दण्डक्रम पारायणकर्ता देवव्रत रेखे के सम्मान में काशी में निकलेगी भव्य शोभायात्रा
वैदिक परंपरा,
गुरुभक्ति
और
सांस्कृतिक
ध्वनि
से
गूंजेगा
शहर
श्रृंगेरी शंकराचार्य की ओर से मिलेगा स्वर्ण कंकण व सम्मान पत्र
रथयात्रा चौमुहानी से उठेगी भव्य शोभायात्रा
अभिनंदन समिति की प्रेस वार्ता में हुई तैयारियों की विस्तृत जानकारी
सुरेश गांधी
वाराणसी. काशी की प्राचीन
धरती, जहाँ वेदों की
प्रतिध्वनि आज भी समय
की सीमाओं को चीरती हुई
गूंजती है, वहां एक
ऐसा आध्यात्मिक अध्याय लिखा जाने जा
रहा है जिसे आने
वाली पीढ़ियां भी गर्व से
स्मरण करेंगी। वैदिक सम्राट् श्रीकृष्ण शास्त्री गोडशे जी की जन्मशताब्दी,
वेदमूर्ति विश्वनाथ भट्ट जोशी (आलंदी)
की स्मृति तथा पारायणकर्ता की
आदरणीया माताजी के पावन स्मरण
में, काशी में पहली
बार शुक्ल यजुर्वेद माध्यंदिनी शाखा का सम्पूर्ण
एकाकी कंठस्थ दण्डक्रम पारायण करने वाले पारायणकर्ता
वेदमूर्ति देवव्रत महेश रेखे घनपाठी
का भव्य अभिनंदन समारोह
आयोजित होने जा रहा
है.
सभी ने पत्रकारों को बताया कि वैदिक परंपरा के अद्वितीय साधक वेदमूर्ति देवव्रत महेश रेखे घनपाठी के सम्मान में काशी का यह कार्यक्रम ऐतिहासिक होने जा रहा है।
समिति ने बताया कि जगद्गुरु श्रृंगेरी शंकराचार्य जी महाराज के आशीर्वाद से तथा वैदिक सम्राट् श्रीकृष्ण शास्त्री गोडशे जी की जन्मशताब्दी एवं वेदमूर्ति विश्वनाथ भट्ट जोशी (आलंदी) की स्मृति में दण्डक्रम पारायणकर्ता देवव्रत रेखे का भव्य अभिनंदन समारोह 29 नवंबर को संपन्न होगा।
यह कार्यक्रम पारायणकर्ता की पूज्य माताजी के पावन स्मरण को भी समर्पित रहेगा। समिति ने बताया कि 29 नवंबर, शनिवार को सायं 4 बजे रथयात्रा चौमुहानी से शोभायात्रा प्रारंभ होगी। इसमें चिरंजीवी देवव्रत सुसज्जित रथ में विराजमान रहेंगे।
शोभायात्रा की मुख्य विशेषताएँ
विविध वैदिक विद्यालयों के बटुक ब्रह्मचारी
आगे-आगे वैदिक मंत्रोच्चार
करते हुए चलेंगे। महाराष्ट्र
से आया हुआ विशेष
वाद्य दल, नाद-स्वर
तथा शहनाई वादक शोभायात्रा की
शोभा बढ़ाएंगे। काशी के विभिन्न
धार्मिक, सामाजिक, शैक्षणिक, मठ-मंदिरों एवं
सांस्कृतिक संस्थाओं के प्रतिनिधि भी
शामिल होंगे। समिति ने कहा कि
काशीवासियों के लिए यह
सिर्फ एक शोभायात्रा नहीं,
बल्कि वेद-परंपरा के
गौरव का उत्सव होगी।
शोभायात्रा श्रृंगेरी मठ, महमूरगंज पहुँचकर
पूर्ण होगी।
श्रृंगेरी मठ में होगा भव्य अभिनंदन समारोह
शोभायात्रा के श्रृंगेरी मठ
पहुँचने के बाद सायं
6 बजे से भव्य अभिनंदन
समारोह आरंभ होगा। समिति
के अनुसार इस अवसर पर
अनेक मूर्धन्य विद्वान एवं संत उपस्थित
रहेंगे। समारोह में उपस्थित प्रमुख
अतिथि महंत शंकर पुरी
जी महाराज, अन्नपूर्णा मंदिर, विशिष्ट अतिथि श्री श्री महेश
चैतन्य ब्रह्मचारी जी महाराज (हरिद्वार),
सारस्वत अतिथि आचार्य राजाराम शुक्ल, मुख्य अतिथि, अध्यक्षता आचार्य हृदयरंजन शर्मा होगे.
समिति ने बताया कि इस अवसर पर जगद्गुरु श्रृंगेरी शंकराचार्य जी महाराज की ओर से देवव्रत रेखे को विशेष सम्मान पत्र, स्वर्ण कंकण और दक्षिणा प्रदान की जाएगी।
इसके
अतिरिक्त समिति द्वारा एक विशिष्ट सम्मान
पत्र एवं अंगवस्त्र भी
भेंट किया जाएगा।
गुरु, श्रोता और संयोजकों का भी होगा सम्मान
समिति ने बताया कि केवल पारायणकर्ता ही नहीं, बल्कि इस कठिन एवं दुरूह दण्डक्रम पारायण की सफल यात्रा में सहयोग देने वाले सभी जनों का सम्मान किया जाएगा।
सम्मानित होने वाले, देवव्रत
के पिता एवं गुरु
महेश चंद्रकांत रेखे, श्रोता देवेंद्र रामचंद्र गढ़ीकर, पारायण संयोजक नीलेश केदार जोशी, काशी के विभिन्न
संस्थाओं, मठ-मंदिरों एवं
विद्यालयों द्वारा भी देवव्रत का
नागरिक अभिनंदन किया जाएगा।
व्यवस्थाएं रहेगी चाक चौबंद
पत्रकारों द्वारा पूछे गए सवालों
पर समिति ने बताया कि
शोभायात्रा मार्ग पर त्रिस्तरीय सुरक्षा
प्रबंधन रखा गया है।
भीड़ नियंत्रण व पार्किंग के लिए अलग-अलग स्वयंसेवी समूह तैनात रहेंगे। श्रृंगेरी मठ परिसर को वैदिक गरिमा के अनुरूप सुसज्जित सभा स्थल के रूप में तैयार किया गया है।
मंच पर केवल निर्धारित
विद्वान व अतिथि ही
रहेंगे, ताकि कार्यक्रम अनुशासन,
गरिमा और पूर्ण रूप
से वैदिक वातावरण
में सम्पन्न हो।
समिति ने आशा व्यक्त
की कि काशीवासियों का
उत्साह इस आयोजन को
ऐतिहासिक बनाएगा।
काशी में वेद-ध्वनि का अद्भुत पर्व
वेदमूर्ति देवव्रत रेखे जैसे युवाओं के कारण भारत की आध्यात्मिक विरासत आज भी उतनी ही उज्ज्वल है जितनी हमारी संस्कृति. शंकराचार्य जी ने अपने संदेश में कहा है कि काशी की भूमि पर वेद-परंपरा का यह अद्वितीय कार्य धर्म-संस्कृति के पुनरुत्थान का द्योतक है, और देवव्रत रेखे जैसी युवा प्रतिभाएँ भारत के वैदिक भविष्य की आधारशिला हैं।
दण्डक्रम पारायण : कठिनतम वैदिक साधना
दण्डक्रम पारायण वैदिक साधना की अत्यंत दुरूह
प्रक्रिया है। शुक्ल यजुर्वेद
माध्यंदिनी शाखा के सम्पूर्ण
मंत्रों को दण्डक्रम में
कंठस्थ कर एकाकी रूप
से सुनानाकृयह अत्यंत दुर्लभ उपलब्धि है। इस परंपरा
को जीवित रखने वाले साधक
विरले ही होते हैं,
और देवव्रत रेखे जैसे युवा
घनपाठी इस परंपरा को
नया जीवन दे रहे
हैं। समिति के वरिष्ठ सदस्य
ने कहा, “यह सिर्फ एक
वैदिक उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक
निरंतरता का प्रमाण है।
देवव्रत जैसे युवा दर्शाते
हैं कि अगली पीढ़ी
भी वेद-मार्ग को
गर्व और अनुशासन के
साथ आगे ले जा
रही है।”
काशी का गौरव बढ़ाने वाला अवसर
काशी में पहली बार ऐसे स्तर का अभिनंदन समारोह आयोजित हो रहा है, जहाँ, वैदिक परंपरा, दक्षिण भारतीय मठ परंपरा, काशी की सांस्कृतिक जीवटता, और महाराष्ट्र की वैदिक साधना-धारा, एक साथ मिलकर अद्वितीय आध्यात्मिक संगम रचेंगी। अभिनंदन समिति ने कहा, काशी की ऐतिहासिक धरा पर यह आयोजन हमें स्मरण कराता है कि वेद केवल ग्रंथ नहीं, हमारी चेतना की जड़ें हैं। और जब कोई साधक अपनी तपस्या से इन जड़ों को सींचता है, तो उसे काशी समाज सम्मान के साथ हृदय से स्वीकार करता है।
भारत की आध्यात्मिक परंपराएँ आज भी जीवंत हैं, युवा पीढ़ी वेद-मार्ग को आत्मसात कर रही है, और काशी अब भी विश्व-धर्म की राजधानी के रूप में अपनी भूमिका निभा रही है। काशी की गलियों से उठने वाला यह वैदिक नाद आने वाले वर्षों तक स्मृतियों में गूंजता रहेगा।29 नवंबर का यह दिन
काशी के लिए केवल
एक तिथि नहीं, वेद
परंपरा के पुनरुत्थान का
उत्सव है। जब देवव्रत
रेखे का रथ काशी
की धरा पर चलेगा,
तो वे केवल एक
साधक नहीं, बल्कि परंपरा के वाहक होंगे।
और जब श्रृंगेरी शंकराचार्य
की ओर से उन्हें
स्वर्ण कंकण पहनाया जाएगा,
तब यह सिर्फ एक
सम्मान नहीं, भारतीय आध्यात्मिक विरासत की अमर यात्रा
का एक स्वर्णिम अध्याय
होगा। तनी ऋषियों के
युग में थी।
काशी में 200 वर्ष बाद दंडक-क्रम
परायण का ऐतिहासिक आयोजन
वेदों की परंपरा, वैदिक स्मृति और गुरु-शिष्य परंपरा के अद्भुत तेज से परिपूर्ण काशी की धरती पर 200 वर्षों बाद वह अलौकिक क्षण पुनः प्रकट हुआ, जब दंडक-क्रम परायण जैसी अत्यंत दुर्लभ, जटिल और विलुप्तप्राय वैदिक विधा का भव्य आयोजन हुआ। यह आयोजन विश्व में दूसरी बार और भारत में प्रथम बार काशी में संपन्न हुआ है।
इसके पूर्व लगभग दो शताब्दी पूर्व महाराष्ट्र के नासिक में यह परायण संपन्न हुआ था। इस दुरूह परायण को कुल 50 दिनों तक निरंतर साधना, व्रत और अनुशासन के साथ 19 वर्षीय वैदिक प्रतिभा देवव्रत महेश रेखे ने पूर्ण किया। शुक्ल यजुर्वेद मध्यंदिन शाखा के अंतर्गत दंडक-क्रम में लगभग 35,000 पद होते हैं, जो क्रम-विकृति (अष्ट-विकृति) की विशिष्ट विधियों से बढ़कर 20 लाख से अधिक पदों में परिवर्तित हो जाते हैं। उनके उच्चारण में करोड़ों वैदिक शब्दराशि का समावेश होता है।दंडक-क्रम परायण क्या है इसकी कठिनता?
भारतीय वैदिक वाङ्मय में चार वेद और उनकी अनेक शाखाएं हैं। प्रत्येक शाखा में पद-पाठ, क्रम-पाठ, जटा, घना सहित आठ विशिष्ट विकृतियां होती हैं।
इन्हीं में से सबसे कठिन मानी जाने वाली विधा है, दंडक-क्रम। इस क्रम में, एक मंत्र के 1 से 100 तक पद चढ़ते-उतरते जाते हैं,1→2→3→... 100 फिर 100→99→98→.... →1. हर चरण में संधि-विच्छेद, स्वर, अनुदात्त-उदात्त का शुद्ध पालन, और कहीं से भी पद उठाकर तुरंत बोलने की क्षमता।
उदाहरण स्वरूप, साधारण “नमस्ते रुद्र“ मंत्र दंडक-क्रम में ऐसे परिवर्तित होता है कि उसकी संरचना कई सौ संयोजनों में विस्तृत हो जाती है, जिसे बिना लेखन के केवल स्मृति और कंठस्थ परंपरा से बोलना वैदिक मेधा का चमत्कार है। यह सामान्य बुद्धि नहीं, दिव्य मेधा का विषय है।काशी का गौरव, भारत की उपलब्धि
दंडक-क्रम परायण समिति का कहना है कि यह परायण काशी के इतिहास में पहली बार हो रहा है। भारत में 200 वर्षों से यह विधा अभ्यास में नहीं आई थी। जिस वैदिक मेधा से देवव्रत ने यह परायण किया, वह गिनीज रिकॉर्ड के योग्य है। किसी भी पद को बीच से उठाकर बोल देना, उल्टे-सीधे क्रम में प्रवाह बनाए रखना असाधारण क्षमता का प्रमाण है। समिति के सदस्य विद्वानों ने कहा कि महर्षि परंपरा की स्मृति इस प्रकार के परायण से ही जीवित रहती है। यह काशी की जनता का सौभाग्य है कि विश्व की इतनी दुर्लभ विद्या का प्रदर्शन यहां हुआ।
देवव्रत
महेश रेखे ने प्रतिदिन
करोड़ों शब्दराशि का उच्चारण, 20 लाख
से अधिक वैदिक पदों
का क्रमिक आवर्तन, 50 दिनों का कठोर वैदिक
व्रत, और आचार्यों की
सन्निधि में निरंतर साधना
की। यजुर्वेद की शुक्ल मध्यदिन
शाखा में दंडक-क्रम
एक अत्यंत कठिन और अद्भुत
विधा मानी जाती है।
इसे सामान्यतः वेदपाठी भी नहीं कर
पाते; यह स्मरण-शक्ति
की, मनस्थिति की, और गुरु-कृपा की चरम
परीक्षा है। दंडक-क्रम
की विशेषता यह है कि
इसमेंः पद को केवल
क्रम से नहीं, आगे-पीछे, मिलाकर-तोड़कर, जोड़कर-उलटकर 1 से 100 तक, फिर 100 से
वापस 1 तक वाक्य संरचना
बदले बिना, ध्वनि और छंद को
अक्षुण्ण रखते हुए पाठ
किया जाता है। उदाहरण
के लिए, “नमस्ते रुद्र... नमः” जैसे मंत्र
को भी दंडक-क्रम
में इस प्रकार पढ़ना
पड़ता है कि, पहले
एक पद, फिर दो
पद, फिर दो से
एक, फिर एक से
दो-तीन, फिर तीन-दो-एक, फिर
चार-चार-तीन-दो-एक... यह क्रम केवल
सुनने में उलझन भरा
नहीं, बल्कि स्मरण की चरम सीमा
का आह्वान करता है। केवल
8 पदों का ऐसा पाठ
भी साधक को अत्यंत
ध्यान और शक्ति की
आवश्यकता देता है; और
यदि 220 पद हों, जैसे
इस आयोजन में, तो यह
अद्भुत तपस्या के समान है।
इस आयु में इतना
गहन अध्ययन, जहाँ सामान्य बालक
साधारण पाठ भी भूल
जाएँ, वहां देवव्रत बालक
का बीच के किसी
भी पद से तुरंत
शुरू कर देना, आगे-पीछे उलटकर कहना,
और बिना रुके पाठ
को पूर्ण करना, यह वैदिक मेधा
का दिव्य वरदान है।











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