Monday, 31 August 2026

कृष्ण जन्माष्टमी : निशीथ में गूंजेगा ‘नंद के घर आनंद भय’

कृष्ण जन्माष्टमी : निशीथ में गूंजेगानंद के घर आनंद भय’ 

जिस रात समय ठहर-सा जाता है और आधी रात के सन्नाटे में शंखनाद गूंजता है, उस रात भारतीय आस्था अपने सबसे प्रिय बाल रूप को पुकारती है। भाद्रपद की कृष्ण अष्टमी फिर वही प्रतीक्षा लेकर रही हैउस क्षण की प्रतीक्षा, जब देवकी की कोख से जन्मे कृष्ण केवल मथुरा की कारागार का अंधेरा नहीं मिटाते, बल्कि युगों के अंधकार में उम्मीद का दीप जला देते हैं। इस बार चार सितंबर की रात जन्माष्टमी का उल्लास चरम पर होगा। अष्टमी तिथि, निशीथ काल और रोहिणी नक्षत्र से जुड़ी पंचांग गणनाएं पर्व की धार्मिक आभा को और गहरा करेंगी। मंदिरों में झूलेंगे लड्डू गोपाल, घरों में सजेंगे पालने और आधी रात को जन्म के साथ हीनंद के घर आनंद भयोसे वातावरण गूंज उठेगा। कृष्ण का जन्मोत्सव हर वर्ष आता है, लेकिन हर बार उसका अर्थ नया हो जाता है। कहीं वह बाल गोपाल की मुस्कान है, कहीं मां यशोदा का वात्सल्य, कहीं राधा का प्रेम और कहीं कुरुक्षेत्र में दिया गया वह संदेश, जिसने कर्म को जीवन का धर्म बना दिया। इस जन्माष्टमी आधी रात केवल कान्हा का जन्म नहीं होगाआस्था, प्रेम और उम्मीद भी फिर जन्म लेगी

सुरेश गांधी 

भाद्रपद की कृष्ण पक्ष की अष्टमी जब रात के सन्नाटे को चीरकर आती है तो वह केवल कैलेंडर की एक तिथि नहीं रहती, बल्कि करोड़ों हृदयों में कृष्ण के अवतरण का उत्सव बन जाती है। इस बार भी कान्हा के जन्म की प्रतीक्षा में मंदिरों से लेकर घरों तक आस्था का दीप जलेगा और आधी रात को घंटे-घड़ियालों की ध्वनि के बीच बाल गोपाल के जन्म का उल्लास छाएगा। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी शुक्रवार, 4 सितंबर को मनाई जाएगी। यह पर्व भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर पड़ रहा है। पंचांग गणना के अनुसार अष्टमी तिथि 4 सितंबर को लगभग 2:25 बजे शुरू होकर 5 सितंबर की रात 12:14 बजे तक रहेगी। भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का स्मरण जिस निशीथ काल में किया जाता है, वही इस पर्व का सबसे महत्वपूर्ण समय होगा। निशीथ पूजा का समय लगभग रात 12:02 बजे से 12:49 बजे तक रहेगा। इस दौरान लड्डू गोपाल का पंचामृत अभिषेक, श्रृंगार, जन्म आरती और प्रसाद अर्पण किया जाएगा।  मध्यरात्रि में जैसे ही घड़ी जन्म के क्षण की ओर बढ़ेगी, मंदिरों में शंखनाद होगा। कहीं पालना झूलेगा, कहीं नंद के घर आनंद के गीत गूंजेंगे और कहीं भक्त अपने आराध्य को माखन-मिश्री का भोग लगाकर जन्मोत्सव मनाएंगे। जन्माष्टमी पर बाजार से पांच चीजें खरीदना जरूरी नहीं; कृष्ण के पांच संदेश घर लाना जरूरी हैप्रकृति से प्रेम, मन की सरलता, भक्ति, करुणा और कर्म। क्योंकि कान्हा के मुकुट का मोरपंख तभी सुंदर है, जब मन में प्रकृति के लिए जगह हो; बांसुरी तभी सार्थक है, जब भीतर अहंकार कुछ कम हो; तुलसी तभी पवित्र है, जब उसके प्रति सेवा का भाव हो; गाय-बछड़ा तभी कृष्ण की याद दिलाएगा, जब मन में जीवों के प्रति करुणा हो और लड्डू गोपाल तभी घर के भगवान बनेंगे, जब उनके प्रति प्रेम में निरंतरता होगी। आधी रात को जन्म लेने वाले कृष्ण इसलिए आज भी जीवित हैंमंदिरों की मूर्तियों में नहीं, बल्कि उस उम्मीद में जो हर अंधेरे समय में मनुष्य को कहती हैअभी सब समाप्त नहीं हुआ है।

अष्टमी की गोद में रोहिणी का आकाश

कृष्ण जन्म की कथा में तिथि जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्व रोहिणी नक्षत्र का भी है। धार्मिक मान्यता है कि देवकी-वसुदेव के पुत्र के रूप में श्रीकृष्ण का प्राकट्य भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की अर्धरात्रि में रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। रोहिणी नक्षत्र का संयोग जन्माष्टमी के आसपास बन रहा है, जिसके कारण पर्व की धार्मिक महत्ता और बढ़ जाती है। उपलब्ध पंचांग गणनाओं में रोहिणी के समय को लेकर स्थानानुसार कुछ अंतर है, इसलिए स्थानीय पंचांग को अंतिम मानना उचित होगा। यह संयोग मानो उस दिव्य क्षण की स्मृति को फिर से जीवित करता है, जब मथुरा की कारागार में अंधकार के बीच प्रकाश का जन्म हुआ था। कंस का आतंक था, सत्ता का अहंकार था, लेकिन उसी अंधकार में धर्म की नई सुबह ने जन्म लिया। रोहिणी नक्षत्र 4 सितंबर को रात 11:04 बजे तक रहेगा। मथुरा-वृंदावन क्षेत्र में निशीथ पूजा का समय लगभग रात 11:56 बजे से 12:41 बजे तक रहेगा। स्थान के अनुसार मुहूर्त में कुछ मिनट का अंतर स्वाभाविक है।

व्रत से जन्मोत्सव तक, भक्ति का अपना विधान

जन्माष्टमी पर श्रद्धालु प्रातः स्नान के बाद व्रत का संकल्प लेते हैं। दिनभर कृष्ण नाम, कथा, भजन और कीर्तन का क्रम चलता है। घरों में बाल गोपाल के लिए पालना सजाया जाता है। रात में निशीथ काल में भगवान का अभिषेक कर उन्हें नवीन वस्त्र और आभूषण धारण कराए जाते हैं। पंचामृत स्नान के बाद माखन-मिश्री, धनिया पंजीरी, फल और अन्य नैवेद्य अर्पित करने की परंपरा है। जन्म के बाद आरती और जयघोष के साथ प्रसाद वितरित किया जाता है। पारण के समय को लेकर भी परंपरागत मत अलग हो सकते हैं। कुछ पंचांग अष्टमी तिथि समाप्त होने के बाद पारण बताते हैं, जबकि कुछ परंपराओं में सूर्योदय के बाद निर्धारित नियम से व्रत खोला जाता है। इसलिए व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं के लिए अपने क्षेत्र के मान्य पंचांग अथवा मंदिर की परंपरा का अनुसरण करना बेहतर रहेगा। 

कृष्ण केवल जन्म नहीं लेते, उम्मीद भी जन्म लेती है

कृष्ण की कथा का सबसे बड़ा संदेश यही है कि जब अन्याय अपनी सीमा पार कर लेता है, तब परिवर्तन की शुरुआत होती है। मथुरा की जेल में जन्मे कृष्ण महलों में नहीं पले; यशोदा के आंगन में उनकी बाल लीलाएं खिलीं और गोकुल की गलियों में उनकी बांसुरी ने प्रेम का अर्थ समझाया। इसीलिए जन्माष्टमी केवल भगवान के जन्म की तिथि नहीं, बल्कि अंधकार पर प्रकाश, अहंकार पर विनम्रता और अन्याय पर धर्म की विजय का सांस्कृतिक उत्सव है। इस बार भी जब मध्यरात्रि में मंदिरों के कपाट खुलेंगे और बालकृष्ण का जन्म कराया जाएगा, तब हजारों वर्षों पुरानी वही अनुभूति फिर लौटेगीकारागार का अंधकार टूटेगा, बांसुरी की धुन जन्म लेगी और हर आंगन से एक ही स्वर उठेगा—‘जय कन्हैयालाल की।

पंचांग एक नजर में

विवरण                                                  समय/स्थिति

जन्माष्टमी                                               शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

मास                                                        भाद्रपद

पक्ष                                                         कृष्ण पक्ष

तिथि                                                       अष्टमी

अष्टमी प्रारंभ                                         4 सितंबर, लगभग 2:25 बजे

अष्टमी समाप्त                                      5 सितंबर, लगभग 12:14 बजे रात

निशीथ पूजा                                          लगभग 12:02 से 12:49 बजे

मुख्य नक्षत्र                                            रोहिणी

जन्मोत्सव                                               निशीथ काल में

विशेष                                                     स्थान/पंचांग के अनुसार समय में कुछ मिनट का अंतर संभव

उपरोक्त समय भारत के उपलब्ध पंचांग स्रोतों के अनुसार हैं; स्थानीय शहर के पंचांग में कुछ अंतर संभव है।

ललही छठहल की पूजा, संतान की मंगलकामना

कृष्ण जन्माष्टमी से ठीक पहले बुधवार, 2 सितंबर 2026 को ललही छठ (हल षष्ठी/हरछठ) मनाई जाएगी। यह भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला महत्वपूर्ण व्रत है और इसे भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलरामजी से जोड़ा जाता है। बलराम का प्रमुख आयुध हल होने के कारण यह पर्व कृषि, धरती और मातृत्व से भी गहरे जुड़ा है। इस दिन माताएं संतान की दीर्घायु, आरोग्य और सुख-समृद्धि की कामना से व्रत रखती हैं। परंपरा में हल से जुड़ी कृषि-स्मृतियों तथा सात्विक आहार का विशेष महत्व है। गांवों और कस्बों में आज भी हरछठ की पूजा लोकपरंपरा, मातृ-आस्था और कृषि संस्कृति का अद्भुत संगम दिखाई देती है।

जन्माष्टमी से पहले घर ले आएं कान्हा के ये पांच प्रिय प्रतीक, बदल जाएगा घर का माहौल

भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की रात जब घड़ी की सुइयां आधी रात की ओर बढ़ेंगी, तब देश के करोड़ों घरों में एक साथ एक ही प्रतीक्षा होगीकब जन्मेंगे नंदलाल। कहीं मंदिरों में शंख बजेंगे, कहीं कान्हा का पालना सजेगा, कहीं माखन-मिश्री का भोग लगेगा और कहीं मां अपने लड्डू गोपाल को नन्हे शिशु की तरह गोद में उठाकर जन्मोत्सव मनाएगी। लेकिन कृष्ण की भक्ति केवल पूजा के उस एक क्षण तक सीमित नहीं है। उनकी स्मृति से जुड़े कुछ प्रतीक भारतीय घरों और लोकजीवन में सदियों से आस्था का हिस्सा रहे हैं। इस जन्माष्टमी से पहले घर को कृष्णमय बनाने की तैयारी है तो मोरपंख, बांसुरी, तुलसी, गाय-बछड़े की प्रतिमा और लड्डू गोपाल जैसे प्रतीकों को विशेष स्थान दिया जा सकता है। धार्मिक मान्यताओं में इनका अपना अलग महत्व बताया गया है। कोई इन्हें ग्रहों के प्रभाव से जोड़ता है तो कोई प्रेम, करुणा, समृद्धि और पारिवारिक सौहार्द का प्रतीक मानता है। खास बात यह है कि कृष्ण के ये प्रतीक केवल सजावट की वस्तुएं नहीं हैं; इनके पीछे एक पूरी सांस्कृतिक कथा और जीवन-दर्शन छिपा है।

कृष्ण का घर, केवल मंदिर नहींएक भावलोक

कृष्ण को घर में लाने का अर्थ केवल एक मूर्ति या प्रतीक को किसी स्थान पर रख देना नहीं है। कृष्ण भारतीय चेतना में ऐसे देवता हैं जो जीवन के लगभग हर रंग में दिखाई देते हैं। वह बालक हैं तो यशोदा के आंगन में हैं, मित्र हैं तो सुदामा के साथ हैं, प्रेम हैं तो राधा के साथ हैं, सारथी हैं तो अर्जुन के रथ पर हैं और योगेश्वर हैं तो कुरुक्षेत्र में कर्म का संदेश देते हैं। इसीलिए जन्माष्टमी की तैयारी में इस्तेमाल होने वाली वस्तुएं भी अपने भीतर कोई न कोई प्रतीक लेकर आती हैं। मोरपंख कृष्ण की शोभा और प्रकृति से उनके सहज संबंध की याद दिलाता है। बांसुरी अहंकार से खाली होकर ईश्वर की धुन बनने का संदेश देती है। तुलसी भक्ति और समर्पण की प्रतीक है। गाय-बछड़ा कृष्ण के गोपाल रूप और ग्रामीण संस्कृति की स्मृति जगाता है। वहीं लड्डू गोपाल घर में वात्सल्य और बाल रूप की उपासना का केंद्र बनते हैं। इन्हें खरीदना किसी अनिवार्य धार्मिक नियम की तरह नहीं, बल्कि आस्था और परंपरा के प्रतीकों के रूप में देखा जाना चाहिए।

क्या पांचों चीजें एक साथ लाना जरूरी है?

नहीं। धर्म में श्रद्धा की कीमत वस्तुओं की संख्या से नहीं होती। यदि किसी परिवार के पास केवल एक छोटा मोरपंख है, तो वही पर्याप्त है। यदि कोई केवल तुलसी का पौधा लगा सकता है, तो वही कृष्ण-स्मरण का सुंदर माध्यम बन सकता है। किसी के पास बांसुरी है, किसी के पास बाल गोपाल हैं, किसी के घर पहले से गाय-बछड़े की प्रतिमा हैहर घर की अपनी परंपरा है। कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए वस्तुओं का प्रदर्शन नहीं, भाव का होना महत्वपूर्ण माना गया है। इसलिए जन्माष्टमी की खरीदारी को धार्मिक भय का रूप न दें। यह सोचकर वस्तुएं न खरीदें कि इन्हें न लाने से कोई अनिष्ट हो जाएगा। इन्हें लाएं तो प्रेम से, अपनी श्रद्धा से और उस प्रतीक के अर्थ को समझते हुए।

जन्माष्टमी पर इन प्रतीकों को कैसे सजाएं?

घर के मंदिर या कृष्ण की वेदी को पहले स्वच्छ करें। एक साफ चौकी पर पीला या लाल वस्त्र बिछाया जा सकता है। बाल गोपाल को आसन दें। पास में मोरपंख रखा जा सकता है। बांसुरी को कृष्ण की प्रतिमा के बगल में रखा जा सकता है। तुलसीदल पूजा के लिए तैयार रखें। गाय-बछड़े की छोटी प्रतिमा को वेदी के निकट किसी स्वच्छ स्थान पर रखा जा सकता है। यदि लड्डू गोपाल घर में हैं तो उनके लिए नया वस्त्र, मुकुट, बांसुरी, मोरपंख, हार और अन्य श्रृंगार सामग्री तैयार की जा सकती है। फूलों से पालना सजाएं। माखन-मिश्री, पंजीरी, फल और परिवार की परंपरा के अनुसार अन्य भोग तैयार करें। रात में जन्म के समय शंखनाद, घंटी और आरती के साथ कान्हा का जन्मोत्सव मनाएं।

जन्माष्टमी का असली संदेशघर में कान्हा आएं तो व्यवहार भी बदले

कृष्ण के प्रतीकों को घर में सजाना सुंदर है, लेकिन कृष्ण को समझना उससे भी अधिक सुंदर है। मोरपंख हमें प्रकृति से प्रेम करना सिखाए। बांसुरी हमें अहंकार खाली करने का संदेश दे। तुलसी हमें सेवा और हरित जीवन की याद दिलाए। गाय-बछड़ा हमें करुणा और सह-अस्तित्व का अर्थ समझाए। और लड्डू गोपाल हमें यह याद दिलाएं कि ईश्वर से रिश्ता केवल भय का नहीं, प्रेम और वात्सल्य का भी हो सकता है। यदि जन्माष्टमी के बाद भी घर में प्रेम बढ़े, बच्चों के साथ संवाद बढ़े, बुजुर्गों के प्रति सम्मान बढ़े, प्रकृति के प्रति संवेदना बढ़े और मन में दूसरों के लिए करुणा जन्म लेतभी कृष्ण के आने का अर्थ पूरा होगा। कृष्ण ने कभी जीवन से भागने का संदेश नहीं दिया। उन्होंने युद्धभूमि में खड़े अर्जुन को कर्म का रास्ता दिखाया। उन्होंने प्रेम भी किया और नीति भी सिखाई। उन्होंने बांसुरी भी बजाई और सुदर्शन भी धारण किया। इसलिए जन्माष्टमी का उत्सव केवल सजावट और मिठाइयों तक सीमित नहीं होना चाहिए। कान्हा का घर में आना दरअसल उस जीवन-दर्शन का घर में आना है जिसमें प्रेम है, नीति है, करुणा है, कर्म है और सबसे बढ़करअंधकार के बीच प्रकाश की उम्मीद है।

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