृतिक धाराओं के समन्वय का प्रतीक हैं। समाज को जोड़ो—विभाजन नहीं, सहभागिता ही भारतीयता की शक्ति है। सत्ता से अधिक सेवा का मूल्य है—रथयात्रा में भगवान स्वयं जनता के बीच आते हैं। रहस्य—जो शायद रहस्य ही रहने चाहिए. जगन्नाथ धाम के अनेक प्रसंग आज भी लोगों को आकर्षित करते हैं—ध्वज, नीलचक्र, नवकलेवर, ब्रह्म परिवर्तन, महाप्रसाद, स्थापत्य और अनेक लोकमान्यताएँ। इनमें कुछ बातों के वैज्ञानिक स्पष्टीकरण प्रस्तुत किए जाते हैं, कुछ ऐतिहासिक शोध का विषय हैं, और कुछ श्रद्धा की परिधि में आती हैं। संभवतः यही संतुलन इस धाम की सबसे बड़ी शक्ति है—यह प्रश्न पूछने की भी जगह देता है और श्रद्धा रखने की भी।


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