Saturday, 11 July 2026

ताजमहल 'तेजोमहालय' है, यह राजा जय सिंह की संपत्ति थी : विष्णु शंकर जैन

ताजमहल 'तेजोमहालय' है, यह राजा जय सिंह की संपत्ति थी : विष्णु शंकर जैन 

राम जन्मभूमि के निर्णय के बाद देश में जिन धार्मिक-ऐतिहासिक विवादों ने सबसे अधिक चर्चा बटोरी, उनमें वाराणसी का ज्ञानवापी परिसर, मथुरा का श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद, धार की भोजशाला, दिल्ली का कुतुब मीनार परिसर और संभल के धार्मिक स्थल प्रमुख हैं। और अगर देश की न्यायिक और वैचारिक बहस के केंद्र में आज यदि कोई अधिवक्ता सबसे अधिक चर्चा में है, तो वह हैं सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन। इन बहुचर्चित मामलों में उनकी कानूनी रणनीति, अदालतों में पेश किए गए तर्क और ऐतिहासिक दस्तावेज़ लगातार राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बने हुए हैं। समर्थकों के लिए वे भारतीय इतिहास के विवादित अध्यायों को न्यायपालिका के समक्ष साक्ष्यों के आधार पर रखने वाले अधिवक्ता हैं, जबकि आलोचक उनके मुकदमों को अलग नजरिए से देखते हैं। सीनियर रिपोर्टर सुरेश गांधी से हुई विस्तृत और बेबाक बातचीत में विष्णु शंकर जैन ने पहली बार एक साथ उन सभी महत्वपूर्ण मामलों पर विस्तार से अपनी कानूनी सोच, रणनीति और तर्क रखे, जिनकी देशभर में चर्चा है। उनका कहना है कि उनकी पूरी लड़ाई किसी समुदाय के खिलाफ नहीं, बल्कि संविधान, न्यायपालिका और साक्ष्यों के माध्यम से उन ऐतिहासिक प्रश्नों का समाधान तलाशने की है, जिन्हें उनके अनुसार लंबे समय तक अनुत्तरित छोड़ दिया गया। राम मंदिर की लड़ाई ने भारत की न्यायिक चेतना बदल दी, अब इतिहास के अनुत्तरित प्रश्न अदालत के दरवाजे पर हैं. कोर्ट में जाने का अधिकार किसी समुदाय ने नहीं दिया, संविधान ने दिया है न्यायालय केवल तर्क, साक्ष्य और कानून से चलता है. प्रस्तुत हैसीनियर रिपोर्टर सुरेश गांधी की सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन से विशेष बातचीत :-   

प्रश्न : ताजमहल को लेकर आपकी कानूनी लड़ाई का मूल उद्देश्य क्या है?

विष्णु शंकर जैन : हमारी लड़ाई किसी स्मारक के खिलाफ नहीं है और ही किसी समुदाय के विरुद्ध है। हमारा कहना है कि ताजमहल के इतिहास को लेकर जो प्रश्न वर्षों से उठते रहे हैं, उनकी निष्पक्ष और वैज्ञानिक जांच होनी चाहिए। हमने न्यायालय से यही आग्रह किया है कि जिन तथ्यों और ऐतिहासिक स्रोतों पर विवाद है, उनका परीक्षण विशेषज्ञों की सहायता से कराया जाए। हमारा विश्वास केवल न्यायपालिका, संविधान और साक्ष्यों पर है।

प्रश्न : आप कहते हैं कि ताजमहल वास्तव में 'तेजोमहालय' है। इस दावे का आधार क्या है?

विष्णु शंकर जैन : मेरा कहना है कि यह केवल एक भावनात्मक दावा नहीं है। हमने अपनी याचिकाओं और दलीलों में विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों, दस्तावेजों और शोध सामग्री का उल्लेख किया है। मेरा दावा है कि ताजमहल मूलतः 'तेजोमहालय' था और यह राजा जय सिंह से संबंधित संपत्ति थी। मैंने अदालत के समक्ष यह भी कहा है कि कुछ ऐतिहासिक ग्रंथों, जिनमें बादशाहनामा का भी उल्लेख किया जाता है, का विधिक परीक्षण होना चाहिए। मेरा आग्रह केवल इतना है कि अदालत इन सभी स्रोतों की निष्पक्ष जांच कराए।  

प्रश्न : आलोचक कहते हैं कि ये केवल दावे हैं।

विष्णु शंकर जैन : लोकतंत्र में दावा करना और उसे अदालत में साक्ष्यों के साथ परखने के लिए रखना अलग बात है। मैं कभी यह नहीं कहता कि मेरा पक्ष अंतिम सत्य मान लिया जाए। मैं तो अदालत से कह रहा हूँ कि यदि मेरे दस्तावेज़, अभिलेख और तर्क गलत हैं तो उन्हें खारिज कर दीजिए। लेकिन यदि वे विचारणीय हैं तो उनकी जांच अवश्य होनी चाहिए। अंतिम निर्णय न्यायालय का ही होगा।  

प्रश्न : आपने बार-बार ताजमहल के बंद कमरों का मुद्दा उठाया है। क्यों?

विष्णु शंकर जैन : क्योंकि वर्षों से उन कमरों को लेकर अनेक तरह की चर्चाएँ होती रही हैं। मेरा कहना है कि यदि वहां ऐसा कुछ नहीं है जो इतिहास की समझ को प्रभावित करता हो, तो विशेषज्ञों की निगरानी में उन्हें खोलकर जांच कराने में क्या आपत्ति है? जांच होने से भ्रम दूर होगा। सत्य जो भी होगा, वह सामने जाएगा।

प्रश्न : आपने ताजमहल की वास्तुकला पर भी सवाल उठाए हैं।

विष्णु शंकर जैन : मैंने अदालत में कहा है कि इस स्मारक की कुछ स्थापत्य विशेषताओं और संरचनात्मक पहलुओं का विशेषज्ञ अध्ययन होना चाहिए। मेरे अनुसार, किसी ऐतिहासिक इमारत का वैज्ञानिक परीक्षण इतिहास को और स्पष्ट कर सकता है। मेरा उद्देश्य निष्कर्ष सुनाना नहीं, बल्कि निष्पक्ष अध्ययन कराना है।

प्रश्न : आपने राजा जय सिंह का भी उल्लेख किया है।

विष्णु शंकर जैन : जी। मेरा दावा है कि ताजमहल जिस भूमि और भवन से जुड़ा है, उसका संबंध राजा जय सिंह से था। इसी कारण मैंने न्यायालय के समक्ष उपलब्ध दस्तावेजों और ऐतिहासिक उल्लेखों की जांच की मांग की है। अदालत ही तय करेगी कि इन दावों का विधिक और ऐतिहासिक मूल्य क्या है।

प्रश्न : कुछ लोग कहते हैं कि ऐसे मुकदमे इतिहास को बदलने की कोशिश हैं।

विष्णु शंकर जैन : मैं इससे सहमत नहीं हूँ। अदालत में जाना इतिहास बदलना नहीं है। अदालत का काम उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करना है। यदि कोई पक्ष अपने दस्तावेज़ लेकर न्यायालय जाता है, तो उसे सुनना न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है। मैं केवल उसी प्रक्रिया का पालन कर रहा हूँ।

प्रश्न : आपका अंतिम संदेश क्या है?

विष्णु शंकर जैन : मैं केवल इतना कहना चाहता हूँ कि इतिहास के प्रश्नों का समाधान नारों से होगा और टीवी बहसों से। यदि किसी पक्ष के पास दस्तावेज़ हैं तो उन्हें अदालत के सामने रखा जाना चाहिए। यदि मेरे तर्क और साक्ष्य गलत होंगे तो न्यायालय उन्हें अस्वीकार कर देगा। लेकिन यदि उनमें दम है तो उनकी निष्पक्ष जांच से किसी को डरना नहीं चाहिए। हमारा भरोसा संविधान, न्यायपालिका और विधिक प्रक्रिया पर है। सत्य जो भी होगा, वह न्यायालय की कसौटी पर ही सामने आएगा।

ताजमहल विवाद : अब तक क्या-क्या हुआ?

ताजमहल को लेकर समय-समय पर विभिन्न इतिहासकारों, लेखकों और सामाजिक संगठनों की ओर से अलग-अलग दावे किए जाते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने ताजमहल परिसर के बंद कमरों को खोलकर उनकी जांच कराने की मांग को लेकर न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। जैन का कहना है कि उनकी मांग किसी निष्कर्ष को पहले से स्थापित करने की नहीं, बल्कि विशेषज्ञों और संबंधित एजेंसियों से तथ्यात्मक जांच कराने की है। जैन का दावा है कि उन्होंने अपनी याचिका में विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों और दस्तावेजों का उल्लेख किया है, जिनके आधार पर न्यायिक परीक्षण की आवश्यकता बताई गई है। इस विषय पर अलग-अलग पक्षों की अलग-अलग ऐतिहासिक व्याख्याएँ हैं। अंतिम निर्णय न्यायालय और उपलब्ध साक्ष्यों के परीक्षण पर निर्भर करेगा।

5 बड़े सवाल, जिन पर विष्णु शंकर जैन चाहते हैं न्यायिक पड़ताल

1. क्या ताजमहल के बंद कमरों की वैज्ञानिक और विशेषज्ञों की निगरानी में जांच होनी चाहिए?

2. क्या उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेजों और अभिलेखों का स्वतंत्र न्यायिक परीक्षण कराया जाना चाहिए?

3. क्या ताजमहल के निर्माण और उसके पूर्व इतिहास से जुड़े विभिन्न दावों की विशेषज्ञ समिति द्वारा समीक्षा संभव है?

4. क्या परिसर की वास्तुकला और संरचनात्मक विशेषताओं का आधुनिक तकनीकों से विस्तृत अध्ययन कराया जाना चाहिए?

5. क्या दशकों से चले रहे विवादों और दावों का अंतिम समाधान न्यायालय की निगरानी में साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए?

विष्णु शंकर जैन के 5 प्रमुख कथन

हम किसी पूर्वनिर्धारित निष्कर्ष की मांग नहीं कर रहे, बल्कि जांच की मांग कर रहे हैं।

यदि हमारे दावे गलत हैं तो अदालत उन्हें स्वीकार नहीं करेगी।

इतिहास से जुड़े विवादों का समाधान न्यायपालिका ही कर सकती है।

हमारा भरोसा केवल संविधान, कानून और साक्ष्यों पर है।

तथ्यों की जांच होगी तो भ्रम भी दूर होगा और सत्य भी स्पष्ट होगा।

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