दीपावली : दीपों की अवली में छिपा है जीवन
का दर्शन
अमावस्या
की रात... चारों ओर पसरा अंधकार... लेकिन इसी अंधेरे को चुनौती देने के लिए जब एक-एक
कर लाखों दीप जल उठते हैं तो रात भी रोशनी के उत्सव में बदल जाती है। घरों की देहरी
से लेकर मंदिरों के शिखर तक, गलियों से लेकर घाटों तक और मन की चौखट से लेकर रिश्तों
की दुनिया तक एक अद्भुत उजास फैल जाता है। यही दीपावली है। एक ऐसा पर्व, जो केवल कैलेंडर
की तारीख नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की हजारों वर्षों पुरानी स्मृतियों, आस्थाओं और
जीवन-दर्शन का जीवंत दस्तावेज है। दीपावली आती है तो केवल घरों की सफाई नहीं होती,
स्मृतियों की भी धूल झड़ती है। आंगन में मिट्टी के दीये सजते हैं तो बचपन लौट आता है।
खील-बताशों की मिठास में पुरानी परंपराएं घुलती हैं। पकवानों की खुशबू में रिश्तों
की आत्मीयता महसूस होती है। दूर रह रहे अपनों की घर वापसी की प्रतीक्षा में आंखें चमक
उठती हैं। बाजारों की चकाचौंध के बीच भी मिट्टी के एक छोटे से दीये की लौ मन को सबसे
ज्यादा आकर्षित करती है। दरअसल, दीपावली का सबसे बड़ा चमत्कार यही है कि यह बाहर की
रोशनी के बहाने मनुष्य को अपने भीतर झांकने का अवसर देती है। यह बताती है कि अंधकार
चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, उसे मिटाने के लिए एक छोटी-सी लौ भी पर्याप्त है
सुरेश गांधी
दीपावली आती है तो सिर्फ घरों की देहरी
नहीं सजती, स्मृतियों के दरवाजे भी खुल जाते हैं। आंगन में रखे मिट्टी के दीये, चौखट
पर बनी रंगोली, पकवानों की महक, बच्चों की खिलखिलाहट और अपनों के लौट आने की प्रतीक्षा...
इन सबके बीच एक ऐसा एहसास जन्म लेता है, जिसे शब्दों में बांधना आसान नहीं। शायद इसी
अनुभूति का नाम दीपावली है। यह महज अमावस्या की रात को रोशन करने का उत्सव नहीं, बल्कि
मनुष्य के भीतर उम्मीद का दीप जलाने का अवसर है। भारतीय संस्कृति में दीप का अर्थ केवल
प्रकाश नहीं है। वह ज्ञान है, विश्वास है, आस्था है और अंधकार के विरुद्ध मनुष्य की
अनवरत जिजीविषा भी। इसीलिए हजारों वर्षों से भारतीय जनमानस में दीपावली का स्थान विशिष्ट
बना हुआ है। समय बदला, घरों की बनावट बदली, जीवनशैली बदली, बाजार का स्वरूप बदला, लेकिन
दीप जलाने की इच्छा आज भी वैसी ही है। दीपावली का सबसे लोकप्रिय पौराणिक प्रसंग भगवान
श्रीराम की अयोध्या वापसी से जुड़ा है। मान्यता है कि चौदह वर्ष का वनवास पूरा करने
और लंकापति रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, माता
सीता और अनुज लक्ष्मण अयोध्या लौटे तो उनके स्वागत में पूरी अयोध्या दीपों से जगमगा
उठी थी।
यह केवल एक राजा के घर लौटने का उत्सव
नहीं था। यह अन्याय पर न्याय, अधर्म पर धर्म और अहंकार पर मर्यादा की विजय का उल्लास
था। अयोध्यावासियों ने अपने आराध्य के स्वागत में जो दीप जलाए, वे कालांतर में भारतीय
जनमानस की सांस्कृतिक पहचान बन गए। दीपावली शब्द भी अपने भीतर इस परंपरा का अर्थ समेटे
हुए है। दीपों की अवली अर्थात दीपों की पंक्ति। एक दीप से दूसरा दीप जलता है और फिर
प्रकाश की ऐसी शृंखला बनती है, जिसमें किसी एक की लौ दूसरे की रोशनी कम नहीं करती।
यही इस पर्व का सबसे बड़ा जीवन-दर्शन है। खुशियां बांटने से घटती नहीं, बल्कि बढ़ती
हैं। हालांकि भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में दीपावली के साथ कई धार्मिक और पौराणिक
मान्यताएं जुड़ी हैं। कहीं इसे भगवान श्रीराम की अयोध्या वापसी के रूप में मनाया जाता
है तो कहीं मां लक्ष्मी के प्राकट्य और भगवान विष्णु से संबंधित मान्यताओं के साथ।
कुछ परंपराओं में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध को भी इस पर्व से जोड़ा जाता
है। इस विविधता में ही भारतीय संस्कृति की खूबसूरती छिपी है। आस्था के रास्ते अलग हो
सकते हैं, लेकिन हर रास्ते की मंजिल प्रकाश, मंगल और समृद्धि है।
लक्ष्मी के साथ गणेश की पूजा, धन के साथ
विवेक का संदेश
दीपावली की रात मां लक्ष्मी और भगवान
गणेश की पूजा का विशेष विधान है। मां लक्ष्मी धन, वैभव, ऐश्वर्य और समृद्धि की प्रतीक
हैं तो भगवान गणेश बुद्धि, विवेक और विघ्नों के विनाश के अधिष्ठाता माने जाते हैं।
दोनों की एक साथ पूजा का आध्यात्मिक अर्थ भी गहरा है। धन के साथ विवेक न हो तो समृद्धि
स्थायी नहीं रह सकती। वैभव के साथ विनम्रता न हो तो उसका कोई अर्थ नहीं। इसीलिए भारतीय
परंपरा में लक्ष्मी के साथ गणेश की आराधना का विधान बनाया गया। लेकिन आज इस मान्यता
को एक नए सामाजिक संदर्भ में समझने की जरूरत है। क्या समृद्धि केवल बैंक बैलेंस और
तिजोरी में रखे धन से मापी जा सकती है? क्या महंगे घर, चमचमाती गाड़ियां और बाजार से
खरीदी गई सजावट ही खुशहाली का प्रमाण हैं? निश्चित रूप से नहीं। परिवार में स्वास्थ्य,
रिश्तों में विश्वास, समाज में सद्भाव, जीवन में संतोष और जरूरतमंद की मदद करने की
क्षमता भी समृद्धि के ही रूप हैं। यही कारण है कि दीपावली पर मां लक्ष्मी की पूजा के
साथ घर की स्वच्छता, सद्भाव और अतिथि सत्कार को भी विशेष महत्व दिया गया है।
इस बार रविवार, अमावस्या और स्वाति नक्षत्र
का संयोग
इस वर्ष दीपावली ज्योतिषीय दृष्टि से
भी चर्चा का विषय है। 8 नवंबर 2026 को रविवार के दिन कार्तिक कृष्ण पक्ष की अमावस्या
पर दीपावली मनाई जाएगी। खास बात यह है कि इसी दिन तिथि परिवर्तन के कारण नरक चतुर्दशी
और मुख्य दीपावली का पर्व भी एक ही दिन पड़ रहा है। वाराणसी के स्थानीय पंचांग के अनुसार
8 नवंबर को सुबह लगभग 11 बजकर 28 मिनट तक कृष्ण चतुर्दशी रहेगी। इसके बाद अमावस्या
तिथि प्रारंभ होगी, जो 9 नवंबर को दोपहर लगभग 12 बजकर 31 मिनट तक रहेगी। इसलिए 8 नवंबर
की शाम लक्ष्मी-गणेश पूजन के समय अमावस्या तिथि विद्यमान रहेगी। इस दिन स्वाति नक्षत्र
का संयोग भी रहेगा, जो 9 नवंबर की सुबह लगभग 7 बजकर 24 मिनट तक प्रभावी रहेगा। इसके
बाद विशाखा नक्षत्र प्रारंभ होगा। स्वाति नक्षत्र का स्वामी राहु माना जाता है। ज्योतिषीय
मान्यता में इसे स्वतंत्रता, गति, परिवर्तन और नए अवसरों का प्रतीक माना गया है। स्वाति
का प्रतीक हवा में स्वतंत्र रूप से लहराता तिनका भी माना जाता है, जो परिस्थितियों
के अनुरूप स्वयं को ढालने की क्षमता का संकेत देता है। इस दिन रविवार होने के कारण
सूर्य का विशेष महत्व रहेगा। वहीं आयुष्मान योग का संयोग भी बन रहा है, जो 9 नवंबर
को तड़के लगभग 3 बजकर 3 मिनट तक रहेगा। इसके बाद सौभाग्य योग प्रारंभ होगा। ज्योतिषीय
मान्यता में आयुष्मान योग को स्वास्थ्य, दीर्घायु और मंगलकारी कार्यों से जोड़ा जाता
है। इस प्रकार रविवार, अमावस्या, स्वाति नक्षत्र और आयुष्मान योग का संयोग दीपावली
के पंचांग को विशेष बनाता है।
वृषभ लग्न में मां लक्ष्मी की आराधना का
विशेष महत्व
दीपावली पर केवल तिथि और नक्षत्र ही नहीं,
लग्न का भी विशेष महत्व होता है। मान्यता है कि प्रदोष काल में स्थिर लग्न के दौरान
मां लक्ष्मी की पूजा करने से घर में स्थायी सुख-समृद्धि का वास होता है। ज्योतिष में
वृषभ, सिंह, वृश्चिक और कुंभ को स्थिर राशियां माना गया है। इनमें वृषभ लग्न को दीपावली
के लक्ष्मी पूजन के लिए विशेष महत्व प्राप्त है। वृषभ राशि के स्वामी शुक्र हैं, जिन्हें
ज्योतिष में सुख, सौंदर्य, ऐश्वर्य और भौतिक समृद्धि का कारक माना जाता है। इस बार
वाराणसी में शाम 5 बजकर 13 मिनट पर सूर्यास्त होगा। इसके बाद प्रदोष काल प्रारंभ होगा।
लक्ष्मी पूजन का प्रमुख मुहूर्त
दिन
: रविवार, 8 नवंबर 2026
प्रदोष
काल : शाम 5:13 से 7:49 बजे तक
वृषभ
लग्न : शाम 5:37 से 7:34 बजे तक
लक्ष्मी-गणेश
पूजन : शाम 5:37 से 7:34 बजे तक
मुहूर्त
की अवधि : 1 घंटा 57 मिनट
यह
मुहूर्त प्रदोष काल और स्थिर वृषभ लग्न के संयोग पर आधारित है।
निशीथ काल का महत्व
रात्रिकालीन विशेष साधना करने वाले साधकों
के लिए निशीथ काल भी महत्वपूर्ण माना जाता है। निशीथ काल : रात 11:16 से 12:08 बजे
तक। सिंह लग्न : रात 12:05 से 2:19 बजे तक। सामान्य गृहस्थों के लिए प्रदोष काल में
वृषभ लग्न के दौरान पूजा को प्राथमिकता दी जाती है। निशीथ काल विशेष साधना और तांत्रिक
परंपराओं से जुड़े साधकों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
ग्रहों की चाल और ज्योतिषीय दृष्टि से दीपावली
दीपावली के समय ग्रहों की स्थिति भी ज्योतिषीय
विश्लेषण का विषय रहती है। वैदिक ज्योतिष में सूर्य को आत्मबल और प्रतिष्ठा, चंद्रमा
को मन, मंगल को साहस, बुध को बुद्धि, गुरु को ज्ञान, शुक्र को वैभव और शनि को कर्म
एवं अनुशासन का कारक माना गया है। राहु और केतु को छाया ग्रह कहा जाता है। इनके आधार
पर ज्योतिषाचार्य विभिन्न ग्रहयोगों और उनके पारंपरिक फलादेश का विश्लेषण करते हैं।
इस बार सूर्य तुला राशि में रहेगा। वैदिक ज्योतिष में तुला राशि सूर्य की नीच राशि
मानी जाती है। ग्रहों की वास्तविक स्थिति, दृष्टि, युति और भावगत प्रभाव के आधार पर
ही किसी विशेष योग का फलादेश किया जाता है। इसलिए केवल किसी ग्रह के वक्री या नीच राशि
में होने से पूरे वर्ष अथवा किसी व्यक्ति के भविष्य के बारे में निष्कर्ष निकालना उचित
नहीं है। दीपावली का ज्योतिषीय संदेश भी यही है कि ग्रहों की स्थिति चाहे जैसी हो,
मनुष्य के जीवन में कर्म, विवेक और सकारात्मकता का महत्व सर्वोपरि है।
एक दीप जरूरतमंद के घर भी जलना चाहिए
दीपावली की सबसे बड़ी खूबसूरती उसका सामाजिक
चरित्र है। इस दिन लोग अपने घर सजाते हैं, नए कपड़े पहनते हैं, मिठाइयां बांटते हैं
और एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं। लेकिन इस उल्लास के बीच उन चेहरों को भी देखना
जरूरी है, जिनके घरों तक त्योहार की रोशनी नहीं पहुंच पाती। किसी जरूरतमंद परिवार को
मिठाई देना, किसी बच्चे को नए कपड़े दिलाना, किसी बुजुर्ग का हाल पूछना, किसी अकेले
व्यक्ति के साथ कुछ पल बिताना या किसी कारीगर से सीधे खरीदारी करना भी दीपावली मनाने
का सुंदर तरीका है। त्योहार की सार्थकता केवल अपने घर को रोशन करने में नहीं, बल्कि
किसी दूसरे के जीवन में उम्मीद जगाने में है।
पांच दिनों का महापर्व, हर दिन में छिपा
अलग संदेश
दीपावली केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि
कई परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा पांच दिवसीय महापर्व है। धनतेरस, 6 नवंबर:
भगवान धन्वंतरि की आराधना, स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना तथा नए बर्तन, धातु और अन्य
वस्तुओं की खरीदारी का पर्व। नरक चतुर्दशी, 8 नवंबर: भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर
के वध की मान्यता से जुड़ा पर्व। इस बार तिथि के विशेष संयोग के कारण छोटी दीपावली
और मुख्य दीपावली एक ही दिन पड़ रही हैं। दीपावली, 8 नवंबर: मां लक्ष्मी, भगवान गणेश
और मां सरस्वती की आराधना का मुख्य पर्व। घरों और प्रतिष्ठानों में दीप जलाकर सुख-समृद्धि
की कामना की जाती है। गोवर्धन पूजा, 10 नवंबर: भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत
धारण कर प्रकृति और ब्रजवासियों की रक्षा करने की स्मृति में पूजा। यह पर्व प्रकृति
के प्रति कृतज्ञता का संदेश भी देता है। भाई दूज, 11 नवंबर: भाई-बहन के स्नेह, विश्वास
और आत्मीय संबंधों का पर्व। बहनें भाइयों के मंगलमय जीवन की कामना करती हैं।
असली दीपावली तब, जब भीतर का अंधेरा भी
मिटे
आज मनुष्य के पास पहले से अधिक साधन हैं।
बड़े घर हैं, महंगी गाड़ियां हैं, आधुनिक सजावट है और बाजार में हर तरह की वस्तु उपलब्ध
है। इसके बावजूद रिश्तों में दूरियां, अकेलापन, तनाव और असंतोष जीवन की बड़ी चुनौतियां
बने हुए हैं। ऐसे समय में दीपावली का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। यह हमें अपने
भीतर झांकने का अवसर देती है। क्या हमने किसी का दिल दुखाया है? क्या किसी जरूरतमंद
की मदद कर सकते हैं? क्या परिवार के साथ बैठकर कुछ पल बिता सकते हैं? क्या अपने भीतर
के क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या और नकारात्मकता को कम कर सकते हैं? उपनिषद का कालजयी मंत्र
इसी जीवन-दर्शन को अभिव्यक्त करता है—
असतो
मा सद्गमय।
तमसो
मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मा
अमृतं गमय॥
अर्थात हमें असत्य से सत्य की ओर, अंधकार
से प्रकाश की ओर और मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो। यह केवल धार्मिक मंत्र नहीं, बल्कि
मनुष्य की अनंत आकांक्षा का उद्घोष है। सत्य की तलाश, ज्ञान की प्राप्ति और जीवन को
बेहतर बनाने की निरंतर कोशिश ही वास्तविक प्रकाश है। इसलिए इस दीपावली पर दीप केवल
घर की चौखट पर न जलाएं। उसे अपने व्यवहार, विचार और रिश्तों में भी जलने दें। किसी
के चेहरे पर मुस्कान बनकर, किसी के जीवन में उम्मीद बनकर और किसी जरूरतमंद के घर में
रोशनी बनकर। क्योंकि दीपावली की सार्थकता इस बात में नहीं कि हमारे घर में कितने दीप
जले, बल्कि इस बात में है कि हमारे कारण कितने जीवन रोशन हुए। दीप की लौ छोटी जरूर
होती है, लेकिन उसका संदेश अनंत है। वह कहती है—अंधकार से समझौता मत करो, एक दीप जलाओ
और उजाले की शुरुआत करो।


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