सब कुछ बदला... बस काशी की स्मृतियाँ नहीं
बारह वर्षों में काशी ने विकास की ऐसी छलांग लगाई, जिसने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा। विश्वनाथ धाम बना, घाट संवरे, नमो घाट नई पहचान बना, रोपवे आकार लेने लगा, सड़कें चौड़ी हुईं और करोड़ों श्रद्धालुओं के स्वागत की नई व्यवस्था खड़ी हुई। लेकिन इसी बदली हुई काशी के बीच एक सवाल लगातार बड़ा होता जा रहा है—क्या दुनिया की सबसे प्राचीन जीवित नगरी के पास आज भी ऐसा कोई आधुनिक केंद्र है, जहाँ उसकी पाँच हजार वर्षों की सभ्यता, संस्कृति, संगीत, शिल्प, दर्शन और सामाजिक इतिहास को एक साथ समझा जा सके? मतलब साफ है वाराणसी में इतिहास है, विरासत है, शोध संस्थान हैं, संग्रहालय भी हैं। फिर भी ऐसा क्यों महसूस होता है कि दुनिया की सबसे प्राचीन जीवित नगरी की पूरी कहानी आज भी किसी एक स्थान पर नहीं मिलती?
सुरेश गांधी
सुबह के छह
बजे। गंगा के घाटों
पर सूरज की पहली
किरण उतर रही है।
अस्सी घाट पर योग
और मंत्रोच्चार का संगम है।
दशाश्वमेध घाट की सीढ़ियों
पर देश-विदेश से
आए श्रद्धालु कैमरों में काशी को
कैद कर रहे हैं।
श्री काशी विश्वनाथ धाम
में दर्शन के लिए कतारें
लगनी शुरू हो चुकी
हैं। गलियों में चाय की
भाप के साथ बनारस
की सुबह अपनी पुरानी
लय में लौट रही
है। इसी भीड़ में
एक विदेशी दंपती अपने गाइड से
पूछता है— "हमने विश्वनाथ धाम
देख लिया, घाट देख लिए,
गंगा आरती भी देखी।
अब बताइए, काशी के पाँच
हजार वर्षों के इतिहास को
एक ही जगह कहाँ
देखा जा सकता है?"
गाइड कुछ पल सोचता
है। फिर जवाब देता
है— "ऐसी कोई एक
जगह नहीं है। अलग-अलग जगह जाना
पड़ेगा।" यही उत्तर इस
पूरी पड़ताल का आधार बन
गया। क्योंकि यह सवाल केवल
एक विदेशी पर्यटक का नहीं, बल्कि
उस हर व्यक्ति का
है जो काशी को
केवल धार्मिक नगर नहीं, बल्कि
मानव सभ्यता की सबसे प्राचीन
जीवित सांस्कृतिक राजधानी मानता है।
बदली हुई काशी... जिसे दुनिया ने देखा
यह कहना गलत
होगा कि काशी नहीं
बदली। सच्चाई इसके बिल्कुल विपरीत
है। पिछले बारह वर्षों में
जितना व्यापक परिवर्तन वाराणसी ने देखा, वह
स्वतंत्र भारत के इतिहास
में अभूतपूर्व माना जाएगा। श्री
काशी विश्वनाथ धाम ने सदियों
पुरानी कल्पना को आधुनिक स्वरूप
दिया। गंगा तटों का
सौंदर्यीकरण हुआ। नमो घाट
ने धार्मिक पर्यटन के साथ आधुनिक
पर्यटन की नई पहचान
बनाई। शहर में रिंग
रोड, फ्लाईओवर, रेलवे स्टेशन का कायाकल्प, हवाई
अड्डे का विस्तार, क्रूज़
पर्यटन, रोपवे परियोजना, स्मार्ट सिटी के तहत
अनेक कार्य और सार्वजनिक सुविधाओं
में उल्लेखनीय सुधार हुए। आज काशी
केवल आस्था की राजधानी नहीं,
बल्कि आधुनिक शहरी परिवर्तन का
भी उदाहरण बन चुकी है।
इस उपलब्धि को स्वीकार करना
ईमानदार पत्रकारिता का दायित्व है।
लेकिन पत्रकारिता का दूसरा दायित्व
यह भी है कि
वह विकास की उस परत
को भी देखे, जो
अभी अधूरी है।
विकास केवल कंक्रीट नहीं, स्मृति भी होता है
किसी शहर का
विकास केवल सड़क, पुल
और भवनों से नहीं मापा
जाता। उसकी असली पहचान
इस बात से तय
होती है कि वह
अपनी स्मृतियों को कैसे सहेजता
है। पेरिस केवल एफिल टॉवर
से महान नहीं है।
लंदन केवल संसद भवन
से नहीं पहचाना जाता।
रोम केवल प्राचीन इमारतों
से नहीं, बल्कि अपनी सभ्यता को
व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत
करने की क्षमता से
दुनिया को आकर्षित करता
है। इसी कसौटी पर
यदि काशी को देखें
तो एक प्रश्न सामने
आता है— क्या काशी
अपनी पूरी कहानी दुनिया
को सुना पा रही
है?
संग्रहालय हैं... लेकिन क्या पूरी काशी वहाँ है?
इस पड़ताल के
दौरान सबसे पहले यही
तथ्य सामने आया कि यह
कहना गलत होगा कि
वाराणसी में संग्रहालय नहीं
हैं। शहर में भारत
कला भवन है, जो
भारतीय कला और सांस्कृतिक
धरोहर का अत्यंत प्रतिष्ठित
केंद्र है। सारनाथ का
पुरातत्व संग्रहालय विश्व बौद्ध विरासत का गौरव है।
रामनगर किले का संग्रहालय
काशी नरेश की परंपरा
और राजसी इतिहास का महत्वपूर्ण साक्षी
है। इन संस्थानों का
महत्व निर्विवाद है। लेकिन जब
इनकी भूमिका का अध्ययन किया
गया तो एक अलग
तस्वीर उभरकर सामने आई। इनमें से
प्रत्येक अपने-अपने विषय
का प्रतिनिधित्व करता है। कोई
कला का केंद्र है।
कोई बौद्ध पुरातत्व का। कोई राजपरंपरा
का। लेकिन यदि कोई पर्यटक
यह जानना चाहे कि— काशी
कब बसी? घाटों का
विकास कैसे हुआ? गंगा
और काशी का रिश्ता
क्या है? कबीर, रैदास
और तुलसी ने इस शहर
को कैसे बदला? बनारस
घराने ने भारतीय संगीत
को क्या दिया? बुनकरों
ने बनारसी साड़ी को विश्व तक
कैसे पहुँचाया? देव दीपावली, नाग
नथैया, भरत मिलाप और
रामनगर की रामलीला जैसी
परंपराएँ कैसे विकसित हुईं?
और 2014 के बाद काशी
का कायाकल्प किस तरह हुआ?
तो इन सभी प्रश्नों
का उत्तर उसे किसी एक
स्थान पर नहीं मिलता।
यहीं से इस रिपोर्ट
का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न
जन्म लेता है।
करोड़ों लोग आते हैं... लेकिन क्या वे काशी को समझकर लौटते हैं?
हर वर्ष करोड़ों
श्रद्धालु और लाखों विदेशी
पर्यटक वाराणसी पहुँचते हैं। वे मंदिर
देखते हैं। घाट देखते
हैं। गंगा आरती देखते
हैं। सारनाथ जाते हैं। लेकिन
क्या वे काशी की
सभ्यता को समझकर लौटते
हैं? पर्यटन से जुड़े कई
स्थानीय लोगों का मानना है
कि अधिकांश आगंतुक काशी का अनुभव
तो लेकर जाते हैं,
लेकिन उसकी पूरी कहानी
नहीं। क्योंकि वह कहानी अभी
भी अलग-अलग संस्थानों,
विश्वविद्यालयों, पुस्तकालयों, मंदिरों, निजी संग्रहों और
लोकस्मृतियों में बिखरी हुई
है। यही है विकास
का अगला सवाल. यह
रिपोर्ट किसी उपलब्धि को
कमतर नहीं आँकती। यह
यह भी नहीं कहती
कि पहले जो हुआ,
वह पर्याप्त नहीं था। बल्कि यह
एक नया प्रश्न सामने
रखती है— यदि काशी
अपने भौतिक स्वरूप में इतना बदल
सकती है, तो क्या
अब उसकी सांस्कृतिक स्मृतियों
को भी उसी गंभीरता
से संरक्षित करने का समय
नहीं आ गया है?
क्या अब ऐसा "काशी
सभ्यता संग्रहालय" नहीं होना चाहिए,
जहाँ कोई बच्चा, कोई
शोधार्थी, कोई श्रद्धालु और
कोई विदेशी पर्यटक दो-तीन घंटे
में काशी की पाँच
हजार वर्षों की यात्रा को
समझ सके?
क्या अब काशी को उसकी सभ्यता का एक स्थायी घर मिलना चाहिए?
यह सवाल भावनात्मक
कम और व्यावहारिक अधिक
है। आज दुनिया का
पर्यटन बदल चुका है।
पर्यटक केवल मंदिर या
स्मारक देखने नहीं आता, वह
उस शहर की कहानी
समझना चाहता है। वह यह
जानना चाहता है कि जिस
धरती पर वह खड़ा
है, उसकी ऐतिहासिक यात्रा
क्या रही, उसकी सांस्कृतिक
पहचान कैसे बनी और
उसने दुनिया को क्या दिया।
यहीं काशी ठहर जाती है।
श्रद्धालु विश्वनाथ धाम से अभिभूत
होकर निकलता है, लेकिन यदि
वह यह जानना चाहे
कि काशी की सभ्यता
का विकास हजारों वर्षों में कैसे हुआ,
तो उसे अलग-अलग
स्थानों पर जाना पड़ता
है। कला के लिए
एक जगह, बौद्ध इतिहास
के लिए दूसरी, राजपरंपरा
के लिए तीसरी, संगीत
के लिए अलग स्रोत,
बनारसी बुनकरों की कहानी अलग,
लोक परंपराएँ अलग और आधुनिक
काशी की विकास यात्रा
कहीं व्यवस्थित रूप से दर्ज
ही नहीं। यानी काशी का
इतिहास मौजूद है, लेकिन उसकी
प्रस्तुति बिखरी हुई है।
दुनिया ने विरासत को अनुभव में बदला
आज विश्व के
बड़े सांस्कृतिक शहरों ने इतिहास को
केवल पुस्तकों में नहीं छोड़ा।
उन्होंने उसे अनुभव में
बदल दिया। आधुनिक संग्रहालय अब केवल पुरानी
वस्तुओं के भंडार नहीं
हैं। वे ध्वनि, प्रकाश,
डिजिटल तकनीक, त्रि-आयामी प्रस्तुति,
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और संवादात्मक माध्यमों
से इतिहास को जीवंत बनाते
हैं। एक बच्चा भी
वहाँ जाकर इतिहास समझ
लेता है और एक
शोधार्थी भी नई सामग्री
लेकर लौटता है। काशी जैसी
नगरी, जो स्वयं एक
जीवित सभ्यता है, क्या इस
स्तर की प्रस्तुति की
अधिकारी नहीं है?
काशी आखिर दुनिया को क्या दिखाए?
यदि कल काशी
में एक "काशी सभ्यता संग्रहालय"
बने तो उसमें केवल
मूर्तियाँ और तस्वीरें नहीं
होंगी। वहाँ गंगा की
सांस्कृतिक यात्रा होगी। वहाँ वैदिक काशी
से आधुनिक काशी तक का
कालक्रम होगा। वहाँ संत कबीर
की वाणी होगी। संत
रैदास का सामाजिक संदेश
होगा। गोस्वामी तुलसीदास की साहित्य साधना
होगी। बनारस घराने का संगीत होगा।
उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ की शहनाई
की गूँज होगी। गिरिजा
देवी की ठुमरी की
मिठास होगी। बनारसी बुनकरों के करघे की
कहानी होगी। देव दीपावली, नाग
नथैया, भरत मिलाप और
रामनगर की रामलीला जैसे
जीवंत सांस्कृतिक पर्वों का डिजिटल अनुभव
होगा। और साथ ही
यह भी होगा कि
वर्ष 2014 के बाद काशी
किस प्रकार बदली और उसने
आधुनिक भारत के विकास
की नई पहचान कैसे
बनाई। यानी अतीत और
वर्तमान एक ही छत
के नीचे संवाद करते
दिखाई देंगे।
इससे बदलेगा क्या?
यह प्रश्न भी
स्वाभाविक है। उत्तर केवल
संस्कृति तक सीमित नहीं
है। ऐसा केंद्र बनने
से पर्यटक शहर में अधिक
समय बिताएगा। स्थानीय गाइडों को नया विषय
मिलेगा। बनारसी शिल्प और हस्तकला को
नया मंच मिलेगा। विद्यालयों
और विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों को
जीवंत अध्ययन केंद्र मिलेगा। शोधकर्ताओं को बिखरी सामग्री
के बजाय संगठित अभिलेखागार
मिलेगा। और सबसे बड़ी
बात—काशी की सांस्कृतिक
पहचान आने वाली पीढ़ियों
के लिए सुरक्षित हो
जाएगी। यह केवल पर्यटन
परियोजना नहीं होगी, बल्कि
सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था की भी बड़ी
पहल बन सकती है।
यह केवल सरकार का काम नहीं
इस पड़ताल के
दौरान एक और तथ्य
सामने आया। ऐसी परिकल्पना
केवल सरकार के भरोसे नहीं
बनती। इसके लिए विश्वविद्यालयों,
इतिहासकारों, पुरातत्वविदों, सांस्कृतिक संस्थाओं, शिल्पकारों, संगीतज्ञों, धार्मिक ट्रस्टों, व्यापारिक संगठनों और स्थानीय समाज
को भी साझा दृष्टि
विकसित करनी होगी। काशी
की सबसे बड़ी शक्ति
उसकी साझी सांस्कृतिक चेतना
रही है। यदि वही
चेतना इस दिशा में
आगे आए, तो यह
सपना केवल कल्पना नहीं
रहेगा।
विकास का अगला अध्याय
पिछले वर्षों में काशी ने दिखाया कि राजनीतिक इच्छाशक्ति और जनसहभागिता से बड़े परिवर्तन संभव हैं। काशी विश्वनाथ धाम इसका प्रमाण है। नमो घाट इसका प्रमाण है। शहर की बदली हुई तस्वीर इसका प्रमाण है। अब प्रश्न यह है कि क्या विकास का अगला अध्याय "सांस्कृतिक अधोसंरचना" का होगा? क्या आने वाले वर्षों में ऐसा दिन आएगा जब कोई विदेशी पर्यटक काशी आकर केवल घाटों और मंदिरों की तस्वीरें ही नहीं, बल्कि पाँच हजार वर्षों की सभ्यता का अनुभव भी अपने साथ लेकर जाएगा? यह रिपोर्ट किसी उपलब्धि को कम करने के लिए नहीं लिखी गई। यह उस उपलब्धि को पूर्ण बनाने का आग्रह है। काशी ने भारत को अध्यात्म दिया। ज्ञान दिया। दर्शन दिया। साहित्य दिया। संगीत दिया। शिल्प दिया। जीवन जीने की दृष्टि दी। अब समय शायद इस बात का है कि भारत भी काशी को उसकी स्मृतियों का एक ऐसा घर दे, जहाँ उसकी पूरी सभ्यता आने वाली सदियों तक सुरक्षित रह सके। क्योंकि... सड़कें विकास का मार्ग दिखाती हैं, लेकिन संग्रहालय किसी सभ्यता की स्मृति बचाते हैं। और यदि स्मृतियाँ बिखरी रहें, तो विकास की कहानी पूरी नहीं होती। शायद यही वह सवाल है, जिसका उत्तर अब केवल वाराणसी ही नहीं, पूरा देश खोज रहा है—आखिर काशी की सभ्यता को उसका घर कब मिलेगा?


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