अनंत चतुर्दशी : विदाई में छिपा है अगले मिलन का वादा
ढोल की थाप तेज होती है। गलियों में गुलाल उड़ता है। जयघोष के बीच गणपति बप्पा की प्रतिमा धीरे-धीरे अपने विसर्जन स्थल की ओर बढ़ती है। आंखों में उत्सव है, लेकिन कहीं भीतर एक हल्की-सी नमी भी। जिन बप्पा को कुछ दिन पहले घर लाया गया था, जिनके सामने दीप जले, आरती हुई, मोदक का भोग लगा और जिनसे घर-परिवार की मंगलकामना मांगी गई, अब उन्हें विदा करने का समय आ गया है। ‘गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ...’ यह केवल जयघोष नहीं। यह उस रिश्ते की पुकार है, जिसमें विदाई के भीतर ही अगले मिलन की उम्मीद सांस लेती है। अनंत चतुर्दशी को अगर केवल कैलेंडर की एक तिथि मान लिया जाए तो यह गणपति विसर्जन और अनंत व्रत का दिन भर रह जाता है। लेकिन इसके भीतर उतरें तो यह पर्व जीवन का दर्शन बन जाता है। गणपति हमें सिखाते हैं— अहंकार को विसर्जित करो। अनंत सूत्र कहता है— संकल्प को बांधकर रखो। विसर्जन कहता है— परिवर्तन को स्वीकार करो। अनंत व्रत कहता है— विश्वास को मत छोड़ो। और अगले बरस फिर आने का निमंत्रण कहता है— हर विदाई में वापसी की संभावना होती है
सुरेश गांधी
एक तरफ ढोल की थाप पर गूंजेगा—‘गणपति
बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ...’ दूसरी तरफ घरों में भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप
की पूजा होगी और कलाई पर चौदह गांठों वाला अनंत सूत्र बंधेगा। एक ही दिन में भक्ति
के दो रंग दिखाई देंगे—एक में विदाई होगी, दूसरे में संकल्प
का बंधन। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाने वाली अनंत चतुर्दशी, जिसे अनंत
चौदस भी कहा जाता है, सनातन परंपरा में भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की आराधना का पर्व
है। इसी दिन दस दिवसीय गणेशोत्सव का भी समापन होता है। यह पर्व 25 सितंबर को मनाया
जाएगा। ‘अनंत’ शब्द ही इस पर्व की आत्मा है। जिसका
कोई अंत न हो, वही अनंत। भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा करते हुए भक्त जीवन में
स्थिरता, सुख, समृद्धि और मंगल की कामना करते हैं। लेकिन अनंत चतुर्दशी को केवल गणपति
विसर्जन का दिन समझना इस पर्व की आधी तस्वीर देखना है। इसके भीतर अनंत भगवान की पूजा,
चौदह गांठों का रहस्य, कौण्डिल्य-सुशीला की कथा और पांडवों से जुड़ी मान्यता—सब
एक साथ मौजूद हैं। मतलब साफ है एक ओर गणपति विसर्जन से उत्सव अपने चरम पर पहुंचता है,
तो दूसरी ओर भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा और चौदह गांठों वाले अनंत सूत्र का
विधान इस दिन को गहरी आध्यात्मिक अर्थवत्ता देता है। मानो एक ही दिन मनुष्य को दो विपरीत
दिखने वाले, मगर भीतर से जुड़े हुए पाठ पढ़ाता है—छोड़ना भी सीखो और निभाना भी।
मिट्टी का गणपति, अनंत की आस्था
गणपति की प्रतिमा का जल में विसर्जन देखने
में भले ही किसी उत्सव का अंत लगता हो, लेकिन सनातन दृष्टि में यह अंत नहीं, प्रकृति
में लौटने की प्रक्रिया है। मिट्टी से आकार लिया। भक्तिभाव से पूजे गए। फिर उसी मिट्टी
का जल में विलय। यह चक्र बताता है कि संसार में कोई रूप स्थायी नहीं। शरीर हो या प्रतिमा,
भवन हो या वैभव—हर आकार एक दिन अपने मूल तत्व में लौटता
है। मगर जिस भाव से उसे देखा गया, जिस श्रद्धा से उसे पूजा गया, वह मनुष्य के भीतर
रह जाता है। इसीलिए गणपति विसर्जन में केवल विदाई नहीं होती। वहां एक दार्शनिक सत्य
भी बहता है—रूप नश्वर है, आस्था अनश्वर। गणपति जाते हैं, मगर उनके नाम
का मंगलाचरण घर में रह जाता है। प्रतिमा जल में विलीन होती है, मगर ‘बुद्धि-विवेक’
का स्मरण मन में बना रहता है।
और तभी कलाई पर बंधता है अनंत
गणपति को विदा करने वाले इसी दिन श्रद्धालु
भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा करते हैं। हाथ में बंधता है अनंत सूत्र—चौदह
गांठों वाला वह पवित्र धागा, जिसमें लोकविश्वास ने सुरक्षा, समृद्धि, संकल्प और स्थायित्व
के भाव पिरो दिए हैं। चौदह गांठों को परंपरा में चौदह लोकों के प्रतीक के रूप में भी
देखा जाता है। धागा साधारण है, लेकिन उसके साथ जुड़ा भाव असाधारण। कलाई पर बंधा यह
सूत्र जैसे मनुष्य से कहता है—समय बदलता रहे, परिस्थितियां बदलती रहें,
लेकिन अपने धर्म और शुभ संकल्प को मत छोड़ो। गणपति विसर्जन कहता है—जो
आया है, उसे एक दिन लौटना है। अनंत सूत्र कहता है—लौटते हुए भी अपने मूल से जुड़े रहो।
यही अनंत चतुर्दशी की अद्भुत द्वंद्वात्मक सुंदरता है।
चौदह गांठें और जीवन का विस्तार
अनंत सूत्र की चौदह गांठों को केवल धार्मिक
कर्मकांड मानकर आगे बढ़ जाना इस पर्व की गहराई को छोटा कर देना होगा। भारतीय परंपरा
ने गांठ को हमेशा संकल्प और स्मृति से जोड़ा है। कोई रिश्ता गांठ से बांधा जाता है
तो कोई प्रतिज्ञा। गांठ खुलना केवल धागे का खुलना नहीं, किसी संकल्प के टूटने का प्रतीक
भी बन सकता है। इसलिए अनंत सूत्र की गांठें जैसे मनुष्य को बार-बार याद दिलाती हैं
कि जीवन केवल उपलब्धियों का नाम नहीं, बल्कि उन मूल्यों को निभाने का भी नाम है जिनके
आधार पर जीवन खड़ा है। चौदह गांठें—मानो चौदह बार स्वयं से किया गया एक मौन
संवाद। मैं अपने धर्म से जुड़ा रहूंगा। मैं अपने संकल्प से जुड़ा रहूंगा। मैं विपरीत
परिस्थितियों में भी विश्वास नहीं छोड़ूंगा।
कौण्डिल्य और सुशीला की कथा : जब अहंकार
ने अनंत को नकार दिया
अनंत चतुर्दशी की प्रसिद्ध व्रत-कथा में
सुमन्त नामक ब्राह्मण और उनकी पुत्री सुशीला का प्रसंग आता है। सुशीला का विवाह कौण्डिल्य
ऋषि से हुआ। एक दिन मार्ग में सुशीला ने कुछ स्त्रियों को भगवान अनंत की पूजा करते
और चौदह गांठों वाला अनंत सूत्र धारण करते देखा। जिज्ञासा होने पर उसे व्रत का महत्व
बताया गया। सुशीला ने श्रद्धापूर्वक अनंत व्रत किया और अनंत सूत्र धारण कर लिया। इसके
बाद उनके जीवन में सुख-समृद्धि आने लगी। लेकिन कौण्डिल्य ऋषि को इस समृद्धि का कारण
अपनी मेहनत लगा। उन्होंने अनंत सूत्र का महत्व स्वीकार नहीं किया और क्रोध में उसे
तोड़कर अग्नि में डाल दिया। इसके बाद उनके जीवन से सुख-समृद्धि चली गई। जब उन्हें अपनी
भूल का बोध हुआ तो वे भगवान अनंत की खोज में निकल पड़े। अंततः भगवान ने उन्हें दर्शन
देकर व्रत की विधि बताई। कौण्डिल्य ने श्रद्धापूर्वक अनंत व्रत किया और उनके कष्ट दूर
हुए। इस कथा का सबसे गहरा संदेश चमत्कार नहीं, बल्कि अहंकार और आस्था का संबंध है।
मनुष्य अपनी उपलब्धियों का श्रेय स्वयं को दे सकता है, लेकिन भारतीय दर्शन उसे यह भी
याद दिलाता है कि जीवन में बहुत कुछ ऐसा है जो उसके नियंत्रण से परे है।
गणपति की विदाई में काशी का भाव
काशी में धर्म केवल मंदिर की चौखट तक
सीमित नहीं रहता। वह गलियों से गुजरता है, घाटों तक पहुंचता है और लोकजीवन का हिस्सा
बन जाता है। गणपति विसर्जन के दौरान भी यही दृश्य दिखाई देता है। गलियों में निकलती
शोभायात्राएं, ढोल की गूंज, अबीर-गुलाल, हाथों में गणपति की प्रतिमाएं और बार-बार उठता
जयघोष—पूरा वातावरण एक जीवंत धार्मिक आख्यान में बदल जाता है। लेकिन
उत्सव की इस चहल-पहल के बीच काशी का अपना दर्शन भी है। यह शहर मृत्यु को भी जीवन की
तरह स्वीकार करना जानता है। यहां विदाई को भी अंतिम शब्द नहीं माना जाता। शायद इसीलिए
गणपति की विदाई भी यहां केवल बिछोह नहीं बनती। काशी में विदाई का अर्थ अक्सर अगली प्रतीक्षा
होता है। गणपति को विदा करते समय भक्त कहते हैं—‘अगले बरस तू जल्दी आ।’
यानी विदाई के क्षण में भी भविष्य का उत्सव जन्म ले चुका होता है।
विसर्जन में अंत नहीं, लौटने का विश्वास
गणेश चतुर्थी पर घर आए गणपति दस दिनों
तक पूजे जाते हैं। आरती होती है, मोदक का भोग लगता है, परिवार की मंगलकामना की जाती
है और घर-आंगन में उत्सव उतर आता है। फिर अनंत चतुर्दशी आती है। जिस प्रतिमा को इतने
प्रेम से स्थापित किया गया था, उसे जल में विसर्जित कर दिया जाता है। बाहर से देखने
पर यह विदाई है, लेकिन सनातन दृष्टि में यह रूप का मूल तत्व में लौटना है। मिट्टी से
बनी प्रतिमा मिट्टी और जल में विलीन होती है। देवत्व का भाव भक्त के भीतर रह जाता है।
इसीलिए गणपति विसर्जन का सबसे मार्मिक क्षण वह नहीं जब प्रतिमा जल में उतरती है, बल्कि
वह है जब भक्त कहते हैं— ‘अगले बरस तू जल्दी आ।’
विदाई के उसी क्षण अगली भेंट का संकल्प जन्म ले लेता है।
प्रकृति के सामने मनुष्य का विनम्र होना
गणपति विसर्जन का एक और गहरा संदेश प्रकृति
से जुड़ा है। मनुष्य ने मिट्टी को आकार दिया। उसे देवत्व के भाव से प्रतिष्ठित किया।
फिर उसी आकार को जल में समर्पित कर दिया। यह प्रक्रिया मनुष्य को याद दिलाती है कि
वह प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका हिस्सा है। आज पर्यावरण के संदर्भ में गणेश प्रतिमाओं
के निर्माण और विसर्जन को लेकर जागरूकता भी बढ़ी है। प्राकृतिक सामग्री से बनी प्रतिमाएं
और निर्धारित विसर्जन स्थलों का उपयोग धार्मिक आस्था के साथ पर्यावरणीय जिम्मेदारी
को जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। सनातन परंपरा का मूल भाव भी यही रहा है—प्रकृति
पूज्य है, उपभोग की वस्तु मात्र नहीं।
जब पानी में उतरता है एक रूप और मन में
रह जाता है एक विश्वास
संध्या ढलती है। विसर्जन यात्रा अपने
अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ती है। आरती की लौ हवा में कांपती है। ढोल की आवाज कुछ धीमी पड़ती
है। गणपति की प्रतिमा जल को स्पर्श करती है। एक क्षण के लिए लगता है जैसे भक्त अपने
सबसे प्रिय अतिथि को स्वयं से दूर कर रहा हो। फिर जयघोष उठता है—
‘गणपति बप्पा मोरया... अगले बरस तू जल्दी आ।’
प्रतिमा धीरे-धीरे जल में समा जाती है। लेकिन कहानी वहीं खत्म नहीं होती। कलाई पर बंधा
अनंत सूत्र अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है। वह बताता है कि कुछ चीजें दिखाई नहीं देतीं,
फिर भी जीवन में बनी रहती हैं। यही तो भारतीय आस्था का सौंदर्य है—
देवता का रूप विसर्जित हो सकता है, देवत्व नहीं। उत्सव समाप्त हो सकता है, उत्साह नहीं।
विदाई हो सकती है, विश्वास नहीं। और शायद इसीलिए अनंत चतुर्दशी केवल गणपति को विदा
करने का दिन नहीं। यह उस अनंत यात्रा को समझने का दिन है, जिसमें आगमन भी है, प्रस्थान
भी; मिलन भी है, विरह भी—और इन सबके बीच मनुष्य के भीतर बचा रह
जाता है केवल एक शब्द... ‘अनंत’।
पांडवों से भी जुड़ा है अनंत व्रत
अनंत चतुर्दशी की कथा महाभारत से भी जुड़ती
है। प्रचलित व्रत-कथा में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को अनंत व्रत का माहात्म्य
बताए जाने का उल्लेख है। इसके बाद युधिष्ठिर ने विधिपूर्वक व्रत किया और पांडवों के
लिए राज्य-प्राप्ति तथा विजय से जुड़ी मान्यता कथा में आती है। इसलिए अनंत चतुर्दशी
को केवल धन-समृद्धि की कामना का पर्व मानना भी अधूरा है। इसके केंद्र में धैर्य, विश्वास,
संकल्प और विपरीत परिस्थितियों में धर्म पर टिके रहने का भाव है। मान्यता है कि गणेश
ने निरंतर लेखन किया और इसी से गणेशोत्सव की दस दिवसीय परंपरा को जोड़ा जाता है। इसी
लोकप्रिय मान्यता के अनुसार दस दिनों तक निरंतर लेखन के बाद गणेश के शरीर पर धूल-मिट्टी
जम गई और शरीर का ताप बढ़ गया। वेदव्यास ने उन्हें स्नान कराया और इसके बाद गणेशोत्सव
के दस दिनों की परंपरा को गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक जोड़कर देखा जाता है। यह
कथा गणेश को केवल विघ्नहर्ता नहीं, बल्कि ज्ञान, लेखन और बुद्धि के आराध्य के रूप में
भी स्थापित करती है।
महाराष्ट्र से काशी तक, गणपति का बढ़ता
उत्सव
गणेशोत्सव का सार्वजनिक रूप महाराष्ट्र
में विशेष रूप से विकसित हुआ और बाद में देश के विभिन्न हिस्सों में इसकी व्यापक लोकप्रियता
हुई। आज काशी सहित उत्तर भारत के अनेक शहरों में भी गणपति स्थापना और विसर्जन श्रद्धा
तथा उत्साह के साथ होता है। काशी की गलियों में गणपति की शोभायात्रा निकलती है तो लगता
है जैसे धर्म केवल मंदिरों में नहीं, लोकजीवन की धड़कनों में भी सांस ले रहा है। ढोल
की आवाज, आरती की लौ, फूलों की सुगंध और ‘गणपति बप्पा मोरया’
का उद्घोष—सब मिलकर एक ऐसा दृश्य रचते हैं जिसमें भक्ति और लोकसंस्कृति
एकाकार हो जाते हैं।
अनंत चतुर्दशी का आज के समय में संदेश
आज जब जीवन भागदौड़, अस्थिरता और निरंतर
परिवर्तन से भरा है, अनंत चतुर्दशी का संदेश और भी अर्थवान लगता है। गणपति का विसर्जन
कहता है—परिवर्तन जीवन का नियम है। अनंत सूत्र कहता है—परिवर्तन
के बीच अपने मूल्यों को थामे रहो। व्रत कहता है—संकल्प में निरंतरता रखो। कथा कहती है—अहंकार
से बचो। और गणपति की विदाई कहती है— ‘यह अंत नहीं, फिर मिलने की शुरुआत है।’
शायद यही कारण है कि अनंत चतुर्दशी के दिन जल में उतरती गणपति की प्रतिमा को देखकर
आंखें नम होती हैं, लेकिन होंठों पर मुस्कान रहती है। क्योंकि भक्त जानता है—
बप्पा जा नहीं रहे, बस अपने मूल में लौट रहे हैं। और कलाई पर बंधा अनंत सूत्र धीरे
से याद दिलाता रहता है— जो अनंत है, उसका कोई विसर्जन नहीं होता।
यही अनंत चतुर्दशी की सबसे बड़ी दास्तां है— एक तरफ गणपति का विसर्जन, दूसरी तरफ
अनंत का बंधन; एक में विदाई, दूसरे में विश्वास। और इन दोनों के बीच धड़कता है सनातन
का वह दर्शन, जिसमें अंत भी किसी नए आरंभ का द्वार है।


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