खेतों में लहराई सरसों, आंगन में उतरा वसंत, झूम रहा भारत
खेतों में लहराई सरसों, आंगन में उतरा वसंत, यह केवल एक पंक्ति नहीं, ग्रामीण भारत की पूरी ऋतु-गाथा है। यह वह क्षण है, जब धरती अपने श्रम का प्रतिफल मुस्कान में बदल देती है और गांव की हर सांस में उल्लास घुल जाता है। ज्यों ही बसंती बयार बहती है, खेतों में सरसों पीली हंसी बिखेर देती है। दूर-दूर तक फैली वह पीली चादर मानो किसान के वर्षों पुराने भरोसे की गवाही देती है। हल की धार से उगी उम्मीदें अब फूल बनकर झूम रही होती हैं। मिट्टी महक उठती है, वैसी ही सोंधी महक, जो केवल गांव की धरती ही रच सकती है। आंगन में वसंत का उतरना किसी उत्सव से कम नहीं। सुबह की धूप जब तुलसी चौरे पर पड़ती है, तो लगता है जैसे घर-घर लक्ष्मी का वास हो गया हो। चूल्हों पर बसंती पकवान चढ़ते हैं, हाथों में पीले धागे बंधते हैं और मन में नई शुरुआत का विश्वास जाग उठता है। गांव की स्त्रियां लोकगीतों में फागुन को आमंत्रित करती हैं और बच्चे खुले आकाश के नीचे खिलखिलाते हुए वसंत का स्वागत करते हैं। पेड़ों पर आम की बौर आने लगती है। कोयल की कूक जैसे कहती है, अब समय है प्रेम का, सृजन का, आगे बढ़ने का। सर्दी की जड़ता टूट चुकी होती है और जीवन फिर से गति पकड़ लेता है। पशु-पक्षी, नदी-नाले, पेड़-पौधे, सब इस ऋतु में एक साझा उल्लास के सहभागी बन जाते हैं
सुरेश गांधी
वसंत गांवों में
केवल ऋतु नहीं होता,
वह जीवन का उत्सव
होता है। यह वह
समय है, जब किसान
अपने खेत को देखकर
भविष्य की रेखाएं पढ़ता
है, जब श्रम को
सम्मान मिलता है और प्रकृति
मनुष्य के सबसे करीब
आ जाती है। न
दिखावा, न आडंबर, बस
मिट्टी, मेहनत और मुस्कान। इसीलिए
कहा गया है, जब
खेतों में सरसों लहराती
है, तभी आंगन में
वसंत उतरता है। और जब
वसंत उतरता है, तब गांव
केवल गांव नहीं रहता,
वह आशा, प्रेम और
जीवन का सबसे सुंदर
चित्र बन जाता है।
मतलब साफ है वसंत
केवल ऋतु नहीं है,
वह सनातन चेतना का उत्सव है।
यह वह क्षण है
जब प्रकृति अपने मौन को
तोड़कर बोलने लगती है, जब
धरती का कण-कण
मधुरस से भर उठता
है और जीवन फिर
से मुस्कुराने लगता है। शिशिर
की कठोरता और पतझड़ की
उदासी के बाद वसंत
का आगमन मानो सृष्टि
का पुनर्जन्म है, जहां सूनी
डालियों पर कोंपलें फूटती
हैं, सरसों के खेत स्वर्णिम
हो उठते हैं और
आम की बौर से
हवाएं इठलाने लगती हैं। बसंत
पंचमी इसी सनातन प्रवाह
की उजली घोषणा है।
यह दिन केवल मां
सरस्वती की आराधना का
नहीं, बल्कि विवेक, सृजन और संतुलन
के पुनर्स्मरण का पर्व है।
बसंत पंचमी हमें
याद दिलाती है कि सनातन
दर्शन भाषणों में नहीं, लोकगीतों
में जीवित है। जब तक
गांव गाएगा, धरती हरेगी, पशु-पक्षी चहचहाएंगे, तब तक यह
संस्कृति अमर है। मतलब
साफ हे वसंत पंचमी
ग्रामीण भारत की वह
तान है जिस पर
पूरा जीवन नृत्य करता
है, और उसी लय
में होली के रंग
मन को रोमांचित कर
देते हैं।
“मैं ऋतुओं में न्यारा वसंत, मैं अग-जग का प्यारा वसंत।
मेरी पगध्वनि सुन जग जागा, कण-कण ने छवि मधुरस मांगा...”
कवयित्री महादेवी वर्मा की ये पंक्तियां
मानो वसंत ऋतु का
आत्मकथ्य हों। उनकी कविता
‘स्वप्न से किसने जगाया’
में वसंत केवल एक
ऋतु नहीं, बल्कि चेतना का जागरण, जीवन
का पुनर्जन्म और प्रकृति की
मुस्कान बनकर उपस्थित होता
है। वसंत के आते
ही जैसे धरती की
नाड़ी में फिर से
रस दौड़ने लगता है। वसंत
वह समय है जब
मौसम और प्रकृति में
होने वाले सुंदर, कोमल
और संतुलित परिवर्तन मनुष्य को सकारात्मक ऊर्जा
से भर देते हैं।
पतझड़ के बाद ठूंठ
हो चुके पेड़-पौधे
फिर से पत्तियों और
फूलों से सज उठते
हैं। सूनी डालियों पर
नई कोंपलें फूटती हैं और उन्हीं
कोंपलों की सुगंध में
भंवरे और मधुमक्खियां अपने
जीवन की नई धारा
तलाशने पहुंचती हैं। यह दृश्य
केवल प्राकृतिक नहीं, बल्कि आशा का दर्शन
है। यही कारण है
कि वसंत को शृंगार
की ऋतु और ऋतुओं
का राजा कहा गया
है। इसका गूढ़ अर्थ
हमें श्रीमद्भगवद्गीता में मिलता है,
जहां भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, “ऋतूनां
कुसुमाकरः”, अर्थात ऋतुओं में मैं वसंत
हूँ। यह कथन स्पष्ट
करता है कि वसंत
केवल मौसम नहीं, बल्कि
सृजन, सौंदर्य और मनुष्यत्व की
नयी शुरुआत का प्रतीक है।
भारतीय साहित्य की लगभग सभी
भाषाओं में वसंत का
उत्सव दिखाई देता है। संस्कृत
के ऋतु-वर्णनों से
लेकर अवधी-ब्रज के
फाग, उर्दू की ग़ज़लों के
मौसम-ए-गुल और
आधुनिक हिंदी कविता तक, हर जगह
वसंत प्रेम, उल्लास और उन्माद का
पर्याय बनकर उपस्थित है।
न अधिक ठंड, न
तीखी गर्मी, दोनों के संतुलन से
जन्मा यह सम-मौसम
ही मौसम-ए-गुल
कहलाता है। इस समन्वित
मौसम में केवल प्रकृति
ही नहीं, जीव-जंतु और
मनुष्य भी एक-दूसरे
के निकट आते हैं।
खेतों में फसलें पककर
तैयार होती हैं, आम
की डालियाँ मंजरी से लद जाती
हैं और बाग-बगीचे
रंग-बिरंगे फूलों से सज जाते
हैं। गांवों में लोकगीत गूंजने
लगते हैं, तो शहरों
में भी मन अनायास
हल्का हो जाता है।
आधुनिक संस्कृति में प्रेम के
बदलते रूपों के कारण युवा
पीढ़ी इस समय को
वेलेंटाइन वीक के रूप
में भी मनाती दिखाई
देती है। परंतु भारतीय
परंपरा में वसंत का
प्रेम केवल व्यक्ति-केंद्रित
नहीं, बल्कि समष्टि-केंद्रित है, प्रकृति से
प्रेम, जीवन से प्रेम
और सृजन से प्रेम।
वसंत वास्तव में जीवन की
स्फूर्ति और चेतना का
काल है। इसलिए भारतीय
सभ्यता के आरंभ से
ही वसंत के गीत
गाए जाते रहे हैं।
यह ऋतु मनुष्य की
जिजीविषा, उसके आगे बढ़ने
के साहस और भीतर
छिपी संभावनाओं का प्रतीक है।
वसंत वन के उल्लास
की ऋतु है, और
वही उल्लास मनुष्य के भीतर उतरकर
उसे नई दृष्टि, नया
संकल्प और नया उत्साह
प्रदान करता है। वसंत
आता है और हमें
याद दिलाता है कि हर
पतझड़ के बाद हरियाली
संभव है, हर मौन
के बाद गीत संभव
है, और हर थकान
के बाद उत्सव।
सनातन दर्शन और गांव का जीवन
लोकगीतों में उतरता वसंत
जैसे ही माघ
की ठंड ढलती है,
गांवों में फाग की
तान, हवा में घुलने
लगती है, “फागुन आयो
रे सजन, रंग रसिया
संग लायो रे...” यह
गीत केवल मनोरंजन नहीं,
यह जीवन की स्वीकृति
है। यह बताता है
कि संघर्ष के बाद उत्सव
भी जरूरी है। तप के
बाद रंग भी जरूरी
हैं। सनातन दर्शन इसी संतुलन का
नाम है।
पशु-पक्षी भी गुनगुनाते हैं बसंत
बसंत पंचमी के
दिन गांव का नज़ारा
कुछ और ही होता
है। गायें सुबह की धूप
में अलग ही शांति
से बैठती हैं। बछड़े मिट्टी
में लोटकर खुशी जाहिर करते
हैं। पेड़ों पर गौरैया, मैना,
तोता सब जैसे किसी
अदृश्य राग में ताल
मिलाए हों। कोयल की
कूक तो मानो पूरा
लोकगीत हो, “कुहू-कुहू...”
जिसका अर्थ हर गांव
वाला समझता है, आया है
वसंत। सनातन संस्कृति इसीलिए कहती है, यह
धरती केवल मनुष्य की
नहीं, साझा परिवार है।
मतलब साफ है वसंत
केवल मनुष्य का पर्व नहीं।
यह ऋतु धरती पर
रहने वाले हर प्राणी
के लिए उत्सव लेकर
आती है। गायों की
चाल में अलग ही
फुर्ती होती है। बछड़े
उछलते हैं। कुत्ते धूप
में आंखें मूंदकर सुख का अनुभव
करते हैं। पेड़ों पर
चिड़ियों की चहचहाहट तेज
हो जाती है। कोयल
की कूक मानो घोषणा
करती है, जीवन फिर
से रंगीन हो गया है।
आम की बौर और स्त्रियों के गीत
बसंत पंचमी के
आसपास जब आम की
बौर आती है, तो
गांव की स्त्रियां खेत-खलिहान से लौटते हुए
धीरे-धीरे गाने लगती
हैं, “अमवा में बौर
आयी सखि, साजन की
सुधि लायि...” इन गीतों में
विरह भी है, आशा
भी है, और जीवन
की कोमल सच्चाई भी।
सनातन दर्शन स्त्री को केवल भूमिका
नहीं, सृजन की शक्ति
मानता है। इसीलिए बसंत
पंचमी मां सरस्वती का
पर्व है, जहां ज्ञान
करुणा से जुड़ा है।
मतलब साफ है आम
की बौर केवल फूल
नहीं होती। वह भविष्य का
वादा होती है। सनातन
संस्कृति में हर फूल
फल की आशा के
साथ खिलता है। इसीलिए यहां
कर्म और फल अलग
नहीं माने गए। बसंत
पंचमी यही संदेश देती
है, जो आज बोया
जाएगा, वही कल काटा
जाएगा।
मां सरस्वती और लोकबुद्धि
ग्रामीण भारत में सरस्वती
सिर्फ किताबों में नहीं। वह
उस कहावत में है, “बात
वही कहो जो मन
में बैठे” वह उस बुजुर्ग
में है जो कम
बोलकर सही बोलता है।
बसंत पंचमी के दिन जब
बच्चे पीली स्लेट पर
पहला अक्षर लिखते हैं, तो वह
शिक्षा केवल नौकरी के
लिए नहीं, जीवन के लिए
होती है। सनातन दर्शन
ज्ञान को अहंकार नहीं,
विवेक बनाता है।
बसंत से होली : रंगों की तैयारी
बसंत पंचमी रंगों
का बीज बोती है।
सरसों का पीला, पलाश
का केसरिया, और फूलों की
सुगंध, धीरे-धीरे होली
की ओर बढ़ते हैं।
गांवों में फाग गूंजने
लगता है, ढोलक बजने
लगती है। फाग गाए
जाते हैं। और जीवन
थोड़ी शरारत सीख लेता है।
“खेले मसाने में होरी, दिगंबर
खेले होरी...” यह गीत मृत्यु
और जीवन के बीच
डर को तोड़ देता
है। सनातन दर्शन मृत्यु से भागता नहीं,
उसे जीवन का अंग
मानता है।
होली की छींट : जीवन का निर्भय उल्लास
बसंत पंचमी संयम
है, होली उन्मुक्तता। पर
दोनों विरोधी नहीं, पूरक हैं। होली
की छींट बसंत पंचमी
से ही हवा में
तैरने लगती है। यह
छींट सिखाती है कि जीवन
केवल नियम नहीं, रस
भी है। मर्यादा भी,
और मस्ती भी। जीवन केवल
तप नहीं, उत्सव भी है। जब
गांव में बुजुर्ग, युवा,
बच्चे एक-दूसरे को
रंग लगाते हैं, तो समाज
क्षण भर को बराबर
हो जाता है। यही
सनातन का सबसे सुंदर
सत्य है।
प्रकृति और मानव : टूटता रिश्ता
आधुनिक मनुष्य बसंत को भी
कैलेंडर की तारीख मानने
लगा है। वह भूल
गया है कि ऋतुएं
केवल मौसम नहीं, संस्कृति
हैं। जब जंगल कटते
हैं, नदियां सूखती हैं, और पशु
बेघर होते हैं, तब
बसंत भी अधूरा रह
जाता है। सनातन दर्शन
हमें चेतावनी देता है, यदि
प्रकृति रोएगी, तो मनुष्य भी
बचेगा नहीं। बसंत पंचमी हमें
याद दिलाती है कि यदि
भीतर वसंत नहीं, तो
बाहर की ऋतु अर्थहीन
है। जब विचार शुद्ध
हों, कर्म संतुलित हों,
और प्रकृति के प्रति सम्मान
हो, तभी सच्चा वसंत
आता है।
कुदरत की बरकतों का खजाना है वसंत
यह केवल मौसम
का बदलाव नहीं, बल्कि चेतना का परिवर्तन है।
हर बदलती ऋतु अपने साथ
एक संदेश लेकर आती है,
लेकिन वसंत वह ऋतु
है, जो संदेश नहीं,
संवेदना देता है। जो
आंखों को ही नहीं,
मन और आत्मा को
भी हरा कर देता
है। भारत की प्रकृति,
उसकी भौगोलिक विविधता और सांस्कृतिक चेतना
के अनुसार यहां छह ऋतुएं
मानी गई हैं, हेमंत,
शिशिर, वसंत, ग्रीष्म, वर्षा और शरद। इन
सभी में वसंत को
ऋतुराज कहा गया है।
कारण स्पष्ट है, वसंत आते
ही प्रकृति का कण-कण
खिल उठता है। मानव
तो क्या, पशु-पक्षी तक
उल्लास से भर जाते
हैं। हर दिन नई
उमंग लेकर सूर्योदय होता
है, मानो सृष्टि हर
सुबह स्वयं को नया कर
रही हो।
विविधता में एकता का पर्व
वसंत विविध रंगों
के पुष्प देता है, हर
रंग में सौंदर्य। विविध
स्वाद के फल देता
है, हर स्वाद में
पोषण। विविध नदियों का जल देता
है, हर धारा में
रस। यह ऋतु समाज
को यह बोध कराती
है कि विविधता में
भी एक साथ आने
की ताकत होती है।
यही कारण है कि
वसंत केवल प्रकृति का
नहीं, सामाजिक चेतना का भी पर्व
है। दुर्गा के सरस्वती रूप
में यह ऋतु संहार
से सृजन की ओर
मानवीय चेतना के अंतरण का
पर्व है। यह बोध
का पर्व है, मनुष्य
के भीतर सद्गुणों के
जागरण का पर्व। यह
हमें रचनात्मकता के अहंकार से
भी मुक्त करता है। भारतीय
सनातन दर्शन मानता है कि अपनी
रचना पर गर्व और
मोह में तो ब्रह्मा
तक शापित हो गए। वसंत
मनुष्य को विशुद्ध संवेदना
के धरातल पर खड़ा करता
है, यही भारतीय साधना
है, यही सनातन विश्वास।
क्यों कहा गया वसंत को ऋतुराज
वसंत को ऋतुओं
का राजा कहने के
पीछे केवल काव्यात्मकता नहीं,
गहरी जीवन-दृष्टि है।
फसलें तैयार होती हैं, मंगल
कार्य आरंभ होते हैं,
विवाह और उत्सव होते
हैं, मौसम सुहावना होता
है। आम की मोहक
मंजरियां, कोयल की कूक,
शीतल और सुरभित हवाएं,
खिलते फूल, फागुन के
मदमस्त गीत, सब मिलकर
ऐसा अनुकूल वातावरण रचते हैं, जो
जीवन को सहज और
उल्लासपूर्ण बना देता है।
पौराणिक दृष्टि में वसंत
पौराणिक कथाओं में वसंत सृजन
की आधारभूमि है। अंधकासुर के
वध हेतु शिवपुत्र का
जन्म आवश्यक था। इसके लिए
ब्रह्मा की योजना से
वसंत की उत्पत्ति हुई।
शक्ति की स्तुति के
बाद देवी सरस्वती प्रकट
हुईं और सृष्टि सृजन
का कार्य प्रारंभ हुआ। कालिका पुराण
में वसंत का व्यक्तीकरण
अत्यंत मोहक रूप में
किया गया है, सुदर्शन,
संतुलित शरीर, आकर्षक नेत्र, फूलों से सजा, आम
की मंजरियां हाथ में लिए,
मतवाले हाथी जैसी चाल
वालाकृवसंत सौंदर्य और आकर्षण का
साकार रूप है। वसंत
पंचमी के दिन कामदेव
ने रति के साथ
शिव की तपस्या भंग
करने का प्रयास किया।
इसलिए यह ऋतु प्रेम,
सौंदर्य और सृजन का
उत्सव भी मानी जाती
है।
खगोलीय, आयुर्वेदिक और जीवन वैज्ञानिक वसंत
खगोलीय दृष्टि से वसंत सूर्य
के मीन और मेष
राशि में प्रवेश के
साथ आता है। ज्योतिष
के अनुसार इस समय सूर्य
मित्र और उच्च राशि
में रहता है, जिससे
आत्मविश्वास, सकारात्मकता और उत्साह बढ़ता
है। आयुर्वेद कहता है कि
ऋतु परिवर्तन के समय त्रिदोष,
वात, पित्त और कफ, असंतुलित
हो सकते हैं। इसी
संतुलन के लिए वसंत
में व्रत और पर्वों
की परंपरा बनी। इससे रोग
प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और
जीवन दीर्घ होता है। आम
की मंजरी को औषधीय माना
गया है। मधुमेह, अतिसार
और रक्त विकार जैसी
समस्याओं में इसका उपयोग
लाभकारी बताया गया है। यह
बताता है कि वसंत
शरीर और मन, दोनों
का उपचार है।
ग्रामीण भारत में वसंत
खेतों में पीली सरसों
लहराती है। किसान का
मन बाग-बाग हो
जाता है। खलिहानों में
उम्मीदें पकने लगती हैं।
सरसों की स्वर्णिम आभा
स्वर्णिम भारत का आभास
कराती है, समृद्ध भारत
के नवनिर्माण की प्रेरणा देती
है। पशु-पक्षी सर्दी
की कैद से निकलकर
चहकने लगते हैं। नवजीवन
का आगमन इसी ऋतु
में होता है। लोकगीत
हवा में तैरने लगते
हैं, “सरसैया क फुलवा झर
लागा...” पूरी प्रकृति पीली
चादर ओढ़े मदमस्त होकर
झूम उठती है।
प्रेम, विद्रोह और संवेदना का वसंत
वसंत प्रेम है।
वह विद्रोही भी है, टेसू
के लाल फूलों जैसा।
जिस तरुणाई में विद्रोह नहीं,
वह निष्प्राण है। यह विद्रोह
केवल विरोध नहीं, बल्कि गतिशील मनुष्यता की यात्रा है।
इसका मूल है सहृदयता।
जीवन के हर क्षण
में यही जीवन-प्रेम
आत्मीयता बनकर प्रकट होता
है।
वसंत की नसीहत
वसंत पंचमी को
केवल अनुष्ठान बना देना वसंत
की आत्मा के साथ अन्याय
है। असली वसंत तब
होगा जब, गरीब के
घर भी उल्लास पहुंचे,
हर बच्चे के हाथ में
किताब हो, हर युवा
को रोजगार मिले। पीले वस्त्र पहन
लेना आसान है, लेकिन
असली वसंत उन चेहरों
पर मुस्कान लाना है, जो
आज भी अभाव में
हैं। व्यक्तिगत प्रार्थना को सामूहिक संकल्प
में बदलना ही वसंत का
वास्तविक अर्थ है।
स्वागत है ऋतुराज वसंत
वसंत प्रभु और प्रकृति का वरदान है। इसीलिए इसे मधु ऋतु कहा गया है। तो आइए, अलसाई सर्दियों को विदा दें, रंगीन ओढ़नी ओढ़े वसंत का स्वागत करें। क्योंकि वसंत वह ऋतु है, जो मन में उमंग भरती है, प्रकृति और पुरुष को जोड़ती है, और जीवन को फिर से अर्थ देती है। तितलियाँ रंगीन पंख फैलाकर आकाश में चित्र उकेरती हैं। लोकगीतों की पंक्तियाँ हवा में तैरने लगती हैं, “सरसैया क फुलवा झर लागा, फागुन में बाबा देवर लागा...” सच कहा जाए तो प्रकृति इस समय उन्मादी हो जाती है, और हो भी क्यों न, उसका सौंदर्य लौट आया है।






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