Friday, 21 August 2026

कुर्सी का कुरुक्षेत्र : 2027 से पहले ही यूपी में छिड़ी निर्णायक जंग

नारी शक्ति लगाएगी योगी का बेड़ापार! जातीय गणित धरे रह जाएंगे?

कुर्सी का कुरुक्षेत्र : 2027 से पहले ही यूपी में छिड़ी निर्णायक जंग

उत्तर प्रदेश की सत्ता का रण 2027 के चुनाव से महीनों पहले ही सज चुका है। इस बार लड़ाई केवल जातीय समीकरणों की नहीं, बल्कि महिला वोट, राष्ट्रवाद, विकास और सीधे लाभ की राजनीति के बीच भी है। भाजपा जहां योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में कानून-व्यवस्था, एक्सप्रेसवे, निवेश, डबल इंजन और राष्ट्रवाद को चुनावी हथियार बनाने की तैयारी में है, वहीं महिलाओं के खातों में सीधे आर्थिक सहायता की संभावित योजना ने इस मुकाबले का सबसे बड़ा नया अध्याय खोल दिया है। महाराष्ट्र और बिहार में महिलाओं को सीधे आर्थिक लाभ देने की राजनीति के बाद यूपी में भी 50 हजार तक की संभावित सहायता की चर्चा ने सियासी हलकों में हलचल पैदा कर दी है। यदि चुनाव से पहले महिला के खाते में पहली बड़ी किस्त पहुंचती है तो यह सिर्फ सरकारी सहायता नहीं होगीयह करोड़ों परिवारों के दरवाजे तक पहुंचता राजनीतिक संदेश होगा। यहीं समाजवादी पार्टी का पीडीए समीकरण चुनौती में दिखाई देता है। अखिलेश यादव जातीय गोलबंदी के जरिए सत्ता की राह तलाश रहे हैं, जबकि भाजपा सामाजिक समीकरणों के साथ राष्ट्रवाद और लाभार्थी वर्ग को जोड़ने की कोशिश में है। कांग्रेस युवाओं के सहारे वापसी का रास्ता खोज रही है और बसपा अपनी खामोश रणनीति से समीकरण बिगाड़ने की ताक में है। सवाल अब यह नहीं कि जातीय गणित किसके पक्ष में बैठेगा। असली सवाल यह हैक्या 2027 में महिला की उंगली पर लगी स्याही जातीय समीकरणों की पूरी बिसात उलट देगी? मतलब साफ है महाराष्ट्र-बिहार के बाद यूपी में भी महिलाओ कोसीधी मददकी तैयारी के संकेत मिलने लगे है.• 2022 में पुरुषों से ज्यादा महिलाओं ने डाला वोट था. करीब 4.34 करोड़ महिलाओं ने मतदान किया था 

सुरेश गांधी

जी हां, उत्तर प्रदेश की 2027 की चुनावी लड़ाई अब सिर्फ जातीय समीकरण, कानून-व्यवस्था, रोजगार और विकास के सवालों तक सीमित रहने वाली नहीं है। इसके केंद्र में धीरे-धीरे एक ऐसा वोट बैंक रहा है, जिसे किसी जाति के खांचे में पूरी तरह बंद नहीं किया जा सकतामहिला मतदाता। महाराष्ट्र कीलाडकी बहिनऔर बिहार की महिला-केंद्रित आर्थिक सहायता के बाद अब यूपी में भी महिलाओं के खाते तक सीधे आर्थिक लाभ पहुंचाने की संभावित कवायद ने चुनावी पारे को चढ़ा दिया है। महिलाओं को 50 हजार तक की आर्थिक सहायता देने का प्रस्ताव विचाराधीन होने की खबरों ने इसलिए राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा की है क्योंकि चर्चा सिर्फ सहायता की नहीं, बल्कि चुनाव से पहले पहली बड़ी किस्त पहुंचाने की भी है। कुछ रिपोर्टों में 20 हजार की शुरुआती किस्त और बाद में 10-10 हजार की तीन किस्तों के संभावित मॉडल का उल्लेख है। हालांकि अभी इसे अंतिम सरकारी योजना या घोषित फैसला मानना जल्दबाजी होगी। लेकिन सवाल रकम से बड़ा हैक्या सीधे महिला के खाते में पैसा पहुंचने से 2027 का चुनावी रुख बदल सकता है

4.34 करोड़ महिला वोट का वजन

इस सवाल का जवाब 2022 के चुनावी आंकड़ों में छिपा है। 2022 के विधानसभा चुनाव में यूपी में करीब 6.98 करोड़ महिला मतदाता थीं। इनमें से 62.24 प्रतिशत महिलाओं ने मतदान किया। यानी मोटे तौर पर 4.34 करोड़ महिला मतदाताओं ने वोट डाला। इसके मुकाबले पुरुषों का मतदान प्रतिशत 59.56 रहा। यह आंकड़ा बताता है कि महिला अब केवलपरिवार के साथ मतदान करने वालीमतदाता नहीं रह गई है। वह खुद एक स्वतंत्र और निर्णायक चुनावी शक्ति बन चुकी है। 2022 में ही महिला मतदान पुरुषों से करीब 2.68 प्रतिशत अंक अधिक रहा। चुनावी राजनीति में यह मामूली अंतर नहीं है। खासकर ऐसे राज्य में जहां सैकड़ों सीटों पर जीत-हार का अंतर कुछ हजार से लेकर कुछ दसियों हजार वोटों का रहता है।

2022 में 1000 ने क्या किया था?

2022 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले -श्रम से जुड़े श्रमिकों के खातों में दिसंबर और जनवरी की. 500-500 यानी 1000 की सहायता पहुंचाई गई थी। करीब 1.50 करोड़ श्रमिकों के खातों में पहली दो महीनों की रकम चुनाव आचार संहिता लागू होने से पहले पहुंच चुकी थी। इसे सीधे चुनाव परिणाम का कारण मानना तथ्यों से परे होगा। चुनाव किसी एक योजना या एक हजार रुपये से नहीं जीता या हारा जाता। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि प्रत्यक्ष लाभ की राजनीति ने लाभार्थी और सरकार के बीच एक सीधा रिश्ता बनाया। यही प्रयोग यदि इस बार कहीं ज्यादा बड़े पैमाने पर महिलाओं के साथ होता है तो उसका राजनीतिक असर भी बड़ा हो सकता है। 2022 में एक हजार रुपये थे, 2027 में चर्चा पचास हजार तक की है। यही तुलना इस पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक रूप से विस्फोटक बनाती है।

एक खाते में रकम, पूरे घर में संदेश?

महिला के खाते में आने वाला पैसा केवल महिला तक सीमित नहीं रहता। घरेलू अर्थव्यवस्था में महिला अक्सर राशन, बच्चों की पढ़ाई, दवा, कपड़े और छोटी घरेलू जरूरतों पर खर्च का निर्णय करती है। इसलिए प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता का असर परिवार के भीतर भी महसूस हो सकता है। यही वह बिंदु है जहांलाभार्थीऔरमतदाताके बीच राजनीतिक रिश्ता बनता है। अगर किसी महिला को चुनाव से कुछ महीने पहले खाते में 20 हजार मिलते हैं और उसे बताया जाता है कि आगे भी सहायता जारी रहेगी, तो उसके लिए यह सरकार की किसी दूर की घोषणा से अलग अनुभव होगासरकार उसके बैंक खाते तक पहुंच चुकी होगी। यही कारण है कि महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और बिहार के प्रयोगों के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में महिला केंद्रित डीबीटी को लेकर उत्सुकता बढ़ी है। ऐसे में बड़ा सवाल है क्या इससे पूरा पासा पलट जाएगा? संभव है, लेकिन अपने आप नहीं। यूपी की महिला मतदाता कोई एक राजनीतिक ब्लॉक नहीं है। वह जाति, वर्ग, धर्म, क्षेत्र, महंगाई, बेरोजगारी, सुरक्षा, परिवार की आर्थिक स्थिति और स्थानीय उम्मीदवार जैसे कई मुद्दों पर मतदान करती है। इसलिए यह कहना कि 50 हजार मिलते ही महिला वोट पूरी तरह भाजपा के पक्ष में चला जाएगा, अतिशयोक्ति होगी। लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि इतनी बड़ी प्रत्यक्ष सहायता का चुनाव पर कोई असर नहीं पड़ेगा। असल सवाल होगाकितनी महिलाओं को लाभ मिलेगा, रकम चुनाव से कितने समय पहले आएगी, पात्रता कितनी व्यापक होगी और विपक्ष उसका कितना प्रभावी राजनीतिक जवाब देता है।

यहीं है असली 2027 का खेल

मान लीजिए सरकार किसी सीमित वर्ग की महिलाओं को लाभ देती है। तब भी करोड़ों परिवारों तक इसका संदेश पहुंच सकता है। और अगर पात्रता का दायरा बड़ा हुआ तो यह योजना यूपी के चुनावी विमर्श का केंद्रीय मुद्दा बन सकती है। क्योंकि महिला वोटर की संख्या पहले ही बहुत बड़ी है और मतदान में उनकी सक्रियता पुरुषों से अधिक दिखाई दे चुकी है। 2022 में लगभग 4.34 करोड़ महिलाओं ने मतदान किया था। 2027 का अंतिम मतदाता आंकड़ा अभी सामने नहीं है, इसलिए आज की तारीख में निश्चित संख्या बताना उचित नहीं होगा। लेकिन एक बात साफ हैजिस दल ने महिला मतदाता के मन में यह भरोसा पैदा कर दिया कि सत्ता में आने पर या सत्ता में बने रहने पर सीधे उसके खाते में आर्थिक सुरक्षा पहुंचेगी, उसे चुनावी मुकाबले में बड़ा मनोवैज्ञानिक लाभ मिल सकता है।

महिला सम्मानसेमहिला के खातेतक

योगी सरकार अब तक महिलाओं को सुरक्षा, आवास, उज्ज्वला, शौचालय, स्वयं सहायता समूह, कन्या सुमंगला, विवाह सहायता और विभिन्न सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के माध्यम से लाभार्थी बनाने की राजनीति करती रही है। अब यदि इसके ऊपर सीधा नकद हस्तांतरण जुड़ता है तो राजनीतिक संदेश बदल जाएगा— “सरकार आपके लिए काम कर रही हैसे आगे बढ़करसरकार आपके खाते में पैसा भेज रही है।यही बदलाव 2027 की राजनीति में महत्वपूर्ण हो सकता है।

विपक्ष के लिए भी बड़ी चुनौती

अगर भाजपा इस दिशा में आगे बढ़ती है तो विपक्ष के सामने सिर्फ योजना का विरोध करने का विकल्प नहीं होगा। उसे इससे बड़ा या अधिक भरोसेमंद महिला एजेंडा सामने रखना पड़ेगा। समाजवादी पार्टी पहले ही महिलाओं की पेंशन को बढ़ाकर 40 हजार करने की घोषणा कर चुकी है। ऐसे में महिला मतदाता के लिए मुकाबला सीधेकौन कितना देगा और किस रूप में देगाकी तरफ जा सकता है। यानी 2027 की लड़ाई में PDA, जातीय समीकरण और परंपरागत वोट बैंक के साथ एक नया सवाल भी खड़ा होगा— “महिला के खाते में किसकी सरकार कितना पहुंचाएगी?”

पासा पलटेगा या नहीं, फैसला महिला करेगी

2022 में महिलाओं ने पुरुषों से अधिक मतदान करके संकेत दे दिया था कि वे यूपी की चुनावी दिशा तय करने में पीछे नहीं हैं। अब 2027 में यदि करोड़ों महिलाओं के बैंक खातों में चुनाव से पहले प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता पहुंचती है तो उसका असर केवल रकम तक सीमित नहीं रहेगा। वह सरकार की छवि, परिवार की आर्थिक सोच और मतदान के निर्णयतीनों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। इसलिए अभी से यह कहना जल्दबाजी होगी कि “50 हजार आए और चुनाव पलट गया।लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है— 2022 में एक हजार की किस्त नेलाभार्थी राजनीतिका स्वाद दिखाया था। अगर 2027 में महिला के खाते में हजार नहीं, हजारों की रकम पहुंची तो यूपी की चुनावी राजनीति में यह प्रयोग कहीं ज्यादा बड़ा हो सकता है। और तब मुकाबला सिर्फकौन जीतेगाका नहीं होगा। सवाल होगा- “किसके साथ खड़ी होगी आधी आबादी?”

No comments:

Post a Comment

कुर्सी का कुरुक्षेत्र : 2027 से पहले ही यूपी में छिड़ी निर्णायक जंग

नारी शक्ति लगाएगी योगी का बेड़ापार ! जातीय गणित धरे रह जाएंगे ? कुर्सी का कुरुक्षेत्र : 2027 से पहले ही यूपी में छिड़ी न...