सीएम योगी के सामने उठा ‘एक देश–एक पत्रकार पहचान पत्र’ का मुद्दा
आयुष्मान कार्ड पर एक हफ्ते का आश्वासन, ‘एक देश–एक पत्रकार पहचान पत्र’ पर सरकार गंभीर
मुख्यमंत्री योगी
आदित्यनाथ
से स्वास्थ्य सुरक्षा, सामाजिक
सुरक्षा,
कल्याण
कोष,
पत्रकार
सम्मान
के
मुद्दे
और
राष्ट्रीय
पहचान
पत्र
पर
विस्तृत
बातचीत;
सूचना
निदेशक
ने
कहा—प्रस्ताव
सही
दिशा
में
महत्वपूर्ण
पहल
एक सप्ताह
में
आयुष्मान
कार्ड
प्रक्रिया
शुरू
करने
का
आश्वासन
लखनऊ के लोकभवन
की वह दोपहर प्रशासनिक
कैलेंडर की एक साधारण
प्रविष्टि भर हो सकती
थी, लेकिन काशी से पहुँचे
पत्रकार प्रतिनिधिमंडल ने उसे लोकतंत्र
के एक जीवंत संवाद
में बदल दिया। सामने
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ थे;
दूसरी ओर सुरेश गांधी, जिनकी
कलम रोज़ समाज की
बेचैनी, सरकार की नीतियाँ, जनता
की पीड़ा और समय की
धड़कन दर्ज करती है।
इसी पीड़ा ने
ज्ञापन का पहला और
सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव जन्म दिया — काशी
के सभी पात्र पत्रकारों
को आयुष्मान भारत योजना के
अंतर्गत स्वास्थ्य सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए। प्रतिनिधियों
ने तथ्य रखे कि
अनेक पत्रकार गंभीर बीमारियों के उपचार में
आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहे
हैं। नियमित चिकित्सा जांच, आपातकालीन उपचार और परिवार की
सुरक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएँ
भी कई बार उनकी
पहुँच से बाहर रहती
हैं।
मुख्यमंत्री ने पूरे विषय
को ध्यानपूर्वक सुना। बातचीत के दौरान सुरेश
गांधी ने आग्रह किया कि स्वास्थ्य
सुरक्षा को दया नहीं,
अधिकार के रूप में
देखा जाए। उन्होंने कहा
कि लोकतंत्र की सूचना-व्यवस्था
को जीवित रखने वाले लोगों
के लिए राज्य को
एक संस्थागत स्वास्थ्य ढाँचा विकसित करना चाहिए। मुख्यमंत्री
ने संबंधित अधिकारियों को विषय पर
गंभीरता से कार्रवाई करने
का संकेत दिया।
मगर इस मुलाकात
का सबसे दूरगामी क्षण
तब आया, जब सुरेश
गांधी ने “एक देश–एक पत्रकार
पहचान पत्र” की अवधारणा मुख्यमंत्री
के सामने रखी। प्रश्न सरल
था, पर उसके भीतर
गहरी लोकतांत्रिक बेचैनी छिपी थी — यदि
पासपोर्ट, आधार और अन्य
अनेक पहचान प्रणालियाँ राष्ट्रीय स्तर पर एकरूप
हो सकती हैं, तो
पत्रकारों की पहचान राज्यों
की सीमाओं में क्यों बँटी
रहे? एक राज्य में
मान्यता प्राप्त पत्रकार दूसरे राज्य में वही सुविधा
क्यों नहीं पाता? चुनाव,
आपदा, संसद, न्यायपालिका या राष्ट्रीय घटनाओं
की रिपोर्टिंग के दौरान यह
विसंगति और स्पष्ट हो
जाती है।
सुरेश गांधी ने सुझाव दिया कि देशभर
के मान्यता प्राप्त पत्रकारों के लिए एक
समान, डिजिटल और सत्यापित पहचान
प्रणाली बनाई जाए, जिससे
स्वास्थ्य सुविधाओं, यात्रा, आपदा सहायता और
सरकारी संवाद तंत्र में समान अवसर
सुनिश्चित हो सकें। यह
प्रस्ताव प्रशासनिक सुधार से आगे बढ़कर
लोकतांत्रिक समानता का प्रस्ताव था।
मुख्यमंत्री के समक्ष इसे
राष्ट्रीय विमर्श के रूप में
प्रस्तुत किया गया।
ज्ञापन में पत्रकार कल्याण
कोष की प्रभावी क्रियान्विति,
वरिष्ठ पत्रकारों के लिए विशेष
चिकित्सा सुविधा, आकस्मिक सहायता कोष, पत्रकार परिवारों
की सामाजिक सुरक्षा, जिला स्तर पर
हेल्प डेस्क तथा आपातकालीन सहायता
तंत्र जैसी मांगें भी
शामिल थीं। प्रतिनिधियों ने
यह भी कहा कि
पत्रकारों के लिए एक
स्थायी हेल्थ सपोर्ट सिस्टम बनाया जाए, ताकि दुर्घटना
या गंभीर बीमारी की स्थिति में
तत्काल सहायता मिल सके।
मुख्यमंत्री से मुलाकात के
बाद प्रतिनिधिमंडल सीधे सूचना विभाग
के उच्चाधिकारियों से भी मिला।
लोकभवन में सूचना निदेशक
विशाल सिंह के साथ
हुई अलग बैठक ने
इस पूरी पहल को
प्रशासनिक दिशा दी। वहाँ
स्वास्थ्य सुरक्षा, आयुष्मान कार्ड, पत्रकार कल्याण योजनाओं और पहचान प्रणाली
पर बिंदुवार चर्चा हुई। सूचना निदेशक
ने प्रतिनिधिमंडल की बातों को
सकारात्मक बताते हुए आश्वासन दिया
कि एक सप्ताह के
भीतर काशी के पत्रकारों
को आयुष्मान कार्ड उपलब्ध कराने की प्रक्रिया प्रारंभ
करने के लिए आवश्यक
कदम उठाए जाएंगे।
सूचना निदेशक ने विशेष रूप
से “एक देश–एक
पत्रकार पहचान पत्र” प्रस्ताव को “सही दिशा
में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम”
बताया। उन्होंने माना कि पत्रकारों
की पहचान प्रणाली में एकरूपता लाने
का विचार व्यवहारिक और दूरगामी प्रभाव
वाला है तथा इसे
उच्च स्तर पर विचारार्थ
भेजा जाएगा। यह टिप्पणी केवल
प्रशासनिक प्रतिक्रिया नहीं थी; उसने
इस मांग को सरकारी
विमर्श के दायरे में
प्रवेश दिला दिया।
इस पूरे घटनाक्रम
की सबसे उल्लेखनीय बात
उसका स्वर था। यहाँ
टकराव नहीं था, संवाद
था; आरोप नहीं थे,
तर्क थे; आक्रोश नहीं
था, लोकतांत्रिक आग्रह था। प्रतिनिधिमंडल ने
सरकार की सकारात्मक पहलों
का उल्लेख करते हुए कहा
कि पत्रकार हितों पर समयबद्ध निर्णय
लोकतंत्र के प्रति राज्य
की संवेदनशीलता का प्रमाण होंगे।
मुख्यमंत्री और सूचना निदेशक
दोनों ने पत्रकारिता की
भूमिका को लोकतंत्र का
महत्वपूर्ण स्तंभ बताते हुए निरंतर संवाद
की आवश्यकता स्वीकार की।
दरअसल, यह कहानी उत्तर
प्रदेश से आगे जाती
है। यह उस बड़े
राष्ट्रीय प्रश्न को छूती है
जिसे भारतीय लोकतंत्र लंबे समय से
टालता आया है — क्या
पत्रकार केवल सूचना उद्योग
का श्रमिक है, या वह
ऐसा नागरिक कर्मी है जिसकी सुरक्षा
और गरिमा राज्य की जिम्मेदारी भी
है? महामारी, प्राकृतिक आपदाओं और सामाजिक संकटों
ने बार-बार सिद्ध
किया कि पत्रकार सबसे
कठिन परिस्थितियों में भी सूचना
तंत्र को सक्रिय रखते
हैं। इसके बावजूद उनकी
सामाजिक सुरक्षा पर राष्ट्रीय नीति
अभी भी विखंडित और
सीमित है।
काशी की यह
पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह
किसी वैचारिक खेमे की नहीं,
बल्कि पेशेगत गरिमा की मांग है।
यदि “एक देश–एक
पत्रकार पहचान पत्र” कभी राष्ट्रीय नीति
का रूप लेता है,
तो उसका प्रारंभिक स्वर
संभवतः ऐसी ही बैठकों
में सुना जाएगा, जहाँ
पत्रकार अपनी ही परिस्थितियों
पर बोलने का साहस जुटाते
हैं।
लोकभवन की उस मेज
पर रखा ज्ञापन वस्तुतः
एक दस्तावेज़ से अधिक था।
उसमें पत्रकारों का वह मौन
इतिहास दर्ज था, जिसमें
उन्होंने समाज की हर
लड़ाई लिखी, पर अपनी लड़ाई
बहुत कम लिखी। उस
दिन काशी के पत्रकारों
ने अपनी लड़ाई स्वयं
लिखी — संयम के साथ,
तथ्यों के साथ और
लोकतंत्र में विश्वास के
साथ।
और शायद इसी कारण वह दोपहर केवल एक मुलाकात नहीं रही; वह एक संकेत बन गई — जब पत्रकार अपनी गरिमा, स्वास्थ्य और पहचान के प्रश्न पर संगठित होकर सत्ता से संवाद करते हैं, तब लोकतंत्र की मेज़ पर नागरिकता का एक नया अध्याय खुलता है।

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