कृष्ण को मंदिर से निकालिए, जीवन में उतारिए
आधी रात को जब अंधकार के बीच कृष्ण का जन्म होता है तो वह केवल एक दिव्य अवतरण नहीं, बल्कि मनुष्य की चेतना में प्रकाश के जन्म का प्रतीक बन जाता है। यही कारण है कि जन्माष्टमी को केवल पूजा-पाठ और उत्सव तक सीमित करना कृष्ण के विराट व्यक्तित्व को छोटा कर देना है। कृष्ण आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, क्योंकि उन्होंने जीवन के हर मोड़ पर कर्म, साहस, प्रेम, नीति और न्याय का रास्ता दिखाया। उन्होंने सत्ता को साध्य नहीं, समाज और धर्म की रक्षा का साधन माना। कंस का अंत किया तो स्वयं राजा नहीं बने, योग्य को सिंहासन सौंपा। महाभारत में निर्णायक भूमिका निभाई, फिर भी विजय का श्रेय पांडवों को दिया। यही त्याग आज की राजनीति के लिए सबसे बड़ा आईना है। अर्जुन के विषाद को कर्मयोग में बदलने वाले कृष्ण आज की दिशाहीन युवा शक्ति को भी पुकार रहे हैं। उनका संदेश है—भय से नहीं, कर्तव्य से भविष्य बनता है। क्रोध बुद्धि को नष्ट करता है और लोभ विवेक को। रिश्ते स्वार्थ से नहीं, संवेदना से निभते हैं और धर्म वहीं है जहां न्याय तथा नारी सम्मान सुरक्षित हो। इसलिए जन्माष्टमी पर सवाल कृष्ण के जन्म का नहीं, हमारे भीतर कृष्ण के जन्म का है।
सुरेश गांधी
श्रीकृष्ण को केवल देवता
मानकर उनकी आरती उतार
देना उनके विराट व्यक्तित्व
को सीमित कर देना है।
कृष्ण तो भारतीय चेतना
के वह अनंत आयाम
हैं, जिनमें प्रेम भी है, नीति
भी; करुणा भी है, रणकौशल
भी; बांसुरी की मधुर तान
भी है और अन्याय
के विरुद्ध उठता सुदर्शन भी।
वह केवल भगवान नहीं,
श्रेष्ठ सारथी, अद्वितीय कूटनीतिज्ञ, कुशल राजनीतिज्ञ, मित्र,
मार्गदर्शक और ऐसे गुरु
हैं, जिनकी वाणी हजारों वर्षों
बाद भी मनुष्य के
भीतर सोई हुई शक्ति
को जगाने की क्षमता रखती
है। यही कारण है
कि कृष्ण को समझना दरअसल
अपने समय को समझना
है। आज जब समाज
‘मैं’ और ‘मेरा’ की
संकीर्ण परिधियों में सिमटता जा
रहा है, रिश्ते स्वार्थ
की कसौटी पर तौले जा
रहे हैं, राजनीति सेवा
के बजाय सत्ता-साधना
का पर्याय बनती जा रही
है और युवा शक्ति
दिशाहीनता के अंधेरे से
जूझ रही है, तब
कृष्ण का जीवन किसी
दीपस्तंभ की तरह सामने
खड़ा दिखाई देता है। उनका
संदेश स्पष्ट है—धर्म और
न्याय के लिए खड़े
होइए, कर्म से मत
भागिए और अपने कर्तव्य
का श्रेय पाने की लालसा
मत पालिए।
कृष्ण चाहते तो मथुरा से
हस्तिनापुर और हस्तिनापुर से
पूरी पृथ्वी तक अपना साम्राज्य
स्थापित कर सकते थे।
लेकिन उन्होंने सत्ता को लक्ष्य नहीं
बनाया। कंस के वध
के बाद स्वयं सिंहासन
पर बैठने के बजाय योग्य
व्यक्ति को सत्ता सौंपी।
जरासंध के अंत के
बाद भी उसके पुत्र
को राज्य दिया। महाभारत में निर्णायक भूमिका
निभाने के बावजूद विजय
का श्रेय पांडवों को दिया। वे
जानते थे कि नेतृत्व
का अर्थ हर सफलता
के शिखर पर अपना
नाम लिखना नहीं, बल्कि योग्य व्यक्ति को आगे बढ़ाकर
स्वयं पीछे खड़े रहना
भी है। कृष्ण कहते हैं—परिवर्तन
संसार का नियम है।
जो आज तुम्हारा है,
कल किसी और का
होगा। इसलिए ‘मैं’ और ‘मेरा’
के मोह से ऊपर
उठो। यही मुक्ति का
मार्ग है। आज जरूरत
कृष्ण की मूर्ति को
घर में स्थापित करने
से कहीं अधिक कृष्ण
के आदर्शों को मन में
स्थापित करने की है।
भारत की युवा शक्ति
को यदि अर्जुन का
साहस, कृष्ण का विवेक और
निष्काम कर्म की साधना
मिल जाए तो कोई
शक्ति इस राष्ट्र की
सृजनात्मक ऊर्जा को रोक नहीं
सकती। कृष्ण केवल जन्म लेने
के लिए नहीं आए
थे। वे मनुष्य के
भीतर सोई हुई चेतना
को जगाने आए थे। जन्माष्टमी
उसी जागरण का पर्व है।
इसलिए इस बार कान्हा
को केवल पालने में
न झुलाएं—अपने भीतर भी
उन्हें जन्म लेने दें।
क्योंकि जिस दिन कर्म
में कृष्ण, विचार में कृष्ण और
आचरण में कृष्ण उतर
आएंगे, उसी दिन समाज
में धर्म, राजनीति में मर्यादा और
जीवन में सच्चे आनंद
का सूर्योदय होगा।
आज की राजनीति के लिए इससे बड़ा पाठ और क्या हो सकता है?
राजनीति में पद प्रतिष्ठा
के लिए होड़ है।
उपलब्धियों पर अपना नाम
लिखने की बेचैनी है।
कुर्सी छोड़ने की कल्पना तक
असहज करती है। ऐसे
समय में कृष्ण याद
दिलाते हैं कि पद
स्थायी नहीं, कर्म स्थायी है।
सत्ता आती-जाती है,
किंतु चरित्र इतिहास में जीवित रहता
है। कृष्ण की राजनीति सत्ता
हथियाने की नहीं, व्यवस्था
को धर्म और न्याय
की दिशा देने की
राजनीति थी।
कृष्ण का सबसे बड़ा संदेश—कर्म से बड़ा कोई परिचय नहीं
कृष्ण का दर्शन मनुष्य
को कर्म की ओर
लौटाता है। गीता का
निष्काम कर्मयोग इसी जीवन-दृष्टि
की घोषणा है। मनुष्य का
अधिकार कर्म पर है,
फल पर नहीं। इसका
अर्थ निष्क्रियता नहीं, बल्कि परिणाम की चिंता से
मुक्त होकर कर्म में
पूरी निष्ठा से उतरना है।
अपने काम में इस
तरह रम जाना कि
कर्म ही आनंद बन
जाए। अर्जुन रणभूमि में विषाद से
जकड़े थे। हाथ में
गांडीव था, पर मन
में संशय। कृष्ण ने उन्हें भागने
का रास्ता नहीं दिखाया, बल्कि
उनकी सुप्त चेतना को जगाया। उन्होंने
अर्जुन को विषाद से
प्रसाद, कायरता से वीरता और
मोह से कर्तव्य की
ओर ले जाने का
मार्ग दिखाया। आज का युवा
भी अनेक प्रकार के
अवसाद, असमंजस और भविष्य की
चिंता से घिरा है।
भारत की विशाल युवा
शक्ति के सामने अवसरों
का आकाश है, मगर
दिशा का संकट भी
कम नहीं। जन्माष्टमी इसलिए केवल कान्हा के
जन्म का उत्सव नहीं,
बल्कि भीतर सोई ऊर्जा
को जगाने का पर्व भी
है। यह पर्व पुकारता
है कि युवा अपने
हिस्से के निर्माण का
दायित्व स्वीकार करें। हाथ में अर्जुन
का गांडीव हो या आज
के युवा के हाथ
में कुदाली, कलम, कंप्यूटर अथवा
औजार—उसे तब तक
कर्म करते रहना होगा,
जब तक अपने भीतर
छिपी पूर्णता का जलस्रोत न
मिल जाए।
मन जीता तो जग जीता
कृष्ण ने बाहरी युद्ध
से पहले मनुष्य के
भीतर चल रहे युद्ध
को पहचाना। उन्होंने बताया कि मन ही
मित्र है और मन
ही शत्रु। छोटी-छोटी बुरी
आदतें धीरे-धीरे व्यक्तित्व
को खोखला करती हैं। क्रोध
विवेक को ढकता है,
भ्रम बुद्धि को कमजोर करता
है और बुद्धि के
नष्ट होते ही मनुष्य
के पतन का मार्ग
खुल जाता है। आज
की दुनिया में संघर्ष बाहर
कम और भीतर अधिक
है। प्रतिस्पर्धा, लोभ, ईर्ष्या, भय,
असुरक्षा और निरंतर भविष्य
की चिंता मनुष्य को भीतर से
थका रही है। कृष्ण
का समाधान सीधा है—चिंता
नहीं, चिंतन कीजिए। चिंता मन को अशांत
करती है, चिंतन उसे
दिशा देता है। चिंता
भय और निराशा को
जन्म देती है, जबकि
चिंतन समाधान की राह खोलता
है। इसलिए कृष्ण का दर्शन वर्तमान
में जीने की कला
सिखाता है। जो बीत
गया, वह लौटने वाला
नहीं; जो आने वाला
है, वह अभी आया
नहीं। मनुष्य के हाथ में
केवल वर्तमान का कर्म है।
त्याग की राजनीति, स्वार्थ से परे नेतृत्व
कृष्ण की राजनीति का
सबसे बड़ा गुण उनका
त्याग था। उन्होंने कभी
अपने लिए राजपद को
अनिवार्य नहीं माना। वे
जानते थे कि सत्ता
साधन है, साध्य नहीं।
इसी कारण वे राजा
से अधिक प्रभावशाली बने,
क्योंकि उन्होंने सिंहासन के बजाय व्यवस्था
को दिशा दी। महाभारत
में वे स्वयं शस्त्र
न उठाने की प्रतिज्ञा करते
हैं, फिर भी पूरे
युद्ध की दिशा उनके
विवेक और रणनीति से
तय होती है। वह
सारथी हैं, पर वास्तविक
अर्थों में पूरे युग
के मार्गदर्शक भी। आज राजनीति
में पद के लिए
संघर्ष है, लेकिन कृष्ण
बताते हैं कि वास्तविक
नेतृत्व पद से नहीं,
प्रभाव से पैदा होता
है। योग्य व्यक्ति को आगे बढ़ाना,
सही समय पर सही
निर्णय लेना और आवश्यकता
पड़ने पर स्वयं पीछे
हट जाना ही नेतृत्व
की परिपक्वता है। कृष्ण का
जीवन यह भी सिखाता
है कि व्यक्ति जन्म
से महान नहीं होता,
उसके कर्म उसे महान
बनाते हैं। आज जब
जाति, परिवार, धनबल और बाहुबल
सामाजिक-राजनीतिक पहचान के बड़े आधार
बनते दिखाई देते हैं, तब
कृष्ण का कर्मप्रधान दर्शन
अधिक प्रासंगिक हो उठता है।
जहां न्याय है, वहीं कृष्ण हैं
कृष्ण का धर्म किसी
संकीर्ण पहचान का धर्म नहीं
था। उनका धर्म अन्याय
के सामने खड़े होने का
धर्म था। अपने हों
या पराए, गलत को गलत
कहना ही उनकी नीति
थी। उन्होंने संबंधों को महत्व दिया,
लेकिन संबंधों के नाम पर
अधर्म को स्वीकार नहीं
किया। महाभारत केवल राजसत्ता का
संघर्ष नहीं था; वह
स्त्री सम्मान, न्याय और अधिकार की
लड़ाई भी था। द्रौपदी
के अपमान के समय कृष्ण
की उपस्थिति भारतीय चेतना में इस संदेश
के रूप में दर्ज
है कि स्त्री की
गरिमा से समझौता किसी
सभ्य समाज का धर्म
नहीं हो सकता। नारी
सम्मान के बिना कृष्ण
की आराधना अधूरी है। नरकासुर के
बंधन से हजारों स्त्रियों
को मुक्त कराने की कथा इसी
व्यापक संवेदना को सामने रखती
है। उन्होंने उन स्त्रियों को
सामाजिक तिरस्कार के हवाले नहीं
छोड़ा, बल्कि उनके सम्मान की
रक्षा की। संदेश साफ
है—जिस समाज में
स्त्री सुरक्षित और सम्मानित नहीं,
वहां धर्म का दावा
खोखला है।
रिश्ते कृष्ण की सबसे बड़ी पूंजी थे
आज परिवार टूट
रहे हैं। रिश्तों में
संवाद कम और स्वार्थ
अधिक दिखाई देता है। ऐसे
समय में कृष्ण का
जीवन रिश्तों की उस गरिमा
की याद दिलाता है
जिसमें अधिकार से अधिक आत्मीयता
होती है। अर्जुन हों,
सुदामा हों या उद्धव—कृष्ण ने जिन्हें हृदय
से अपना माना, उनके
साथ संबंध को जीवन की
अंतिम सीमा तक निभाया।
सुदामा की गरीबी देखकर
उनकी मित्रता छोटी नहीं हुई।
मित्र के आत्मसम्मान को
बचाते हुए उसकी जरूरत
समझ लेना कृष्ण की
मित्रता की ऊंचाई थी।
द्रौपदी के साथ उनका
संबंध भी इसी आत्मीयता
का उदाहरण है। एक छोटा-सा घाव देखकर
द्रौपदी ने बिना क्षण
गंवाए अपनी साड़ी का
पल्लू फाड़कर कृष्ण की उंगली बांध
दी। प्रेम के इस छोटे
से स्पर्श को कृष्ण ने
जीवन भर की आत्मीयता
में बदल दिया। यही
कृष्ण का सूत्र है—रिश्तों को दिमाग से
नहीं, दिल से जिया
जाता है।
कृष्ण सबके हैं, इसलिए सबसे अपने हैं
भारतीय परंपरा में कृष्ण की
सबसे बड़ी विशेषता उनकी
सर्वस्वीकार्यता है। वे केवल
मंदिरों के देवता नहीं
हैं। वे वृंदावन की
गलियों में खेलने वाला
बालक भी हैं, गोपियों
के प्रिय भी, अर्जुन के
सारथी भी, सुदामा के
मित्र भी और धर्म
की स्थापना के लिए रणभूमि
के रणनीतिकार भी। कालिया नाग
के फन पर नृत्य
करने वाला बालक वही
कृष्ण हैं जो गोवर्धन
उठाकर गिरिधारी बनते हैं। विदुराणी
के घर साग खाने
वाला वही कृष्ण हैं
जो राजसभाओं की राजनीति को
समझते हैं। शिशुपाल की
गालियां सुनकर धैर्य रखने वाला वही
कृष्ण आवश्यकता पड़ने पर सुदर्शन भी
उठाता है। कृष्ण की
यही पूर्णता उन्हें अद्वितीय बनाती है। उनके व्यक्तित्व
में प्रेम और प्रतिरोध, करुणा
और कठोरता, नीति और रणनीति,
भक्ति और कर्म—सभी
एक साथ दिखाई देते
हैं। शायद इसीलिए हर
व्यक्ति अपने भीतर के
कृष्ण को अलग-अलग
रूप में पहचानता है।
कृष्ण को पाने का रास्ता मंदिर से होकर जीवन तक जाता है
गीता में कृष्ण
ने कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग के
माध्यम से मनुष्य को
आत्मबोध की राह दिखाई।
भक्ति उनके लिए केवल
पूजा-पद्धति नहीं, मन की वह
अवस्था है जिसमें अहंकार
गलता है और आत्मा
परमात्मा से जुड़ती है।
माता-पिता की सेवा,
जरूरतमंद के प्रति संवेदना,
अपने कर्म के प्रति
ईमानदारी, अन्याय के विरुद्ध साहस
और संबंधों के प्रति निष्ठा—यही वह भक्ति
है जिसे जीवन में
उतारकर कृष्ण के निकट पहुंचा
जा सकता है। जन्माष्टमी
का पर्व इसी आत्मजागरण
का अवसर है। आधी
रात में मंदिरों में
गूंजता नंद के आनंद
भयो का स्वर केवल
धार्मिक उल्लास नहीं, अंधकार में प्रकाश के
जन्म की घोषणा है।
संदेश है कि जब
जीवन में अधर्म, भय
और निराशा का अंधकार गहराए,
तब भीतर कृष्ण का
जन्म होना चाहिए।
बांसुरी भी चाहिए, सुदर्शन भी
कृष्ण के व्यक्तित्व की
सबसे बड़ी सीख शायद
यही है कि जीवन
में केवल कठोरता पर्याप्त
नहीं और केवल कोमलता
भी नहीं। जहां प्रेम चाहिए
वहां बांसुरी बजनी चाहिए, जहां
अन्याय हो वहां सुदर्शन
उठना चाहिए। जहां मित्र विषाद
में हो वहां सारथी
बनना चाहिए और जहां व्यवस्था
भटक रही हो वहां
नीति का मार्ग दिखाना
चाहिए। कृष्ण ने किशोरावस्था के
बाद अपने जीवन का
बड़ा हिस्सा तत्कालीन राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों
को बदलने में लगाया। उन्होंने
स्वयं को राजा बनाने
के बजाय योग्य नेतृत्व
को आगे बढ़ाया। द्वारका
में भी उनका प्रभाव
शासन से कहीं बड़ा
था। उन्होंने दिखाया कि बिना सिंहासन
पर बैठे भी इतिहास
की दिशा बदली जा
सकती है। आज जब
राजनीति पद और प्रचार
के केंद्र में घूम रही
है, कृष्ण का सारथी रूप
सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश
है—नेतृत्व वह नहीं जो
हर तस्वीर के केंद्र में
दिखाई दे, नेतृत्व वह
है जो दूसरों को
सही दिशा देकर उन्हें
विजय तक पहुंचाए।
जन्माष्टमी—बाहर नहीं, भीतर कृष्ण के जन्म का पर्व
जन्माष्टमी हर वर्ष आती है और चली जाती है। मंदिर सजते हैं, झांकियां निकलती हैं, माखन-मिश्री का भोग लगता है, पालने में लड्डू गोपाल झूलते हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हमारे भीतर भी कृष्ण जन्म लेते हैं? यदि जन्माष्टमी के बाद भी मन में वही क्रोध है, व्यवहार में वही छल है, राजनीति में वही स्वार्थ है, समाज में वही भेदभाव है और रिश्तों में वही अविश्वास है तो फिर उत्सव अधूरा है। कृष्ण को पूजने का सबसे सुंदर तरीका उनके विचारों को जीवन में उतारना है। अपने भीतर के भय को हराना, कर्म से भागना बंद करना, लोभ और अहंकार को त्यागना, स्त्री का सम्मान करना, कमजोर के पक्ष में खड़ा होना, रिश्तों को बचाना और सफलता का श्रेय बांटना—यही कृष्ण का वास्तविक प्रसाद है।


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