निर्यात की नई उड़ान : भारत ने तोड़ा टैरिफ का जाल
भारत ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि चुनौतियां उसके लिए अवसर बन जाती हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय उत्पादों पर लगाए गए 50 प्रतिशत तक के टैरिफ के बावजूद, भारत ने न केवल अपनी निर्यात वृद्धि को बनाए रखा, बल्कि सितंबर 2025 में 6.75 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की। अमेरिका को निर्यात में 11.9 प्रतिशत की गिरावट के बावजूद यह उछाल दर्शाता है कि भारत अब किसी एक बाजार पर निर्भर नहीं है। यह बदलाव केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि भारत की नई निर्यात नीति दिशा और आत्मनिर्भर आर्थिक सोच का प्रमाण है. खास यह है कि भारत ने निर्यात को नई ऊंचाई देने के लिए ₹25,060 करोड़ की “एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन” की मंजूरी दी है. जो वाराणसी, भदोही और मिर्जापुर जैसे पारंपरिक कालीन क्लस्टरों के लिए यह नीति वरदान साबित होगी। कारपेट एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (सीईपीसी) के चेयरमैन कुलदीप राज बट्ठल का दावा है कि “निर्यात मिशन से कालीन उद्योग को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में नई पहचान मिलेगी। हमारे बुनकरों के कौशल को विश्व पटल पर प्रदर्शित करने का यह सही समय है।” उन्होंने बताया कि ‘निर्यात दिशा’ के तहत कालीनों की ब्रांडिंग, पैकेजिंग और डिज़ाइन प्रमोशन पर विशेष सहायता दी जाएगी। वहीं ‘निर्यात प्रोत्साहन’ से एमएसएमई निर्यातकों को पूंजी तक आसान पहुंच मिलेगी, जिससे उत्पादन क्षमता और रोजगार दोनों में वृद्धि होगी
सुरेश गांधी
आज़ादी का अमृत महोत्सव हम सभी के लिए सिर्फ़ आज़ादी के 75 वर्षों का उत्सव नहीं है, बल्कि यह भारत की आर्थिक, सामाजिक और वैश्विक क्षमताओं का पुनर्निर्माण करने का अवसर भी है। इसी क्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने हाल ही में “इक्सपोर्ट प्रामेशन मिशन (ईपीएम)” को मंजूरी दी है। यह मिशन वर्ष 2025 से 26 व 2030 से 31 तक चलेगा और इस पर कुल ₹25,060 करोड़ खर्च किए जाएंगे। यह मिशन पुराने बिखरे हुए निर्यात प्रोत्साहन कार्यक्रमों को एकजुट कर एकीकृत, डिजिटल और परिणाम-आधारित ढांचा प्रदान करेगा। ईपीएम का उद्देश्य केवल वित्तीय सहायता प्रदान करना नहीं है, बल्कि यह भारत के निर्यात ढांचे को डिजिटल, समावेशी और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सक्षम बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।
विशेष रूप से यह पहल एमएसएमई, प्रथम-बार निर्यातक और श्रम-सघन क्षेत्रों के लिए बेहद उपयोगी साबित होगी। ईपीएम के अंतर्गत दो प्रमुख पहलें की गई हैं, “निर्यात प्रोत्साहन एमएसएमई क्षेत्र को सस्ती और सुलभ फाइनेंस सुविधा उपलब्ध कराएगी, जिसमें ब्याज सब्सिडी, क्रेडिट कार्ड, फैक्टरिंग और गारंटी स्कीम शामिल होंगी।
“निर्यात दिशा, अंतरराष्ट्रीय ब्रांडिंग, पैकेजिंग, लॉजिस्टिक्स, सर्टिफिकेशन, ट्रेड फेयर और गुणवत्ता
सुधार पर केंद्रित होगी।
इस मिशन की खासियत
यह है कि अब
आवेदन से लेकर भुगतान
तक की पूरी प्रक्रिया
डिजिटल प्लेटफॉर्म पर होगी, जिससे
पारदर्शिता और समयबद्धता सुनिश्चित
होगी।
कारपेट उद्योग के लिए स्वर्णिम अवसर
वाराणसी, भदोही और मिर्जापुर जैसे पारंपरिक कालीन क्लस्टरों के लिए यह नीति वरदान साबित होगी। कारपेट एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (सीईपीसी) के चेयरमैन कुलदीप राज बट्ठल ने सीनियर रिपोर्टर सुरेश गांधी से बातचीत में कहा, “निर्यात मिशन से कालीन उद्योग को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में नई पहचान मिलेगी। हमारे बुनकरों के कौशल को विश्व पटल पर प्रदर्शित करने का यह सही समय है।”
उन्होंने बताया कि ‘निर्यात दिशा’ के तहत कालीनों की ब्रांडिंग, पैकेजिंग और डिज़ाइन प्रमोशन पर विशेष सहायता दी जाएगी। वहीं ‘निर्यात प्रोत्साहन’ से एमएसएमई निर्यातकों को पूंजी तक आसान पहुंच मिलेगी, जिससे उत्पादन क्षमता और रोजगार दोनों में वृद्धि होगी। उनका कहना है कि ईपीएम से भारतीय कारपेट उद्योग को एक नया इतिहास रचने का अवसर मिला है। इससे देश के छोटे और मध्यम निर्माताओं को वैश्विक बाजार में सशक्त बनाने में मदद मिलेगी। निर्यात प्रोत्साहन योजना के तहत एमएएसएमई और छोटे निर्यातकों को सस्ते व्यापार वित्त (ट्रेड फाइनेंस) की सुविधा दी जाएगी। ब्याज सबवेंशन और क्रेडिट गारंटी से उत्पादन और निर्यात की लागत घटेगी। ई-कॉमर्स निर्यातकों के लिए विशेष क्रेडिट कार्ड उपलब्ध होंगे, जिससे ऑनलाइन वैश्विक बिक्री में आसानी होगी।
ईपीएम की निर्यात दिशा योजना के तहत कारपेट उद्योग को ब्रांडिंग, पैकेजिंग और अंतरराष्ट्रीय मानक अनुपालन में सहायता मिलेगी। व्यापार मेलों और अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में भागीदारी को बढ़ावा दिया जाएगा। इसके अलावा, मार्केट इंटेलिजेंस और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों के माध्यम से निर्यातकों को वैश्विक मांग और रुझानों की जानकारी मिलेगी। इंडलैंड ट्रांसपोर्ट और वेरहाउसिंग रिइम्बर्समेंट से देश के अंदरूनी इलाकों में उत्पादन और निर्यात की लागत कम होगी। यह पहल विशेष रूप से वाराणसी, भदोही और एटा जैसे कारपेट हब्स के लिए लाभकारी साबित होगी। इस मिशन से स्थानीय कारीगरों और एमएसएमई को निर्यात ऑर्डर सुनिश्चित होंगे, रोजगार बढ़ेगा और भारत के हस्तनिर्मित कारपेट को वैश्विक पहचान मिलेगी।“सीईपीसी के माध्यम से
निर्यातक अब डिजिटल प्लेटफॉर्म
पर आवेदन और सब्सिडी प्राप्त
कर सकेंगे। इससे प्रक्रिया सरल,
पारदर्शी और समयबद्ध होगी।
मतलब साफ है ईपीएम
का यह कदम भारत
के हस्तनिर्मित कारपेट उद्योग के लिए ऐतिहासिक
अवसर साबित होगा। छोटे और मध्यम
निर्माताओं को वित्तीय और
गैर-वित्तीय दोनों तरह की सहायता
मिलेगी, जिससे भारतीय कारपेट वैश्विक बाजार में अपनी पकड़
मजबूत करेगा। यह समय है
कि भारतीय कारपेट उद्योग ’’अपने कौशल और
गुणवत्ता के माध्यम से
दुनिया में अपनी छवि
को और मजबूत करे।
म्च्ड इसके लिए एक
ऐतिहासिक अवसर लेकर आया
है।
आत्मनिर्भर भारत का व्यापार मॉडल
निर्यात ही नया राष्ट्रनिर्माण का इंजन
निर्यात को सशक्त बनाने की रणनीति
वैश्विक व्यापार में भारत की रणनीति
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में कई देशों
ने टैरिफ और व्यापार नीतियों
में बदलाव किए हैं, जिससे
भारतीय निर्यातक प्रभावित हुए हैं। विशेष
रूप से टेक्सटाइल्स, लेदर,
जेम्स और ज्वेलरी, इंजीनियरिंग
गुड्स और मरीन उत्पाद
क्षेत्रों को नए वैश्विक
टैरिफ से चुनौती मिली
है। ईपीएम के माध्यम से
इन क्षेत्रों को प्राथमिकता दी
जाएगी ताकि : निर्यात ऑर्डर बनाए रखें, रोजगार
सुरक्षित हों, नए भौगोलिक
क्षेत्रों में निर्यात का
विस्तार हो, यह नीति
न केवल वर्तमान संकट
का समाधान करेगी, बल्कि भारत को एक
मजबूत, निर्यात-केंद्रित अर्थव्यवस्था बनाने में भी सहायक
होगी।
डिजिटल प्लेटफॉर्म और सरल प्रक्रिया
मिशन के कार्यान्वयन
के लिए डायरेक्ट्रेट जनरल
आफ फारेन ट्रेड (डीजीएफटी) को जिम्मेदारी दी
गई है। ईपीएम के
तहत सभी प्रक्रियाएं, आवेदन
से लेकर अनुदान वितरण
तक, एक डिजिटल प्लेटफॉर्म
के माध्यम से संचालित होंगी।
इस डिजिटल प्रणाली से प्रक्रिया में
पारदर्शिता, त्वरित निर्णय और निर्यातक के
लिए आसान पहुंच सुनिश्चित
होगी। बता दें, पहले
भारत में निर्यात प्रोत्साहन
के लिए कई अलग-अलग योजनाएं थीं,
जैसे इंटरेस्ट इक्वालिसेशन स्कीम (आईएस) और मार्केट एसेस
इनिसिएटिव (एमएआई)। इन योजनाओं
के खंडित होने के कारण
लाभार्थियों तक मदद पहुँचने
में कई बाधाएँ आती
थीं। ईपीएम इन सबको एकीकृत
कर एक आउटकम बेस्ड
और प्रभावी ढांचा प्रस्तुत करता है।
एमएसएमई और स्थानीय रोजगार का सशक्तिकरण
भारत की अर्थव्यवस्था
में एमएसएमई सेक्टर की भूमिका केंद्रीय
है। देश के लगभग
63 मिलियन एमएसएमई रोजगार प्रदान करते हैं और
निर्यात का महत्वपूर्ण हिस्सा
योगदान करते हैं। एमएसएमई
इस वर्ग को लक्षित
कर उन्हें सस्ते वित्त, बाजार तक पहुंच और
वैश्विक मानकों के अनुरूप तैयारी
में सहायता करेगा। इसके अलावा, मिशन
गैर-पारंपरिक जिलों और कम निर्यात
वाले क्षेत्रों को भी लाभान्वित
करेगा। इससे न केवल
रोजगार के अवसर बढ़ेंगे,
बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था भी सुदृढ़ होगी।











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