Monday, 19 October 2026

लोकतंत्र की हत्या का रावण आखिर कब मरेगा?

लोकतंत्र की हत्या का रावण आखिर कब मरेगा? 

साधुओं पर गोलियां, आपातकाल की बंदिशें और आज की सियासी जुबानी जंग... सत्ता बदली, चेहरे बदले, मगर लोकतंत्र की हत्या का शोर नहीं बदला. मतलब साफ है हर दौर में कोई न कोई लोकतंत्र का हत्यारा करार दिया जाता है। कभी सत्ता कठघरे में होती है, कभी विपक्ष। सवाल यह कि लोकतंत्र आखिर है क्या बला, जो हर सरकार में मर जाता है और अगली राजनीतिक लड़ाई में फिर जिंदा हो उठता है? कहने का अभिप्राय यह है की रावण का पुतला हर साल जलता है, लेकिन लोकतंत्र की हत्या का शोर कभी नहीं मरता। 1966 में दिल्ली में साधुओं पर पुलिस की गोलीबारी से लेकर 1975 की इमरजेंसी और आज की सियासी जुबानी जंग तक, हर दौर में लोकतंत्र का हत्यारा बदलता रहा। सत्ता बदली, चेहरे बदले, मगर आरोप वही रहे। सवाल है—क्या हर राजनीतिक हार लोकतंत्र की हत्या है? क्या बहुमत मनमानी का लाइसेंस है? लोकतंत्र आखिर है क्या बला, जो हर सरकार में मरता और विपक्ष के हाथों फिर जिंदा हो उठता है? लोकतंत्र केवल चुनाव नहीं, अधिकारों, स्वतंत्र संस्थाओं और जवाबदेही का नाम है। सत्ता को विरोध कुचलने का अधिकार नहीं, विपक्ष को हर असहमति पर तानाशाही का तमगा लगाने की छूट नहीं। लोकतंत्र की हत्या का आरोप लगाने वालों से भी पूछिए—किसका अधिकार छीना, संविधान की कौन-सी मर्यादा टूटी और प्रमाण क्या हैं? रावण का पुतला जलाने से बुराई खत्म नहीं होती। लोकतंत्र का हत्यारा भी तभी मरेगा, जब सत्ता जवाबदेह होगी, विपक्ष जिम्मेदार और जनता नारों के बजाय तथ्यों से फैसला करेगी...

सुरेश गांधी

रावण हर साल जलता है। दशहरे की शाम मैदानों में उसके पुतले खड़े होते हैं। तीर चलता है, आग लगती है, आतिशबाजी होती है और बुराई पर अच्छाई की जीत का जयघोष गूंज उठता है। फिर अगले साल उसी रावण का पुतला नए आकार में तैयार होता है। चेहरे पर वही दस सिर, हाथ में वही हथियार और अंत में वही अग्निबाण! मानो बुराई का अंत नहीं, उसका सालाना आयोजन तय हो गया हो। भारतीय राजनीति में लोकतंत्र की हत्या का विमर्श भी कुछ ऐसा ही है। यहां भी हर दौर में लोकतंत्र की मौत की घोषणा होती है। कभी सत्ता को उसका हत्यारा बताया जाता है, कभी विपक्ष को लोकतांत्रिक संस्थाओं का दुश्मन करार दिया जाता है। कभी संविधान खतरे में दिखाई देता है, कभी लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण पर चिंता जताई जाती है। सरकार बदलती है, सत्ता के चेहरे बदलते हैं, राजनीतिक नारे बदलते हैं, लेकिन लोकतंत्र की हत्या का आरोप अपनी जगह बना रहता है।

दिलचस्प यह कि लोकतंत्र हर बार मर जाता है, मगर उसका जनाजा उठने से पहले ही वह फिर जीवित दिखाई देने लगता है। चुनाव आते हैं, जनता मतदान करती है, सरकारें बनती हैं, विपक्ष सड़क से संसद तक संघर्ष करता है और फिर किसी नए प्रसंग पर वही घोषणा गूंजती है—लोकतंत्र की हत्या हो गई! आखिर यह कैसा प्राणी है, जो हर सत्ता में मरता है और हर विपक्ष के हाथों फिर जी उठता है? क्या लोकतंत्र की हत्या वास्तव में हो रही है, या उसकी हत्या का नारा राजनीति का ऐसा हथियार बन चुका है, जिसे हर दल अपनी जरूरत के मुताबिक निकाल लेता है? और सबसे बड़ा सवाल—लोकतंत्र आखिर है क्या बला? इन सवालों का जवाब आज की सियासी बयानबाजी में तलाशने से पहले इतिहास की उन गलियों में लौटना होगा, जहां लोकतंत्र, सत्ता और नागरिक अधिकारों के बीच टकराव ने देश की राजनीति को निर्णायक मोड़ दिए।

संसद के दरवाजे तक पहुंचे साधु, गोलियों की गूंज से दहली दिल्ली

सात नवंबर 1966। दिल्ली में गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग को लेकर साधु-संतों और दूसरे प्रदर्शनकारियों का बड़ा जमावड़ा हुआ। आंदोलन संसद के आसपास पहुंचा। प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़की और पुलिस ने गोलीबारी की। लोगों की जान गई। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार पर सवाल उठे। घटना को लेकर वर्षों से राजनीतिक और सामाजिक विमर्श चलता रहा है। इस प्रसंग के साथ कई दावे भी बार-बार दोहराए जाते हैं। संसद के गेट तक पहुंचे साधुओं, गोलियों से छलनी हुए प्रदर्शनकारियों और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन तक शव पड़े होने की भयावह तस्वीरें राजनीतिक भाषणों और सोशल मीडिया की चर्चाओं में सामने आती रही हैं। लेकिन ऐसी तस्वीरों और संख्या संबंधी दावों का मूल्यांकन प्रमाणित ऐतिहासिक अभिलेखों के आधार पर ही किया जाना चाहिए। इस घटना में हुई मौतों की संख्या को लेकर बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावों को प्रमाणित तथ्य मानना उचित नहीं है। फिर भी, इस घटना का मूल प्रश्न आज भी प्रासंगिक है। जब नागरिक अपनी मांग लेकर सड़कों पर उतरते हैं, तो सरकार की जिम्मेदारी कहां से शुरू होती है और उसकी ताकत की सीमा कहां समाप्त होती है? क्या कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर बल प्रयोग की हर कार्रवाई उचित हो जाती है? क्या प्रदर्शनकारियों की मांगों से असहमति उनकी जान की कीमत तय करने का अधिकार दे देती है?nनिश्चित रूप से नहीं।bसरकार को कानून-व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार है, लेकिन इस अधिकार का इस्तेमाल कानून और आवश्यकता की सीमाओं के भीतर ही होना चाहिए। पुलिस की गोलीबारी में नागरिकों की जान जाए तो यह सवाल पूछना जरूरी है कि कार्रवाई किन परिस्थितियों में हुई, क्या बल प्रयोग आवश्यक था और क्या कम कठोर विकल्प उपलब्ध थे।यहीं से लोकतंत्र की असली परीक्षा शुरू होती है। सत्ता की ताकत केवल इस बात से नहीं मापी जाती कि वह कितने बड़े प्रदर्शन को नियंत्रित कर सकती है, बल्कि इससे भी कि वह अपने विरोधियों के अधिकारों और जीवन की रक्षा कैसे करती है। हालांकि, पुलिस की गोलीबारी और लोकतंत्र की संपूर्ण हत्या को एक ही अर्थ में देखना भी उचित नहीं होगा। किसी घटना में नागरिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन हुआ हो सकता है, लेकिन पूरे लोकतांत्रिक ढांचे की स्थिति का आकलन व्यापक तथ्यों और संस्थागत परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए। इतिहास की तारीखें भी यहां महत्वपूर्ण हैं। साधु आंदोलन की चर्चित घटना 1974 में नहीं, बल्कि 1966 में हुई थी। वर्ष 1974 भारतीय राजनीति में एक अलग जनांदोलन के लिए याद किया जाता है, जिसने तत्कालीन सत्ता को चुनौती दी और देश को आपातकाल की ओर बढ़ते राजनीतिक संघर्ष की पृष्ठभूमि से परिचित कराया।

1974 : जब जनता ने सत्ता से पूछा—आखिर जवाबदेह कौन?

वर्ष 1974 का भारत राजनीतिक असंतोष से गुजर रहा था। महंगाई, भ्रष्टाचार और शासन व्यवस्था के प्रति नाराजगी के बीच छात्र आंदोलन उभरे। गुजरात के नवनिर्माण आंदोलन और बिहार में छात्रों के आंदोलन ने देश की राजनीति को नई दिशा दी। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने इस असंतोष को व्यापक जनांदोलन का स्वर दिया। यह केवल सरकार बदलने की मांग नहीं थी। आंदोलन के केंद्र में व्यवस्था की जवाबदेही, भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष और राजनीति में नैतिकता की बहाली जैसे प्रश्न भी थे। सड़कों पर उमड़ती भीड़ सत्ता को चुनौती दे रही थी और सत्ता के सामने यह सवाल खड़ा था कि जनता की असहमति को राजनीतिक विरोध माना जाएगा या व्यवस्था के लिए खतरा? लोकतंत्र में जनांदोलन का महत्व इसी जगह है। जनता केवल पांच साल में एक बार मतदान करने वाली भीड़ नहीं है। वह शासन की असफलताओं पर सवाल उठा सकती है, नीतियों का विरोध कर सकती है और अपनी मांगों के समर्थन में संगठित हो सकती है। लेकिन जनांदोलन भी लोकतांत्रिक मर्यादाओं से परे नहीं होते। लोकतंत्र सरकार को मनमानी की अनुमति नहीं देता, तो आंदोलनकारियों को भी हिंसा या कानून तोड़ने की असीमित छूट नहीं देता। सरकार और आंदोलन—दोनों की कसौटी संविधान, कानून और नागरिक अधिकार ही होने चाहिए। 1974 के आंदोलन ने जिस राजनीतिक बेचैनी को स्वर दिया, वह अगले वर्ष एक ऐसे मोड़ पर पहुंची, जिसे भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में आज भी सबसे गंभीर घटनाक्रमों में गिना जाता है।

25 जून 1975 : जब लोकतंत्र पर आपातकाल की छाया पड़ी

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 25 जून 1975 की रात केवल एक तारीख नहीं, एक चेतावनी की तरह दर्ज है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने आपातकाल लागू किया। विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां हुईं, प्रेस पर सेंसरशिप लगी और नागरिक स्वतंत्रताओं पर गंभीर प्रतिबंध लगाए गए। उस दौर में सत्ता के केंद्रीकरण और राजनीतिक विरोध को सीमित किए जाने ने लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने बुनियादी प्रश्न खड़े कर दिए। सरकार के समर्थकों ने व्यवस्था, स्थिरता और अनुशासन की जरूरतों का तर्क दिया, लेकिन आपातकाल के दौरान नागरिक अधिकारों के संकुचन और विपक्ष के दमन ने इस तर्क की लोकतांत्रिक सीमाओं को उजागर किया। प्रेस का काम सत्ता की प्रशंसा करना भर नहीं है। उसका दायित्व सरकार से सवाल पूछना, जनता की समस्याओं को सामने लाना और सत्ता को जवाबदेह बनाए रखना भी है। जब खबरों पर सेंसरशिप लगे, राजनीतिक विरोध सीमित हो और नागरिक स्वतंत्रताओं पर अंकुश लगे, तब लोकतंत्र केवल चुनावी व्यवस्था बनकर रह जाने का खतरा पैदा होता है। आपातकाल ने भारतीय लोकतंत्र को यह सबक दिया कि संविधान के भीतर मौजूद असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल भी लोकतांत्रिक मूल्यों की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। कोई व्यवस्था केवल इसलिए लोकतांत्रिक नहीं रह जाती कि उसके पास संविधान की किताब मौजूद है। सवाल यह भी है कि उस संविधान की भावना और उसमें निहित अधिकारों के साथ व्यवहार कैसा हो रहा है। वर्ष 1977 में चुनाव हुए। जनता ने इंदिरा गांधी की सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया। यह भारतीय लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण घड़ी थी। जिस जनता की स्वतंत्रता पर अंकुश लगा था, उसी जनता ने मताधिकार के माध्यम से अपना फैसला सुनाया। लोकतंत्र की ताकत यहीं दिखाई दी। सत्ता कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, यदि जनता के पास स्वतंत्र रूप से सरकार चुनने और बदलने का अधिकार सुरक्षित है, तो वह सत्ता को चुनौती दे सकती है। लेकिन इतिहास का यह अध्याय एक और सवाल छोड़ गया। जिस लोकतंत्र को आपातकाल के दौरान घायल बताया गया, वह चुनाव के बाद फिर जीवित कैसे हुआ? क्या लोकतंत्र केवल सरकार बदलने से बहाल हो जाता है? या उसे जीवित रखने के लिए नागरिक स्वतंत्रताओं, स्वतंत्र संस्थाओं और सत्ता की जवाबदेही को लगातार सुरक्षित रखना पड़ता है? जवाब स्पष्ट है। चुनाव लोकतंत्र की बहाली का महत्वपूर्ण माध्यम है, लेकिन लोकतंत्र की सेहत केवल चुनाव से तय नहीं होती।

लोकतंत्र आखिर है क्या बला?

राजनीति में इस शब्द का इस्तेमाल इतनी बार हो चुका है कि इसकी गंभीरता कई बार नारों के शोर में खो जाती है।कोई नेता चुनाव हारता है तो कहता है कि लोकतंत्र खतरे में है। कोई सरकार बहुमत के आधार पर फैसला लेती है तो विपक्ष उसे तानाशाही बताता है। कोई आंदोलनकारी सड़क पर उतरता है तो सत्ता उसे व्यवस्था के लिए चुनौती मानती है। कभी सरकार विपक्ष पर संसद नहीं चलने देने का आरोप लगाती है, तो कभी विपक्ष सरकार पर चर्चा से बचने का। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या लोकतंत्र का अर्थ वही है, जो सत्ता में बैठे लोग बताएं? या वही, जिसे विपक्ष अपने राजनीतिक संघर्ष में परिभाषित करे? दरअसल, लोकतंत्र किसी एक राजनीतिक दल की परिभाषा का मोहताज नहीं है। लोकतंत्र वह व्यवस्था है, जिसमें जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है, सरकार संविधान और कानून के दायरे में काम करती है, न्यायपालिका स्वतंत्र रहती है, मीडिया सवाल पूछ सकता है और नागरिक बिना अनुचित भय के अपनी बात रख सकते हैं। इसमें बहुमत का सम्मान होता है, लेकिन अल्पमत के अधिकार भी सुरक्षित रहते हैं।

चुनाव लोकतंत्र का प्रवेश-द्वार है, पूरा लोकतंत्र नहीं।

बहुमत सरकार बनाने का अधिकार देता है, संविधान से ऊपर उठने का नहीं। विपक्ष को सवाल पूछने का अधिकार देता है, लेकिन हर चुनावी हार को लोकतंत्र की हत्या बताने का प्रमाणपत्र नहीं। सरकार को कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी देता है, लेकिन असहमति की हर आवाज को कुचल देने का अधिकार नहीं। लोकतंत्र की असली परीक्षा तब होती है, जब सत्ता अपनी आलोचना सुनती है; जब विपक्ष अपनी हार स्वीकार करता है; जब पत्रकार बिना अनुचित दबाव के सवाल पूछते हैं; जब अदालतें सरकार के फैसलों की स्वतंत्र समीक्षा करती हैं और जब किसी नागरिक के अधिकारों की रक्षा उसके राजनीतिक विचारों से ऊपर उठकर की जाती है। यानी लोकतंत्र कोई निर्जीव इमारत नहीं, जिस पर केवल चुनाव के दिन ताला खुले। वह नागरिकों के अधिकारों, संस्थाओं की स्वतंत्रता, कानून के शासन और सत्ता की जवाबदेही से चलने वाली सतत प्रक्रिया है।

हर दौर में लोकतंत्र की हत्या—आरोप या राजनीतिक हथियार?

आज की राजनीति में लोकतंत्र की हत्या का आरोप किसी एक दल तक सीमित नहीं है। सत्ता पक्ष अपने विरोधियों के आचरण को लोकतांत्रिक मर्यादाओं के विरुद्ध बताता है, जबकि विपक्ष सरकार के फैसलों में तानाशाही के संकेत तलाशता है। कभी संविधान बचाने की अपील होती है, कभी लोकतंत्र को कमजोर करने का आरोप लगाया जाता है। इन आरोपों को एक झटके में खारिज कर देना भी गलत होगा। इतिहास बताता है कि लोकतांत्रिक अधिकारों पर वास्तविक खतरे पैदा हो सकते हैं। सरकारें अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर सकती हैं, संस्थाओं की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है और विरोध की आवाज दबाने के प्रयास हो सकते हैं। लेकिन दूसरी तरफ, हर राजनीतिक असहमति को लोकतंत्र की हत्या कहना भी उतना ही अनुचित है। किसी कानून से असहमति, किसी सरकारी नीति का विरोध या किसी चुनाव में हार अपने आप लोकतंत्र के अंत का प्रमाण नहीं है। समस्या तब पैदा होती है, जब राजनीतिक आरोपों को प्रमाणों से ऊपर रख दिया जाता है। लोकतंत्र की हत्या का दावा करने वाला नेता यदि यह न बताए कि किस अधिकार का उल्लंघन हुआ, संविधान के किस प्रावधान का अतिक्रमण हुआ और उसके आरोप के समर्थन में क्या प्रमाण हैं, तो उसकी बात राजनीतिक नारे से आगे नहीं बढ़ पाती। यहां सत्ता और विपक्ष, दोनों के लिए एक ही कसौटी होनी चाहिए। यदि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर अनुचित बल प्रयोग होता है, पत्रकारों को केवल आलोचना के कारण निशाना बनाया जाता है, विपक्ष को गैरकानूनी तरीके से राजनीतिक गतिविधियों से रोका जाता है या संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता पर वास्तविक चोट पहुंचती है, तो लोकतंत्र पर खतरे की आशंका गंभीरता से जांची जानी चाहिए।bइसके विपरीत, यदि किसी दल की राजनीतिक मांग स्वीकार नहीं होती, किसी नेता को कानूनी प्रक्रिया का सामना करना पड़ता है या किसी चुनाव में जनता उसे नकार देती है, तो केवल इन आधारों पर लोकतंत्र की हत्या का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। हर मामले की परिस्थितियों और उपलब्ध प्रमाणों को देखना आवश्यक है। लोकतंत्र की रक्षा का दावा करने वालों से भी उतने ही कठिन सवाल पूछे जाने चाहिए, जितने लोकतंत्र पर खतरा पैदा करने के आरोपित लोगों से।

सत्ता बदलती है, लोकतंत्र के हत्यारे का नाम भी बदल जाता है!

भारतीय राजनीति की विडंबना देखिए। जो दल सत्ता में रहते हुए अपने फैसलों को जनादेश का परिणाम बताता है, वही विपक्ष में पहुंचकर संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठा सकता है। जो नेता कल तक विरोध-प्रदर्शन को व्यवस्था के लिए चुनौती बता रहा था, वही आज सड़क पर उतरकर विरोध के अधिकार की दुहाई देता है।इसका अर्थ यह नहीं कि सत्ता और विपक्ष के सभी आरोप गलत हैं। कई बार परिस्थितियां सचमुच बदलती हैं और किसी दल का रुख भी उन परिस्थितियों के अनुरूप बदल सकता है। लेकिन यही वह जगह है, जहां लोकतांत्रिक मूल्यों की निरंतरता की परीक्षा होती है। यदि कोई अधिकार केवल तब तक महत्वपूर्ण है, जब तक वह अपने पक्ष में इस्तेमाल हो रहा है, तो वह लोकतांत्रिक मूल्य नहीं, राजनीतिक सुविधा है। यदि मीडिया की स्वतंत्रता केवल अपने पक्ष की खबरों तक सीमित है, यदि विरोध का अधिकार केवल अपने समर्थकों के लिए है और यदि संविधान की चिंता केवल सत्ता से बाहर रहने पर जागती है, तो लोकतंत्र का विमर्श खोखला हो जाता है। लोकतंत्र की रक्षा का अर्थ केवल अपने विरोधियों की गलतियां गिनाना नहीं, बल्कि अपने पक्ष की गलतियों को भी उसी ईमानदारी से स्वीकार करना है। इंदिरा गांधी के समय आपातकाल पर सवाल उठाना आवश्यक है। 1966 के साधु आंदोलन में पुलिस की कार्रवाई की ऐतिहासिक समीक्षा भी जरूरी है। इसी तरह आज की किसी सरकार के फैसले से यदि नागरिक अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, तो उस पर सवाल उठाना भी उतना ही जरूरी है। इतिहास किसी पुरानी सरकार को दोषमुक्त नहीं करता और वर्तमान सरकार को केवल उसके जनादेश के कारण संविधान से ऊपर नहीं उठाता। लोकतंत्र की कसौटी व्यक्ति, पार्टी या कालखंड देखकर नहीं बदल सकती।

क्या लोकतंत्र केवल गोली से मरता है?

लोकतंत्र की हत्या की चर्चा होते ही अक्सर गोलीबारी, गिरफ्तारियों और आपातकाल जैसी घटनाएं सामने आती हैं। इन घटनाओं की गंभीरता अपनी जगह है। लेकिन लोकतंत्र को कमजोर करने वाले खतरे केवल उन्हीं रूपों में सामने नहीं आते, जिनमें हिंसा साफ दिखाई देती है।लोकतंत्र धीरे-धीरे भी कमजोर हो सकता है—जब संस्थाओं की स्वतंत्रता घटने लगे, जब असहमति को देशविरोध के बराबर मान लिया जाए, जब नागरिक अधिकारों के बजाय राजनीतिक निष्ठा को महत्व मिलने लगे और जब सत्ता से सवाल पूछने वालों को शत्रु की तरह देखा जाने लगे। इसके उलट, हर विवाद या संस्थागत टकराव को लोकतंत्र के पतन का निर्णायक प्रमाण मान लेना भी सही नहीं होगा। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार, विपक्ष, न्यायपालिका, मीडिया और नागरिक समाज के बीच मतभेद होना स्वाभाविक है। महत्वपूर्ण यह है कि इन मतभेदों का समाधान संविधान, कानून और स्वतंत्र संस्थाओं के माध्यम से हो। लोकतंत्र की हत्या का सवाल इसलिए केवल यह नहीं है कि गोली चली या नहीं, किसी को गिरफ्तार किया गया या नहीं। सवाल यह भी है कि कार्रवाई का आधार क्या था, कानून का पालन हुआ या नहीं, अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायिक रास्ता उपलब्ध था या नहीं और सत्ता जवाबदेही स्वीकार कर रही है या नहीं। इसलिए लोकतंत्र की सेहत का आकलन न केवल किसी एक घटना से किया जा सकता है, न केवल किसी एक नेता के भाषण से।

लोकतंत्र का सबसे बड़ा दुश्मन कौन?

क्या लोकतंत्र का सबसे बड़ा दुश्मन कोई तानाशाह है? कोई राजनीतिक दल? कोई विचारधारा? या फिर जनता की उदासीनता? इतिहास बताता है कि सत्ता का निरंकुश होना लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है। लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं के कमजोर होने में नागरिकों की उदासीनता भी भूमिका निभा सकती है। जब जनता सवाल पूछना छोड़ देती है, जब राजनीतिक समर्थक अपने नेता की हर गलती को सही ठहराने लगते हैं और जब संस्थाओं के बजाय व्यक्तियों के प्रति अंधनिष्ठा बढ़ती है, तब लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर होने लगती है। लोकतंत्र में नागरिक केवल मतदाता नहीं, निगरानीकर्ता भी हैं। उनका काम केवल अपने पसंदीदा नेता को जिताना नहीं, बल्कि जीतने के बाद उससे जवाब मांगना भी है। सरकार की उपलब्धियों का मूल्यांकन होना चाहिए, लेकिन उसकी कमियों पर पर्दा डालना लोकतांत्रिक जिम्मेदारी नहीं। विपक्ष को सरकार की आलोचना करनी चाहिए, लेकिन आलोचना को प्रमाण और तर्क से मजबूत बनाना भी उसकी जिम्मेदारी है। मीडिया को सत्ता से सवाल पूछने चाहिए, लेकिन तथ्यों की जांच और निष्पक्षता से समझौता नहीं करना चाहिए। लोकतंत्र का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच किसी एक नेता का भाषण नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था है जिसमें कोई नेता, दल या संस्था खुद को सवालों से ऊपर न समझे।

रावण का पुतला हर साल जलेगा, लोकतंत्र की हत्या का शोर भी उठेगा?

दशहरे पर रावण का पुतला जलाकर हम बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीकात्मक उत्सव मनाते हैं। लेकिन अगले साल फिर वही पुतला तैयार होता है, क्योंकि बुराई का अंत केवल प्रतीक जलाने से नहीं होता। उसके लिए उन प्रवृत्तियों को बदलना पड़ता है, जिनसे बुराई जन्म लेती है। लोकतंत्र के मामले में भी यही बात लागू होती है। केवल संविधान बचाने का नारा लगा देने से संविधान सुरक्षित नहीं हो जाता। लोकतंत्र की हत्या का आरोप लगा देने से उसकी हत्या साबित नहीं हो जाती। और किसी सरकार का चुनाव जीत लेना इस बात की गारंटी नहीं कि उसके हर फैसले में लोकतांत्रिक मूल्य सुरक्षित ही रहेंगे। इस बहस को नारों से आगे ले जाने की जरूरत है। लोकतंत्र की हत्या का आरोप लगाने वाले हर नेता से पूछा जाना चाहिए—किसका अधिकार छीना गया? संविधान के किस प्रावधान का उल्लंघन हुआ? आरोप के समर्थन में प्रमाण क्या हैं? और क्या उस मामले में न्यायिक या संवैधानिक उपचार उपलब्ध है? इन सवालों से कोई भी सत्ता, कोई भी विपक्ष और कोई भी राजनीतिक दल बच नहीं सकता। लोकतंत्र का संकट केवल तब नहीं होता, जब उसके अधिकारों पर हमला हो; संकट तब भी गहराता है, जब लोकतंत्र की हत्या का आरोप राजनीतिक तमाशे में बदल दिया जाए। जब हर पक्ष अपने विरोधी को लोकतंत्र का हत्यारा और खुद को उसका इकलौता रक्षक बताने लगे, तो जनता के सामने असली खतरे और राजनीतिक नारे के बीच अंतर करना कठिन हो जाता है। तब लोकतंत्र की बहस अधिकारों की रक्षा के बजाय आरोपों की प्रतिस्पर्धा बनकर रह जाती है।

आखिर लोकतंत्र की हत्या का यह रावण कब मरेगा?

शायद उस दिन, जब सत्ता विरोध को दुश्मनी नहीं समझेगी; जब विपक्ष हर हार को तानाशाही का प्रमाण नहीं बताएगा; जब नेता संविधान को अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार याद नहीं करेंगे और जब जनता किसी दावे को केवल इसलिए सच नहीं मान लेगी कि उसे उसका पसंदीदा नेता कह रहा है। रावण का पुतला जलाने से पहले यह जानना जरूरी है कि बुराई कहां है। उसी तरह, लोकतंत्र की हत्या का शोर सुनकर यह जानना जरूरी है कि लोकतंत्र के किस अधिकार, किस संस्था और किस संवैधानिक मर्यादा पर चोट पहुंची है। क्योंकि लोकतंत्र कोई ऐसा प्राणी नहीं, जो हर सरकार में मरता और हर विपक्ष में जिंदा हो जाता हो। वह जनता के अधिकारों, संस्थाओं की स्वतंत्रता, कानून के शासन और सत्ता की जवाबदेही से जीवित रहने वाली व्यवस्था है। और उसका सबसे बड़ा रक्षक कोई एक नेता नहीं हो सकता। लोकतंत्र तभी जीवित रहता है, जब सत्ता खुद को जनता से बड़ा नहीं समझती, विपक्ष खुद को संविधान से ऊपर नहीं मानता और नागरिक किसी भी राजनीतिक चेहरे को सवालों से परे नहीं रखते। रावण का पुतला हर साल जलता रहे, इसमें कोई बुराई नहीं। लेकिन लोकतंत्र की हत्या का रावण तभी मरेगा, जब राजनीति आरोपों से आगे बढ़कर अपने आचरण की भी परीक्षा देने को तैयार होगी।

 7 नवंबर 1966 : साधु आंदोलन और पुलिस गोलीबारी

दिल्ली में गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग को लेकर साधु-संतों और अन्य प्रदर्शनकारियों का बड़ा आंदोलन हुआ। संसद के आसपास प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़की और पुलिस ने गोलीबारी की। इस घटना ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार की भूमिका और पुलिस के बल प्रयोग पर सवाल खड़े किए। घटना से संबंधित मौतों और अन्य दावों का मूल्यांकन प्रमाणित ऐतिहासिक अभिलेखों के आधार पर किया जाना चाहिए। बड़ा सवाल: क्या कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर नागरिकों के जीवन और विरोध के अधिकार की अनदेखी की जा सकती है?

1974 : जनांदोलन ने सत्ता को दी चुनौती

महंगाई, भ्रष्टाचार और शासन व्यवस्था के प्रति असंतोष के बीच छात्र आंदोलनों ने जोर पकड़ा। बिहार में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में व्यापक जनांदोलन उभरा। आंदोलन ने सत्ता की जवाबदेही, राजनीतिक नैतिकता और नागरिक भागीदारी के सवालों को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया। यह वही दौर था, जिसने अगले वर्ष के राजनीतिक घटनाक्रम की पृष्ठभूमि तैयार की। बड़ा सवाल: क्या जनता की असहमति को सत्ता के लिए खतरा मानना चाहिए या लोकतंत्र की स्वाभाविक आवाज?

 25 जून :  1975–मार्च 1977 आपातकाल: लोकतंत्र की सबसे कठिन परीक्षा

25 जून 1975 को देश में आपातकाल लागू किया गया। विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां हुईं और प्रेस पर सेंसरशिप लगाई गई। नागरिक स्वतंत्रताओं पर गंभीर प्रतिबंध लगे और सत्ता के केंद्रीकरण को लेकर सवाल उठे। 1977 में हुए आम चुनाव में इंदिरा गांधी की सरकार सत्ता से बाहर हो गई।बड़ा सवाल: क्या केवल चुनाव करा देना पर्याप्त है, या लोकतंत्र के लिए नागरिक स्वतंत्रता, स्वतंत्र संस्थाएं और सत्ता की जवाबदेही भी जरूरी हैं? “लोकतंत्र की हत्या का आरोप लगाना आसान है, लेकिन उसे प्रमाणित करने के लिए तथ्यों और संविधान की कसौटी पर उतरना पड़ता है।”  “रावण का पुतला हर साल जलता है, लेकिन लोकतंत्र की हत्या का रावण तभी मरेगा, जब सत्ता जवाबदेह होगी, विपक्ष जिम्मेदार होगा और जनता नारों से नहीं, प्रमाणों से फैसला करेगी।”

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