जब ज्ञान मशीनों में आ गया, तब शिक्षक और
जरूरी हो गया…
किसी
राष्ट्र का भविष्य संसद, बाजार या ऊंची इमारतों में नहीं, बल्कि उसकी कक्षाओं में आकार
लेता है। वहां एक शिक्षक बच्चों को केवल पाठ नहीं पढ़ाता, वह उनके भीतर सोचने, प्रश्न
करने और सही-गलत के बीच फर्क करने की क्षमता पैदा करता है। आज जब एक मोबाइल फोन में
दुनिया का ज्ञान समाया है और कृत्रिम बुद्धिमत्ता पलक झपकते उत्तर दे रही है, तब शिक्षक
की जरूरत खत्म नहीं हुई, बल्कि और बढ़ गई है। मशीन सूचना दे सकती है, लेकिन विवेक नहीं
दे सकती। वह उत्तर बता सकती है, लेकिन बच्चे की आंखों में छिपी असफलता, डर या संभावना
नहीं पढ़ सकती। शिक्षक का सबसे बड़ा योगदान वह नहीं जो परीक्षा के परिणाम में दिखाई
देता है, बल्कि वह है जो वर्षों बाद किसी विद्यार्थी के व्यवहार में नजर आता है। किसी
वैज्ञानिक, अधिकारी, कलाकार या सफल नागरिक की कहानी के पीछे अक्सर किसी ऐसे शिक्षक
का मौन योगदान होता है, जिसका नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं होता। शिक्षक स्वयं
पीछे रहकर अपने विद्यार्थियों को आगे बढ़ाता है। उसका पुरस्कार पदक या सम्मान-पत्र
नहीं, बल्कि वर्षों बाद किसी शिष्य का यह कहना होता है—“गुरुजी,
आपकी वह बात आज भी याद है।” इस शिक्षक दिवस पर फूलों
और शुभकामनाओं से आगे बढ़कर शिक्षक को उसके वास्तविक स्थान पर रखना होगा। क्योंकि शिक्षक
केवल भविष्य नहीं पढ़ाता—वह भविष्य लिखता है
किसी राष्ट्र की
असली पहचान उसकी संसदों, उसकी
ऊंची इमारतों, उसकी चमचमाती सड़कों
अथवा उसके आर्थिक आंकड़ों
से नहीं होती। किसी
राष्ट्र की असली पहचान
इस बात से होती
है कि वह अपने
बच्चों को क्या सिखा
रहा है—और उन्हें
सिखाने वाले शिक्षक को
कितना सम्मान दे रहा है।
क्योंकि भविष्य कभी अचानक पैदा
नहीं होता। वह किसी कक्षा
के कोने में, किसी
शिक्षक की आवाज में,
किसी ब्लैकबोर्ड पर लिखे एक
छोटे-से वाक्य में
और किसी बच्चे की
आंखों में धीरे-धीरे
आकार लेता है। 5 सितंबर
भारत के लिए केवल
एक तारीख नहीं है। यह
उस ऋण को याद
करने का दिन है
जिसे कोई मनुष्य जीवन
भर चुकाने के बाद भी
पूरा नहीं चुका सकता।
भारत में यह दिन
महान दार्शनिक, शिक्षाविद और देश के
दूसरे राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन
की जयंती के अवसर पर
शिक्षक दिवस के रूप
में मनाया जाता है। 1962 से
चली आ रही इस
परंपरा का सबसे सुंदर
पक्ष यही है कि
एक राष्ट्रपति के जन्मदिन को
स्वयं उनके आग्रह से
शिक्षकों के नाम कर
दिया गया। लेकिन शिक्षक दिवस का सबसे
बड़ा प्रश्न यह नहीं है
कि ‘हम शिक्षक को
क्या उपहार दें?’ सबसे बड़ा प्रश्न
यह है— ‘हमने शिक्षक
से जो पाया, उसे
समाज को लौटाया कितना?’
एक शिक्षक बच्चे
को केवल ‘क’ से कबूतर
और ‘A’ से Apple नहीं सिखाता। वह
उसे पहली बार यह
एहसास कराता है कि दुनिया
किताब के पन्नों से
बड़ी है। वह बताता
है कि गलती करना
अपराध नहीं, लेकिन गलती से सीखने
से इनकार करना सबसे बड़ी
भूल है। वह गणित
में संख्याएं सिखाते-सिखाते जीवन का हिसाब
समझाता है। इतिहास पढ़ाते
हुए बताता है कि बीता
हुआ कल केवल बीती
हुई कहानी नहीं, बल्कि आज के निर्णयों
का आईना है। विज्ञान
पढ़ाते हुए प्रश्न पूछना
सिखाता है। साहित्य पढ़ाते
हुए संवेदना जगाता है। और कभी-कभी तो वह
बिना कुछ कहे ही
सबसे बड़ा पाठ पढ़ा
देता है—मनुष्य बने
रहने का। यही कारण
है कि शिक्षक की
भूमिका पाठ्यक्रम से कहीं बड़ी
है। किताब ज्ञान दे सकती है,
लेकिन ज्ञान का विवेक शिक्षक
देता है।
आज का सबसे बड़ा संकट—ज्ञान बहुत है, गुरु कम होते जा रहे हैं
हम ऐसे समय
में जी रहे हैं
जहां एक मोबाइल फोन
में पूरी दुनिया का
ज्ञान मौजूद है। एक बच्चा
किसी भी प्रश्न का
उत्तर कुछ सेकंड में
खोज सकता है। कृत्रिम
बुद्धिमत्ता उसके लिए निबंध
लिख सकती है। वीडियो
उसे प्रयोग करके दिखा सकते
हैं। ऑनलाइन कक्षाएं उसे दुनिया के
किसी भी कोने के
शिक्षक तक पहुंचा सकती
हैं। फिर सवाल उठता
है— जब ज्ञान इतना
आसानी से उपलब्ध है
तो शिक्षक की जरूरत क्यों
है? क्योंकि सूचना और ज्ञान एक
नहीं हैं। और ज्ञान
तथा विवेक तो बिल्कुल एक
नहीं हैं। इंटरनेट बता
सकता है कि क्या
सही है। लेकिन जीवन
कई बार यह तय
करने की चुनौती देता
है कि— ‘सही होते
हुए भी क्या करना
उचित है?’ यहीं शिक्षक
की जरूरत शुरू होती है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता उत्तर दे सकती है,
मगर शिक्षक बच्चे के चेहरे पर
छिपा हुआ प्रश्न पढ़
सकता है। मशीन
गलती पकड़ सकती है,
मगर शिक्षक यह समझ सकता
है कि गलती ज्ञान
की कमी से हुई
है या आत्मविश्वास की
कमी से। एल्गोरिद्म प्रदर्शन
का आंकड़ा बता सकता है,
लेकिन शिक्षक यह देख सकता
है कि कम अंक
पाने वाला बच्चा शायद
जीवन में सबसे अधिक
संभावना वाला बच्चा हो।
एक शिक्षक की सबसे बड़ी उपलब्धि उसका अपना नाम नहीं, उसके विद्यार्थियों के नाम होते हैं
दुनिया बड़े लोगों की
सफलता की कहानियां लिखती
है। लेकिन उन कहानियों के
पीछे खड़े शिक्षकों के
नाम अक्सर फुटनोट में भी नहीं
मिलते। किसी वैज्ञानिक की
उपलब्धि पर प्रयोगशाला का
नाम चमकता है। किसी अधिकारी
के सम्मान में पूरा शहर
बधाई देता है। किसी
लेखक की पुस्तक पर
उसका नाम छपता है।
किसी खिलाड़ी के गले में
पदक पड़ता है। लेकिन उस
बच्चे के पहले शिक्षक
का नाम कौन पूछता
है जिसने उसकी उंगली पकड़कर
पहली बार अक्षर लिखना
सिखाया था? शायद यही
शिक्षक की नियति है।
वह स्वयं पीछे रहता है
ताकि उसका विद्यार्थी आगे
दिखाई दे। वह अपनी
सफलता अपने नाम से
नहीं, अपने विद्यार्थियों के
चरित्र में देखता है।
और शायद इसलिए शिक्षक
दुनिया का वह एकमात्र
पेशा है जिसमें किसी
और की सफलता देखकर
मनुष्य को अपने भीतर
सबसे अधिक संतोष मिलता
है।
गांव का वह शिक्षक भी राष्ट्र निर्माता है जिसकी खबर कभी अखबार में नहीं छपती
किसी दूरस्थ गांव
में आज भी कोई
शिक्षक बारिश के बाद कीचड़
भरे रास्ते से विद्यालय पहुंचता
होगा। किसी सरकारी स्कूल
में कोई अध्यापक सीमित
संसाधनों के बावजूद बच्चों
के भीतर बड़े सपने
बो रहा होगा। कहीं
कोई शिक्षिका घर से लाई
हुई अतिरिक्त कॉपियों से उस बच्चे
को पढ़ा रही होगी
जिसके माता-पिता किताब
खरीदने की स्थिति में
नहीं हैं। कहीं कोई
शिक्षक अपने विद्यार्थी से
कह रहा होगा— “तुम
कर सकते हो।” और
शायद उस बच्चे के
जीवन में इससे बड़ी
छात्रवृत्ति कोई नहीं। देश
की सबसे बड़ी शैक्षिक
क्रांति कभी-कभी किसी
सरकारी योजना से नहीं, किसी
शिक्षक के एक वाक्य
से शुरू होती है।
शिक्षक का सम्मान समारोह में नहीं, व्यवस्था में दिखाई देना चाहिए
शिक्षक दिवस पर फूल
चढ़ेंगे। मालाएं पहनाई जाएंगी। मंच सजेंगे। भाषण
होंगे। ‘गुरु देवो भवः’
कहा जाएगा। विद्यार्थी अपने शिक्षकों को
शुभकामनाएं देंगे। यह सब होना
भी चाहिए। लेकिन शिक्षक के प्रति सच्चा
सम्मान उस दिन दिखाई
देगा जब हम यह
सुनिश्चित करेंगे कि शिक्षक को
केवल परिणाम देने वाली मशीन
न समझा जाए। उसका
समय कागजी औपचारिकताओं में कम और
बच्चों के साथ अधिक
बीते। उसे पढ़ाने के
लिए पर्याप्त संसाधन मिलें। उसे समाज में
वह प्रतिष्ठा मिले जिसके योग्य
वह है। और सबसे
महत्वपूर्ण— शिक्षक को केवल नौकरी
करने वाला कर्मचारी नहीं,
राष्ट्र के भविष्य का
निर्माता माना जाए।
राधाकृष्णन को याद करने का अर्थ केवल उनकी तस्वीर पर माला चढ़ाना नहीं
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन
स्वयं शिक्षक, दार्शनिक और शिक्षाविद थे।
वे स्वतंत्र भारत के पहले
उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति
बने। उन्होंने आंध्र विश्वविद्यालय और बनारस हिंदू
विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों का
नेतृत्व भी किया। लेकिन
उनकी सबसे बड़ी पहचान
राष्ट्रपति भवन नहीं थी।
उनकी सबसे बड़ी पहचान
एक शिक्षक और चिंतक की
थी। यही कारण है
कि 5 सितंबर का अर्थ किसी
महान व्यक्ति की जयंती मनाना
भर नहीं है। यह
उस विचार को याद करना
है कि— शिक्षा का
अंतिम उद्देश्य केवल रोजगार नहीं,
मनुष्य निर्माण है। आज जब
शिक्षा भी बाजार, प्रतियोगिता
और परिणामों के दबाव में
दिखाई देती है, तब
राधाकृष्णन की विरासत हमें
फिर उस मूल प्रश्न
तक ले जाती है—
हम शिक्षित किसलिए हो रहे हैं?
अधिक कमाने के लिए? अधिक
पाने के लिए? दूसरों
से आगे निकलने के
लिए? या फिर एक
बेहतर मनुष्य बनने के लिए?
यदि शिक्षा मनुष्य को अधिक संवेदनशील,
अधिक विवेकशील और अधिक जिम्मेदार
नहीं बनाती, तो डिग्रियों की
संख्या चाहे जितनी हो,
शिक्षा अधूरी ही रहेगी।
शिक्षक का असली पुरस्कार
किसी शिक्षक के
लिए सबसे बड़ा पुरस्कार
शायद वह क्षण होता
है जब वर्षों बाद
कोई विद्यार्थी सामने आकर कहता है—
“गुरुजी, आपने उस दिन
जो कहा था, वह
आज भी याद है।”
बस। उस एक वाक्य
में पूरी उम्र की
मेहनत लौट आती है।
किसी शिक्षक के लिए इससे
बड़ा सम्मान-पत्र शायद कोई
नहीं। क्योंकि शिक्षक जानता है कि उसने
केवल एक विद्यार्थी को
नहीं पढ़ाया था। उसने किसी
परिवार का भविष्य बदला।
उसने किसी समाज में
एक संवेदनशील नागरिक जोड़ा। और संभव है
कि उसके विद्यार्थी ने
आगे चलकर हजारों लोगों
के जीवन को प्रभावित
किया हो। इस तरह
शिक्षक की एक छोटी-सी मेहनत पीढ़ियों
में फैलती चली जाती है।
शिक्षक स्वयं एक वृक्ष नहीं
होता; वह वृक्ष उगाने
वाला माली होता है।
माली के हाथों की
मिट्टी दिखाई देती है, लेकिन
उसके लगाए पेड़ की
छाया में आने वाली
पीढ़ियां अक्सर उसे पहचानती तक
नहीं।
आज शिक्षक से एक और बड़ी अपेक्षा है
समय बदल चुका
है। आज शिक्षक को
केवल विषय का ज्ञाता
होना पर्याप्त नहीं। उसे बच्चों को यह भी
सिखाना है कि सूचना
के समुद्र में सत्य कैसे
खोजें। झूठ और तथ्य में
अंतर कैसे करें। सोशल मीडिया
की चमक और वास्तविक
जीवन की सच्चाई के
बीच दूरी कैसे समझें।
असफलता से कैसे जूझें। मानसिक
दबाव में स्वयं को
कैसे संभालें। दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते
हुए भी मनुष्य बने
कैसे रहें। और सबसे महत्वपूर्ण—
भीड़ में शामिल होने
के बजाय अपनी स्वतंत्र
सोच कैसे बचाए रखें।
यही 21वीं सदी के
शिक्षक की सबसे बड़ी
भूमिका है।
एक दिन शिक्षक नहीं होगा…
किसी दिन स्कूल
की घंटी बजेगी। बच्चे
कक्षा में जाएंगे। किसी
पुराने शिक्षक की कुर्सी खाली
होगी। ब्लैकबोर्ड वही होगा। किताबें
वही होंगी। खिड़की से आती धूप
भी वही होगी। बस
वह आवाज नहीं होगी
जो कभी कहती थी—
“ध्यान से सुनो…” तब
शायद विद्यार्थियों को समझ आएगा
कि वे केवल पाठ
नहीं सुनते थे। वे जीवन
सुनते थे। और तब
महसूस होगा कि शिक्षक
कभी कक्षा से पूरी तरह
विदा नहीं होता। वह
विद्यार्थी की भाषा में
रहता है। उसके निर्णयों
में रहता है। उसके
संस्कारों में रहता है।
उसकी सफलता में रहता है।
और कभी-कभी तो
उसकी संतान को दी गई
सीख में भी जीवित
रहता है। शिक्षक की
मृत्यु संभव है, शिक्षक
का प्रभाव नहीं।
इस शिक्षक दिवस पर हमें क्या करना चाहिए?
आज किसी शिक्षक
को केवल शुभकामना संदेश
भेजने के बजाय एक
विद्यार्थी अपने पुराने गुरु
को फोन कर सकता
है। किसी शिक्षक का
नाम वर्षों बाद भी याद
है तो उसे खोजकर
धन्यवाद कह सकता है।
और समाज एक कदम
आगे बढ़कर यह संकल्प ले
सकता है कि वह
अपने शिक्षकों का सम्मान केवल
एक दिन नहीं, पूरे
वर्ष करेगा। क्योंकि शिक्षक दिवस वास्तव में
शिक्षक को धन्यवाद कहने
का दिन नहीं है।
यह स्वयं से पूछने का
दिन है कि हम
अपने शिक्षकों की दी हुई
शिक्षा के कितने योग्य
उत्तराधिकारी बने।
अंतिम बात
सभ्यताएं तलवारों से नहीं बचतीं।
वे विचारों से बचती हैं।
विचार किताबों से निकलते हैं।
किताबें कक्षाओं में पहुंचती हैं।
और कक्षाओं में उन विचारों
को जीवन देने वाला
एक मनुष्य बैठा होता है—
शिक्षक। वह शायद सबसे
कम दिखाई देने वाला राष्ट्र
निर्माता है। वह किसी
सीमा पर बंदूक लेकर
खड़ा नहीं होता, फिर
भी राष्ट्र की सीमाओं से
कहीं आगे जाकर आने
वाली पीढ़ियों की चेतना की
रक्षा करता है। वह
कोई भवन नहीं बनाता,
लेकिन मनुष्य बनाता है। वह कोई
स्मारक नहीं खड़ा करता,
लेकिन अपने विद्यार्थियों के
भीतर ऐसी नींव रख
जाता है जिस पर
परिवार, समाज और राष्ट्र
खड़े होते हैं। इसलिए
शिक्षक को केवल ‘गुरु’
कह देना पर्याप्त नहीं।
गुरु के प्रति सच्ची
श्रद्धा तब होगी, जब
हम उनकी शिक्षा को
अपने आचरण में उतारेंगे।
क्योंकि अंततः शिक्षक की सबसे बड़ी
कक्षा स्कूल नहीं— समाज है। और उसकी
सबसे बड़ी पाठ्यपुस्तक— हमारा
चरित्र शिक्षक दिवस पर उन
सभी ज्ञात-अज्ञात गुरुओं को नमन, जिनके
अपने सपनों से पहले उनके
विद्यार्थियों के सपने बड़े
रहे। क्योंकि दुनिया में बहुत से
लोग हमें यह बताते
हैं कि जीवन से
क्या पाना है— लेकिन
एक सच्चा शिक्षक हमें यह सिखाता
है कि जीवन में
क्या बनना है।


