पहाड़ की छाती चीरकर विकास, सैलाब ने खोल दी तबाही की किताब… हिमालय की चेतावनी—अब भी नहीं संभले तो अगली बारी किसकी?
हिमालय की खामोशी के भीतर कितनी बेचैनी जमा हो चुकी थी, शायद इसका अंदाजा नेपाल को उस सुबह तक नहीं था। फिर एक झटके में पहाड़ टूटा, ग्लेशियर का हिस्सा ध्वस्त हुआ, चट्टानों और मलबे ने पानी की रफ्तार को विकराल बनाया और देखते ही देखते नदी घाटियां मौत की धाराओं में बदल गईं। घर, सड़कें, पुल, बिजली परियोजनाएं और उन सबके बीच बसी जिंदगियां—सब कुछ मलबे और सैलाब में समाता चला गया। 26 अगस्त की इस भयावह आपदा ने नेपाल और तिब्बत के सीमावर्ती हिमालयी क्षेत्र को हिलाकर रख दिया है। नेपाल की आपदा प्राधिकरण के अनुसार शुक्रवार तक 538 लोगों की मौत हो चुकी थी और 977 लोग अब भी लापता थे। हजारों लोग प्रभावित हुए हैं और हजारों सुरक्षाकर्मी बचाव अभियान में जुटे हैं। चीन के तिब्बत क्षेत्र में भी पांच मौतें और सैकड़ों लोगों के लापता होने की सूचना है। लेकिन यह कहानी केवल आंकड़ों की नहीं है। यह उस हिमालय की कहानी है जिसे हमने सदियों से देवभूमि कहा, लेकिन पिछले कुछ दशकों में उसे विकास की प्रयोगशाला बना दिया
सुरेश गांधी
नेपाल में हिमालय ने
इस बार जो मंजर
दिखाया है, वह किसी
डरावनी फिल्म का दृश्य नहीं,
बल्कि हमारी आंखों के सामने घटती
उस त्रासदी की तस्वीर है
जिसके संकेत प्रकृति लंबे समय से
दे रही है। 26 अगस्त
को हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर और
चट्टानों के बड़े पैमाने
पर टूटने से पैदा हुई
मलबे की धारा और
फ्लैश फ्लड ने देखते
ही देखते नदी घाटियों को
मौत और मलबे की
घाटियों में बदल दिया।
नेपाल के साथ तिब्बत
का सीमावर्ती इलाका भी इसकी चपेट
में आया। वैज्ञानिक आकलन
में इस घटना के
पीछे ग्लेशियल कोलैप्स की भूमिका सामने
आई है। ताजा आधिकारिक
आंकड़े भयावह हैं। शुक्रवार तक
नेपाल में 538 लोगों की मौत और
977 लोगों के लापता होने
की सूचना है। हजारों परिवारों
पर एक साथ आसमान
टूट पड़ा है। सड़कें,
पुल, जलविद्युत परियोजनाएं, संचार तंत्र और बस्तियां तबाह
हुई हैं। बचाव दल
मलबे के बीच जिंदगी
तलाश रहे हैं, जबकि
कई इलाकों में पहुंचना अब
भी चुनौती बना हुआ है।
लेकिन इस त्रासदी को
केवल ‘कुदरत का कहर’ कहकर
आगे बढ़ जाना शायद
सबसे आसान और सबसे
खतरनाक रास्ता होगा। एक झटके में उजड़
गए घर, बह गईं
सड़कें और सपने; सवाल
सिर्फ सरकारों से नहीं, उस
इंसान से भी है
जो विकास की सीढ़ी चढ़ते-चढ़ते प्रकृति की नींव ही
खोदता जा रहा है.
मतलब साफ है एक झटके में उजड़ गए घर, बह गईं सड़कें और सपने... सवाल सिर्फ सरकारों से
नहीं, उस इंसान से भी है जो विकास की सीढ़ी चढ़ते-चढ़ते प्रकृति की नींव ही खोदता जा रहा
है?
ग्लेशियर का टूटना बना तबाही का ट्रिगर
प्रारंभिक वैज्ञानिक आकलन के मुताबिक
ऊंचाई वाले क्षेत्र में
ग्लेशियर और चट्टान के
बड़े हिस्से के टूटने से
भारी मलबा नीचे आया
और उसने नदी तंत्र
को अचानक उफान में बदल
दिया। विशेषज्ञों ने इस घटना
को ग्लेशियल कोलैप्स और उसके बाद
आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड से जोड़ा
है। यानी यह महज
बारिश से आई बाढ़
नहीं थी। यह पहाड़
की ऊंचाई से शुरू हुई
ऐसी श्रृंखलाबद्ध घटना थी, जिसमें
बर्फ, चट्टान, मलबा और पानी
ने मिलकर रास्ते में आने वाली
हर चीज को अपनी
चपेट में ले लिया।
और यही वह बिंदु
है जहां प्राकृतिक आपदा
का सवाल मानव निर्मित
जोखिम से जुड़ जाता
है।
कुदरत ने चेताया था, हमने सुना नहीं
हिमालय स्थिर पहाड़ नहीं है। वह
जीवित भूगर्भीय तंत्र है—लगातार बदलता
हुआ, खिसकता हुआ और मौसम
के साथ प्रतिक्रिया करता
हुआ। जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी
क्षेत्र में ग्लेशियरों और
बर्फ की संरचना में
बदलाव हो रहा है।
दूसरी तरफ इंसान ने
पहाड़ों पर सड़कें, सुरंगें,
जलविद्युत परियोजनाएं, होटल और बस्तियां
खड़ी करने की होड़
लगा दी है। विकास
जरूरी है। लेकिन सवाल
है—क्या हर कीमत
पर विकास जरूरी है? क्या नदी
के प्राकृतिक रास्ते पर कब्जा करके
बनाया गया निर्माण विकास
है? क्या पहाड़ की
संवेदनशील ढलान को काटकर
सड़क बनाना उपलब्धि है? क्या भूस्खलन
की आशंका वाले क्षेत्र में
भारी निर्माण को मंजूरी देना
आधुनिकता है? और क्या
ग्लेशियल झीलों की निगरानी, शुरुआती
चेतावनी और स्थानीय आपदा
तैयारी को नजरअंदाज करके
हम अगली त्रासदी का
इंतजार कर रहे हैं?
नेपाल की यह त्रासदी
इन सवालों को और तीखा
कर रही है।
तबाही के बाद भी मौत मंडरा रही
सबसे डरावनी बात
यह है कि पहली
आपदा के बाद खतरा
खत्म नहीं हुआ है।
भूस्खलन और मलबे से
बनी एक झील में
पानी बढ़ने के बाद उसके
उफनने का खतरा पैदा
हो गया। इसके चलते
कुछ समय के लिए
बचाव अभियान तक रोकना पड़ा।
यानी जिस इलाके में
सेना और बचावकर्मी मलबे
में जिंदगी तलाश रहे थे,
उसी इलाके पर दूसरी बाढ़
का खतरा मंडराने लगा।
यह हिमालय की वह चेतावनी
है जिसे सिर्फ नेपाल
नहीं, भारत समेत पूरे
हिमालयी क्षेत्र को सुनना होगा।
भारत के लिए भी खतरे की घंटी
नेपाल की त्रासदी काठमांडू
की सीमा में बंद
नहीं है। हिमालय की
पर्वत श्रृंखला किसी राजनीतिक सीमा
को नहीं मानती। उत्तराखंड
से हिमाचल और जम्मू-कश्मीर
से पूर्वोत्तर तक हिमालयी क्षेत्र
में बदलता मौसम, ग्लेशियरों की अस्थिरता, अचानक
बाढ़, भूस्खलन और अनियोजित निर्माण
पहले ही चिंता बढ़ा
रहे हैं। ऐसे में
नेपाल का हादसा भारत
के लिए भी एक
आईना है। हमने केदारनाथ
की तबाही देखी। हमने पहाड़ों को
दरकते देखा। हमने नदियों को
उफनते और शहरों को
डूबते देखा। हर बार कुछ
दिन तक बहस हुई,
जांच समितियां बनीं, रिपोर्टें आईं और फिर
विकास की मशीनरी उसी
रफ्तार से आगे बढ़
गई। क्या इस बार
भी यही होगा?
सरकारें राहत देंगी, लेकिन क्या विकास का चरित्र बदलेगा?
आपदा के बाद
सरकार का पहला धर्म
है—हर जिंदगी बचाना।
राहत पहुंचाना, लापता लोगों को खोजना और
विस्थापित परिवारों को सहारा देना।
लेकिन असली जिम्मेदारी उसके
बाद शुरू होती है।
पुनर्निर्माण करते समय क्या
उसी जगह फिर वही
गलती दोहराई जाएगी? क्या नदी के
किनारे फिर निर्माण होगा?
क्या पहाड़ की ढलान फिर
काटी जाएगी? क्या पर्यावरणीय स्वीकृतियां
केवल कागज की औपचारिकता
बनी रहेंगी? और क्या परियोजनाओं
की सफलता का पैमाना केवल
यह होगा कि सड़क
कितनी जल्दी बनी, सुरंग कितनी
लंबी बनी या बिजली
कितनी पैदा हुई? या
फिर यह भी पूछा
जाएगा कि उस विकास
ने पहाड़ की कितनी सांस
बचाई?
प्रकृति बदला नहीं लेती, अपना संतुलन मांगती है
प्रकृति को अक्सर हम
‘कहर’ कह देते हैं।
लेकिन प्रकृति किसी से बदला
नहीं लेती। वह अपने नियमों
से चलती है। जब
हिमालय की बर्फ बदलती
है, तो नदियों का
स्वभाव बदलता है। जब पहाड़ की ढलान काटी
जाती है, तो उसकी
स्थिरता बदलती है। जब जंगल घटते हैं,
तो मिट्टी की पकड़ कमजोर
होती है। और जब
नदी के रास्ते में
इंसान अपनी दुनिया बसा
लेता है, तो एक
दिन वही नदी अपना
रास्ता वापस मांगती है।
नेपाल में जो हुआ,
वह केवल एक देश
की त्रासदी नहीं है। यह
हिमालय की ओर से
आया वह संदेश है
जिसे पढ़ना अब विकल्प नहीं,
मजबूरी है। क्योंकि सवाल यह नहीं
कि अगली आपदा कब
आएगी… सवाल यह है
कि जब आएगी, तब
क्या हम फिर उसे
‘कुदरत का कहर’ कहकर
अपनी जिम्मेदारी से बच निकलेंगे?
हिमालय को जीतने की
कोशिश छोड़नी होगी। उसके साथ जीना सीखना
होगा। वरना विकास की ऊंची इमारतों
के नीचे कहीं इंसान
का अपना भविष्य ही
दबा मिलेगा।
हिमालय आखिर कब तक सहता रहेगा?
हिमालय सिर्फ बर्फ से ढके
पहाड़ों का नाम नहीं
है। वह करोड़ों लोगों
की जलधारा, मौसम, जैव विविधता और
जीवन का आधार है।
मगर पिछले कुछ दशकों में
विकास की जिस परिभाषा
को हमने अपनाया, उसमें
पहाड़ों को काटकर सड़क
बनाना, जंगलों को हटाकर निर्माण
करना, नदियों के किनारे बस्तियां
और परियोजनाएं खड़ी करना तथा
पहाड़ों की प्राकृतिक ढलानों
से छेड़छाड़ करना विकास की
कीमत मान लिया गया।
नेपाल की इस आपदा
में तत्काल ट्रिगर ग्लेशियल और भूगर्भीय घटना
थी; इसे सीधे किसी
एक मानवीय गतिविधि का परिणाम कहना
वैज्ञानिक रूप से उचित
नहीं होगा। लेकिन विशेषज्ञ लगातार चेतावनी दे रहे हैं
कि जलवायु परिवर्तन हिमालयी ग्लेशियरों और पर्वतीय आपदाओं
के जोखिम को बढ़ा रहा
है। हिन्दूकुश-हिमालय क्षेत्र में बाढ़, भूस्खलन
और हिमस्खलन जैसी घटनाओं की
तीव्रता और आवृत्ति बढ़ने
की चिंता पहले ही सामने
आ चुकी है। यानी
सवाल यह नहीं कि
प्रकृति ने हमला क्यों
किया। सवाल यह है
कि हमने प्रकृति के
बदलते मिजाज के बावजूद अपने
विकास का तरीका क्यों
नहीं बदला?
विकास की रफ्तार और पहाड़ों की सहनशक्ति
हर नई सड़क
को विकास की उपलब्धि, हर
सुरंग को आधुनिकता का
प्रतीक और हर बड़ी
परियोजना को आर्थिक तरक्की
का प्रमाण मान लेना आसान
है। लेकिन पहाड़ों का भूगोल मैदानों
जैसा नहीं होता। वहां
एक गलत कटाव, एक
कमजोर ढलान, एक अवैज्ञानिक निर्माण
या नदी के प्राकृतिक
रास्ते में किया गया
हस्तक्षेप भविष्य की आपदा को
न्योता दे सकता है।
नेपाल की मौजूदा त्रासदी
में एक और भयावह
पहलू सामने आया है। आपदा
के बाद भूस्खलन से
बना एक जलाशय उफनने
लगा, जिसके कारण राहत-बचाव
कार्य तक रोकना पड़ा
और निचले इलाकों में फिर से
बाढ़ की आशंका पैदा
हुई। यानी एक आपदा
अपने भीतर दूसरी आपदा
को जन्म देने की
क्षमता रखती है। यह
हिमालय की चेतावनी है—पहाड़ को सिर्फ संसाधन
समझने की भूल मत
करो।
सवाल सिर्फ नेपाल सरकार से नहीं
आपदा आने के
बाद सरकारें हेलीकॉप्टर भेजेंगी, राहत पैकेट बांटेंगी,
मुआवजे की घोषणा करेंगी
और पुनर्निर्माण की योजनाएं बनाएंगी।
यह जरूरी भी है। लेकिन
असली परीक्षा आपदा के बाद
नहीं, आपदा से पहले
होती है। क्या संवेदनशील
पर्वतीय क्षेत्रों में निर्माण की
अनुमति देने से पहले
भूगर्भीय जोखिम का ईमानदार आकलन
होता है? क्या नदी
के प्राकृतिक बहाव क्षेत्र को
सुरक्षित रखा जाता है?
क्या ग्लेशियल झीलों और हिमनदों की
लगातार निगरानी के लिए पर्याप्त
आधुनिक तंत्र मौजूद है? क्या स्थानीय
लोगों को समय रहते
चेतावनी मिलती है? और सबसे
बड़ा सवाल—क्या पर्यावरणीय
नियमों को विकास की
राह में बाधा समझने
की मानसिकता बदलेगी? इन सवालों का
जवाब नेपाल तक सीमित नहीं
है।
कुदरत बदला नहीं लेती, आईना दिखाती है
प्रकृति किसी से बदला
नहीं लेती। वह सिर्फ अपने
संतुलन के बिगड़ने का
परिणाम सामने रखती है। हिमालय
में जमा बर्फ पिघलती
है, पहाड़ टूटते हैं, नदियां अपना
रास्ता तलाशती हैं और पानी
उस रास्ते पर दौड़ता है
जिसे इंसान ने चाहे जितनी
बार रोकने की कोशिश की
हो। नेपाल की तबाही इसलिए
सिर्फ मृतकों और लापता लोगों
की संख्या नहीं है। यह
उस विकास मॉडल का आईना
है जिसमें हमने यह मान
लिया कि प्रकृति को
नियंत्रित किया जा सकता
है। शायद अब समय
आ गया है कि
विकास की परिभाषा में
एक शब्द और जोड़ा
जाए—संयम। सड़कें बनें, लेकिन पहाड़ काटकर नहीं; सुरंगें बनें, लेकिन भूगर्भ को समझे बिना
नहीं; जलविद्युत परियोजनाएं आएं, लेकिन नदी
की सांस रोककर नहीं;
पर्यटन बढ़े, लेकिन पहाड़ों की वहन क्षमता
कुचलकर नहीं। क्योंकि अगर इंसान ने
प्रकृति को सिर्फ जमीन,
पानी और जंगल की
कीमत में मापना जारी
रखा, तो आने वाली
पीढ़ियां हमसे पूछेंगी— जब
हिमालय चेतावनी दे रहा था,
तब तुम विकास के
किस नशे में सो
रहे थे?

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