Saturday, 17 October 2026

रावण तो हर साल जलता है, रावणत्व कब जलेगा

रावण तो हर साल जलता है, रावणत्व कब जलेगा? 

शरद की सुनहरी धूप, उत्सव के रंग और आसमान में उठती अग्निशिखाएं... विजयादशमी आते ही रावण के पुतले जल उठते हैं। आतिशबाजी के बीच अधर्म पर धर्म और असत्य पर सत्य की विजय का उद्घोष होता है। मगर पुतला राख होते ही एक सवाल फिर सिर उठाता है—रावण हर साल जलता है, फिर हमारे भीतर और समाज में जिंदा कैसे रह जाता है? विडंबना देखिए! स्वच्छता का संदेश देने वाला अपने घर का कूड़ा पड़ोसी के दरवाजे पर डाल देता है। महंगाई पर चिंता जताने वाला मिलावट से गुरेज नहीं करता। ईमानदारी की दुहाई देने वाला अपने स्वार्थ के लिए नियम तोड़ता है। स्त्री-सम्मान की बातें करने वाले ही कई बार उसके अधिकारों को कुचलते हैं। आखिर ये कैसी विजय है, जिसमें बुराई के पुतले तो जलते हैं, लेकिन बुराइयों को पालने वाली मानसिकता सुरक्षित बच निकलती है? रावण का व्यक्तित्व भी एक गहरी सीख देता है। वह प्रकांड विद्वान, शिवभक्त और अपार सामर्थ्य का स्वामी था, लेकिन अहंकार ने उसके विवेक को परास्त कर दिया। ज्ञान था, शक्ति थी, वैभव था, मगर मर्यादा के उल्लंघन ने सब कुछ मिट्टी में मिला दिया। यही रावण के पतन का मर्म है—प्रतिभा मनुष्य को महान बना सकती है, लेकिन चरित्र ही उसे पतन से बचाता है। भगवान श्रीराम की विजय केवल एक योद्धा की दूसरे योद्धा पर जीत नहीं, बल्कि मर्यादा, न्याय और आत्मबल की प्रतिष्ठा है। विजयादशमी का असली अर्थ भी तभी पूरा होगा, जब हम दूसरों के भीतर रावण खोजने के बजाय अपने अंतर्मन में झांकने का साहस जुटाएं। क्योंकि रावण दहन का उत्सव हर साल आता है, लेकिन असली दशहरा उस दिन होगा, जब हमारे भीतर का अहंकार जलेगा और मनुष्यता विजयी होगी

सुरेश गांधी

शरद की सुनहरी धूप, उत्सव में डूबा जनमानस, सजे हुए दुर्गा पंडाल, रामलीला के अंतिम दृश्यों का रोमांच और फिर आसमान को छूती अग्निशिखाएं। विजयादशमी आते ही रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले धू-धूकर जल उठते हैं। आतिशबाजी की गूंज के बीच अधर्म पर धर्म और असत्य पर सत्य की विजय का उद्घोष होता है। चेहरे उल्लास से दमकते हैं, बच्चे तालियां बजाते हैं और हर ओर उत्सव का रंग बिखर जाता है। लेकिन कुछ ही देर में जब पुतले राख बनकर जमीन पर बिखर जाते हैं, तब एक सवाल हवा में तैरता रह जाता है—रावण हर साल जलता है, फिर हमारे भीतर और समाज में जिंदा कैसे रह जाता है? यह सवाल केवल किसी धार्मिक आयोजन या परंपरा से जुड़ा नहीं है। यह हमारे समय, हमारे आचरण और हमारे अंतर्मन से जुड़ा सवाल है। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम हर साल रावण का पुतला जलाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं, जबकि उसके प्रतीक अहंकार, लोभ, छल, अन्याय और संवेदनहीनता को अपने जीवन में जगह देते रहते हैं? यदि ऐसा है तो फिर विजयादशमी का उत्सव केवल एक रस्म बनकर रह जाने का खतरा है।

पुतला जलता है, बुराई की जड़ बच जाती है

समाज की विडंबना देखिए। स्वच्छता का संदेश देने वाला व्यक्ति अपने घर का कूड़ा पड़ोसी के दरवाजे पर डालने से गुरेज नहीं करता। महंगाई पर चिंता जताने वाला व्यापारी मिलावट के जरिए दूसरों की सेहत से खिलवाड़ कर सकता है। ईमानदारी की दुहाई देने वाला अपने स्वार्थ के लिए नियम तोड़ने में संकोच नहीं करता। मंच से नारी-सम्मान की बातें करने वाले समाज में ही महिलाओं के अधिकारों का हनन होता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले कभी-कभी अपने काम के लिए उसी व्यवस्था में अनुचित रास्ता तलाशने लगते हैं, जिसकी बुराइयों पर वे सवाल खड़े करते हैं। यही वह दोहरापन है, जो विजयादशमी के संदेश को हमारे सामने और अधिक प्रासंगिक बना देता है। बुराई हमेशा किसी बड़े अपराध या बड़े षड्यंत्र के रूप में ही सामने नहीं आती। वह छोटी-छोटी बेईमानियों, सुविधानुसार बदले जाने वाले सिद्धांतों, दूसरे के अधिकारों की अनदेखी और अपने दोषों पर पर्दा डालने की आदत में भी छिपी होती है। जब हम अपने लिए नियमों में छूट चाहते हैं और दूसरों से आदर्श आचरण की अपेक्षा करते हैं, तब हमारे भीतर का रावण सिर उठाने लगता है। दहेज की मांग, महिलाओं के प्रति हिंसा, कमजोरों का शोषण, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, रिश्वतखोरी, सामाजिक भेदभाव और नफरत की भाषा—ये सब किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना की परीक्षा लेते हैं। रावण का पुतला जलाने से इन बुराइयों का अंत नहीं होगा। इनके विरुद्ध अपने व्यवहार में बदलाव लाना होगा। असली विजय वही होगी, जिसमें हमारा उत्सव हमारे आचरण में भी दिखाई दे।

रावण का अंत उसके अहंकार से हुआ

रावण को केवल दस सिरों वाले एक राक्षस के रूप में देखना उसके चरित्र से मिलने वाली बड़ी सीख को सीमित कर देना होगा। रामकथा की परंपरा में वह प्रकांड विद्वान, शिवभक्त, सामर्थ्यवान शासक और असाधारण प्रतिभा का धनी बताया गया है। उसके पास ज्ञान था, वैभव था, शक्ति थी और अपनी क्षमता पर अपार विश्वास भी। लेकिन जब यही विश्वास अहंकार में बदल गया, जब शक्ति के साथ विवेक और ज्ञान के साथ मर्यादा का संतुलन टूट गया, तब उसका पतन निश्चित हो गया। रावण का चरित्र हमें बताता है कि मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी हमेशा उसकी अज्ञानता नहीं होती। कभी-कभी उसका ज्ञान, उसकी उपलब्धियां और उसकी शक्ति ही उसके भीतर ऐसा अहंकार पैदा कर देती हैं, जो उसे अपनी गलतियां देखने नहीं देता। वह दूसरों को छोटा समझने लगता है, अपनी इच्छा को ही न्याय मान बैठता है और यह भूल जाता है कि सामर्थ्य का अर्थ मनमानी करने का अधिकार नहीं है। रावण के दस सिरों को प्रतीकात्मक रूप से देखें तो वे मनुष्य के भीतर मौजूद अनेक विकारों की याद दिलाते हैं—काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार और विवेक को ढक लेने वाली दूसरी प्रवृत्तियां। यह व्याख्या हमें एक जरूरी प्रश्न तक ले जाती है: क्या हम अपने भीतर मौजूद इन विकारों को पहचानने और उनसे संघर्ष करने के लिए तैयार हैं? दूसरों की गलतियां गिनाना सरल है। अपने दोषों को स्वीकार करना कठिन। अपनी उपलब्धियों पर गर्व करना स्वाभाविक है, लेकिन उस गर्व को अहंकार बनने से रोकना आत्मानुशासन मांगता है। रावण का दहन इसी आत्ममंथन का अवसर है—कहीं हमारी प्रतिभा हमें विनम्र बनाने के बजाय दूसरों को कमतर आंकने का हथियार तो नहीं बन रही? कहीं हमारी शक्ति किसी कमजोर की आवाज दबाने का माध्यम तो नहीं बन रही?

श्रीराम की विजय केवल युद्ध की जीत नहीं

रामकथा में श्रीराम और रावण का संघर्ष दो शक्तिशाली व्यक्तियों के बीच युद्ध भर नहीं है। यह मर्यादा और अहंकार, न्याय और अन्याय, संयम और मनमानी के बीच संघर्ष के रूप में भी देखा जाता है। श्रीराम की प्रतिष्ठा केवल उनकी युद्धकुशलता के कारण नहीं, बल्कि उनके चरित्र, धैर्य, कर्तव्यबोध और मर्यादा के कारण है। श्रीराम का आदर्श यह नहीं कि मनुष्य के जीवन में संकट न आएं, बल्कि यह कि संकट के समय भी वह अपने मूल्यों से विमुख न हो। विपरीत परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखना, अपने दायित्वों को निभाना, सहयोगियों के प्रति विश्वास रखना और शक्ति का उपयोग न्याय के पक्ष में करना—ये ऐसे गुण हैं, जो रामकथा को समय की सीमाओं से परे ले जाते हैं। राम की विजय का संदेश यह भी है कि किसी संघर्ष में केवल बाहरी साधन निर्णायक नहीं होते। व्यक्ति के भीतर का संकल्प, उसके निर्णयों की नैतिकता और कठिन समय में उसके चरित्र की दृढ़ता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। रावण के पास विशाल सामर्थ्य था, लेकिन वह अपने अहंकार पर विजय नहीं पा सका। श्रीराम का चरित्र इसके विपरीत मर्यादा और आत्मसंयम की प्रतिष्ठा करता है। आज के जीवन में इस संदेश का अर्थ किसी एक प्रसंग तक सीमित नहीं है। परिवार में रिश्तों को निभाना हो, कार्यस्थल पर ईमानदारी बनाए रखनी हो, सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही स्वीकार करनी हो या समाज में कमजोर व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करनी हो—हर जगह व्यक्ति के सामने अपने स्वार्थ और अपने कर्तव्य के बीच चुनाव का अवसर आता है। यही उसका वास्तविक युद्ध है। 

विजयादशमी : भीतर की सफाई का पर्व

विजयादशमी का पर्व आश्विन शुक्ल पक्ष की दशमी को मनाया जाता है। नवरात्र के नौ दिनों की साधना और उत्सव के बाद आने वाला यह दिन विजय, नई शुरुआत और शुभ संकल्प का प्रतीक माना जाता है। देश के अलग-अलग हिस्सों में इस अवसर की परंपराएं भिन्न हो सकती हैं, लेकिन इनके केंद्र में बुराई पर अच्छाई की जीत और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन की कामना का भाव दिखाई देता है। नवरात्र में देवी के विभिन्न रूपों की आराधना की जाती है। विजयादशमी के साथ जुड़ी राम-रावण की परंपरा भी इसी व्यापक सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा है। जहां एक ओर दुर्गा पूजा की परंपरा में देवी की महिषासुर पर विजय का उत्सव मनाया जाता है, वहीं रामलीला और रावण दहन में श्रीराम की विजय को जीवंत किया जाता है। इन कथाओं के धार्मिक और सांस्कृतिक अर्थ अलग-अलग स्तरों पर समझे जाते हैं, लेकिन दोनों में अन्याय और अहंकार के सामने संघर्ष, साहस और विजय का संदेश प्रमुख है। यदि नवरात्र आत्मशक्ति के जागरण का अवसर है, तो विजयादशमी उस शक्ति को आचरण में उतारने का संकल्प बन सकती है। नौ दिनों तक पूजा-अर्चना करने के बाद यदि मन में द्वेष बना रहे, दूसरों के प्रति व्यवहार में कठोरता बनी रहे और जीवन में छल-कपट का स्थान बना रहे, तो आत्मशुद्धि की प्रक्रिया अधूरी रह जाती है। पूजा का अर्थ केवल दीप जलाना नहीं, बल्कि अपने भीतर संवेदना और विवेक का प्रकाश जगाना भी है। मन की सफाई किसी एक दिन का काम नहीं। इसके लिए रोज अपने व्यवहार की समीक्षा करनी पड़ती है। क्या हमने किसी का अपमान किया? क्या किसी जरूरतमंद की मदद कर सकते थे, लेकिन अनदेखी कर दी? क्या अपने लाभ के लिए किसी दूसरे का नुकसान किया? क्या अपनी गलती मानने के बजाय दोष किसी और पर डाल दिया? ऐसे सवालों का ईमानदार जवाब ही अंतर्मन के अंधकार को पहचानने की शुरुआत है।

उत्सव की असली शक्ति सामाजिक एकता

विजयादशमी केवल धार्मिक आस्था का अवसर नहीं, बल्कि सामाजिक मेलजोल और सामूहिक सहभागिता का भी पर्व है। रामलीला, दुर्गा पूजा के पंडाल, मेले और शोभायात्राएं अनेक लोगों के सहयोग से आकार लेते हैं। कहीं कलाकार मंच सजाते हैं, कहीं कारीगर प्रतिमाएं और पुतले बनाते हैं, कहीं स्थानीय समितियां व्यवस्था संभालती हैं और कहीं आम नागरिक आयोजन की सफलता के लिए श्रमदान करते हैं। ऐसे आयोजनों में अनेक बार विभिन्न समुदायों के लोग भी अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं। रामलीला की तैयारी हो, पंडालों की सजावट हो या मेले की व्यवस्था—स्थानीय स्तर पर सहयोग की ये मिसालें याद दिलाती हैं कि सामाजिक जीवन की बुनियाद आपसी विश्वास और सहभागिता से मजबूत होती है। किसी उत्सव की वास्तविक गरिमा तभी बढ़ती है, जब वह लोगों को जोड़ने का माध्यम बने, न कि उनके बीच दूरी बढ़ाने का। आज जब सार्वजनिक संवाद में कटुता और मतभेद कई बार रिश्तों पर हावी हो जाते हैं, तब ऐसे पर्व हमें साझा सांस्कृतिक जीवन की ताकत पहचानने का अवसर देते हैं। एक-दूसरे की आस्था का सम्मान, सार्वजनिक स्थानों पर जिम्मेदार व्यवहार, जरूरतमंदों के प्रति संवेदनशीलता और मतभेद के बावजूद संवाद बनाए रखना—ये भी उसी विजय के रूप हैं, जिसकी कामना दशहरा करता है। उत्सव का आनंद तभी पूर्ण होता है, जब उसकी रोशनी समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। यदि मेले में खुशियां हों, लेकिन आसपास कोई भूखा हो; यदि मंच से सदाचार की बातें हों, लेकिन व्यवहार में भेदभाव हो; यदि पुतले जलें, लेकिन मन में नफरत की आग सुलगती रहे, तो उत्सव के संदेश पर फिर विचार करना जरूरी हो जाता है।

अपने भीतर के रावण से कैसे लड़ें?

अंतर्मन का रावण किसी एक दिन में समाप्त नहीं होता। उसे पहचानने के लिए आत्ममंथन और बदलने के लिए निरंतर प्रयास चाहिए। इसकी शुरुआत बहुत छोटे कदमों से हो सकती है। घर और आसपास सफाई रखना, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना, किसी भी तरह की मिलावट और बेईमानी से दूर रहना, महिलाओं के सम्मान और अधिकारों का व्यवहार में पालन करना, अपने काम में ईमानदार रहना और गलती होने पर उसे स्वीकार करना—ये साधारण दिखने वाले काम ही बड़े सामाजिक बदलाव की नींव रखते हैं। अपने स्वार्थ पर नियंत्रण रखना भी उतना ही जरूरी है। हर बहस जीतना आवश्यक नहीं, हर असहमति को शत्रुता में बदलना उचित नहीं और हर सफलता का श्रेय अकेले लेना न्यायसंगत नहीं। विनम्रता कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी सीमाओं को पहचानने की शक्ति है। क्षमा का अर्थ अन्याय को स्वीकार करना नहीं, बल्कि प्रतिशोध की भावना से ऊपर उठकर विवेकपूर्ण रास्ता चुनना है। सबसे महत्वपूर्ण है—दूसरों को बदलने की अपेक्षा करने से पहले स्वयं में बदलाव की शुरुआत करना। इसका अर्थ यह नहीं कि सामाजिक बुराइयों, अन्याय या भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाना छोड़ दिया जाए। बल्कि व्यक्तिगत आचरण की ईमानदारी ही सार्वजनिक विरोध को विश्वसनीय बनाती है। जो व्यक्ति अपने जीवन में नैतिकता का पालन करने की कोशिश करता है, उसकी आवाज में स्वाभाविक दृढ़ता होती है। रावण दहन का दृश्य हमें हर साल एक अवसर देता है। हम चाहें तो उसे केवल आतिशबाजी और मनोरंजन का क्षण मानकर भूल सकते हैं, या फिर उस अग्नि को आत्ममंथन का प्रतीक बना सकते हैं। पुतले की लपटें कुछ ही देर में बुझ जाती हैं, लेकिन उनसे उठने वाला सवाल हमारे साथ रहना चाहिए—क्या हमने इस साल अपने किसी अहंकार, किसी लालच, किसी पूर्वाग्रह या किसी गलत आदत को छोड़ने का संकल्प लिया?

असली दशहरा उस दिन होगा...

विजयादशमी का संदेश किसी दूसरे को पराजित करने से अधिक स्वयं पर विजय पाने में छिपा है। बाहर के रावण का आकार कितना भी बड़ा हो, उसे जलाने में कुछ क्षण लगते हैं। भीतर के रावण का सामना करने में जीवन लग सकता है। वहां कोई मैदान नहीं, कोई दर्शक नहीं और कोई आतिशबाजी नहीं होती। वहां केवल मनुष्य और उसका विवेक आमने-सामने होते हैं। इसलिए इस दशहरे पर संकल्प केवल इतना न हो कि रावण का पुतला जलेगा। संकल्प यह भी हो कि अहंकार की जगह विनम्रता, स्वार्थ की जगह संवेदना, छल की जगह ईमानदारी और नफरत की जगह संवाद को महत्व देंगे। हम अपने घर से लेकर कार्यस्थल और सार्वजनिक जीवन तक उन छोटी-बड़ी बुराइयों को पहचानेंगे, जिन्हें अक्सर यह कहकर टाल देते हैं कि दुनिया ही ऐसी है। श्रीराम की विजय का स्मरण तभी सार्थक होगा, जब मर्यादा हमारे व्यवहार में उतरे, न्याय हमारे निर्णयों में दिखाई दे और करुणा हमारे संबंधों का हिस्सा बने। रावण के दस सिरों से अधिक चुनौतीपूर्ण है मनुष्य के भीतर छिपा वह अहंकार, जो अपनी गलती मानने से इनकार करता है। उसे परास्त कर लिया जाए तो जीवन की अनेक लड़ाइयां अपने आप आसान होने लगेंगी। रावण हर साल जले, यह परंपरा है; लेकिन रावणत्व हर साल थोड़ा-थोड़ा घटे, यही विजयादशमी का संकल्प होना चाहिए। क्योंकि असली दशहरा उस दिन होगा, जब पुतले की आग के साथ हमारे भीतर का अहंकार भी जलेगा और मनुष्यता विजयी होगी।

देशभर में विजय का अलग-अलग रंग

भारत की सांस्कृतिक विविधता विजयादशमी के उत्सव में विशेष रूप से दिखाई देती है। उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में रामलीला और रावण दहन इस पर्व के प्रमुख आकर्षण हैं। मैदानों में सजे विशाल पुतले, रामलीला के मंचन, मेले और आतिशबाजी सामूहिक उल्लास का दृश्य रचते हैं। इन आयोजनों के माध्यम से रामकथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों तक पहुंचती है और लोकजीवन में अपनी जगह बनाए रखती है। पश्चिम बंगाल, ओडिशा और असम सहित पूर्वी भारत के कई हिस्सों में दुर्गा पूजा का उत्सव विशेष महत्व रखता है। देवी की प्रतिमाओं, कलात्मक पंडालों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सामूहिक सहभागिता के बीच विजयादशमी विदाई और विजय—दोनों भावों को समेटती है। बंगाल में सिंदूर खेला जैसी परंपराएं उत्सव को अलग सांस्कृतिक पहचान देती हैं। महाराष्ट्र में विजयादशमी पर शमी के पत्तों को स्वर्ण का प्रतीक मानकर बांटने की परंपरा प्रचलित है। मैसूर में दशहरा अपने भव्य जुलूस और राजपरंपरा से जुड़ी छटा के लिए जाना जाता है। हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में दशहरा उत्सव की अपनी विशिष्ट परंपरा है, जिसमें विभिन्न देवी-देवताओं की शोभायात्राएं और स्थानीय धार्मिक-सांस्कृतिक सहभागिता प्रमुख होती है। गुजरात में नवरात्र के दौरान गरबा और डांडिया की धूम रहती है, जबकि दक्षिण भारत में विजयादशमी को विद्यारंभ, पूजा और शुभ कार्यों की शुरुआत से जोड़कर भी देखा जाता है। छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में दशहरा की परंपरा स्थानीय आस्था और सांस्कृतिक इतिहास के कारण अलग पहचान रखती है। इन विविध रूपों में एक ही उत्सव अनेक रंगों में खिलता है। कहीं देवी की आराधना केंद्र में है, कहीं रामकथा, कहीं लोकदेवताओं की परंपरा और कहीं ज्ञान तथा नए कार्य की शुरुआत। यह विविधता भारतीय संस्कृति की उस क्षमता को दर्शाती है, जिसमें अलग-अलग मान्यताएं अपनी विशिष्टता के साथ व्यापक उत्सव का हिस्सा बनती हैं।

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