कृष्ण की धरती से योगी की हुंकार, राम के बाद अब कृष्ण की बारी
राम के बाद कृष्ण… 2027 में मथुरा बनेगा सियासत का कुरुक्षेत्र!
जन्माष्टमी पर योगी की ललकार—अयोध्या-काशी के बाद ब्रज के भव्य विकास का संकल्प
बाबर-औरंगजेब के बहाने विपक्ष पर सीधा वार ‘बंटेंगे तो कटेंगे’
जन्माष्टमी पर योगी का तीखा वार—आस्था के सवाल पर विपक्ष को घेरा, ब्रज को अयोध्या-काशी जैसा बनाने का संकल्प
2012 में सपा की सत्ता,
2017 में
भाजपा
की
प्रचंड
वापसी
और
2022 में
योगी
की
दूसरी
के
बाद
अब
तीसरी
पारी
की तैयारी…
योगी का बड़ा संदेश—ब्रज को भी मिलेगा भव्य परिसर और विश्वस्तरीय विकास का मॉडल, 2027 की सियासत में बढ़ेगी मथुरा की अहमियत
सुरेश गांधी
वाराणसी-मथुरा। जन्माष्टमी पर कृष्ण की नगरी में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का आगमन धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं रहा। मथुरा-वृंदावन की धरती से निकली उनकी हुंकार में 2027 के उत्तर प्रदेश की राजनीति की आहट भी सुनाई दी। अयोध्या और काशी के बाद अब ब्रजभूमि को उसी तर्ज पर विकसित करने की घोषणा और साथ ही बाबर-औरंगजेब के बहाने विपक्ष पर निशाना—इन दोनों को एक साथ रखकर देखें तो साफ है कि उत्तर प्रदेश की सियासत में ‘राम के बाद कृष्ण’ का नया अध्याय खुल रहा है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि
अयोध्या और काशी के
भव्य विकास के बाद अब
ब्रजभूमि का विकास भी
लोगों की भावनाओं के
अनुरूप किया जाएगा। मथुरा-वृंदावन में अयोध्या और
काशी की तरह भव्य
परिसर विकसित करने की बात
कही। इसी मंच से
उन्होंने पिछली सरकारों पर श्रीकृष्ण जन्मभूमि
आने से वोटबैंक के
कारण हिचकने का आरोप लगाया
और सवाल किया कि
जिनकी आस्था बाबर और औरंगजेब
में है, वे जनता
की आस्था का सम्मान कैसे
करेंगे? यह महज बयान
नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की उस राजनीति
का अगला विस्तार है
जिसमें आस्था, विरासत और विकास एक-दूसरे के पूरक बनते
जा रहे हैं।
लेकिन चुनाव केवल नारों से
नहीं जीते जाते। 2012 से
2022 तक का इतिहास यही
बताता है कि उत्तर
प्रदेश का मतदाता एक
ही मुद्दे पर स्थिर नहीं
रहता। 2012 में सत्ता परिवर्तन
हुआ। 2017 में भाजपा का
अभूतपूर्व उभार हुआ। 2022 में
भाजपा ने सत्ता बरकरार
रखी, मगर सीटें 2017 के
मुकाबले घटीं और सपा
ने अपनी स्थिति मजबूत
की। इसलिए 2027 में कृष्ण जन्मभूमि
का सवाल महत्वपूर्ण हो
सकता है, लेकिन अकेला
निर्णायक नहीं। रोजगार, महंगाई, किसान, महिला सुरक्षा, कानून-व्यवस्था, सामाजिक समीकरण, कल्याणकारी योजनाओं का लाभ, युवाओं
की आकांक्षाएं और स्थानीय विकास—इन सबका जोड़
ही चुनाव का परिणाम तय
करेगा।
यही कारण है
कि मथुरा से योगी की
आज की हुंकार को
केवल मंदिर की घोषणा मानना
भी अधूरा होगा और इसे
अभी से 2027 की पूरी चुनावी
रणनीति मान लेना भी
जल्दबाजी। मगर एक बात
स्पष्ट है—उत्तर प्रदेश
की चुनावी राजनीति में अयोध्या का
राम अध्याय समाप्त नहीं हुआ है,
काशी का विश्वनाथ अध्याय
जारी है और अब
ब्रज का कृष्ण अध्याय
तेजी से खुल रहा
है। 2027 में सवाल सिर्फ
यह नहीं होगा कि
सत्ता किसकी होगी… सवाल यह भी
होगा कि उत्तर प्रदेश
के मतदाता के मन में
‘राम’, ‘कृष्ण’, ‘काम’ और ‘कल्याण’
में कौन-सा नैरेटिव
सबसे ज्यादा गूंजेगा। मथुरा से आज उठी
कृष्ण की बांसुरी की
धुन राजनीतिक गलियारों तक पहुंच चुकी
है—अब देखना है,
2027 के रण में यह
धुन कितनी दूर तक जाती
है।
2012 : जब ‘साइकिल’ दौड़ी थी
2012 का उत्तर प्रदेश
चुनाव आज की राजनीति
को समझने की पहली सीढ़ी
है। उस चुनाव में
समाजवादी पार्टी ने 403 में से 224 सीटें
जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया था। बसपा
80 सीटों के साथ दूसरे
स्थान पर रही, जबकि
भाजपा को महज 47 सीटें
मिलीं। सपा का वोट
शेयर करीब 29.15 प्रतिशत और भाजपा का
15 प्रतिशत रहा। यह वह
दौर था जब उत्तर
प्रदेश की राजनीति का
केंद्रीय विमर्श सामाजिक समीकरण, सत्ता परिवर्तन और कानून-व्यवस्था
के इर्द-गिर्द था।
भाजपा तब राज्य की
राजनीति में तीसरे स्थान
पर थी। मगर पांच
साल बाद तस्वीर ऐसी
बदली कि उत्तर प्रदेश
का राजनीतिक भूगोल ही बदल गया।
2017 : ‘राम’ की पृष्ठभूमि में भाजपा का भगवा उभार
2017 में भाजपा ने
312 सीटें जीतकर ऐसी प्रचंड वापसी
की, जिसने प्रदेश की राजनीति के
पुराने समीकरणों को उलट दिया।
भाजपा का वोट शेयर
करीब 39.7 प्रतिशत पहुंचा। सपा 47 और बसपा 19 सीटों
तक सिमट गई। यह
सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं था। यह
राजनीतिक नैरेटिव के परिवर्तन का
चुनाव था। भाजपा ने
हिंदुत्व, कानून-व्यवस्था, विकास और नरेंद्र मोदी
की लोकप्रियता को एक साथ
साधा। इसी दौर में
योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने और प्रदेश
की राजनीति में एक नया
चेहरा केंद्र में आया। राम मंदिर
का सवाल तब भी
मौजूद था, लेकिन वह
अभी निर्माण की वास्तविकता नहीं
बना था।
2022 : ‘राम मंदिर’ से आगे ‘काम, कानून और राशन’ का चुनाव
2022 में भाजपा की
सीटें घटकर 255 हुईं, लेकिन वह फिर भी
स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता
में लौटी। सहयोगियों के साथ उसका
आंकड़ा 273 तक पहुंचा। समाजवादी
पार्टी 111 सीटों पर पहुंची, जबकि
बसपा केवल एक सीट
जीत सकी। भाजपा का
वोट शेयर करीब 41.3 प्रतिशत
रहा। 2022 का चुनाव केवल
मंदिर के भरोसे नहीं
जीता गया। भाजपा के
पक्ष में कानून-व्यवस्था,
मुफ्त राशन, कल्याणकारी योजनाएं, बुनियादी ढांचे का विकास और
राम मंदिर निर्माण को एक साथ
रखा गया। चुनावी विश्लेषणों
में भी मुफ्त राशन
और कानून-व्यवस्था को महत्वपूर्ण कारक
माना गया। अयोध्या में राम मंदिर
निर्माण शुरू हो चुका
था और भाजपा उसे
अपने लंबे राजनीतिक वादे
की पूर्ति के रूप में
प्रस्तुत कर रही थी।
यानी 2017 में राम एक
राजनीतिक प्रतीक थे, तो 2022 में
राम मंदिर निर्माण एक दिखाई देने
वाली उपलब्धि बन चुका था।
और अब 2027 : ‘राम’ से ‘कृष्ण’ तक
यहीं से आज
का मथुरा महत्वपूर्ण हो जाता है।
अयोध्या में मंदिर निर्माण
की कहानी आगे बढ़ चुकी
है। काशी विश्वनाथ धाम
का मॉडल सामने है।
अब मुख्यमंत्री का कहना कि
ब्रजभूमि को भी अयोध्या
और काशी की तर्ज
पर विकसित किया जाएगा, आने
वाले चुनावी विमर्श को नई दिशा
देने वाला संदेश माना
जा सकता है। मथुरा-वृंदावन के साथ गोवर्धन,
बरसाना और नंदगांव का
पूरा ब्रज क्षेत्र धार्मिक
पर्यटन, सांस्कृतिक विरासत और आस्था के
बड़े केंद्र के रूप में
सामने है। मुख्यमंत्री ने
इन क्षेत्रों में श्रद्धालुओं के
लिए सुविधाओं को बेहतर करने
पर भी जोर दिया।
अयोध्या में राम। काशी
में विश्वनाथ। विंध्याचल में मां विंध्यवासिनी।
और अब ब्रज में
कृष्ण। उत्तर प्रदेश की राजनीति के
सांस्कृतिक मानचित्र पर यह एक
ऐसा त्रिकोण बनाता दिख रहा है,
जिसकी गूंज 2027 तक सुनाई दे
सकती है।
‘बाबर-औरंगजेब’ : इतिहास से वर्तमान की राजनीति तक
योगी ने आज
बाबर और औरंगजेब का
उल्लेख करते हुए कहा
कि जिनकी आस्था इन ऐतिहासिक आक्रांताओं
में है, वे जनता
की आस्था का सम्मान कैसे
कर सकते हैं। उन्होंने
आरोप लगाया कि ऐसे तत्व
समाज में जहर घोलने
की कोशिश कर रहे हैं।
यह वही राजनीतिक शैली
है जिसमें अतीत को वर्तमान
की राजनीतिक पहचान से जोड़ा जाता
है। भाजपा के लिए यह
सांस्कृतिक अस्मिता और बहुसंख्यक एकजुटता
का संदेश है। विपक्ष के
लिए चुनौती यह है कि
वह इस विमर्श का
जवाब किस तरह देता
है—सिर्फ विरोध के रूप में
या फिर विकास, रोजगार,
सामाजिक न्याय और धार्मिक पर्यटन
के अपने वैकल्पिक मॉडल
के साथ।
‘बंटेंगे तो कटेंगे’ से आगे की पटकथा?
2024 में योगी आदित्यनाथ
का ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ नारा
उत्तर प्रदेश की राजनीति में
बड़ा चुनावी विमर्श बना। भाजपा ने
इसे हिंदू एकता और सामाजिक
एकजुटता के संदेश के
रूप में आगे बढ़ाया,
जबकि अखिलेश यादव ने इसके
जवाब में ‘जुड़ेंगे तो
जीतेंगे’ का नारा दिया।
अब 2027 की ओर बढ़ते
हुए सवाल यह है
कि क्या यह राजनीतिक
भाषा मथुरा के कृष्ण विमर्श
से जुड़कर और व्यापक होगी? राम—आस्था का प्रतीक। कृष्ण—रणनीति और कर्म का
प्रतीक। और ‘बंटेंगे तो
कटेंगे’—राजनीतिक एकजुटता का नारा। आज
योगी ने अपने भाषण
में श्रीकृष्ण के गीता संदेश—कर्तव्य और निष्काम कर्म—को भी विकास
और राष्ट्र निर्माण से जोड़ा। यानी
कृष्ण को केवल मंदिर
तक सीमित नहीं किया गया,
बल्कि कर्म, कर्तव्य, विकास और राष्ट्र निर्माण
के विमर्श से भी जोड़ा
गया।



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