गणपति के हर अंग में जीवन का संदेश
भारतीय
जीवन
में
कुछ
नाम
ऐसे
हैं,
जिन्हें
पुकारना
ही
शुभारंभ
माना
जाता
है।
नई
दुकान
खुले
तो
‘श्री
गणेश’,
विवाह
का
मंडप
सजे
तो
पहले
गणपति
पूजन,
गृह
प्रवेश
हो
तो
प्रथम
आराध्य
विघ्नहर्ता
और
विद्यारंभ
हो
तो
सबसे
पहले
लिखा
जाता
है—‘श्री
गणेशाय
नमः।’
मानो
जीवन
की
हर
नई
पगडंडी
पर
पहला
कदम
गणपति
के
स्मरण
से
ही
पड़ता
हो।
भाद्रपद
शुक्ल
चतुर्थी
इसी
सनातन
आस्था
को
फिर
जीवंत
करने
जा
रही
है।
14 सितंबर,
सोमवार
को
गणेश
चतुर्थी
के
साथ
दस
दिवसीय
गणेशोत्सव
शुरू
होगा।
काशी
में
गणपति
स्थापना
के
लिए
मध्याह्न
का
विशेष
मुहूर्त
सुबह
10:39 से
दोपहर
1:07 बजे
तक
रहेगा।
चतुर्थी
तिथि
14 सितंबर
की
सुबह
7:06 बजे
से
शुरू
होकर
15 सितंबर
की
सुबह
7:44 बजे
तक
रहेगी।
दस
दिनों
तक
बप्पा
भक्तों
के
बीच
विराजेंगे
और
25 सितंबर
को
अनंत
चतुर्दशी
पर
विदा
होंगे.
गणेश का स्वरूप अपने
आप
में
एक
संदेश
है।
बड़े
कान
कहते
हैं—पहले
सुनो,
फिर
बोलो।
छोटी
आंखें
एकाग्रता
का
प्रतीक
हैं।
विशाल
मस्तक
बड़ा
सोचने
की
प्रेरणा
देता
है।
लंबोदर
जीवन
के
सुख-दुख
को
समेट
लेने
का
संदेश
देता
है
और
एकदंत
लक्ष्य
के
प्रति
दृढ़
रहने
की
सीख
देता
है।
उनका
वाहन
मूषक
भी
प्रतीकात्मक
माना
गया
है—छोटा
होकर
भी
अत्यंत
चंचल।
जैसे
मनुष्य
का
मन।
इच्छाओं
पर
नियंत्रण
रखो।
गणपति
का
उस
पर
सवार
होना
मानो
मन
पर
विवेक
के
नियंत्रण
का
संदेश
देता
है.
सूंड—समय के अनुसार कठोर
भी
बनो,
कोमल
भी।
माता-पिता
की
परिक्रमा—रिश्तों
का
सम्मान
करो।और
‘विघ्नहर्ता’
का
संदेश—समस्या
से
घबराओ
मत,
बुद्धि
से
उसका
रास्ता
निकालो
सुरेश गांधी
बुद्धि के देव, विघ्नों
के विनाशक. ‘वक्रतुंड महाकाय, सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव,
शुभकार्येषु सर्वदा’ यह केवल मंत्र
नहीं, भारतीय मानस की वह
प्रार्थना है जिसमें मनुष्य
अपने हर शुभ संकल्प
को गणपति के चरणों में
अर्पित करता है। भगवान
गणेश को बुद्धि, विवेक,
सिद्धि और समृद्धि का
देवता माना गया है।
‘गणपति’ यानी गणों के
स्वामी। यही कारण है
कि देवताओं में उन्हें प्रथम
पूज्य स्थान मिला। मनुष्य के जीवन में
पहला संघर्ष बाहरी दुनिया से नहीं, स्वयं
के भीतर के संशय
और अविवेक से होता है।
इसलिए गणपति की पूजा का
अर्थ केवल विघ्न दूर
करने की प्रार्थना नहीं,
बल्कि सही निर्णय लेने
की शक्ति मांगना भी है। भाद्रपद
शुक्ल पक्ष की चतुर्थी
से शुरू होने वाला
गणेश महोत्सव इस बार 14 सितंबर,
सोमवार से आरंभ होगा
और 25 सितंबर, शुक्रवार को अनंत चतुर्दशी
के दिन गणपति विसर्जन
के साथ संपन्न होगा।
दस दिनों तक चलने वाला
यह पर्व घरों से
लेकर सार्वजनिक पंडालों तक श्रद्धा, भक्ति
और उत्सव का अद्भुत रंग
बिखेरेगा। धार्मिक मान्यता है कि गणेश
चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी
तक भगवान गणेश अपने भक्तों
के बीच विराजमान रहते
हैं। जो भक्त श्रद्धा
और विधि-विधान से
उनकी आराधना करते हैं, उनके
जीवन से विघ्न दूर
होते हैं और सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त
होता है। यही कारण
है कि गणेशोत्सव केवल
पूजा का पर्व नहीं,
बल्कि आस्था, मंगलकामना और सामूहिक उत्सव
का दस दिवसीय महापर्व
बन चुका है।
शुभ मुहूर्त
पंचांग गणना के अनुसार
गणेश चतुर्थी तिथि 14 सितंबर की सुबह 7:06 बजे
शुरू होगी और 15 सितंबर
की सुबह 7:44 बजे तक रहेगी।
इसी दौरान गणपति स्थापना और पूजन किया
जाएगा। गणेश चतुर्थी पर
दोपहर के समय भगवान
गणेश की पूजा का
विशेष महत्व माना गया है।
पंचांग के अनुसार इस
बार पूजन का शुभ
मुहूर्त सुबह 11:02 बजे से दोपहर
1:31 बजे तक रहेगा। गणपति
स्थापना करने वाले श्रद्धालु
इस अवधि में विधिवत
पूजा-अर्चना और प्राण-प्रतिष्ठा
कर सकते हैं। इस
बार गणेश चतुर्थी को
विशेष बनाने वाला एक महत्वपूर्ण
संयोग रवि योग का
है। ज्योतिषीय मान्यता में रवि योग
को शुभ कार्यों के
लिए अनुकूल माना जाता है।
गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी
के बीच भी कई
ग्रहों की विशेष स्थितियां
बन रही हैं। इस
समय देवगुरु बृहस्पति कर्क राशि में
उच्च के बताए जा
रहे हैं, जबकि शनि
मीन राशि में वक्री
अवस्था में रहेंगे। ज्योतिषीय
दृष्टि से गुरु की
उच्च स्थिति ज्ञान, धर्म, समृद्धि और शुभता से
जोड़ी जाती है, वहीं
शनि की स्थिति कर्म,
अनुशासन और आत्ममंथन का
संकेत मानी जाती है।
यानी इस बार गणेशोत्सव
में केवल उत्सव का
उल्लास ही नहीं, बल्कि
तिथि, योग और ग्रह
स्थिति का भी विशेष
धार्मिक-ज्योतिषीय महत्व रहेगा।
गणेश के स्वरूप में समाज के लिए छिपे संदेश
1. बड़ा मस्तक
— सोच
बड़ी
रखो
: गणेश जी का विशाल
मस्तक बताता है कि समाज
और व्यक्ति को संकीर्णता से
ऊपर उठकर दूरदृष्टि और
व्यापक सोच रखनी चाहिए।
2. बड़े कान
— पहले
सुनो,
फिर
बोलो
: गणेश जी के बड़े
कान धैर्यपूर्वक सुनने का संदेश देते
हैं। आज जब संवाद
की जगह शोर और
प्रतिक्रिया ने ले ली
है, यह गुण सामाजिक
जीवन के लिए बेहद
जरूरी है।
3. छोटी आंखें
— लक्ष्य
पर
एकाग्र
रहो
: छोटी आंखें एकाग्रता और सूक्ष्म दृष्टि
का प्रतीक मानी जाती हैं।
संदेश है—भीड़ के
शोर में भटकने के
बजाय लक्ष्य को स्पष्ट देखो।
4. एकदंत — अच्छी
बात
ग्रहण
करो,
बुराई
छोड़
दो
: एक दांत को दृढ़ता
और विवेक से जोड़ा जाता
है। इसे इस रूप
में भी समझा जा
सकता है कि जीवन
में उपयोगी को बचाएं और
अनावश्यक को त्यागें।
5. लंबोदर — सहनशीलता
और
समावेश
: गणेश जी का बड़ा
उदर जीवन के अनुभवों,
सुख-दुख और परिस्थितियों
को समाहित करने की क्षमता
का प्रतीक माना जाता है।
समाज में मतभेद हों,
लेकिन मन में समावेश
होना चाहिए।
6. सूंड — परिस्थिति
के
अनुसार
लचीलापन
: हाथी की सूंड अत्यंत
शक्तिशाली होने के साथ
बेहद सूक्ष्म काम भी कर
सकती है। संदेश—जहां
शक्ति जरूरी हो वहां दृढ़
बनो, जहां संवेदनशीलता चाहिए
वहां कोमल रहो।
7. छोटा वाहन
मूषक
— अहंकार
नहीं,
नियंत्रण
जरूरी
: विशालकाय गणेश का वाहन
छोटा मूषक है। इसे
इस संदेश से जोड़ा जा
सकता है कि व्यक्ति
कितना भी बड़ा क्यों
न हो, उसे अपने
भीतर के चंचल मन
और इच्छाओं पर नियंत्रण रखना
चाहिए।
8. प्रथम पूज्य
— पद
से
पहले
पात्रता
: गणेश को प्रथम पूज्य
होने का भाव यह
संदेश देता है कि
किसी व्यवस्था में सबसे आगे
वही होना चाहिए जो
बुद्धि, विवेक और जिम्मेदारी का
परिचय दे।
9. माता-पिता
की
परिक्रमा
— परिवार
का
सम्मान
: तीनों लोकों की परिक्रमा के
बजाय माता-पिता की
परिक्रमा करने वाली कथा
परिवार, माता-पिता के
सम्मान और रिश्तों की
प्राथमिकता का संदेश देती
है।
10. विघ्नहर्ता — समस्या
से
भागो
नहीं,
समाधान
खोजो
: गणेश का ‘विघ्नहर्ता’ स्वरूप
हमें सिखाता है कि बाधाओं
को केवल दुर्भाग्य मानकर
बैठने के बजाय बुद्धि
और विवेक से उनका समाधान
तलाशना चाहिए।
11. मोदक — परिश्रम
के
बाद
आनंद
: मोदक को ज्ञान और
साधना से मिलने वाले
आनंद का प्रतीक भी
माना जाता है। संदेश
यह कि उपलब्धि का
वास्तविक आनंद परिश्रम और
साधना के बाद ही
मिलता है।
12. लाल रंग
— ऊर्जा
और
सक्रियता
: गणपति पूजा में लाल
रंग का विशेष महत्व
माना जाता है। इसे
ऊर्जा, उत्साह और कर्मशीलता के
प्रतीक के रूप में
देखा जा सकता है।
माता-पिता में देख लिया पूरा संसार
गणेश और कार्तिकेय
से जुड़ी कथा में बुद्धि
और विवेक की अद्भुत व्याख्या
मिलती है। तीनों लोकों
की परिक्रमा की चुनौती मिलने
पर कार्तिकेय अपने मयूर पर
निकल पड़े, जबकि गणेश ने
अपने माता-पिता शिव-पार्वती की परिक्रमा कर
कहा कि उनके लिए
माता-पिता ही संपूर्ण
संसार हैं। संदेश साफ
है—सफलता केवल गति से
नहीं, सही दृष्टि से
मिलती है। यही गणेश
को बुद्धि का देव बनाती
है।
मिट्टी की प्रतिमा, अमर संदेश
गणेशोत्सव के दस दिन
केवल पूजा-अर्चना के
दिन नहीं होते। घरों
से लेकर सार्वजनिक पंडालों
तक गणपति की स्थापना के
साथ भक्ति, संगीत, आरती और सामाजिक
सहभागिता का वातावरण बनता
है। लाल पुष्प, दूर्वा,
सिंदूर और मोदक से
बप्पा का श्रृंगार होता
है। धार्मिक परंपरा में गणेश को
21 संख्या प्रिय मानी गई है।
इसलिए पूजा में 21 दूर्वा,
21 पत्र अथवा 21 प्रकार की अर्पण सामग्री
का विधान कई स्थानों पर
मिलता है। गणपति के
विभिन्न नामों का स्मरण भी
इसी परंपरा का हिस्सा है।
फिर आता है अनंत
चतुर्दशी का दिन। ढोल-नगाड़ों और ‘गणपति बप्पा
मोरया’ के जयघोष के
बीच प्रतिमा विसर्जित होती है। मिट्टी
से बने गणपति फिर
उसी प्रकृति में विलीन हो
जाते हैं, जहां से
उनका सृजन हुआ था।
यह विसर्जन एक गहरा जीवन-संदेश छोड़ जाता है—आगमन उत्सव है
तो प्रस्थान भी स्वीकार्यता का
संस्कार है।
चतुर्थी पर चंद्रमा से क्यों बचते हैं?
गणेश चतुर्थी के
साथ चंद्रदर्शन से जुड़ी धार्मिक
मान्यता भी है। वाराणसी
में 14 सितंबर को चंद्रदर्शन का
वर्जित समय सुबह 8:37 से
शाम 7:46 बजे तक बताया
गया है। मान्यता है
कि इस अवधि में
चंद्रमा के दर्शन से
मिथ्या आरोप या कलंक
का सामना करना पड़ सकता
है। इसके पीछे स्यमंतक
मणि से जुड़ी पौराणिक
कथा प्रचलित है।
हर शुरुआत में क्यों आते हैं गणपति?
दरअसल, गणेश पूजन भारतीय
संस्कृति का एक गहरा
मनोवैज्ञानिक संदेश भी है। किसी
भी कार्य को शुरू करने
से पहले मनुष्य को
अपने भीतर की बाधाओं—अहंकार, क्रोध, लोभ, मोह और
अविवेक—पर विजय पानी
होती है। इसलिए ‘श्री
गणेशाय नमः’ लिखना केवल
परंपरा निभाना नहीं, बल्कि यह संकल्प लेना
है कि कार्य की
शुरुआत बुद्धि से होगी, रास्ता
विवेक से चुना जाएगा
और सफलता मिलने पर अहंकार को
स्वयं पर हावी नहीं
होने दिया जाएगा। काशी
की गलियों से लेकर देश-दुनिया के करोड़ों घरों
तक 14 सितंबर को यही आस्था
गूंजेगी— गणपति बप्पा मोरया! और हर नई
शुरुआत के साथ फिर
लिखा जाएगा— श्री गणेशाय नमः।
घर में कैसे करें गणपति की स्थापना और पूजा?
घर में गणपति
स्थापित करने वाले श्रद्धालुओं
के लिए गणेश महोत्सव
के दस दिन विशेष
अनुशासन और सात्विकता के
माने जाते हैं। सुबह
स्नान आदि के बाद
स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान
गणेश की पूजा करनी
चाहिए। शाम को भी
दीपक जलाकर आरती करने की
परंपरा है। पूजन में
भगवान गणेश को दूर्वा,
पीले फूल, सिंदूर और
मोदक अर्पित करना विशेष शुभ
माना जाता है। मोदक
उपलब्ध न हो तो
लड्डू का भोग लगाया
जा सकता है। भगवान
को पीले वस्त्र भी
अर्पित किए जा सकते
हैं। पूजा के बाद
आरती कर प्रसाद वितरित
करना चाहिए। श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य और
परंपरा के अनुसार गणेश
स्तुति, गणेश अथर्वशीर्ष अथवा
गणेश मंत्रों का पाठ कर
सकते हैं।
दस दिन सात्विकता का भी संकल्प
गणेश महोत्सव के
दौरान घर में पवित्रता
और सात्विकता बनाए रखने की
परंपरा है। भोजन भी
सात्विक रखने की सलाह
दी जाती है। गणपति
की स्थापना करने वाले परिवारों
में इन दिनों मांस,
मदिरा तथा प्याज-लहसुन
से परहेज करने की धार्मिक
परंपरा कई स्थानों पर
निभाई जाती है। भोजन
तैयार होने के बाद
पहले भगवान गणेश को भोग
लगाने और उसके बाद
उसे प्रसाद के रूप में
ग्रहण करने की परंपरा
भी है।
अखंड दीपक से लेकर आरती तक
गणपति स्थापना वाले घरों में
पूरे महोत्सव के दौरान घी
का अखंड दीपक जलाने
की परंपरा भी बताई जाती
है। सुबह और शाम
कपूर अथवा दीपक से
भगवान गणेश की आरती
करनी चाहिए। गणेशजी को दूर्वा अत्यंत
प्रिय मानी जाती है।
इसलिए पूजन में दूर्वा
अर्पित करना महत्वपूर्ण माना
गया है। इसी तरह
मोदक को गणपति का
प्रिय नैवेद्य माना जाता है।
मनचाहा विवाह चाहते हैं तो करें यह गणेश उपाय
गणेश महोत्सव को
विघ्नों के निवारण का
पर्व माना जाता है।
विवाह में बाधा आ
रही हो या मनचाहा
जीवनसाथी मिलने की कामना हो
तो श्रद्धालु गणेश महोत्सव के
दौरान विशेष पूजा कर सकते
हैं। इसके लिए भगवान
गणेश को पीले वस्त्र,
पीले फूल और मोदक
अथवा लड्डू अर्पित करें। इसके बाद ‘ॐ
विघ्नहराय नमः’ मंत्र का
108 बार जाप कर शीघ्र
विवाह और मनचाहे जीवनसाथी
की कामना से प्रार्थना करें।
पूजा में अर्पित पीले
वस्त्र को सुरक्षित रखने
की परंपरा भी कुछ धार्मिक
मान्यताओं में बताई गई
है। यह उपाय गणेश
महोत्सव के किसी भी
दिन सुबह किया जा
सकता है।
संतान सुख की कामना के लिए फल अर्पित करने की परंपरा
संतान प्राप्ति की इच्छा रखने
वाले दंपतियों के लिए भी
गणेश महोत्सव में विशेष पूजा
की परंपरा बताई जाती है।
इसके लिए केला, सेब,
अंगूर और नाशपाती जैसे
फलों की माला बनाकर
भगवान गणेश को अर्पित
की जा सकती है।
इसके बाद संतान गणपति
स्तोत्र का पाठ और
‘ॐ उमापुत्राय नमः’ मंत्र का
108 बार जाप करने की
परंपरा है। पति-पत्नी
साथ बैठकर संतान सुख की कामना
से गणपति की आराधना करें।
पूजा के बाद अर्पित
फलों को प्रसाद के
रूप में बच्चों में
बांटने की परंपरा भी
बताई जाती है। यह
उपाय तीन दिनों तक
करने की धार्मिक मान्यता
कही गई है। हालांकि
संतान संबंधी किसी स्वास्थ्य समस्या
में ऐसे धार्मिक उपाय
चिकित्सा परामर्श का विकल्प नहीं
हैं।
मकान या संपत्ति की इच्छा हो तो लाल फूल चढ़ाएं
मकान खरीदने, नया
घर बनाने अथवा संपत्ति संबंधी
इच्छा की पूर्ति के
लिए गणेश महोत्सव में
एक विशेष उपाय बताया गया
है। भगवान गणेश को लाल
फूलों की माला, विशेषकर
गुड़हल या गुलाब के
फूल अर्पित करें। इसके साथ लाल
फल, लाल वस्त्र और
तांबे का सिक्का चढ़ाएं।
इसके बाद ‘ॐ सर्वसौख्यप्रदाय
नमः’ मंत्र का 108 बार जाप कर
संपत्ति और सुख-समृद्धि
की कामना करें। धार्मिक परंपराओं में इन उपायों
को आस्था और संकल्प से
जोड़ा जाता है, इसलिए
इन्हें निश्चित परिणाम की गारंटी के
बजाय श्रद्धा-आधारित साधना के रूप में
देखना उचित है।
गणपति पूजा में दूर्वा और मोदक का विशेष महत्व
भगवान गणेश के पूजन
में कई वस्तुओं का
महत्व बताया गया है, लेकिन
दूर्वा और मोदक का
स्थान विशेष माना जाता है।
दूर्वा गणेशजी को अर्पित करने
की प्राचीन परंपरा है। मोदक को
ज्ञान और आनंद का
प्रतीक मानते हुए भगवान गणेश
को इसका भोग लगाया
जाता है। पीले फूलों
की माला भी अर्पित
की जा सकती है।
विशेष मनोकामना के लिए फलों
की माला चढ़ाने की
परंपरा भी कुछ क्षेत्रों
में प्रचलित है।
25 सितंबर को होगी गणपति की विदाई
दस दिनों तक पूजा-अर्चना, आरती और भक्ति के बाद 25 सितंबर, शुक्रवार को अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति विसर्जन होगा। श्रद्धालु अपनी परंपरा और संकल्प के अनुसार प्रतिमा का विसर्जन करेंगे। विसर्जन से पहले गणपति की अंतिम पूजा, आरती और नैवेद्य अर्पित किया जाएगा। इसके बाद श्रद्धालु उन्हें अगले वर्ष फिर आने का निमंत्रण देते हुए विदाई देंगे— “गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ।” गणेशोत्सव का यही भाव इसे अन्य पर्वों से अलग बनाता है—आगमन में मंगलकामना, दस दिनों की साधना में श्रद्धा और विदाई में अगले वर्ष पुनः आने की उम्मीद।


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