Tuesday, 18 August 2026

राष्ट्रीय टीम में यूपी का ‘सामाजिक एक्स-रे’, 2027 के लिए भाजपा ने खोले पत्ते

राष्ट्रीय टीम में यूपी कासामाजिक एक्स-रे’, 2027 के लिए भाजपा ने खोले पत्ते 

उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनाव कभी सिर्फ चुनाव नहीं होता। यहां हर नियुक्ति के पीछे एक संदेश, हर चेहरे के पीछे एक सामाजिक गणित और हर भाषण के पीछे आने वाले मतदान की आहट पढ़ी जाती है। भाजपा की नई राष्ट्रीय टीम को इसी नजरिये से देखें तो दिल्ली में तैयार हुआ संगठनात्मक खाका दरअसल लखनऊ की सत्ता का भी आईना नजर आता है। नितिन नवीन की टीम में उत्तर प्रदेश से शामिल किए गए चेहरों ने 2027 की चुनावी बिसात पर कई मोहरों को एक साथ आगे बढ़ा दिया है। महिला, युवा और ओबीसीये तीन शब्द इस पूरी रणनीति की सबसे चमकदार धुरी बनकर उभरते हैं। इनके साथ दलित, ब्राह्मण और मुस्लिम प्रतिनिधित्व जोड़कर भाजपा ने सामाजिक समीकरण की ऐसी तस्वीर पेश की है, जिसमें पूर्वांचल से पश्चिम और अवध से प्रयागराज तक क्षेत्रीय संतुलन साधने की कोशिश दिखाई देती है। यह महज पदों का बंटवारा नहीं, बल्कि उन सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाने की कवायद है, जिनका रुख विधानसभा चुनाव में सीटों का भूगोल बदल सकता है. 2024 के लोकसभा चुनाव ने भाजपा को एक अहम सबक दिया थाबड़ा वोट प्रतिशत हमेशा बड़ी सीटों में नहीं बदलता। इसलिए 2027 की तैयारी में संगठन को समाज के अंतिम पायदान तक ले जाने और अलग-अलग जातीय समूहों को प्रतिनिधित्व का भरोसा देने की कवायद तेज होती दिख रही है। स्मृति ईरानी से रेखा वर्मा तक महिला नेतृत्व, अमरपाल मौर्य से संगीता यादव तक ओबीसी विस्तार, भोला सिंह के जरिये दलित प्रतिनिधित्व और हरीश द्विवेदी के रूप में युवा ब्राह्मण चेहराहर नियुक्ति अपने भीतर एक अलग राजनीतिक संदेश समेटे है। राष्ट्रीय संगठन की यह तस्वीर अब यूपी की चुनावी तस्वीर से कितनी मेल खाती है, असली परीक्षा आने वाले महीनों में होगी 

सुरेश गांधी

उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनावी शतरंज की बिसात अभी पूरी तरह बिछी भी नहीं है, लेकिन भाजपा ने अपने मोहरे काफी पहले से सजाने शुरू कर दिए हैं। नितिन नवीन की नई राष्ट्रीय टीम में उत्तर प्रदेश को मिली अहम हिस्सेदारी को इसी नजरिये से देखा जा रहा है। राष्ट्रीय संगठन में शामिल यूपी के चेहरों की सामाजिक पृष्ठभूमि, क्षेत्रीय पहचान और राजनीतिक उपयोगिता को देखें तो एक तस्वीर उभरती है—2027 के लिए भाजपा का फोकस युवा, महिला और ओबीसी पर केंद्रित होता दिखाई दे रहा है। दिलचस्प यह है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार और संगठन दोनों स्तरों पर जिन सामाजिक समूहों पर जोर बढ़ा रहे हैं, उसकी प्रतिध्वनि राष्ट्रीय टीम में भी सुनाई दे रही है। महिला सशक्तिकरण, पिछड़ा वर्ग, युवा नेतृत्व और सामाजिक प्रतिनिधित्व को एक साथ साधने की कोशिश ने नई टीम को केवल संगठनात्मक नियुक्तियों की सूची नहीं रहने दिया है, बल्कि इसे यूपी के आगामी चुनावी समीकरण से जोड़कर देखा जाने लगा है। मतलब साफ है नितिन नवीन की नई टीम की पहली बड़ी राजनीतिक परीक्षा उत्तर प्रदेश में ही होने वाली है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि राष्ट्रीय संगठन के ये चेहरे केवल पदाधिकारी बनकर रहते हैं या उन्हें जमीन पर सामाजिक समूहों के बीच सक्रिय भूमिका भी दी जाती है। क्योंकि यूपी में चुनाव भाषणों से शुरू जरूर होता है, लेकिन जीत बूथ पर सामाजिक समीकरणों की अंतिम गिनती से तय होती है।

भाजपा ने राष्ट्रीय टीम में संकेत दे दिया है कि 2027 की लड़ाई में वह केवल सत्ता विरोधी लहर या विकास के मुद्दे पर निर्भर रहने के बजाय सामाजिक प्रतिनिधित्व, संगठन और नई पीढ़ी के नेतृत्व को साथ लेकर चलना चाहती है। अब सवाल यह है कि विपक्ष इस चाल का जवाब कैसे देता है? सपा अपने पीडीए समीकरण को और धार देती है या नए सामाजिक समूहों को जोड़ती है? कांग्रेस 2024 की बढ़त को संगठन में बदल पाती है? बसपा अपने बिखरे सामाजिक आधार को फिर एकजुट कर पाती है? और भाजपा जिन नए सामाजिक चेहरों को राष्ट्रीय संगठन में आगे लाई है, वे क्या वास्तव में जातीय समीकरणों को वोट में बदल पाएंगे? यूपी की सियासत में शतरंज की चाल चल चुकी है। मोहरे सज चुके हैं। भाषणों की आवाज तेज हो रही है। जातीय समीकरणों की गणित शुरू हो चुकी है। अब देखना यह है कि 2027 की बिसात पर किसकासामाजिक गठबंधनसबसे लंबी बाजी खेलता है। 2022 में 255 सीटों की सत्ता और 41.29 प्रतिशत वोट पर सवार भाजपा को 2024 में लोकसभा की 33 सीटों पर सिमटना पड़ा। सपा 37 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी। अब 2027 से पहले हर दल जातीय जोड़-तोड़, संगठनात्मक फेरबदल और ताबड़तोड़ भाषणों के जरिए खोया-पाया जनाधार वापस करने की कवायद में जुटा है।

आठ चेहरे, कई संदेश

नई टीम में उत्तर प्रदेश से आठ प्रमुख चेहरों को अहम जिम्मेदारियां मिलना अपने आप में महत्वपूर्ण है। इनमें तीन महिला और तीन ओबीसी चेहरों की मौजूदगी विशेष रूप से ध्यान खींचती है। इसके साथ दलित, ब्राह्मण और मुस्लिम प्रतिनिधित्व भी रखा गया है। अर्थात भाजपा ने एक ही सामाजिक समूह पर दांव लगाने के बजाय बहुस्तरीय सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश की है। पश्चिमी यूपी से लेकर पूर्वांचल और अवध से लेकर प्रयागराज क्षेत्र तक चेहरों का विस्तार इस रणनीति को और स्पष्ट करता है। यह वही उत्तर प्रदेश है जहां 2024 के लोकसभा चुनाव ने भाजपा को यह एहसास कराया कि मजबूत संगठन और बड़ा वोट प्रतिशत होने के बावजूद सामाजिक गठबंधन में मामूली बदलाव भी सीटों के गणित को उलट सकता है। लिहाजा 2027 के लिए भाजपा अब केवल सरकार के कामकाज के सहारे नहीं, बल्कि हर सामाजिक खांचे में अपना चेहरा और प्रतिनिधि खड़ा करने की कवायद करती दिखाई दे रही है।

स्मृति ईरानी : हार के बाद भी बड़ा संदेश

राष्ट्रीय महासचिव के अहम पद पर स्मृति ईरानी की वापसी को महिला नेतृत्व के संदर्भ में देखा जा रहा है। अमेठी में राहुल गांधी के खिलाफ उनकी चर्चित जीत और फिर 2024 में चुनावी हार के बावजूद राष्ट्रीय संगठन में उन्हें महत्वपूर्ण भूमिका मिलना भाजपा की रणनीति का स्पष्ट संकेत है। राजनीति में चुनाव हारना हमेशा राजनीतिक पराजय का पर्याय नहीं होता। संगठन किसी नेता की उपयोगिता को चुनाव परिणाम से अलग भी आंकता है। स्मृति ईरानी को राष्ट्रीय टीम में अहम स्थान देकर भाजपा ने महिला नेतृत्व के आक्रामक और मुखर चेहरे को फिर आगे किया है। यूपी में आधी आबादी को लेकर भाजपा लगातार योजनाओं और राजनीतिक संदेशों पर जोर देती रही है। ऐसे में राष्ट्रीय संगठन में महिला चेहरों की प्रमुख भूमिका को आगामी चुनावी रणनीति से जोड़कर देखना स्वाभाविक है।

रेखा वर्मा : कुर्मी समीकरण की मजबूत कड़ी

राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद पर रेखा वर्मा को बरकरार रखना भी सामाजिक समीकरण के लिहाज से महत्वपूर्ण है। धौरहरा से दो बार सांसद रह चुकीं रेखा वर्मा कुर्मी समाज से आती हैं। संतोष गंगवार के राज्यपाल बनने के बाद बरेली मंडल और आसपास के इलाकों में कुर्मी नेतृत्व को लेकर भाजपा के सामने स्वाभाविक रूप से नई चुनौती है। ऐसे में रेखा वर्मा को राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देकर पार्टी ने कुर्मी समाज के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संदेश मजबूत किया है। यह सिर्फ एक पद नहीं, बल्कि उस इलाके के लिए संकेत है जहां जातीय पहचान अब भी चुनावी व्यवहार को प्रभावित करती है।

अमरपाल मौर्य : मौर्य-कुशवाहा वोट पर नजर

प्रयागराज मंडल से आने वाले राज्यसभा सांसद अमरपाल मौर्य को ओबीसी मोर्चे का राष्ट्रीय प्रभारी बनाया जाना भी महत्वपूर्ण है। मौर्य-कुशवाहा समाज पूर्वांचल और मध्य यूपी के कई विधानसभा क्षेत्रों में निर्णायक भूमिका निभाता है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को जिन सामाजिक समूहों के बीच नुकसान का सामना करना पड़ा, उनमें गैर-यादव ओबीसी के कुछ हिस्सों का उल्लेख लगातार राजनीतिक विश्लेषणों में हुआ। ऐसे में अमरपाल मौर्य को राष्ट्रीय स्तर की जिम्मेदारी देना मौर्य-कुशवाहा समाज तक भाजपा की राजनीतिक पहुंच को फिर मजबूत करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। खास बात यह कि यह चेहरा सीधे उस सामाजिक वर्ग से आता है जिसे भाजपा अपने व्यापक पिछड़ा वर्ग गठबंधन की धुरी बनाए रखना चाहती है।

संगीता यादव : पूर्वांचल की कमजोर कड़ी पर दांव

राष्ट्रीय मंत्री पद पर संगीता यादव को जगह मिलना भी यूपी के चुनावी गणित में अलग संदेश देता है। यादव समाज लंबे समय से समाजवादी पार्टी का मजबूत सामाजिक आधार माना जाता है। ऐसे में भाजपा के लिए यादव समाज में राजनीतिक पैठ बनाना आसान नहीं रहा है। संगीता यादव के रूप में महिला और यादवदोनों पहचानें एक साथ भाजपा के पास आती हैं। पूर्वांचल में जहां यादव मतदाताओं की बड़ी राजनीतिक भूमिका है, वहां ऐसा चेहरा पार्टी के लिए सामाजिक संवाद का माध्यम बन सकता है। यह नियुक्ति भाजपा की उस कोशिश की ओर संकेत करती है जिसमें पार्टी केवल अपने पारंपरिक समर्थक वर्गों को मजबूत करने के बजाय विपक्ष के मजबूत सामाजिक आधार में भी सेंध लगाना चाहती है।

भोला सिंह : पश्चिम में दलित चेहरे की भूमिका

बुलंदशहर की सुरक्षित सीट से सांसद भोला सिंह दलित समाज से आते हैं। पश्चिमी यूपी में दलित मतदाता राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं और कई सीटों पर परिणाम का रुख बदलने की क्षमता रखते हैं। राष्ट्रीय संगठन में उन्हें स्थान देकर भाजपा ने पश्चिमी यूपी में दलित प्रतिनिधित्व का संदेश देने की कोशिश की है। खासकर ऐसे समय में जब विपक्ष भी दलित मतदाताओं को अपने पाले में लाने के लिए लगातार सक्रिय है। यूपी की राजनीति में दलित वोट अब किसी एक पार्टी की स्थायी जागीर नहीं रहा। 2027 में जिस दल को दलित मतों का पर्याप्त हिस्सा मिलेगा, उसके लिए कई सीटों पर जीत का रास्ता आसान हो सकता है।

हरीश द्विवेदी : युवा ब्राह्मण चेहरा

बस्ती से आने वाले पूर्व सांसद हरीश द्विवेदी की राष्ट्रीय टीम में एंट्री का अपना अलग संदेश है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और भाजपा युवा मोर्चा से संगठनात्मक यात्रा शुरू करने वाले द्विवेदी को युवा संगठन का लंबा अनुभव रहा है। 2024 में चुनाव हारने के बावजूद संगठन में उनकी सक्रियता बनी रही। असम जैसे राज्य में संगठन की जिम्मेदारी संभालने के बाद राष्ट्रीय टीम में जगह मिलना बताता है कि भाजपा के लिए चुनावी हार अंतिम कसौटी नहीं, संगठनात्मक क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। युवा ब्राह्मण चेहरे के रूप में उनकी भूमिका पूर्वांचल और ब्राह्मण समाज के बीच संगठनात्मक संवाद बढ़ाने में महत्वपूर्ण हो सकती है।

मुस्लिम चेहरों से भी संदेश

राष्ट्रीय टीम में उत्तर प्रदेश से मुस्लिम प्रतिनिधित्व भी चर्चा का विषय है। तारिक मंसूर को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति रहे प्रो. मंसूर का राजनीतिक सफर अकादमिक क्षेत्र से संगठन और सक्रिय राजनीति तक पहुंचा है। उन्हें पहले उत्तर प्रदेश विधान परिषद का सदस्य बनाया गया और बाद में भाजपा के राष्ट्रीय संगठन में जिम्मेदारी मिली। इसके अलावा पश्चिमी यूपी के मेरठ से आने वाले कुंवर बासित अली भी भाजपा के अल्पसंख्यक चेहरे के रूप में महत्वपूर्ण हैं। उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यक मोर्चे की जिम्मेदारी संभाल चुके बासित अली को पश्चिमी यूपी में मुस्लिम समाज के बीच पार्टी का संवाद बढ़ाने वाले चेहरे के तौर पर देखा जाता है। भाजपा के लिए यह प्रयोग राजनीतिक रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी पर विपक्ष लंबे समय से अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठाता रहा है। ऐसे में राष्ट्रीय संगठन में मुस्लिम चेहरों की मौजूदगी प्रतिनिधित्व और राजनीतिक पहुंच दोनों का संदेश देती है।

2027 के लिए क्या है असली संदेश?

नई राष्ट्रीय टीम को अगर यूपी के नजरिये से पढ़ें तो भाजपा की रणनीति के कई अध्याय एक साथ दिखाई देते हैं। महिलाआधी आबादी तक पहुंच। ओबीसीसबसे बड़ा सामाजिक आधार। युवानई पीढ़ी का राजनीतिक आकर्षण। दलितनिर्णायक वोट बैंक। ब्राह्मणपारंपरिक समर्थन का संतुलन। अल्पसंख्यकसामाजिक विस्तार का प्रयास। इसके साथ पूर्वांचल, अवध, प्रयागराज और पश्चिमी यूपी के चेहरों को जगह देकर क्षेत्रीय संतुलन भी साधा गया है। यानी भाजपा ने नई टीम में सिर्फ पद नहीं बांटे, बल्कि सामाजिक संकेत भी दिए हैं।

2024 की सीख, 2027 की तैयारी

2024 में भाजपा का वोट प्रतिशत यूपी में मजबूत रहा, लेकिन सीटों का गणित उसके पक्ष में नहीं रहा। सपा 37 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी और कांग्रेस ने भी छह सीटें जीतीं। भाजपा 33 सीटों तक सिमट गई। यही वह परिणाम था जिसने भाजपा को सामाजिक गठबंधन की बारीकियों पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर किया। अब 2027 की चुनौती उससे भी बड़ी है। लोकसभा चुनाव में वोट राष्ट्रीय मुद्दों और व्यापक गठबंधनों के आधार पर प्रभावित हो सकता है, लेकिन विधानसभा चुनाव में स्थानीय उम्मीदवार, जातीय समीकरण, बूथ संगठन और क्षेत्रीय नेतृत्व कहीं अधिक निर्णायक हो जाते हैं। इसलिए राष्ट्रीय टीम की नई संरचना को यूपी की चुनावी तैयारी से अलग करके देखना कठिन है।

आंकड़ों में बदली तस्वीर

2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अकेले 255 सीटें और 41.29 प्रतिशत वोट हासिल किए थे। सपा को 111 सीटें और 32.06 प्रतिशत वोट मिले। भाजपा के सहयोगी अपना दल (एस) को 12 और निषाद पार्टी को छह सीटें मिलीं। वहीं बसपा 12.88 प्रतिशत वोट के बावजूद केवल एक सीट पर सिमट गई और कांग्रेस को 2.33 प्रतिशत वोट के साथ महज दो सीटें मिलीं। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव ने तस्वीर में बड़ा उलटफेर कर दिया। यूपी की 80 लोकसभा सीटों में सपा 37 सीटों के साथ सबसे आगे रही, भाजपा 33 पर सिमटी और कांग्रेस ने छह सीटें जीतीं। भाजपा का वोट प्रतिशत 41.37 रहा, जबकि सपा को 33.59 और कांग्रेस को 9.46 प्रतिशत वोट मिले। बसपा 9.39 प्रतिशत वोट लेकर भी एक भी सीट नहीं जीत सकी। यानी वोट प्रतिशत में भाजपा अब भी सबसे आगे थी, लेकिन सीटों की बाजी सपा के हाथ लगी। यही विरोधाभास 2027 की पूरी राजनीतिक रणनीति का सबसे बड़ा आधार बन गया है।

भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौतीवोट को सीट में बदलना

भाजपा के लिए 2024 का संदेश साफ थासिर्फ मजबूत वोट प्रतिशत पर्याप्त नहीं, बल्कि सीट-दर-सीट सामाजिक गठजोड़ और बूथ प्रबंधन निर्णायक है। इसीलिए संगठन को नए सिरे से साधा जा रहा है। जून में प्रदेश संगठन में बड़े फेरबदल के तहत उपाध्यक्ष, महामंत्री, मंत्री, क्षेत्रीय अध्यक्ष और विभिन्न मोर्चों के पदों पर नियुक्तियां की गईं। इसमें जातीय, क्षेत्रीय, उम्र और सामाजिक प्रतिनिधित्व का संतुलन साधने की कोशिश दिखाई दी। मई में योगी सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार में भी गैर-यादव ओबीसी, दलित और ब्राह्मण प्रतिनिधित्व को साधने का संकेत मिला। छह नए मंत्रियों में तीन ओबीसी, दो अनुसूचित जाति और एक ब्राह्मण चेहरा शामिल किया गया। अब 18 अगस्त 2026 को भाजपा ने उत्तर प्रदेश के लिए नया प्रभारी भी नियुक्त किया है। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की टीम में यूपी को लेकर संगठनात्मक फेरबदल को आगामी चुनावी तैयारी से जोड़कर देखा जा रहा है। यानी भाजपा की रणनीति साफ दिखाई दे रही हैसरकार के काम के साथ संगठन की पकड़ और सामाजिक समीकरण को एक साथ मजबूत करना।

सपा की नजर—2024 की जमीन को 2027 की सत्ता में बदलना

अखिलेश यादव के लिए 2024 का परिणाम राजनीतिक ऊर्जा लेकर आया। सपा ने 62 सीटों पर चुनाव लड़कर 37 सीटें जीतीं और 33.59 प्रतिशत वोट हासिल किया। कांग्रेस के साथ गठबंधन ने भाजपा के खिलाफ वोटों के बिखराव को काफी हद तक रोक दिया। अब सपा के सामने चुनौती यह है कि लोकसभा में बना सामाजिक गठजोड़ विधानसभा तक कैसे पहुंचे। यादव-मुस्लिम आधार सपा की पारंपरिक ताकत है, लेकिन 2027 की लड़ाई केवल इस समीकरण से नहीं जीती जा सकती। यही वजह है कि पार्टी लगातार गैर-यादव पिछड़ी जातियों, दलितों और छोटे सामाजिक समूहों में अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रही है। अखिलेश यादव ने भी 2027 में चुनावी समीकरण और सीटों के तालमेल को महत्वपूर्ण बताया है। यानी सपा का दांव है—2024 केपीडीएविस्तार को विधानसभा के बूथ तक ले जाना।

बसपा के सामने अस्तित्व की चुनौती

यूपी की जातीय राजनीति में बसपा की कमजोरी शायद सबसे बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम है। 2007 में 206 विधानसभा सीटें जीतने वाली बसपा 2022 में सिर्फ एक सीट पर सिमट गई। 2024 लोकसभा चुनाव में करीब 9.39 प्रतिशत वोट मिलने के बावजूद पार्टी का खाता नहीं खुला। यही कारण है कि बसपा का वोट अब हर दल के लिए महत्वपूर्ण हो गया है।

 

राजनीतिक गणित में यह एक अजीब स्थिति हैजिस पार्टी की सीटें शून्य हैं, उसका वोट प्रतिशत फिर भी इतना बड़ा है कि वह कई सीटों पर जीत-हार का फैसला कर सकता है। दलित मतदाताओं के बीच भाजपा, सपा, कांग्रेस और आजाद समाज पार्टी की सक्रियता इसी बदलते परिदृश्य की ओर संकेत करती है। हाल के राजनीतिक विश्लेषणों में भी दलित वोट को 2027 की लड़ाई का प्रमुख केंद्र बताया गया है।

कांग्रेसदलित कार्ड से संगठन की वापसी

कांग्रेस ने भी यूपी में संगठन को नए सामाजिक आधार पर खड़ा करने का संकेत दिया है। जून 2026 में दलित नेता राजेंद्र पाल गौतम को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया। इसे दलित और वंचित तबकों में कांग्रेस की पैठ बढ़ाने की रणनीति के रूप में देखा गया। 2024 में कांग्रेस को सिर्फ छह लोकसभा सीटें मिलीं, लेकिन उसका वोट प्रतिशत 9.46 तक पहुंचा। 2022 विधानसभा चुनाव में पार्टी सिर्फ दो सीटों पर सिमटी थी। इसलिए कांग्रेस के लिए 2024 परिणाम पुनर्जीवन का संकेत हैं, मगर संगठनात्मक कमजोरी अब भी बड़ी चुनौती है।

जाति की राजनीति अब सिर्फएम-वाईयाकमंडलनहीं

यूपी की राजनीति का नया चरित्र कहीं अधिक जटिल हो चुका है। अब मुकाबला सिर्फ भाजपा केकमंडलऔर सपा केमंडलके बीच नहीं है। इसके बीच गैर-यादव ओबीसी, गैर-जाटव दलित, अति-पिछड़े, कुर्मी, निषाद, मौर्य-कुशवाहा, सैनी, पाल, राजभर, पासी, कोरी और अन्य छोटे सामाजिक समूह निर्णायक भूमिका में सकते हैं। भाजपा लंबे समय से गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलितों को अपने सामाजिक गठबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने में सफल रही है। वहीं सपा अब इस गठजोड़ में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस दलितों और वंचित वर्गों में जगह तलाश रही है, जबकि बसपा अपने परंपरागत आधार को बचाने की लड़ाई लड़ रही है। यही वजह है कि एक-एक जातीय समूह के नेता की राजनीतिक कीमत बढ़ गई है।

ताबड़तोड़ भाषण, यात्राएं और जमीन पर संगठन

चुनाव अभी दूर है, लेकिन राजनीतिक तापमान बढ़ने लगा है। नेताओं के भाषणों की धार तेज हो रही है। मुद्दे भी तेजी से बदले जा रहे हैंआरक्षण, संविधान, जातीय जनगणना, कानून-व्यवस्था, रोजगार, किसान, महंगाई, विकास, हिंदुत्व, पिछड़ों की हिस्सेदारी और दलित सम्मान। दरअसल भाषण अब केवल भीड़ जुटाने का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक संदेश भेजने का हथियार बन चुके हैं। एक नेता जिस जिले में जाता है, वहां केवल सरकार की आलोचना या उपलब्धियां नहीं गिनाता; वह यह भी बताता है कि उसकी पार्टी में उस क्षेत्र, जाति और समुदाय की कितनी हिस्सेदारी है।

असली लड़ाई बूथ पर

2027 में भाषणों से ज्यादा निर्णायक लड़ाई बूथ पर होगी। 2024 ने यह साबित कर दिया कि बड़े वोट प्रतिशत के बावजूद सीटें हाथ से निकल सकती हैं। भाजपा के 41.37 प्रतिशत वोट के मुकाबले सपा-कांग्रेस का संयुक्त वोट प्रतिशत करीब 43.52 प्रतिशत रहा और दोनों दलों ने मिलकर 43 सीटें जीतीं। वहीं भाजपा और उसके सहयोगियों का कुल आंकड़ा करीब 43.69 प्रतिशत और 36 सीटों का रहा।  इसलिए अब राजनीतिक दल पन्ना प्रमुख से लेकर बूथ कमेटी, सेक्टर प्रभारी से लेकर विधानसभा प्रभारी और जिला संगठन तक हर स्तर पर पुनर्संरचना कर रहे हैं।

2027 का सबसे बड़ा सवाल

यूपी की अगली लड़ाई का सवाल यह नहीं होगा कि किस दल का वोट प्रतिशत सबसे अधिक है। असली सवाल होगाकौन अपने वोट को बूथ तक पहुंचाता है? कौन जातीय समीकरण को सामाजिक गठबंधन में बदलता है? कौन सहयोगियों को साथ रखता है? कौन टिकट वितरण में असंतोष रोकता है? और कौन 2024 की रणनीति को 2027 के विधानसभा गणित में सफलतापूर्वक बदल पाता है? भाजपा के सामने 2024 की सीटों की क्षति की भरपाई और सामाजिक गठबंधन को फिर मजबूत करने की चुनौती है। सपा के सामने लोकसभा की सफलता को विधानसभा में दोहराने का सवाल है। कांग्रेस को संगठन खड़ा कर अपनी बढ़ी हुई राजनीतिक जमीन बचानी है। बसपा के सामने अपना वोटबैंक वापस संगठित करने की सबसे कठिन परीक्षा है। यूपी में शतरंज की बिसात सज चुकी है। मोहरे धीरे-धीरे अपनी जगह ले रहे हैं। प्रभारी बदले जा रहे हैं, संगठन गढ़े जा रहे हैं, जातीय समीकरण साधे जा रहे हैं और मंचों से भाषणों की आवाज तेज हो रही है। 2027 का फैसला हालांकि चुनाव के दिन होगा, लेकिन उसकी पटकथा 2026 में ही लिखी जा रही है।

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