Friday, 4 September 2026

2027 की दहलीज पर बसपा : उत्तराधिकारी की तलाश या फिर वही ‘वन-वुमन शो’?

2027 की दहलीज पर बसपा : उत्तराधिकारी की तलाश या फिर वहीवन-वुमन शो’? 

बहुजन समाज पार्टी की कहानी को केवल पतन की कहानी कहना भी गलत होगा और उसे केवल मायावती की व्यक्तिगत शक्ति की कहानी मानना भी अधूरा होगा। यह उस आंदोलन की कहानी है जिसने उत्तर प्रदेश की राजनीति का सामाजिक व्याकरण बदल दिया। यह उस नेतृत्व की कहानी है जिसने सत्ता में दलित प्रतिनिधित्व को प्रतीक से वास्तविक शक्ति में बदला। लेकिन यह उस सवाल की कहानी भी है जिसका उत्तर अब टाला नहीं जा सकताजिस आंदोलन का उद्देश्य बहुजन को सत्ता का स्वामी बनाना था, उसकी सत्ता-संरचना के भीतर अगली पीढ़ी का रास्ता कितना खुला है? कांशीराम ने एक उत्तराधिकारी तैयार किया था। मायावती ने उस उत्तराधिकार को सत्ता में बदलकर दिखाया। अब इतिहास की घड़ी तीसरे अध्याय के सामने खड़ी है। 2027 का उत्तर प्रदेश चुनाव तय करेगा कि बसपा केवल मायावती के नेतृत्व की अंतिम बड़ी राजनीतिक परीक्षा लड़ रही है, या उसी चुनाव से अपने बाद की राजनीति की जमीन भी तैयार कर रही है। आकाश आनंद का बार-बार उभरना और फिर किनारे होना इसी बड़े प्रश्न का एक अध्याय है पूरी किताब नहीं। क्योंकि असली परीक्षा आकाश की नहीं है। असली परीक्षा बसपा की है। और उससे भी बड़ी परीक्षा उस विचार की है, जिसने कभी कहा था— “बहुजन को केवल वोट देने वाला नहीं, सत्ता चलाने वाला बनना है।अब सवाल यही है कि उस सत्ता की अगली कुर्सी पर कौन बैठेगाऔर क्या उसके लिए कुर्सी पहले से तैयार है? 2027 का चुनाव शायद इसी अनसुलझी पहेली का सबसे बड़ा राजनीतिक अध्याय लिखेगा 

सुरेश गांधी

बहुजन समाज पार्टी की राजनीति को केवल चुनावी आंकड़ों, जातीय समीकरणों या मायावती के बयानों के आईने में देखना शायद उसके सबसे महत्वपूर्ण अध्याय को अधूरा पढ़ना होगा। बसपा की कहानी के भीतर एक ऐसी राजनीतिक पहेली लगातार मौजूद रही है, जिसका पूरा उत्तर आज तक नहीं मिलापार्टी में दूसरे नंबर का नेता आखिर कितने समय तक दूसरे नंबर का रह सकता है? यह सवाल इसलिए फिर सामने है क्योंकि 3 सितंबर 2026 को मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को पार्टी की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी से एक बार फिर हटा दिया। उन्होंने आकाश को राजनीतिक रूप से अभी और परिपक्व होने की जरूरत बताई और स्पष्ट किया कि फिलहाल उन्हें बड़ी जिम्मेदारी देना उचित नहीं होगा। उसी बैठक में मायावती ने अपने छोटे भतीजे ईशान आनंद को भी पार्टी नेताओं से परिचित कराया। यह घटना अपने आप में जितनी महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण उसका राजनीतिक संदर्भ है। क्योंकि यह पहली बार नहीं है। आकाश आनंद को दिसंबर 2023 में मायावती ने अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया था। मई 2024 में उन्हें राष्ट्रीय समन्वयक और उत्तराधिकारी पद से हटा दिया गया। जून 2024 में उनकी वापसी हुई। मार्च 2025 में फिर पद छीना गया और पार्टी से निष्कासित भी किया गया। बाद में वापसी हुई और उन्हें फिर महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली। 2025 में उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण संगठनात्मक भूमिका दी गई। अब 2026 में फिर वही कहानीउभार, उम्मीद, जिम्मेदारी और फिर किनारा। तो क्या यह महज एक व्यक्ति की राजनीतिक अपरिपक्वता की कहानी है? या इसके पीछे बसपा के उस नेतृत्व मॉडल की कोई गहरी परत है, जिसे समझे बिना 2027 की राजनीति को समझना संभव नहीं?

कांशीराम ने मायावती में क्या देखा था?

बसपा के इतिहास का सबसे दिलचस्प विरोधाभास यहीं से शुरू होता है। बहुजन समाज पार्टी की स्थापना कांशीराम ने 1984 में की। उनका लक्ष्य केवल चुनाव लड़ना नहीं था। वे सरकारी तंत्र और समाज के वंचित तबकों में राजनीतिक चेतना पैदा करके उन्हें सत्ता के केंद्र तक पहुंचाना चाहते थे। कांशीराम के राजनीतिक प्रयोग की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने कैडर, संगठन और वैचारिक प्रशिक्षण को राजनीति का आधार बनाया। फिर एक समय ऐसा आया जब उन्होंने मायावती को अपने उत्तराधिकारी के रूप में सार्वजनिक रूप से आगे किया। 15 दिसंबर 2001 को लखनऊ में कांशीराम ने मायावती को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था। सितंबर 2003 में मायावती ने बसपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का दायित्व संभाला। यहां इतिहास एक महत्वपूर्ण संकेत देता है। कांशीराम के बाद सत्ता का संक्रमण हुआ और पार्टी बिखरी नहीं। बल्कि मायावती ने पार्टी को अपने नेतृत्व में लंबे समय तक एकजुट रखा। लेकिन सवाल यह है कि क्या मायावती के बाद भी वैसा ही सहज संक्रमण संभव दिखाई देता है? यही वह जगह है जहां बसपा की वर्तमान राजनीति सबसे कठिन परीक्षा से गुजर रही है।

मायावती का दौर : संगठन एक, सत्ता का केंद्र एक

मायावती का राजनीतिक व्यक्तित्व अपने आप में एक संस्था बन चुका है। उत्तर प्रदेश में चार बार मुख्यमंत्री रह चुकी मायावती ने बसपा को 2007 में पूर्ण बहुमत तक पहुंचाया था। उस समय पार्टी ने 403 सदस्यीय विधानसभा में 206 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। वह बसपा के राजनीतिक उत्कर्ष का ऐसा क्षण था, जब दलित राजनीति ने सत्ता के केंद्र में अपनी निर्णायक उपस्थिति दर्ज कराई। लेकिन इसके बाद धीरे-धीरे एक दूसरा प्रश्न पैदा हुआक्या पार्टी के भीतर मायावती के समानांतर कोई ऐसा नेता तैयार हुआ, जिसे जनता और संगठन दोनों स्वाभाविक रूप से अगले नेतृत्व के रूप में स्वीकार कर सकें? बसपा से अनेक बड़े नेता अलग हुए। उनके जाने की वजहें अलग-अलग थीं और प्रत्येक मामले को एक ही पैमाने से देखना उचित नहीं होगा। मगर यह जरूर देखा जा सकता है कि समय के साथ पार्टी के भीतर स्वतंत्र राजनीतिक चेहरों की संख्या और प्रभाव घटता गया। यही वजह है कि बसपा का नेतृत्व आज भी मूलतः मायावती-केंद्रित दिखाई देता है।

नंबर दोकी कुर्सी क्यों बनती रही पहेली?

भारतीय राजनीति में नंबर दो की कुर्सी सामान्यतः भविष्य की सीढ़ी मानी जाती है। लेकिन बसपा की कहानी कुछ अलग दिखाई देती है। यहां सवाल यह नहीं कि नंबर दो कौन है? सवाल यह है किनंबर दो कितने समय तक नंबर दो रह सकता है? नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे प्रभावशाली नेता लंबे समय तक मायावती के सबसे भरोसेमंद चेहरों में गिने गए। बाद में उनके रास्ते अलग हुए। स्वामी प्रसाद मौर्य लंबे समय तक बसपा के बड़े पिछड़े वर्ग के चेहरों में रहे। फिर पार्टी से बाहर गए। रामअचल राजभर, लालजी वर्मा और दूसरे कई वरिष्ठ नेताओं के राजनीतिक रास्ते भी अलग हुए। इन घटनाओं की अपनी-अपनी परिस्थितियां थीं। किसी को केवलउत्तराधिकारी की राजनीतिसे जोड़ देना इतिहास के साथ अन्याय होगा। लेकिन सवाल फिर भी बचता हैबसपा के भीतर इतने लंबे राजनीतिक अनुभव वाले नेता अंततः केंद्रीय नेतृत्व के साथ स्थायी शक्ति-संतुलन क्यों नहीं बना सके? यही सवाल आज आकाश आनंद के मामले में और अधिक तीखा हो गया है।

आकाश आनंद : उत्तराधिकारी से सामान्य कार्यकर्ता तक

आकाश आनंद की कहानी बसपा के भीतर उत्तराधिकार की सबसे स्पष्ट आधुनिक प्रयोगशाला है। युवा चेहरा। विदेश से शिक्षा। मायावती के परिवार से संबंध। संगठन में सक्रिय भूमिका। फिर राष्ट्रीय स्तर पर उभार। और अंततः दिसंबर 2023 में उन्हें राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया जाना। उस समय इसे केवल पारिवारिक फैसला मानना भी पर्याप्त नहीं था। बसपा को युवा मतदाताओं से जोड़ने और संगठन को नई पीढ़ी तक ले जाने की रणनीति के रूप में भी देखा गया। 2026 में भी आकाश को युवा दलित मतदाताओं और विशेषकर चंद्रशेखर आजाद की बढ़ती राजनीतिक चुनौती के मुकाबले एक चेहरे के रूप में पेश करने की चर्चा रही। लेकिन राजनीति में किसी उत्तराधिकारी की घोषणा ही उसकी राजनीतिक स्वीकार्यता की गारंटी नहीं होती। आकाश आनंद के साथ यही हुआ। 2024 में एक विवादित भाषण के बाद मायावती ने उन्हें राष्ट्रीय समन्वयक और उत्तराधिकारी पद से हटा दिया। बाद में उन्हें फिर वापस लाया गया। 2025 में फिर संकट आया। फिर वापसी हुई। और अब सितंबर 2026 में फिर बड़ी जिम्मेदारी से दूर कर दिया गया। मायावती का आधिकारिक तर्क हैराजनीतिक परिपक्वता का अभाव और चुनाव के समय पार्टी को नुकसान से बचाने की आवश्यकता।  राजनीतिक हलकों में इसके साथ पारिवारिक और संगठनात्मक खींचतान की चर्चा भी हुई है, लेकिन इन्हें स्थापित तथ्य की तरह नहीं, बल्कि राजनीतिक दावों और रिपोर्टों के रूप में ही देखना चाहिए।

और अब 2027 सामने है

यहीं से पूरी कहानी व्यक्तिगत नहीं रह जाती। 2027 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव बसपा के लिए अस्तित्व, पुनरुत्थान और प्रासंगिकतातीनों की परीक्षा है। सितंबर 2026 की बैठक में मायावती ने संकेत दिया है कि उम्मीदवारों के चयन, चुनावी रणनीति और संसाधनों की निगरानी में उनकी केंद्रीय भूमिका बनी रहेगी। पार्टी उत्तर प्रदेश में अकेले चुनाव लड़ने की दिशा पर भी कायम है। इसका अर्थ साफ है— 2027 की लड़ाई में बसपा का चेहरा अभी भी मायावती ही हैं। लेकिन इसके साथ दूसरा सवाल भी उतना ही बड़ा हैअगर 2027 मायावती के नेतृत्व में लड़ा जाएगा, तो 2027 के बाद बसपा किस नेतृत्व के साथ खड़ी होगी? यही वह सवाल है जिसे चुनावी शोर में दबा देना आसान है, लेकिन नजरअंदाज करना कठिन।

बसपा की सबसे बड़ी चुनौती भाजपा, सपा या कांग्रेस नहींक्या नेतृत्व का संक्रमण है?

यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि बसपा की सारी समस्याओं की जड़ उत्तराधिकार है। उसके सामने संगठनात्मक कमजोरी है। वोट बैंक का क्षरण है। युवा दलित मतदाताओं का नए चेहरों की ओर आकर्षण है। चंद्रशेखर आजाद जैसे नेताओं की चुनौती है। पार्टी का विधानसभा और लोकसभा में कमजोर होता प्रतिनिधित्व है। और सबसे महत्वपूर्णजमीन पर कैडर की सक्रियता को फिर से चुनावी शक्ति में बदलने की चुनौती। लेकिन इन सबके बीच नेतृत्व का प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी भी राजनीतिक दल की दीर्घकालिक ताकत केवल वर्तमान नेता की लोकप्रियता से नहीं, बल्कि अगली पीढ़ी की विश्वसनीयता से तय होती है। यही वह परीक्षा है, जहां बसपा को अपने अतीत और भविष्य दोनों को एक साथ देखना होगा।

कांशीराम की विरासत का असली सवाल

मायावती ने 2026 की बैठक में कांशीराम के उस सिद्धांत का हवाला दिया कि परिवार के सदस्यों को पार्टी के काम में सहयोग की अनुमति हो सकती है, लेकिन उन्हें चुनाव लड़ाने अथवा सत्ता में पद देने की व्यवस्था से दूर रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि वह भी इसी संकल्प पर चल रही हैं। यह बयान अपने आप में महत्वपूर्ण है। क्योंकि इससे बसपा की उत्तराधिकार राजनीति का एक दूसरा विरोधाभास सामने आता है। यदि परिवारवाद से दूरी कांशीराम की मूल राजनीतिक सोच का हिस्सा थी, तो फिर आकाश आनंद को उत्तराधिकारी बनाने का निर्णय किस राजनीतिक आवश्यकता से पैदा हुआ?

क्या वह बदलते समय की मांग थी?

क्या युवा नेतृत्व को आगे लाने का प्रयास था? क्या पार्टी के सामने मौजूद नेतृत्व-शून्य को भरने की कोशिश थी? या फिर यह एक ऐसा प्रयोग था जिसे परिस्थितियों के बदलने के साथ बार-बार पुनर्परिभाषित करना पड़ा? इन सवालों के उत्तर भविष्य की राजनीति तय कर सकते हैं।

2027 में मायावती के सामने तीन रास्ते

पहलामायावती ही चेहरा, संगठन में सामूहिक दूसरी पंक्ति : यह सबसे सुरक्षित मॉडल हो सकता है। मायावती चुनावी चेहरा बनी रहें और संगठन में कई नेताओं को समानांतर जिम्मेदारियां देकर किसी एक व्यक्ति को तत्काल उत्तराधिकारी बनाने से बचा जाए।

दूसरानई पीढ़ी को नियंत्रित लेकिन वास्तविक भूमिका : युवा नेताओं को जनता के बीच उतरने, आंदोलन चलाने और संगठन बनाने की स्वतंत्रता दी जाए, लेकिन अंतिम राजनीतिक निर्णय केंद्रीय नेतृत्व के पास रहे। यह मॉडल संक्रमण की जमीन तैयार कर सकता है।

तीसरास्पष्ट उत्तराधिकार की घोषणा : यह सबसे जोखिमपूर्ण और सबसे निर्णायक रास्ता होगा। क्योंकि उत्तराधिकारी घोषित करना केवल पद देना नहीं होता। उसके बाद उस व्यक्ति को जनता, संगठन और पार्टी के पुराने कैडर के सामने अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाने का अवसर भी देना पड़ता है। यही वह जगह है जहां बसपा का भविष्य सबसे ज्यादा दिलचस्प हो जाता है।

2027 केवल बसपा का चुनाव नहीं है

उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति का समीकरण बदल रहा है। एक तरफ भाजपा का व्यापक सामाजिक गठजोड़ है। दूसरी तरफ सपा का पिछड़ा-दलित समीकरण साधने का प्रयास है। कांग्रेस भी अपने सामाजिक आधार को पुनर्गठित करने की कोशिश कर रही है। और दूसरी तरफ चंद्रशेखर आजाद जैसे नए चेहरे दलित युवाओं के बीच अपनी राजनीतिक जगह बनाने में जुटे हैं। ऐसे समय में बसपा के लिए केवल यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि उसका मूल वोट बैंक उसके साथ है। वोट बैंक इतिहास से नहीं, वर्तमान राजनीतिक भरोसे से चलता है। और युवा मतदाता केवल विरासत नहीं देखता। वह नेतृत्व में अपनी उम्र, अपनी भाषा, अपना संघर्ष और अपना भविष्य देखना चाहता है।

सबसे बड़ा सवाल : क्या बसपा मायावती के बाद भीबसपारहेगी?

यही शायद इस पूरी कहानी का सबसे असहज प्रश्न है। कांशीराम के बाद मायावती ने पार्टी को संभाला और उसे लंबे समय तक राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावशाली बनाए रखा। लेकिन अब इतिहास एक उलटा सवाल पूछ रहा हैमायावती के बाद कौन? और उससे भी बड़ा सवालक्या वह व्यक्ति होगा या कोई सामूहिक नेतृत्व? क्या बसपा में कोई ऐसा संस्थागत ढांचा बनेगा जो नेतृत्व परिवर्तन को व्यक्ति की इच्छा से आगे ले जाकर संगठनात्मक प्रक्रिया में बदल सके? या फिर 2027 तक पार्टी का पूरा राजनीतिक अभियान एक बार फिर मायावती के व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द ही घूमता रहेगा?

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