‘सादगी की सरस्वती’ लोकगायिका मैथिली की जीत सनातन, संस्कार और परंपरा की जीत
अलीनगर
विधानसभा
में
इस
बार
राजनीति
से
ज्यादा
भावनाएं
जीतीं।
लोकगायिका
मैथिली
शरण
ने
11,000 से अधिक मतों
के
ऐतिहासिक
अंतर
से
वह
दर्ज
किया,
जिसे
जनता
ने
पहले
ही
सुनिश्चित
कर
दिया
था।
मतदान
से
महीनों
पहले
ही
गलियों,
चैपालों
में
एक
ही
आवाज
गूंज
रही
थी,
“हमर
बेटी
जीतै
छइ।”
उनकी
सादगी,
संस्कृति,
मां
- भाई
संग
पारिवारिक
उपस्थिति
और
प्रधानमंत्री
मोदी
द्वारा
सम्मानित
प्रतिभा
ने
मतदाताओं
को
भावनात्मक
रूप
से
जोड़
दिया।
अलीनगर
का
यह
जनादेश
बताता
है,
“नेता
वही,
जिसमें
सादगी
और
आदर
का
भाव
हो।”
मैथिली
शरण
ने
गीतों
से
दिल
जीते
थे,
अब
सेवा
से
दिल
जीतने
की
यात्रा
शुरू
हो
चुकी
है।
चुनाव
के
दौरान
अलीनगर
में
मेरे
ग्राउंड
कवरेज
में
सबसे
खास
बात
यही
दिखी
कि
जनता
केवल
समर्थन
नहीं
कर
रही
थी,
वह
गर्व
महसूस
कर
रही
थी।
कई
जगहों
पर
महिलाओं
की
उत्सुकता,
बुजुर्गों
का
आशीर्वाद
और
युवाओं
का
आत्मविश्वास
साफ
बता
रहा
था
कि
यह
जीत
चुनावी
नहीं,
पारिवारिक
जीत
है।
अलीनगर
ने
केवल
वोट
नहीं
दिया,
अपनी
बेटी
को
नेतृत्व
सौंपा
है।
प्रस्तुत
है
सीनियर
रिपोर्टर
सुरेश
गांधी
की
मैथिली
शरण
से
खास
बातचीत
के
प्रमुख
अंश:-
जहां
जनता
ने
पहले
ही
दिलों
में
लिख
दी
थी
जीत
की
इबारत,
सादगी,
संस्कृति,
मां
- भाई
संग
आत्मीय
छवि
बनी
सबसे
बड़ी
ताकत.
मैथिली
ठाकुर
जैसी
नई
पीढ़ी
की
जीत
ने
राजनीतिक
माहौल
में
नई
ऊर्जा
भर
दी
है.
उनकी
यह
जीत
आने
वाले
समय
में
युवाओं
की
भूमिका
और
भागीदारी
को
भी
नई
दिशा
दे
सकती
है
सुरेश गांधी
साल की गायिका मैथिली ठाकुर चुनाव में बढ़त बनाते ही खुशी से झूमती नजर आ रही हैं। मैथिली की जीत केवल एक राजनैतिक विजय नहीं, बल्कि संस्कृति, परम्परा, सनातन, और सामाजिक सादगी की वह पुकार है जिसने जन-जन का दिल जीता, जनता ने उन्हें अपने वोट से स्वीकारा है।
अलीनगर विधानसभा का यह चुनाव जितना राजनीतिक था, उतना ही भावनात्मक भी। लोकगायिका मैथिली शरण की ऐतिहासिक जीत ने साबित कर दिया कि जनता के लिए सादगी, संस्कार और सम्मान आज भी राजनीति की सबसे बड़ी पूंजी है। चुनाव प्रचार के दौरान एक बात बार-बार सामने आई, “हमर बेटी त जीतबे करैत।” जनता का यही विश्वास अंततः 11,000 से अधिक मतों के विशाल अंतर में बदल गया। मैथिली शरण जहां भी गईं, उनकी मां और भाई उनके साथ रहे। यह दृश्य मतदाताओं को सबसे अधिक आकर्षित करता था। महिलाएँ कहतीं, “एतना सादगी, एतना आदर... ई नेता त नय, अपन बेटी छै।” उनकी इस पारिवारिक छवि ने राजनीति में अद्भुत विश्वास पैदा किया। लोकदृसंगीत से मिली पहचान ने उन्हें गाँव - गाँव तक एक अपना नाम दिया था। उनकी मीठी बोली और सहज व्यवहार ने हर उम्र - समूह को जोड़ दिया।
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा पहले दिया गया सम्मान भी जनता में गर्व का विषय था। चुनावी दौरे के दौरान मैंने पाया कि जहाँ - जहाँ वे जातीं, भीड़ बिना बुलाए उमड़ पड़ती। महिलाएँ आरती उतारतीं, बच्चे “मैथिली दीदी जिंदाबाद” कहते दौड़ते आते। यह चुनाव प्रचार नहीं - एक भावनात्मक स्वीकार्यता थी। विपक्ष की सभाओं में ऊर्जा कम थी। लोग सुनते भी थे, पर मन पहले ही अपना निर्णय कर चुका था। 85 वर्षीय महिला को उसकी बेटी बूथ तक लाई, और बोली, “हमर बेटी जीतै के पहले वोट देल जरूरी छै।” यह दृश्य चुनाव की असली कहानी कह रहा था।सवाल:
अलीनगर की जनता ने
आपको भारी मतों से
जिताया। इस जीत को
आप कैसे देखती हैं?
मैथिली
ठाकुर:
मेरे लिए यह जीत
केवल आंकड़ों की नहीं, भावनाओं
की जीत है। अलीनगर
की जनता ने मुझे
नेता नहीं, अपनी बेटी मानकर
आशीर्वाद दिया। मैंने जिस सादगी, संस्कार
और संस्कृति के साथ यहाँ
कदम रखा, जनता ने
उसी भाव को स्वीकार
किया। लोकगायिका के रूप में
मुझे जो प्यार मिला
था, अब वह जिम्मेदारी
में बदल गया है।
मैं इसे “अलीनगर का
आदेश” मानती हूँ।
सवाल:
आपकी सभाओं में महिलाओं, युवाओं
और बुजुर्गों का अभूतपूर्व समर्थन
दिखा। आपको कब लगा
कि यह जीत पक्की
है?
सवाल:
आपके हर कार्यक्रम में
आपकी माँ - भाई का साथ
रहना आपकी लोकप्रियता का
विशेष कारण माना गया।
क्या यह आपका सुनियोजित
निर्णय था?
मैथिली
ठाकुर:
यह हमारे परिवार की परंपरा है।
जहाँ भी मैं गायन,
भजन या कोई कार्यक्रम
करती हूँ, माँ-पापा
या भाई साथ होते
हैं। यह हमारे संस्कार
हैं। अलीनगर के लोगों ने
इस पारिवारिक जुड़ाव को बहुत अपनाया।
उन्हें लगा कि “हमारी
बेटी परिवार के साथ राजनीति
में उतरी है।” इससे
जनता का विश्वास और
बढ़ा।
सवाल:
आपकी राजनीति की शुरुआत संस्कृति
और सनातन मूल्यों के साथ मानी
जा रही है। आप
इसे कैसे देखती हैं?
सवाल:
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आपकी प्रतिभा
की कई बार प्रशंसा
कर चुके हैं। क्या
उससे चुनाव में लाभ मिला?
मैथिली
ठाकुर: निश्चित रूप से प्रधानमंत्री
जी द्वारा मेरे गीतों की
सराहना, पुरस्कार और सम्मान मुझे
प्रेरणा देते रहे हैं।
लेकिन अलीनगर के लोगों ने
मुझे इसलिए नहीं चुना कि
प्रधानमंत्री ने मुझे सम्मान
दिया, बल्कि इसलिए चुना कि मैं
उनकी बेटी हूँ, उनकी
संस्कृति की आवाज हूँ।
मोदी जी का समर्थन
बड़ी बात है, लेकिन
जनता का भरोसा उससे
भी बड़ी चीज है।
सवाल:
एक लोकगायिका के रूप में
राजनीति में आना कैसा
अनुभव रहा? चुनौतियाँ भी
आईं होंगी?
मैथिली ठाकुर: चुनौतियाँ तो थीं, लेकिन जनता का प्यार सबसे बड़ी शक्ति था। मैंने राजनीति में आकर पाया कि यदि आपका मन साफ है, भाषा मीठी है, और व्यवहार सरल है, तो राजनीति भी उतनी ही सुरमयी हो सकती है जितनी भजन-गायन। मैंने कभी कठोर भाषा का उपयोग नहीं किया, नकारात्मक प्रचार से दूरी बनाई, और जनता ने इसी शैली को अपनाया।
सवाल:
आपके राजनीतिक एजेंडे की दिशा क्या
होगी?
मैथिली
ठाकुर:
मेरा पहला लक्ष्य है,
अलीनगर के युवाओं को
शिक्षा व रोजगार से
जोड़ना। महिलाओं के आत्मनिर्भर समूह,
लोकसंगीत - सांस्कृतिक मंच, सड़क, स्वास्थ्य,
पीने का पानी, इन
सब पर हम प्राथमिकता
से काम करेंगे। मैं
राजनीति में नया हूँ,
लेकिन समर्पण पुराना है। मैं चाहती
हूँ कि लोग कहें,
“मैथिली दीदी बदली नाही,
बल्कि व्यवस्था बदली।”
सवाल:
भविष्य में आप खुद
को किस भूमिका में
देखती हैं?
मैथिली
ठाकुर:
मैं भविष्य नहीं देखती, मैं
वर्तमान को पूरी निष्ठा
से जीती हूँ। जो
जिम्मेदारी मिली है, उसे
पूरी ईमानदारी से निभाना मेरा
लक्ष्य है। यदि जनता
और पार्टी भरोसा जताएगी, तो मैं हर
बड़ी से बड़ी जिम्मेदारी
उठाने को तैयार हूँ।
लेकिन लोकसंगीत और संस्कृति से
दूरी कभी नहीं होगी।
सवाल:
आपकी जीत को लोग
‘सादगी की जीत’ भी
कह रहे हैं। आपका
क्या कहना है?
मैथिली
ठाकुर:
सादगी हमारे परिवार की पहचान है।
मैंने कभी मंच पर
या जीवन में दिखावा
नहीं किया। लोकगीत, भजन और संस्कार
ही मेरा श्रृंगार हैं।
यदि जनता इसे जीत
मानती है, तो यह
मेरे लिए सबसे बड़ी
पूँजी है।
सवाल:
अंत में, अलीनगर को
आप क्या संदेश देना
चाहेंगी?
मैथिली
ठाकुर:
अलीनगर मुझे सिर्फ एमएलए
नहीं, जनता की बेटी
बना कर देख रहा
है। मैं वचन देती
हूँ कि मैं इस
भरोसे की रक्षा प्राण-प्रण से करूँगी।
मेरा गीत भी उनके
लिए, मेरा काम भी
उनके लिए, और मेरा
जीवन भी अलीनगर की
सेवा के लिए समर्पित
है।
फिरहाल, मैथिली ठाकुर की आवाज में
जिस मिठास की गूंज है,
उसी मिठास का विस्तार अब
अलीनगर की राजनीति में
सुनाई देगा। उनका व्यवहार, आदर,
सादगी और सांस्कृतिक आचरण
इस क्षेत्र की उम्मीदों को
नए आकार दे रहा
है। अलीनगर की जनता ने
न केवल एक प्रत्याशी
को चुना, बल्कि अपने संस्कार और
परंपरा की प्रतिध्वनि को
विधान सभा तक भेजा
है. मैथिली ठाकुर की जीत को
केवल चुनावी आंकड़ों में मापना गलत
होगा। यह 11,000 से अधिक मतों
की बढ़त एक सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन की जीत है।
अलीनगर की जनता ने
साफ संदेश दिया है, “हम
सादगी, सत्य, संस्कृति और संस्कार को
वोट देते हैं।” मैथिली
ठाकुर ने राजनीति की
शुरुआत उस जगह से
की है जहाँ लोग
नेता नहीं, अपनी बेटी, अपनी
बहन को चुन रहे
थे। उनकी जीत यह
प्रमाण है कि यदि
उम्मीदवार का हृदय साफ
हो, संस्कृति में आस्था हो
और जनता के प्रति
विनम्रता हो, तो राजनीति
भी संगीत की तरह मधुर
हो सकती है। मैथिली
की पहचान राजनीति से पहले संस्कृति
की प्रतिनिधि के रूप में
रही है। उनके गीत,
“शिव बम बम बोल,
जय माता दी, भक्ति
- भाव से भरल गीत”...
इनको गाते हुए लाखों
लोग बड़े हुए हैं।
उनकी विनम्रता, संस्कार, परम्परा से जुड़ाव, मंच
पर सबसे पहले माँ
- बाप के चरण स्पर्श
करने की आदत... ये
सब संदेश देता है कि
सांस्कृतिक मूल्य केवल किताबों तक
सीमित नहीं, बल्कि जनदृजन तक पहुँचते हैं।
आज जब राजनीति में कठोर चेहरे, तीखे शब्द और व्यक्तिगत हमले आम हो गए हैं, ऐसे समय में मैथिली ठाकुर की संस्कृति-प्रधान राजनीति राहत देती है। उनकी जीत बताती है, “सनातन संस्कृति आधुनिक राजनीति में भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी सदियों पहले थी।” एक लोक गायिका का इतनी भारी जीत दर्ज कर लेना, यह राजनीति में एक नया संकेत है. यह संकेत है कि जनता को अब सिर्फ नेता नहीं चाहिए, प्रेरणा चाहिए। मैथिली ठाकुर के पास कला भी है, आध्यात्म भी, और जनता के प्रति सच्चा सम्मान भी। इतिहास गवाही देता है कि जनप्रतिनिधि वही टिकता है जिसका हृदय जनता से जुड़ा हो। आज भारत में मनोरंजन, उद्योग से या कला, संस्कृति के क्षेत्र से कई लोग राजनीति में आए, पर मैथिली ठाकुर की यात्रा अलग है। वे सिर्फ गाती नहीं, जीती हैं अपनी संस्कृति को। उनका जीवन ही संदेश है। चुनाव के दौरान लोग कहते थे, “दीदी के गाना से हम रउरा दुख - सुख बितइली।” उनकी लोकप्रियता मोदी प्रभाव से आगे निकल गई थी। हालाँकि यह कहना होगा कि मोदी ब्रांड ने उनकी विश्वसनीयता को और मजबूती दी। वे सिर्फ विधायक नहीं, एक सांस्कृतिक आंदोलन की वाहक हैं। उनके पास युवाओं की ऊर्जा, महिलाओं का विश्वास और बुजुर्गों का आशीर्वाद, तीनों हैं। यह संयोजन राजनीति में दुर्लभ है। यदि वे अपनी यह सादगी और जन-संपर्क बनाए रखती हैं, तो उनका सफर बहुत बड़ा हो सकता है, सांस्कृतिक मंत्रालय, महिला सशक्तीकरण, या राष्ट्रीय स्तर पर किसी बड़े सामाजिक अभियान में उन्हें आगे रखा जा सकता है। उनकी राजनीति की शुरुआत ही इतिहास बन गई है, आगे वे क्या आकार लेंगी, यह देखने लायक होगा।









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