चांद की चौखट पर ठहरी सुहाग की आस, छलनी में दिखेगा प्रेम का संसार
29 अक्टूबर की शाम जब काशी समेत उत्तर भारत के घरों में पूजा की तैयारियां पूरी होंगी, तब हजारों-लाखों निगाहें आसमान की ओर उठेंगी। कहीं छत पर सजी पूजा की थाली होगी, कहीं आंगन में जलता दीपक और कहीं परिवार की महिलाएं साथ बैठकर कथा सुन रही होंगी। किसी घर में पहली करवा चौथ की उत्सुकता होगी, तो कहीं वर्षों से निभाई जा रही परंपरा की परिचित आत्मीयता। चांद दिखाई देगा तो अर्घ्य के जल में उसकी छवि थरथराएगी। छलनी उठेगी, आंखें चंद्रमा को निहारेंगी और फिर उसी रोशनी में जीवनसाथी का चेहरा दिखाई देगा। दिनभर की प्रतीक्षा एक क्षण में सिमट जाएगी। लेकिन उस क्षण की सबसे बड़ी उपलब्धि व्रत का पूरा होना भर नहीं होगी। वह एक-दूसरे के लिए मंगलकामना करने, साथ के महत्व को समझने और रिश्ते की जिम्मेदारियों को फिर से स्वीकार करने का अवसर भी होगा। करवा चौथ का चांद हर वर्ष आसमान में उगता है, लेकिन उसकी सबसे सुंदर रोशनी तब धरती पर उतरती है, जब प्रेम केवल पूजा की थाली में नहीं, जीवन के व्यवहार में भी दिखाई देता है। छलनी से देखा गया चेहरा समय के साथ बदल सकता है, शृंगार के रंग उतर सकते हैं और पर्व की रस्में भी नए रूप ले सकती हैं; मगर यदि विश्वास, संवेदना और साथ निभाने का संकल्प बना रहे, तो रिश्ते की रोशनी कायम रहती है। यही करवा चौथ का शाश्वत संदेश है—चांद की प्रतीक्षा से लेकर जीवन की लंबी राह तक, प्रेम का अर्थ एक-दूसरे के लिए मंगलकामना करना और हर परिस्थिति में साथ खड़े रहने की कोशिश करना है
सुरेश गांधी
चांद हर रात निकलता है, लेकिन करवा चौथ
का चांद किसी के लिए पूरे दिन की तपस्या का उत्तर, किसी के लिए प्रेम की प्रतीक्षा
का अंत और किसी के लिए सात जन्मों तक साथ निभाने के वादे की सबसे खूबसूरत तस्वीर बन
जाता है। आसमान में चांद का उभरना एक खगोलीय घटना है, लेकिन उसके दीदार के लिए सजी
आंखों में उतरने वाली चमक रिश्तों की दुनिया का अपना चांद है। छलनी की ओट से चंद्रमा
और फिर जीवनसाथी का चेहरा निहारती सुहागिन के लिए वह क्षण केवल एक धार्मिक रस्म नहीं,
बल्कि भावनाओं, विश्वास, समर्पण और साथ की कामना का उत्सव है। इसी अनूठे भावलोक का
नाम है करवा चौथ। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी पर मनाया जाने वाला यह पर्व
इस वर्ष 29 अक्टूबर, गुरुवार को मनाया जाएगा। उत्तर भारत के घरों में सुबह की पहली
किरण से पहले सरगी की थाली सजेगी, हाथों में मेहंदी की लाली दमकेगी, मांग में सिंदूर
और कलाइयों में चूड़ियों की खनक होगी। दिन चढ़ने के साथ व्रत की कठिनाई और चंद्र दर्शन
की प्रतीक्षा बढ़ेगी। शाम को शिव-पार्वती, गणेश और करवा माता की पूजा होगी। फिर निगाहें
टिक जाएंगी आसमान पर। चांद निकलेगा तो अर्घ्य के जल में आस्था झिलमिलाएगी, छलनी से
झांकती आंखों में प्रेम मुस्कराएगा और जीवनसाथी के हाथों से जल ग्रहण कर व्रत पूरा
होगा। लेकिन करवा चौथ की असली कहानी इतनी भर नहीं है। इसके भीतर लोकजीवन की स्मृतियां
हैं, मां और बेटी के रिश्ते की मिठास है, सास-बहू के स्नेह का विस्तार है, स्त्री के
संकल्प की शक्ति है और बदलते समाज में दांपत्य संबंधों को नए अर्थ देने की कोशिश भी।
भोर की सरगी से चांद की चौखट तक, प्रेम
की लंबी प्रतीक्षा
करवा चौथ की शुरुआत तब होती है, जब अधिकांश
घरों में रात का सन्नाटा कायम रहता है। भोर से पहले उठने की तैयारी, रसोई में रखी सरगी
की थाली और परिवार की महिलाओं के बीच धीमी बातचीत इस पर्व की पहली तस्वीर बनाती है।
परंपरा के अनुसार, सास अपनी बहू को सरगी देती है। फल, मिठाइयां, फेनी, मेवे और अन्य
खाद्य पदार्थों के साथ कभी वस्त्र तो कभी शृंगार की सामग्री भी इसमें शामिल होती है।
सरगी केवल दिनभर के उपवास से पहले भोजन करने की रस्म नहीं है। यह उस पारिवारिक रिश्ते
का प्रतीक है, जिसमें सास अपनी बहू के लिए मंगलकामना करती है और बहू उस स्नेह को आशीर्वाद
के रूप में स्वीकार करती है। कई परिवारों में मायके से भी बेटी के लिए वस्त्र, मिठाई,
फल और सुहाग की सामग्री भेजी जाती है। इस तरह करवा चौथ पति-पत्नी के रिश्ते के साथ
दो परिवारों के बीच स्नेह की डोर को भी मजबूत करता है। सरगी के बाद सूर्योदय से व्रत
आरंभ होता है। पारंपरिक रूप से महिलाएं चंद्रोदय तक अन्न और जल ग्रहण नहीं करतीं। इस
पूरे दिन का सबसे कठिन पक्ष प्रतीक्षा है। घर के काम हों, बच्चों की जिम्मेदारी हो
या रोजमर्रा की व्यस्तता, मन में शाम के चंद्र दर्शन का भाव बना रहता है। दिन के बढ़ते
पहर के साथ उत्सव की तैयारियां भी आगे बढ़ती हैं। कहीं मेहंदी लग रही है, कहीं पूजा
की थाली सज रही है, कहीं नई साड़ी निकाली जा रही है तो कहीं पहली करवा चौथ की तैयारी
में परिवार के सदस्य जुटे हैं। नवविवाहिताओं के लिए यह दिन विशेष उत्साह लेकर आता है।
उनके लिए यह केवल एक व्रत नहीं, बल्कि वैवाहिक जीवन की नई स्मृतियों को संजोने का अवसर
भी है।
छलनी से चांद और फिर जीवनसाथी का दीदार
करवा चौथ की सबसे चर्चित और भावनात्मक
रस्म है छलनी से चंद्रमा और पति का चेहरा देखना। पूजा की थाली में जल से भरा पात्र,
दीपक, रोली, अक्षत, मिठाई और अन्य पूजन सामग्री रखी जाती है। चंद्रमा दिखाई देने पर
महिलाएं उसे अर्घ्य देती हैं और अपने पति के स्वास्थ्य, दीर्घायु तथा सुखमय दांपत्य
जीवन की कामना करती हैं। इसके बाद छलनी से चंद्रमा के दर्शन किए जाते हैं। कई परिवारों
में उसी छलनी से पति का चेहरा भी देखा जाता है। फिर पति पत्नी को जल पिलाकर व्रत खुलवाते
हैं। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में इस रस्म के क्रम तथा तौर-तरीकों में अंतर हो
सकता है। छलनी को लेकर लोकभावना में कई तरह की व्याख्याएं प्रचलित हैं। कोई इसे चंद्रमा
की चमक को एकाग्र होकर देखने का माध्यम मानता है, तो कोई इसे प्रेम और विश्वास के बीच
एक प्रतीकात्मक परदा समझता है, जिसके पार जीवनसाथी का चेहरा दिखाई देता है। हालांकि
छलनी के पीछे कोई एक सर्वमान्य शास्त्रीय व्याख्या नहीं है, लेकिन लोकपरंपरा ने इसे
करवा चौथ की सबसे पहचानने योग्य रस्म बना दिया है। उस क्षण की भावुकता को शब्दों में
बांधना आसान नहीं। दिनभर के व्रत के बाद जब चांद दिखाई देता है तो प्रतीक्षा समाप्त
होती है। चेहरे पर थकान हो सकती है, लेकिन आंखों में संतोष झलकता है। पति के हाथों
से जल ग्रहण करना एक साधारण क्रिया दिखाई दे सकती है, लेकिन इस रस्म के भीतर साथ निभाने
का भाव छिपा है। यही वजह है कि करवा चौथ का चांद हर वर्ष वही होते हुए भी हर घर में
अलग कहानी लिखता है। किसी के लिए यह पहली करवा चौथ है, किसी के लिए पच्चीसवीं और किसी
के लिए जीवन के कई दशकों का साझा सफर। चांद की रोशनी एक जैसी होती है, मगर उसके नीचे
खड़े चेहरों पर दर्ज अनुभव अलग-अलग होते हैं।
वीरवती की कथा में निष्ठा, संकल्प और प्रतीक्षा
का संदेश
करवा चौथ की कथा के बिना पर्व का पारंपरिक
स्वरूप अधूरा माना जाता है। इस अवसर पर सुनाई जाने वाली प्रमुख लोककथाओं में वीरवती
की कथा विशेष स्थान रखती है। लोकप्रचलित कथा के अनुसार, वीरवती सात भाइयों की इकलौती
बहन थी। विवाह के बाद उसने अपने पति की दीर्घायु की कामना से करवा चौथ का व्रत रखा।
दिनभर भूखी-प्यासी बहन की स्थिति देखकर उसके भाई व्याकुल हो उठे। बहन को भोजन कराने
की इच्छा में उन्होंने दूर प्रकाश उत्पन्न करके उसे चंद्रमा निकलने का भ्रम दिया। वीरवती
ने उस प्रकाश को चंद्रमा समझकर व्रत खोल लिया। कथा के आगे के प्रसंग में पति के जीवन
पर संकट आने और वीरवती की प्रार्थना, पश्चात्ताप तथा निष्ठा से संकट दूर होने का वर्णन
मिलता है। इसके अलग-अलग क्षेत्रीय रूप प्रचलित हैं। कथा को धार्मिक लोकविश्वास के रूप
में सुना जाता है, ऐतिहासिक घटना के प्रमाणित विवरण के रूप में नहीं। इस कथा का एक
भावनात्मक पक्ष भी है। भाइयों का बहन के प्रति स्नेह, व्रत की मर्यादा को लेकर उसका
संकल्प और संकट के समय उसकी प्रार्थना—ये प्रसंग करवा चौथ को परिवार, विश्वास
और धैर्य की परंपरा से जोड़ते हैं। सावित्री-सत्यवान की कथा भी भारतीय धार्मिक साहित्य
में स्त्री के संकल्प और पति के प्रति निष्ठा के लिए प्रसिद्ध है। सावित्री ने यमराज
से संवाद करके अपने पति के जीवन और परिवार के कल्याण का मार्ग प्राप्त किया था। यह
कथा करवा चौथ की विशिष्ट व्रत-कथा से अलग है, लेकिन भारतीय सांस्कृतिक स्मृति में इसे
नारी के साहस, विवेक और दृढ़ निश्चय के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है। इसी तरह
द्रौपदी और अर्जुन से जुड़ा एक प्रसंग भी लोकपरंपराओं में करवा चौथ के संदर्भ में सुनाया
जाता है। इन कथाओं का महत्व धार्मिक विश्वास और सांस्कृतिक स्मृति में है। इनके माध्यम
से समाज अपने जीवन-मूल्यों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाता है।
करवा : मिट्टी का पात्र, जिसमें समाई मंगलकामना
करवा चौथ नाम में ही इस पर्व की एक प्रमुख
पहचान छिपी है। करवा या करक जल रखने वाला पात्र है, जिसका उपयोग पूजा में किया जाता
है। चतुर्थी तिथि के कारण पर्व के नाम के साथ चौथ जुड़ा है। कुछ धार्मिक संदर्भों में
इसे करक चतुर्थी भी कहा जाता है। मिट्टी का करवा भारतीय ग्रामीण जीवन और पारंपरिक घरेलू
संस्कृति की याद दिलाता है। मिट्टी से बने पात्र में जल भरना, उसे पूजा में रखना और
चंद्रमा को अर्घ्य देना प्रकृति तथा जीवन के आधारभूत तत्वों के प्रति श्रद्धा का भाव
व्यक्त करता है। परंपरा में जल जीवन का प्रतीक है और करवा मंगलकामना का माध्यम। कुछ
परिवारों में करवे में गेहूं या अन्य अनाज रखने की रस्म भी होती है। पूजा के बाद करवा
दान करने की परंपरा भी कई क्षेत्रों में प्रचलित है। हालांकि सामग्री और विधि में स्थानीय
मान्यताओं के अनुसार अंतर मिलता है। करवा चौथ का अनुष्ठान यह भी याद दिलाता है कि भारतीय
पर्वों में साधारण घरेलू वस्तुएं भी सांस्कृतिक अर्थ ग्रहण कर लेती हैं। मिट्टी का
पात्र केवल बर्तन नहीं रहता, वह प्रार्थना का माध्यम बन जाता है। जल केवल प्यास बुझाने
का साधन नहीं रहता, वह जीवन और मंगल की कामना से जुड़ जाता है।
सोलह शृंगार : सौंदर्य से आगे, सांस्कृतिक
पहचान का उत्सव
करवा चौथ पर सोलह शृंगार की परंपरा पर्व
के सौंदर्य को विशिष्ट रूप देती है। लाल, गुलाबी, मैरून और अन्य रंगों की साड़ियों
या लहंगों में सजी महिलाएं, हाथों में मेहंदी, मांग में सिंदूर, माथे पर बिंदी, कलाइयों
में चूड़ियां और पैरों में महावर या आलता—ये सभी दृश्य भारतीय वैवाहिक संस्कृति
की पहचान बन चुके हैं। सिंदूर, मंगलसूत्र, बिछिया और चूड़ियों का महत्व समुदाय, क्षेत्र
और पारिवारिक परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। कई महिलाओं के लिए ये वैवाहिक पहचान
के प्रतीक हैं, तो कई के लिए व्यक्तिगत पसंद और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा। मेहंदी
की लाली करवा चौथ के उल्लास को और बढ़ा देती है। हथेलियों पर बने फूल, बेलें और पारंपरिक
आकृतियां उत्सव की तैयारी को खास बनाती हैं। नवविवाहिताओं के लिए मेहंदी का अनुभव अक्सर
शादी की स्मृतियों से जुड़ जाता है, जबकि लंबे वैवाहिक जीवन से गुजर रही महिलाओं के
लिए यह पुरानी रस्मों को नए सिरे से जीने का अवसर बनता है।
सरगी, बायना और करवा बदलने की रस्म
करवा चौथ के कई अनुष्ठान ऐसे हैं, जिनमें
रिश्तों की भाषा शब्दों से अधिक संकेतों में व्यक्त होती है। सरगी में सास का स्नेह
है, मायके से आने वाले बायने में बेटी के प्रति माता-पिता की चिंता और आशीर्वाद है,
जबकि करवा बदलने की रस्म महिलाओं के बीच सामूहिकता और आत्मीयता का भाव जगाती है। बायने
में क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार वस्त्र, मिठाई, फल, नारियल, सुहाग सामग्री और अन्य
उपहार शामिल हो सकते हैं। कुछ परिवारों में बेटी की पहली करवा चौथ पर विशेष भेंट दी
जाती है। इसका उद्देश्य केवल उपहार देना नहीं, बल्कि नए जीवन में प्रवेश करने वाली
बेटी को भावनात्मक संबल देना भी है। कई स्थानों पर महिलाएं समूह में बैठकर पूजा करती
हैं और करवे एक-दूसरे को देती हैं। इस दौरान पारंपरिक गीत गाए जाते हैं, व्रत-कथा सुनी
जाती है और परिवार की बड़ी-बुजुर्ग महिलाएं छोटी उम्र की महिलाओं को रस्मों का अर्थ
समझाती हैं। इन सामूहिक आयोजनों का महत्व आज भी कम नहीं हुआ है। बदलती जीवनशैली और
छोटे परिवारों के दौर में ऐसे अवसर महिलाओं को एक-दूसरे से जुड़ने, अनुभव साझा करने
और सांस्कृतिक स्मृतियों को आगे बढ़ाने का अवसर देते हैं। यहां परंपरा का एक सामाजिक
पक्ष भी दिखाई देता है। त्योहार केवल घर की चारदीवारी में सीमित नहीं रहता, बल्कि पड़ोस
और समुदाय को जोड़ता है। एक थाली से दूसरी थाली तक पहुंचती रस्में, साझा गीत और सामूहिक
प्रार्थनाएं एक ऐसा संसार रचती हैं, जिसमें रिश्तों की गर्माहट सबसे बड़ी पूंजी बन
जाती है।
पंजाब की सरगी से राजस्थान के पारंपरिक
शृंगार तक
करवा चौथ मुख्य रूप से उत्तर भारत में
लोकप्रिय पर्व है, लेकिन इसकी रस्मों का स्वरूप अलग-अलग राज्यों में विविध रंग ग्रहण
करता है। पंजाब और हरियाणा में सरगी की परंपरा विशेष रूप से प्रमुख है। भोर से पहले
परिवार की महिलाएं उठती हैं, सरगी ग्रहण करती हैं और दिनभर के व्रत की तैयारी करती
हैं। शाम को महिलाएं एक साथ बैठकर कथा सुनती हैं, पूजा करती हैं और पारंपरिक गीतों
के बीच करवा बदलने की रस्म निभाती हैं। चंद्रमा को अर्घ्य देने और पति के हाथों से
जल ग्रहण करने की परंपरा पर्व के सबसे भावुक क्षणों में शामिल है। उत्तर प्रदेश में
भी सरगी, मेहंदी, सोलह शृंगार, पूजा और चंद्र दर्शन का विशेष महत्व है। अलग-अलग क्षेत्रों
में करवा सजाने, पूजा की चौकी तैयार करने, गौरी की आकृति बनाने या चावल के घोल से पारंपरिक
चित्र उकेरने की प्रथाएं मिलती हैं। परिवार की बुजुर्ग महिलाएं व्रत-कथा सुनाती हैं
और नई पीढ़ी को रीति-रिवाजों से परिचित कराती हैं। राजस्थान में पारंपरिक परिधान, रंग-बिरंगे
घाघरे, ओढ़नी और आभूषण पर्व की छटा बढ़ाते हैं। कुछ क्षेत्रों में करवा के साथ विशेष
पकवान और अनाज से जुड़ी रस्में भी प्रचलित हैं। मध्य प्रदेश में भी उत्तर भारतीय परंपराओं
के अनुरूप पूजा और चंद्र दर्शन का आयोजन होता है। दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र
में करवा चौथ की लोकप्रियता पर पारिवारिक परंपराओं के साथ सिनेमा और टेलीविजन का भी
प्रभाव रहा है। फिल्मों और धारावाहिकों ने छलनी, चंद्रमा, सजावट और पति-पत्नी के भावुक
मिलन को व्यापक सांस्कृतिक पहचान दी है। समय के साथ यह पर्व उन शहरों और परिवारों में
भी लोकप्रिय हुआ है, जहां पहले इसकी परंपरा अपेक्षाकृत सीमित थी। महानगरों में रहने
वाले परिवार अपने मूल प्रदेश की रस्मों के साथ स्थानीय जीवनशैली का मेल बैठाकर करवा
चौथ मनाते हैं। यही भारत की सांस्कृतिक विविधता है—भाव एक, लेकिन अभिव्यक्ति अनेक।
अब केवल पत्नी का व्रत नहीं, साझेदारी का
संकल्प भी
समय के साथ करवा चौथ को देखने का नजरिया
बदला है। पारंपरिक रूप से यह विवाहित महिलाओं द्वारा पति की दीर्घायु और सुख-समृद्धि
की कामना के लिए रखा जाने वाला व्रत है। लेकिन आज कुछ परिवारों में पति भी पत्नी के
साथ व्रत रखते हैं या कम से कम दिनभर उसके साथ रहते हुए उसकी देखभाल और घरेलू जिम्मेदारियों
में भागीदारी निभाते हैं। यह बदलाव महत्वपूर्ण है, क्योंकि विवाह केवल एक व्यक्ति के
त्याग और दूसरे की सुविधा पर आधारित रिश्ता नहीं है। उसका वास्तविक आधार परस्पर सम्मान,
संवाद, विश्वास और जिम्मेदारी है। पत्नी अपने पति के लिए मंगलकामना करती है, तो पति
भी पत्नी के स्वास्थ्य, खुशी और लंबी उम्र की कामना कर सकता है। दोनों का साझा संकल्प
रिश्ते को अधिक आत्मीय बना सकता है। पर्व की सुंदरता इस बात में नहीं कि हर व्यक्ति
एक ही तरह से उसे मनाए, बल्कि इस बात में है कि उसके माध्यम से रिश्तों में स्नेह और
सम्मान बढ़े। यदि कोई पति पत्नी के लिए भोजन तैयार करता है, उसके काम में हाथ बंटाता
है या उसकी थकान को समझते हुए साथ बैठता है, तो वह भी प्रेम की अभिव्यक्ति है। इसी
तरह पत्नी के व्रत और आस्था का सम्मान करना भी दांपत्य संबंधों की साझेदारी का हिस्सा
है। करवा चौथ की परंपरा अपने मूल भाव को कायम रखते हुए नए अर्थ ग्रहण कर सकती है। प्रेम
का मूल्य केवल कठिन तपस्या से नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन में एक-दूसरे का साथ निभाने
से भी तय होता है।
करवा चौथ की असली रोशनी घर के भीतर है
करवा चौथ की रात चंद्रमा के निकलने के
साथ व्रत पूरा हो जाता है, लेकिन इस पर्व का अर्थ वहीं समाप्त नहीं होता। इसकी असली
रोशनी अगले दिन और उसके बाद के जीवन में दिखाई देनी चाहिए—जब
पति-पत्नी एक-दूसरे की बात सुनें, मुश्किल समय में साथ खड़े हों, जिम्मेदारियों को
साझा करें और मतभेदों के बीच भी सम्मान बनाए रखें। सात जन्मों तक साथ निभाने का भाव
भारतीय वैवाहिक संस्कृति की लोकप्रिय कल्पना है। मगर इस कल्पना का सबसे सुंदर रूप वर्तमान
जीवन में दिखाई देता है, जब दो लोग एक-दूसरे की स्वतंत्रता, आकांक्षाओं और सीमाओं का
सम्मान करते हुए साथ चलने का निर्णय लेते हैं। करवा चौथ हमें रिश्तों की उस दुनिया
में ले जाता है, जहां प्रेम केवल कहा नहीं जाता, बल्कि प्रतीक्षा, देखभाल, स्मृति और
छोटे-छोटे व्यवहारों में व्यक्त होता है। फिर भी किसी रिश्ते की मजबूती का प्रमाण केवल
एक दिन का उपवास नहीं, बल्कि वर्षों तक निभाई गई साझेदारी है। इसलिए इस पर्व को न तो
केवल परंपरा के दबाव में सीमित करना चाहिए और न ही उसकी भावनात्मक गहराई को सतही प्रदर्शन
में बदल देना चाहिए। इसका सौंदर्य तभी कायम रहेगा, जब आस्था के साथ संवेदनशीलता और
परंपरा के साथ परस्पर सम्मान भी जुड़ा रहे।


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