स्वदेशी का शंखनाद, कारोबारियों के लिए खुलेगा समृद्धि का द्वार, 5 लाख करोड़ की उम्मीद
त्योहारों
की
रौनक
इस
बार
बाजार
में
स्वदेशी
कारोबार
की
नई
इबारत
लिखने
को
तैयार
है।
धनतेरस
की
खरीदारी,
दिवाली
की
सजावट
और
छठ
की
तैयारियों
ने
बाजार
में
हलचल
बढ़ा
दी
है।
स्वदेशी
उत्पादों
की
मांग
स्थानीय
कारोबार
को
नई
ऊर्जा
दे
रही
है।
खास
यह
है
कि
इस
बार
विदेशी
चमक
के
बीच
देसी
हुनर
भी
अपनी
दमदार
मौजूदगी
दर्ज
करा
रहा
है।
मिट्टी
के
दीये,
पारंपरिक
रंगोली,
गणेश-लक्ष्मी
की
मूर्तियां,
फूलों
की
मालाएं,
बांस
के
सूप-दउरे
और
हस्तनिर्मित
सजावटी
सामान
लोगों
की
पसंद
बन
रहे
हैं।
कैट
के
अनुमान
के
मुताबिक,
दिवाली
तक
देश
में
5
लाख
करोड़
रुपये
से
अधिक
का
कारोबार
होने
की
संभावना
है।
इस
कारोबारी
उत्साह
का
लाभ
बड़े
प्रतिष्ठानों
के
साथ
छोटे
दुकानदारों,
कुम्हारों,
हस्तशिल्पियों,
फूल
विक्रेताओं
और
घरेलू
उद्यमियों
को
भी
मिलेगा।
पूर्वांचल
में
भी
त्योहारी
कारोबार
तीन
हजार
करोड़
रुपये
तक
पहुंचने
का
अनुमान
है।
इससे
वाराणसी
समेत
आसपास
के
जिलों
के
पारंपरिक
और
आधुनिक
कारोबार
को
गति
मिलने
की
उम्मीद
है.
दरअसल, लोकल फॉर
वोकल
का
संदेश
अब
खरीदारी
की
आदतों
में
भी
दिखाई
देने
लगा
है।
स्थानीय
उत्पादों
को
प्राथमिकता
देना
महज
परंपरा
का
सम्मान
नहीं,
बल्कि
रोजगार
सृजन
और
घरेलू
उत्पादन
को
प्रोत्साहन
देने
का
माध्यम
भी
है।
इस
बार
हर
देसी
खरीदारी
किसी
हुनरमंद
हाथ
को
काम
और
आत्मनिर्भर
भारत
को
नई
ताकत
दे
सकती
है

सुरेश गांधी
त्योहारों की रोशनी जब
घरों की देहरी से
निकलकर बाजारों तक पहुंचती है
तो उसकी चमक केवल
रंग-बिरंगी झालरों, सोने-चांदी के
आभूषणों और उपहारों में
नहीं दिखाई देती, बल्कि करोड़ों परिवारों की रोजी-रोटी
में भी उतरती है।
धनतेरस की खरीदारी, दिवाली
की सजावट और छठ की
तैयारियां मिलकर भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए ऐसा
मौसमी अवसर रचती हैं,
जिसमें परंपरा और कारोबार एक-दूसरे का हाथ थामे
चलते हैं। इस बार
इस चमक में एक
और रंग खास है—स्वदेशी का। बाजार में
मिट्टी के दीयों की
लौ से लेकर हाथों
से बनी रंगोली, पारंपरिक
बंदनवार, फूलों की मालाएं, गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियां, हस्तनिर्मित
सजावटी सामान और देसी उपहारों
तक स्थानीय उत्पाद अपनी जगह बना
रहे हैं। यह बदलाव
महज खरीदारी की पसंद का
मामला नहीं है। इसके
पीछे स्थानीय कारीगरों को काम, छोटे
उद्यमियों को बाजार और
देश के भीतर उत्पादन
को प्रोत्साहन देने की बड़ी
आर्थिक संभावना छिपी है।
5 लाख करोड़ के पार जा सकता है त्योहारी बाजार
देश के व्यापारिक
संगठनों के अनुमान भी
इस आर्थिक हलचल की तस्वीर
पेश कर रहे हैं।
कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया
ट्रेडर्स (कैट) के मुताबिक
2026 में दिवाली तक देश का
त्योहारी कारोबार 5 लाख करोड़
रुपये के पार पहुंच
सकता है। यह पिछले
वर्ष के 4.05 लाख करोड़ रुपये
के अनुमानित कारोबार से करीब 15 से
18 प्रतिशत अधिक होगा। इस
बार भी खरीदारी के
साथ परिवहन, होटल, पर्यटन, पैकेजिंग, डिलीवरी, कैटरिंग, टेंट, लाइटिंग और सजावट जैसे
सेवा क्षेत्रों में तेजी की
उम्मीद है। कैट के आकलन में
किराना और एफएमसीजी, सोना-चांदी, आभूषण, इलेक्ट्रॉनिक्स, रेडीमेड कपड़े, उपहार, होम डेकोर और
पूजा सामग्री जैसे क्षेत्र प्रमुख
हैं। यानी त्योहारों का
बाजार किसी एक कारोबार
की कहानी नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था के अनेक पहियों
को एक साथ गति
देने वाला अवसर है।
विदेशी चमक के बीच देसी हुनर की दस्तक
एक समय त्योहारों
की सजावट में विदेशी झालरों,
प्लास्टिक के सजावटी सामान
और मशीन से बने
उत्पादों का दबदबा तेजी
से बढ़ा था। अब
बाजार में स्थानीय कारीगरों
के बनाए उत्पादों को
भी जगह मिल रही
है। मिट्टी के दीये, हस्तनिर्मित
मूर्तियां, प्राकृतिक रंगों की रंगोली, बांस
और लकड़ी से बने सजावटी
सामान तथा पारंपरिक हस्तशिल्प
इसकी मिसाल हैं। इस बदलाव
की अहमियत इसलिए भी है कि
स्थानीय उत्पादों की खरीद का
पैसा सीधे छोटे कारोबारियों
और उत्पादन से जुड़े परिवारों
तक पहुंचता है। एक दीया
खरीदने से कुम्हार की
भट्ठी जलती है, फूलों
की माला खरीदने से
माली और फूल विक्रेता
की आमदनी बढ़ती है और हस्तनिर्मित
सजावटी सामान की बिक्री से
स्थानीय कारीगर को अपने हुनर
का मूल्य मिलता है। यही वह
कड़ी है जो 'लोकल
फॉर वोकल' को केवल नारा
नहीं रहने देती, बल्कि
उसे आर्थिक गतिविधि से जोड़ती है।
त्योहारों की अर्थव्यवस्था में छिपा रोजगार का संसार
त्योहारों का कारोबार दुकान
के काउंटर पर खत्म नहीं
होता। इसके पीछे उत्पादन,
कच्चे माल की आपूर्ति,
पैकिंग, परिवहन, गोदाम, ऑनलाइन बिक्री और घर तक
सामान पहुंचाने वाले लोगों की
लंबी श्रृंखला काम करती है।
एक सजावटी झालर बनाने वाले
छोटे उद्यमी से लेकर उसे
बाजार तक पहुंचाने वाले
परिवहन व्यवसायी और दुकान में
बिक्री करने वाले कर्मचारी
तक अनेक लोगों की
आजीविका इससे जुड़ती है।
फूलों की मांग बढ़ती
है तो किसान से
लेकर माला बनाने वाली
महिलाओं तक को काम
मिलता है। मिट्टी के
दीयों की बिक्री बढ़ती
है तो कुम्हार परिवारों
के लिए अतिरिक्त आमदनी
का रास्ता खुलता है। छोटे प्रिंटिंग
उद्यमी भी इस बदलती
बाजार संस्कृति का हिस्सा हैं।
त्योहारों पर शुभकामना कार्ड,
पैकेजिंग, उपहार सामग्री और सजावटी उत्पाद
तैयार करने वाले स्थानीय
व्यवसायी अपने उत्पादों के
माध्यम से नए बाजार
तलाश रहे हैं। डिजिटल
माध्यमों ने भी छोटे
कारोबारियों को अपने उत्पादों
को व्यापक ग्राहक वर्ग तक पहुंचाने
का अवसर दिया है।
काशी और पूर्वांचल में तीन हजार करोड़ की कारोबारी उम्मीद
पूर्वांचल के लिए त्योहारों
का आर्थिक महत्व और व्यापक है।
वाराणसी केवल धार्मिक और
सांस्कृतिक केंद्र नहीं, बल्कि आसपास के जिलों का
बड़ा व्यापारिक केंद्र भी है। जौनपुर,
गाजीपुर, चंदौली, मिर्जापुर, भदोही, आजमगढ़, मऊ, बलिया और
सोनभद्र समेत आसपास के
क्षेत्रों का बाजार भी
काशी की कारोबारी गतिविधियों
से जुड़ता है। धनतेरस पर
सराफा बाजार, वाहनों के शोरूम और
इलेक्ट्रॉनिक्स दुकानों में खरीदारी बढ़ती
है तो दिवाली पर
कपड़े, मिठाई, उपहार, सजावटी सामान और पूजा सामग्री
की मांग तेज होती
है। इसके बाद छठ
पर्व फूल, फल, बांस
के सूप, दउरा, मिट्टी
के पात्र और पूजन सामग्री
से जुड़े कारोबार को गति देता
है। स्थानीय कारोबारी गतिविधियों के एक प्रारंभिक
अनुमान के मुताबिक इस
पूरे त्योहारी दौर में पूर्वांचल
का कारोबार करीब तीन हजार
करोड़ रुपये तक पहुंचने की
संभावना है। इसमें संगठित
बाजार के साथ छोटे
दुकानदारों, फुटकर विक्रेताओं, कारीगरों और सेवा क्षेत्र
की गतिविधियां भी शामिल हैं।
हालांकि इस अनुमान की
पुष्टि के लिए क्षेत्रवार
व्यापारिक संगठनों के आंकड़ों का
समेकन जरूरी होगा।
आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल उत्पादन नहीं, खरीदारी भी
आत्मनिर्भर भारत का सपना
केवल कारखाने लगाने या बड़े उद्योग
खड़े करने से पूरा
नहीं होगा। इसके लिए जरूरी
है कि देश में
बने उत्पादों को देश का
बाजार भी मिले। जब
उपभोक्ता स्थानीय कुम्हार का दीया, अपने
शहर के कारीगर की
सजावट, स्थानीय बुनकर का वस्त्र और
भारतीय उद्यमी का उत्पाद खरीदता
है तो वह घरेलू
उत्पादन की पूरी श्रृंखला
को सहारा देता है। हालांकि
स्वदेशी को बढ़ावा देने
का अर्थ केवल भावनात्मक
अपील नहीं होना चाहिए।
गुणवत्ता, उचित कीमत, टिकाऊपन
और आकर्षक पैकेजिंग भी उतने ही
जरूरी हैं। स्थानीय उत्पादों
को प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए छोटे
उद्यमियों को तकनीक, आसान
ऋण, बेहतर विपणन और डिजिटल प्लेटफॉर्म
से जोड़ना होगा। आखिरकार त्योहारों की असली रोशनी
केवल घरों में जलने
वाले दीयों से नहीं, बल्कि
उन परिवारों के जीवन में
जगने वाली उम्मीदों से
भी मापी जानी चाहिए,
जिनके हाथों से ये दीये
और सजावटी सामान तैयार होते हैं। इस
बार खरीदारी की थैली में
अगर स्थानीय हुनर को जगह
मिलती है तो उसकी
चमक बाजार से निकलकर गांवों,
कस्बों और छोटे उद्यमों
तक पहुंचेगी। यही त्योहारों की
वह आर्थिक रोशनी है, जो लोकल
फॉर वोकल को आत्मनिर्भर
भारत की मजबूत बुनियाद
में बदल सकती है।
इस दिवाली सवाल सिर्फ यह नहीं कि किसके घर कितने दीये जले, सवाल यह भी है कि कितने
कुम्हारों के चूल्हे जले, कितने कारीगरों के हाथों को काम मिला और कितने छोटे कारोबारियों
के घर में समृद्धि की रोशनी पहुंची।
5 लाख करोड़ के पार त्योहारी कारोबार का अनुमान
प्रमुख क्षेत्र अनुमानित हिस्सेदारी
किराना
एवं एफएमसीजी 12%
सोना-चांदी व आभूषण 10%
इलेक्ट्रॉनिक्स
एवं इलेक्ट्रिकल्स 8%
कंज्यूमर
ड्यूरेबल्स 7%
रेडीमेड
कपड़े 7%
उपहार
सामग्री 7%
होम
डेकोर 5%
फर्नीचर
एवं फर्निशिंग 5%
मिठाई
एवं नमकीन 5%
कपड़ा
एवं टेक्सटाइल 4%
पूजा
सामग्री 3%
फल
एवं ड्राई फ्रूट 3%
बेकरी
एवं कन्फेक्शनरी 3%
फुटवियर 2%
अन्य
कारोबार 19%
पूर्वांचल में तीन हजार करोड़ की आर्थिक रोशनी!
त्योहारी सीजन
में
संभावित
क्षेत्रवार
कारोबार
(करोड़
रुपये
में)
कारोबार का
क्षेत्र अनुमान
सोना-चांदी एवं आभूषण 600
करोड़
कपड़ा
एवं रेडीमेड गारमेंट्स 420 करोड़
किराना,
मिठाई एवं खाद्य सामग्री 450 करोड़
इलेक्ट्रॉनिक्स
एवं इलेक्ट्रिकल्स 300 करोड़
दोपहिया
एवं चारपहिया वाहन 300 करोड़
सजावटी,
झालर एवं पूजा सामग्री 240 करोड़
फर्नीचर
एवं घरेलू साज-सज्जा 180
करोड़
होटल,
परिवहन एवं कैटरिंग 210
करोड़
गिफ्ट,
पैकेजिंग एवं अन्य कारोबार
150 करोड़
फूल-माला, दीये एवं हस्तशिल्प 150 करोड़
कुल
संभावित कारोबार 3000 करोड़
उत्तर
प्रदेश का अनुमान : करीब
1.05 लाख करोड़ रुपये।
वाहन बाजार
त्योहारी खरीदारी में इस बार
वाहन बाजार खास आकर्षण का
केंद्र बना है। शोरूम
में दोपहिया से लेकर एसयूवी
तक की मांग दिखाई
दे रही है। जीएसटी
राहत, आसान फाइनेंस, एक्सचेंज
बोनस और नए मॉडलों
ने ग्राहकों को खरीदारी के
लिए प्रोत्साहित किया है। वाहन
बाजार की यह तेजी
बताती है कि त्योहार
अब केवल पारंपरिक खरीदारी
का अवसर नहीं, बल्कि
परिवारों की बदलती जरूरतों
और उपभोग क्षमता का भी प्रतिबिंब
बन रहे हैं।
सोना : कीमतों के बावजूद धनतेरस पर बढ़ेगी खरीदारी
10-12% बढ़ोतरी की उम्मीद : धनतेरस पर सोने की बिक्री की मात्रा पिछले साल के मुकाबले 10 से 12 प्रतिशत बढ़ सकती है। एक महीने में 7% से अधिक गिरावट : बीते एक महीने में सोने की कीमतों में आई नरमी से ग्राहकों की सराफा बाजार में वापसी हुई है। ज्वेलर्स के मुताबिक फुटफॉल और शादी-विवाह के अग्रिम ऑर्डर बढ़े हैं। 22 कैरेट सोना : 10 ग्राम सोने का सांकेतिक भाव करीब 1,27,910 रुपये रहा। मेकिंग चार्ज और जीएसटी अलग हैं। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार, जुलाई-सितंबर 2026 में भारत में सोने की कुल मांग 162 टन रही, जो पिछले साल की समान अवधि से 29% कम है। हालांकि इस दौरान सोने पर कुल खर्च 3% बढ़कर करीब 2.42 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। ग्राहक बजट के मुताबिक हल्के वजन के गहने, कम कैरेट के आभूषण और पुराने सोने की एक्सचेंज खरीदारी को तरजीह दे रहे हैं।

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