Saturday, 29 August 2026

भजन मेरे लिए सिर्फ संगीत नहीं, महादेव से संवाद का माध्यम है : शेखर

भजन मेरे लिए सिर्फ संगीत नहीं, महादेव से संवाद का माध्यम है : शेखर 

पहाड़ों की खामोश वादियों से निकली एक आवाज जब काशी की गलियों मेंहर हर महादेवके साथ गूंजती है तो वह महज संगीत नहीं रहती, आस्था की अनुभूति बन जाती है। उत्तराखंड के शेखर जायसवाल की गायकी में शिव के प्रति समर्पण भी है और बदलते दौर के संगीत की धड़कन भी।मुझको नंदी बना लेजैसे भजनों से अपनी अलग पहचान बनाने वाले शेखर के लिए भजन मंच पर गाया जाने वाला गीत भर नहीं, बल्कि अपने आराध्य से संवाद का माध्यम है। देवभूमि की लोक-संवेदना से लेकर डिजिटल दौर के युवा श्रोताओं तक पहुंची उनकी आवाज यह सवाल भी छोड़ती है कि आखिर आज की पीढ़ी, जो तेज रफ्तार जिंदगी में सांस ले रही है, वह भक्ति के सुरों में सुकून क्यों तलाश रही है? काशी में हुई मुलाकात में शेखर ने अपनी संगीत यात्रा, महादेव से जुड़ाव, युवाओं की बदलती पसंद और भविष्य के सपनों पर खुलकर बात की

सुरेश गांधी

देवभूमि उत्तराखंड की मिट्टी में भक्ति सहज रूप से सांस लेती है। पहाड़ों की इसी आध्यात्मिक फिजा से निकले शेखर जायसवाल ने शिव भक्ति को अपनी गायकी का केंद्र बनाया और अपने अलग अंदाज से भजन-संगीत में पहचान बनाई।मुझको नंदी बना ले’, ‘शिव कैलाशों के वासी’, ‘मैं भोला पर्वत काऔरभोले के दरजैसे भजनों के जरिए उनकी आवाज शिवभक्तों तक पहुंची है। काशी में सीनियर रिपोर्टर सुरेश गांधी से हुई आत्मीय मुलाकात में गायकी, महादेव और भक्ति को लेकर उनसे हुई बातचीत में उन्होंने कहा भजन मेरे लिए सिर्फ संगीत नहीं, महादेव से संवाद का माध्यम है. प्रस्तुत है उनसे हुई बातचीत के कुछ प्रमुख अंश : -

सवाल : उत्तराखंड की धरती से भजन गायकी तक का सफर कैसे शुरू हुआ?

शेखर जायसवाल : मेरे लिए यह सफर अचानक शुरू नहीं हुआ। बचपन से ही वातावरण में भक्ति रही। उत्तराखंड की संस्कृति में देवत्व जीवन का हिस्सा है। मंदिर, जागर, लोकधुनें और भगवान के प्रति आस्थाइन सबने भीतर कहीं संगीत का बीज बो दिया। धीरे-धीरे समझ आया कि मेरी भावनाओं को व्यक्त करने का सबसे अच्छा माध्यम संगीत है। फिर भजन मेरी साधना और पहचान दोनों बनते चले गए।

सवाल : आपकी गायकी में भगवान शिव का प्रभाव इतना अधिक क्यों दिखाई देता है?

शेखर जायसवाल : शिव मेरे लिए सिर्फ आराध्य नहीं हैं, वह जीवन को समझने का एक तरीका भी हैं। शिव जितने विराट हैं, उतने ही सरल भी। उन्हें पाने के लिए बड़े-बड़े आडंबर की जरूरत नहीं। एक लोटा जल और सच्चे मन की भावना ही काफी है। शायद यही सहजता मुझे शिव के और करीब खींचती है।

सवाल : ‘मुझको नंदी बना लेजैसा भाव आपके मन में कैसे आया?

शेखर जायसवाल : भक्त की सबसे बड़ी इच्छा अपने भगवान के करीब रहने की होती है। नंदी भगवान शिव के सबसे निकट हैं। मैंने इसी भावना को शब्द और स्वर देने की कोशिश की। इसमें मेरी अपनी कोई बड़ी कल्पना नहीं, बल्कि एक भक्त की छोटी-सी इच्छा है कि महादेव के चरणों के पास हमेशा जगह मिलती रहे।

सवाल : भजन और सामान्य गीत में आप क्या अंतर महसूस करते हैं?

शेखर जायसवाल : गीत सुनने के बाद मन प्रसन्न हो सकता है, लेकिन भजन मन को भीतर तक छूता है। भजन गाते समय गायक अकेला नहीं होता, उसके साथ उसकी आस्था भी गाती है। जब शब्दों में भावना और सुरों में समर्पण जाता है तो भजन केवल प्रस्तुति नहीं रहता, वह साधना बन जाता है।

सवाल : आज भजन भी सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए लोगों तक पहुंच रहा है। इसे आप किस तरह देखते हैं?

शेखर जायसवाल : यह बहुत बड़ा बदलाव है। पहले किसी भजन को लोगों तक पहुंचाने के लिए मंच और कार्यक्रम जरूरी होते थे। आज मोबाइल के जरिए एक भजन दुनिया के किसी भी कोने तक पहुंच सकता है। यह कलाकारों के लिए बहुत बड़ा अवसर है। लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी है कि लोकप्रियता की दौड़ में भक्ति की आत्मा कहीं पीछे छूट जाए।

सवाल : आपकी नजर में भजन गायक की सबसे बड़ी जिम्मेदारी क्या है?

शेखर जायसवाल : मेरी नजर में सबसे बड़ी जिम्मेदारी भावनाओं की पवित्रता बनाए रखना है। भजन सुनने वाला व्यक्ति सिर्फ संगीत नहीं सुनता, वह उसमें भगवान को महसूस करने की कोशिश करता है। इसलिए शब्दों, संगीत और प्रस्तुतितीनों में मर्यादा और श्रद्धा जरूरी है।

सवाल : उत्तराखंड के बाद काशी से आपका रिश्ता किस तरह बनता है?

शेखर जायसवाल : उत्तराखंड देवभूमि है और काशी स्वयं महादेव की नगरी। मेरे लिए काशी आना किसी सामान्य शहर में आना नहीं है। यहां आते ही मन का भाव बदल जाता है। गंगा, बाबा विश्वनाथ, मंदिरों की घंटियां और गलियों में बसी शिवभक्तियह सब अपने आप भीतर एक अलग ऊर्जा पैदा करता है।

सवाल : काशी में प्रस्तुति देना आपके लिए कितना विशेष है?

शेखर जायसवाल : काशी में शिव का नाम गाना अपने आप में सौभाग्य है। यहां श्रोता सिर्फ संगीत नहीं सुनते, वे भाव को समझते हैं। बाबा की नगरी मेंभोलेका भजन गाते समय कलाकार के भीतर भी एक अलग तरह की अनुभूति होती है। ऐसा लगता है जैसे सामने श्रोता नहीं, स्वयं महादेव बैठे हों।

सवाल : आपकी गायकी में पहाड़ की लोक-संवेदना कितनी मौजूद है?

शेखर जायसवाल : बहुत गहराई से। पहाड़ ने मुझे सादगी दी है। वहां प्रकृति और अध्यात्म अलग-अलग चीजें नहीं हैं। मंदिर की घंटी, नदी की आवाज, पहाड़ी लोकधुनेंइन सबका असर मन पर रहता है। मैं कोशिश करता हूं कि आधुनिक संगीत के साथ अपनी उस मिट्टी की खुशबू भी बची रहे।

सवाल : भजन गायकी का ख्याल आपके मन में कब और कैसे आया?

शेखर जायसवाल : मेरे लिए भक्ति कोई अलग विषय नहीं रही। जिस माहौल में पला-बढ़ा, वहां देवी-देवताओं और लोक आस्था का जीवन से गहरा रिश्ता रहा। धीरे-धीरे संगीत के प्रति रुचि बढ़ी और लगा कि अपनी भावनाओं को सबसे बेहतर तरीके से भजन के माध्यम से व्यक्त कर सकता हूं। खासकर महादेव की ओर मन लगातार खिंचता चला गया। फिर यही रास्ता मेरी पहचान बन गया।

सवाल : आने वाले समय में शेखर जायसवाल को किस रूप में देखना चाहेंगे?

शेखर जायसवाल : मेरी कोशिश यही है कि भक्ति संगीत के माध्यम से ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचूं। अगर मेरी आवाज सुनकर किसी व्यक्ति को कुछ पल के लिए भी शांति मिले, उसके मन में महादेव के प्रति श्रद्धा जागे या वह अपने जीवन की परेशानियों के बीच सकारात्मक महसूस करे, तो मेरे लिए उससे बड़ी उपलब्धि कोई नहीं।

सवाल : आपकी अधिकांश रचनाओं के केंद्र में महादेव क्यों हैं?

शेखर जायसवाल : शिव की सबसे बड़ी खूबी मुझे उनकी सहजता लगती है। वे देवों के देव हैं, लेकिन भक्त के लिए भोले हैं। उनके दरबार में कोई भेद नहीं। शायद इसी सरलता ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया। इसलिए जब लिखने या गाने बैठता हूं तो मन बार-बार भोलेनाथ की तरफ चला जाता है।

सवाल : आज का युवा भजन और आध्यात्मिक संगीत में इतनी रुचि क्यों ले रहा है?

शेखर जायसवाल : आज का युवा बहुत तेजी से बदलती दुनिया के बीच जी रहा है। उसके पास सुविधाएं बहुत हैं, लेकिन मन की शांति की तलाश भी उतनी ही बड़ी है। भक्ति संगीत उसे कुछ क्षण अपने भीतर लौटने का अवसर देता है। यही कारण है कि युवा अब भजन को पुराने दौर की चीज नहीं मानता, बल्कि नए संगीत और नए अंदाज में उसे अपना रहा है।

सवाल : क्या सोशल मीडिया ने भजन को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई?

शेखर जायसवाल : बिल्कुल। पहले भजन सुनने के लिए किसी कार्यक्रम या कैसेट का इंतजार करना पड़ता था। अब मोबाइल पर एक क्लिक में दुनिया के किसी भी कोने में भजन पहुंच सकता है। यह कलाकार के लिए बहुत बड़ा माध्यम है, लेकिन साथ ही जिम्मेदारी भी है कि लोकप्रियता के लिए भक्ति की भावना से समझौता हो।        

सवाल : मंच पर हजारों लोगों के सामनेहर हर महादेवगूंजते सुनना कैसा लगता है?

शेखर जायसवाल : जब सामने बैठे लोग आपके साथ भजन गाने लगते हैं तो लगता है कि यह सिर्फ मेरी प्रस्तुति नहीं रही। उस समय गायक और श्रोता के बीच की दूरी खत्म हो जाती है और पूरा माहौल भक्ति में बदल जाता है।

सवाल : शेखर जायसवाल का अगला सपना क्या है?

शेखर जायसवाल : सपना सिर्फ बड़ा कलाकार बनने का नहीं है। चाहता हूं कि मेरे भजन देश के हर उस व्यक्ति तक पहुंचें, जो कठिन समय में भगवान का नाम लेकर अपने मन को संभालता है। आने वाले समय में शिव भक्ति के साथ दूसरे देवी-देवताओं और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा पर भी काम करना चाहता हूं। साथ ही संगीत को नए युवाओं तक नए अंदाज में पहुंचाना मेरी प्राथमिकता है।

सवाल : उत्तराखंड से आने वाले कलाकार के लिए काशी कितनी खास है?

शेखर जायसवाल : उत्तराखंड देवभूमि है और काशी महादेव की नगरी। एक शिवभक्त के लिए इन दोनों जगहों का अपना अलग महत्व है। काशी में आकर बाबा विश्वनाथ की नगरी में भजन गाना मेरे लिए केवल कार्यक्रम नहीं, सौभाग्य है। यहांभोलेका नाम लेते हुए लगता है जैसे आवाज सीधे अपने आराध्य तक पहुंच रही हो।

सवाल : अंत में शिवभक्तों के लिए आपका संदेश?

शेखर जायसवाल : महादेव से मांगने से पहले उन्हें महसूस कीजिए। शिव बहुत सरल हैं। मन साफ रखिए, किसी का बुरा मत कीजिए और अपने कर्म ईमानदारी से करते रहिए। भोलेनाथ को पाने के लिए कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं, सच्ची श्रद्धा हो तो शिव अपने आप मन में उतर आते हैं।

शेखर के सुरों में शिवभक्ति के प्रमुख पड़ाव

प्रमुख भजन : मुझको नंदी बना ले... , मेरा हाथ थाम भोले…, शिव कैलाशों के वासी…, क्या मांगू मैं भोले तुमसे…, मैं भोला पर्वत का…, भोले के दर…, दम दम डमरू बाजे…, लागन तुमसे लगा बैठे…, मेरा भोला माने…, भोले बाबा के संग…, नौकरी पे रख ले बाबा…, मेरे बाबा भोले भंडारी…, शिव पार्वती जैसी हो अपनी भी जोड़ी…, भोले का सावन…, मेरे साथ बाबा खड़ा है…, इनमेंमुझको नंदी बना लेउनकी प्रमुख पहचान वाले भजनों में से एक है।

सोशल मीडिया ने बदली भजन की दुनिया

आज भजन केवल मंदिरों और धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं है। डिजिटल प्लेटफॉर्म ने इसे युवाओं के मोबाइल तक पहुंचा दिया है। शेखर जायसवाल का डिजिटल सफर भी इसकी मिसाल है। उनके Shekhar Jaiswal TV चैनल पर एक करोड़ से अधिक नहीं, बल्कि उपलब्ध हालिया आंकड़े के अनुसार करीब 1.05 मिलियन सब्सक्राइबर और 228 मिलियन से अधिक कुल वीडियो व्यूज दर्ज हैं।  

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