मातृमंदिर : जहां जमीन किसी की नहीं... जिम्मेदारी सबकी
ऑरोविल में
60 देशों
के
3527 लोग
साथ
जी
रहे
जीवन
का
अनोखा
प्रयोग—न
कोई
निजी
जमीन,
न
मालिकाना
हक;
पेड़ों,
पगडंडियों
और
सामुदायिक
जीवन
के
बीच
आकार
ले
रहा
‘मानवता
का
नगर’
सुरेश गांधी
पुडुचेरी। सड़क वही थी,
वातावरण वही दक्षिण भारतीय
हरियाली वाला, लेकिन कुछ दूर आगे
बढ़ते ही लगा जैसे
रास्ता किसी शहर की
ओर नहीं, किसी विचार की
ओर जा रहा हो।
पेड़ों की डालियां ऊपर
आकर इस तरह एक-दूसरे से मिलती हैं
कि सड़क पर प्रकृति
का अपना ओवरब्रिज बन
जाता है। धूप नीचे
पहुंचती है तो छनकर—जैसे कोई रोशनी
भी यहां धीरे चलना
सीख गई हो। और
फिर इसी हरित संसार
के बीच दूर दिखाई
देता है वह स्वर्णिम
गोला—मातृमंदिर। पहली नजर में
लगता है जैसे धरती
ने अपनी हथेली पर
सूरज को रख लिया
हो।
सुनहरी डिस्कों से ढका विशाल
गोलाकार ढांचा धूप के साथ
अपना रंग बदलता है।
ऑरोविल की आधिकारिक व्याख्या
में इसे ‘शहर की
आत्मा’ कहा गया है।
यह केवल स्थापत्य नहीं,
बल्कि भीतर की चेतना
और मौन एकाग्रता का
प्रतीक माना गया है।
लेकिन मातृमंदिर को देखकर कहानी
खत्म नहीं होती। असली
सवाल तो इसके चारों
ओर शुरू होता है—
इस सुनहरे गोले के आसपास
आखिर किस तरह के
लोग रहते हैं?
जवाब चौंकाता है।
यह कोई साधारण गांव
नहीं है। यह ऑरोविल—एक अंतरराष्ट्रीय टाउनशिप
है, जिसे श्री अरविंद
और ‘मदर’ की मानव-एकता की दृष्टि
से प्रेरणा मिली। 28 फरवरी 1968 को इसकी स्थापना
के समय दुनिया के
124 देशों और भारत के
23 राज्यों का प्रतिनिधित्व करने
वाले युवाओं ने अपनी-अपनी
मिट्टी एक साझा कलश
में रखी थी। मानो
संदेश यह हो कि
अलग-अलग भूगोल अंततः
एक ही धरती में
मिलते हैं। आज उस
प्रयोग की तस्वीर और
बड़ी हो चुकी है।
ऑरोविल की 2026 की आधिकारिक जनगणना
में 3527 निवासी और 60 राष्ट्रीयताएं दर्ज हैं। इनमें
भारत के अलावा फ्रांस,
जर्मनी, इटली, अमेरिका, नीदरलैंड, रूस, ब्रिटेन, स्पेन,
दक्षिण कोरिया सहित अनेक देशों
के लोग शामिल हैं।
यहां आकर सबसे ज्यादा
जो बात चौंकाती है,
वह केवल अलग-अलग
देशों के लोगों का
एक साथ रहना नहीं,
बल्कि रहने की अवधारणा
है। यहां जमीन पर
निजी मालिकाना हक नहीं है।
ऑरोविल फाउंडेशन के अनुसार भूमि
और परिसंपत्तियां सामूहिक व्यवस्था के अंतर्गत हैं।
यानी घर में रहने
का अर्थ यह नहीं
कि उसके नीचे की
जमीन पर किसी व्यक्ति
का निजी स्वामित्व है।
ऑरोविल की अपनी आधिकारिक
योजना में भी ‘Private Property—No’ दर्ज है। यहीं
से यह जगह सामान्य
शहरों से अलग हो
जाती है।
हमारे शहरों में घर अक्सर
मालिकाना हक की पहली
पहचान होता है। यहां
घर जीवन की जरूरत
है, लेकिन जमीन को व्यक्तिगत
संपत्ति बनाने की अवधारणा से
अलग रखा गया है।
इसीलिए ऑरोविल को केवल देखकर
समझना संभव नहीं। इसे
महसूस करना पड़ता है।
सड़क के दोनों ओर
हरियाली है। कहीं कोई
भवन पेड़ों को काटकर अपनी
जगह नहीं बनाता दिखता,
बल्कि स्थापत्य और प्रकृति के
बीच समझौते की कोशिश दिखाई
देती है। \
कहीं खेत हैं,
कहीं सामुदायिक गतिविधियां, कहीं कार्यस्थल, तो
कहीं ऐसे आवासीय परिसर
जहां अलग-अलग भाषाओं
और संस्कृतियों से आए लोग
एक ही सामुदायिक व्यवस्था
का हिस्सा हैं। यहां फ्रांस
की भाषा बोलने वाला
व्यक्ति भारत की मिट्टी
में है और भारत
का व्यक्ति यूरोप से आए पड़ोसी
के साथ। राष्ट्रीयता पहचान
हो सकती है, लेकिन
यहां की कल्पना उससे
आगे जाने की है।
ऑरोविल की परिकल्पना लगभग
50 हजार आबादी वाले नगर के
रूप में की गई
है। वर्तमान में शहर की
आबादी उससे बहुत कम
है और इसका बड़ा
हिस्सा अभी भी विकास
की प्रक्रिया में है। शहर
के केंद्र में मातृमंदिर और
उसके चारों ओर अलग-अलग
क्षेत्र—आवासीय, सांस्कृतिक, औद्योगिक और अंतरराष्ट्रीय—की
योजना है। इसके साथ
हरित क्षेत्र, खेत और वन
क्षेत्र भी जुड़े हैं।
यानी यह ऐसा शहर
है जो केवल इमारतों
से नहीं, विचारों से बन रहा
है। और शायद यही
वजह है कि यहां
पहुंचकर ‘गांव’ शब्द छोटा पड़
जाता है।
हां, आसपास तमिल
गांव हैं। ऑरोविल की
बस्तियां भी कहीं-कहीं
ग्रामीण परिवेश के बीच बिखरी
हुई हैं। लेकिन स्वयं
ऑरोविल की पहचान एक
विश्व-नगर के प्रयोग
की है। यहां आने
वाले हर व्यक्ति के
लिए रास्ता भी एक जैसा
नहीं। कोई कुछ समय
के लिए आता है,
कोई लंबे समय के
लिए जुड़ता है और समुदाय
में प्रवेश की अपनी प्रक्रिया
से गुजरता है। इसलिए यह
कहना ठीक नहीं होगा
कि यहां रहने वाले
सभी लोगों ने अपना घर-द्वार और सारी निजी
संपत्ति त्याग दी है। वास्तविकता
इससे अधिक सूक्ष्म है।
लेकिन इतना जरूर है
कि ऑरोविल का सामुदायिक मॉडल
निजी जमीन और व्यक्तिगत
मालिकाने की सामान्य शहरी
अवधारणा से अलग है।
यहां काम, आवास
और संसाधनों को सामुदायिक दृष्टि
से देखने की कोशिश की
जाती है। और इस
पूरी व्यवस्था के बीच सबसे
अधिक आकर्षित करता है—मातृमंदिर।
उसके
चारों ओर का खुला
क्षेत्र, हरियाली, बाग और मौन
वातावरण ऐसा लगता है
जैसे शहर की सारी
हलचल को किसी अदृश्य
केंद्र के चारों ओर
शांत कर दिया गया
हो। मातृमंदिर के पश्चिम में
स्थित विशाल बरगद का पेड़
भी इस परिसर का
महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऑरोविल की
आधिकारिक जानकारी के अनुसार यही
बरगद शहर के भौगोलिक
केंद्र के रूप में
चुना गया था और
इसके चारों ओर फैली जटाएं
आज भी इस स्थान
को प्रकृति की अपनी वास्तुकला
का रूप देती हैं।
एक तरफ सुनहरी गोलाकार
संरचना। दूसरी तरफ सदियों पुरानी
भारतीय वृक्ष-परंपरा का प्रतीक बरगद।
और इनके बीच दुनिया
भर से आए मनुष्यों
का समुदाय।
शायद यही ऑरोविल
का सबसे बड़ा दृश्य
है—जहां वास्तुकार ने
भवन बनाया, प्रकृति ने छत बनाई
और मनुष्य ने सीमा मिटाने
का प्रयास किया। यहां कोई विशाल
गगनचुंबी इमारत आंखों को चकाचौंध नहीं
करती। कोई बाजार अपनी
आवाज से बुलाता नहीं।
बल्कि यहां की खूबसूरती
धीरे-धीरे सामने आती
है। पहले पेड़ दिखाई
देते हैं। फिर रास्ता।
फिर सुनहरी चमक। और अंततः
महसूस होता है कि
यह जगह केवल देखने
के लिए नहीं बनी—यह एक सवाल
पूछने के लिए बनी
है। क्या मनुष्य अपनी
राष्ट्रीयता, भाषा, धर्म, संपत्ति और निजी सीमाओं
से थोड़ा ऊपर उठकर साथ
रह सकता है?
ऑरोविल पिछले कई दशकों से इसी सवाल का प्रयोगात्मक उत्तर तलाश रहा है। 1968 में 124 देशों की मिट्टी से शुरू हुआ यह प्रयोग आज 60 राष्ट्रीयताओं और हजारों निवासियों तक पहुंच चुका है। मातृमंदिर की सुनहरी चमक शायद इसी प्रयोग का सबसे बड़ा प्रतीक है। सूरज रोज उगता है और डूब जाता है। लेकिन यहां कोशिश है कि उसके प्रकाश की तरह मनुष्य भी किसी एक देश, किसी एक सीमा और किसी एक पहचान तक सीमित न रहे। शायद इसीलिए ऑरोविल को देखकर लौटते हुए रास्ता वही रहता है, लेकिन नजर बदल जाती है। पेड़ों की शाखाओं का वह प्राकृतिक ओवरब्रिज फिर दिखाई देता है। और मन में एक पंक्ति उतरती है— “जहां जमीन किसी एक की नहीं, वहां शायद आसमान भी सबका हो सकता है।”

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