Thursday, 13 November 2025

निर्यात की नई उड़ान : भारत ने तोड़ा टैरिफ का जाल

निर्यात की नई उड़ान : भारत ने तोड़ा टैरिफ का जाल 

भारत ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि चुनौतियां उसके लिए अवसर बन जाती हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय उत्पादों पर लगाए गए 50 प्रतिशत तक के टैरिफ के बावजूद, भारत ने केवल अपनी निर्यात वृद्धि को बनाए रखा, बल्कि सितंबर 2025 में 6.75 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की। अमेरिका को निर्यात में 11.9 प्रतिशत की गिरावट के बावजूद यह उछाल दर्शाता है कि भारत अब किसी एक बाजार पर निर्भर नहीं है। यह बदलाव केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि भारत की नई निर्यात नीति दिशा और आत्मनिर्भर आर्थिक सोच का प्रमाण है. खास यह है कि भारत ने निर्यात को नई ऊंचाई देने के लिए ₹25,060 करोड़ कीएक्सपोर्ट प्रमोशन मिशनकी मंजूरी दी है. जो वाराणसी, भदोही और मिर्जापुर जैसे पारंपरिक कालीन क्लस्टरों के लिए यह नीति वरदान साबित होगी। कारपेट एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (सीईपीसी) के चेयरमैन कुलदीप राज बट्ठल का दावा है किनिर्यात मिशन से कालीन उद्योग को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में नई पहचान मिलेगी। हमारे बुनकरों के कौशल को विश्व पटल पर प्रदर्शित करने का यह सही समय है।उन्होंने बताया किनिर्यात दिशाके तहत कालीनों की ब्रांडिंग, पैकेजिंग और डिज़ाइन प्रमोशन पर विशेष सहायता दी जाएगी। वहींनिर्यात प्रोत्साहनसे एमएसएमई निर्यातकों को पूंजी तक आसान पहुंच मिलेगी, जिससे उत्पादन क्षमता और रोजगार दोनों में वृद्धि होगी

सुरेश गांधी

आज़ादी का अमृत महोत्सव हम सभी के लिए सिर्फ़ आज़ादी के 75 वर्षों का उत्सव नहीं है, बल्कि यह भारत की आर्थिक, सामाजिक और वैश्विक क्षमताओं का पुनर्निर्माण करने का अवसर भी है। इसी क्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने हाल ही मेंइक्सपोर्ट प्रामेशन मिशन (ईपीएम)” को मंजूरी दी है। यह मिशन वर्ष 2025 से 26 2030 से 31 तक चलेगा और इस पर कुल ₹25,060 करोड़ खर्च किए जाएंगे। यह मिशन पुराने बिखरे हुए निर्यात प्रोत्साहन कार्यक्रमों को एकजुट कर एकीकृत, डिजिटल और परिणाम-आधारित ढांचा प्रदान करेगा। ईपीएम का उद्देश्य केवल वित्तीय सहायता प्रदान करना नहीं है, बल्कि यह भारत के निर्यात ढांचे को डिजिटल, समावेशी और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सक्षम बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। 

विशेष रूप से यह पहल एमएसएमई, प्रथम-बार निर्यातक और श्रम-सघन क्षेत्रों के लिए बेहद उपयोगी साबित होगी। ईपीएम के अंतर्गत दो प्रमुख पहलें की गई हैं, “निर्यात प्रोत्साहन एमएसएमई क्षेत्र को सस्ती और सुलभ फाइनेंस सुविधा उपलब्ध कराएगी, जिसमें ब्याज सब्सिडी, क्रेडिट कार्ड, फैक्टरिंग और गारंटी स्कीम शामिल होंगी। 

निर्यात दिशा, अंतरराष्ट्रीय ब्रांडिंग, पैकेजिंग, लॉजिस्टिक्स, सर्टिफिकेशन, ट्रेड फेयर और गुणवत्ता सुधार पर केंद्रित होगी। इस मिशन की खासियत यह है कि अब आवेदन से लेकर भुगतान तक की पूरी प्रक्रिया डिजिटल प्लेटफॉर्म पर होगी, जिससे पारदर्शिता और समयबद्धता सुनिश्चित होगी।

मतलब साफ है भारत की निर्यात नीति का यह नया अध्याय केवल व्यापार को बल देगा, बल्कि आर्थिक स्वायत्तता की दिशा में ठोस कदम साबित होगा। अमेरिकी टैरिफ का जवाब भारत ने आर्थिक कौशल से दिया है, कि प्रतिक्रिया से। यह वही नीति है जो भारत कोउभरती अर्थव्यवस्थासेवैश्विक व्यापार शक्तिमें रूपांतरित करेगी। 
अब निर्यात सिर्फ अर्थशास्त्र नहीं, आत्मविश्वास का प्रतीक बन चुका है।ईपीएम सिर्फ़ एक आर्थिक योजना नहीं है, यह प्रधानमंत्री मोदी कीविकसित भारत 2047” की दृष्टि का हिस्सा है। आज़ादी के 100 वर्षों तक भारत को सशक्त, तकनीकी-आधारित और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अग्रणी राष्ट्र बनाने का यह एक महत्वपूर्ण कदम है। यह मिशन यह संदेश भी देता है कि भारत अब विभिन्न खंडित योजनाओं पर निर्भर नहीं रहेगा, बल्कि एक समग्र, लचीला और डिजिटल सक्षम निर्यात ढांचा के माध्यम से वैश्विक बाजार में अपनी स्थिति मजबूत करेगा। मतलब साफ है आज, जब भारत अपने 75वें स्वतंत्रता वर्ष का उत्सव मना रहा है, ईपीएम जैसे कार्यक्रम यह प्रमाणित करते हैं कि देश केवल स्वतंत्र नहीं हुआ, बल्कि आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी और वैश्विक दृष्टि से सशक्त बन रहा है। निर्यात बढ़ाने, रोजगार सृजन करने, ईपीएम को सशक्त बनाने और नए बाजारों तक पहुंच बनाने की दिशा में यह मिशन भारत की अर्थव्यवस्था को नई ऊँचाइयों पर ले जाने में सहायक होगा। ईपीएम के माध्यम से भारत आज़ादी का अमृत महोत्सव सिर्फ़ यादगार नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत को मजबूती देने वाला प्रतीक बन गया है।

कारपेट उद्योग के लिए स्वर्णिम अवसर

वाराणसी, भदोही और मिर्जापुर जैसे पारंपरिक कालीन क्लस्टरों के लिए यह नीति वरदान साबित होगी। कारपेट एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (सीईपीसी) के चेयरमैन कुलदीप राज बट्ठल ने सीनियर रिपोर्टर सुरेश गांधी से बातचीत में कहा, “निर्यात मिशन से कालीन उद्योग को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में नई पहचान मिलेगी। हमारे बुनकरों के कौशल को विश्व पटल पर प्रदर्शित करने का यह सही समय है।” 

उन्होंने बताया किनिर्यात दिशाके तहत कालीनों की ब्रांडिंग, पैकेजिंग और डिज़ाइन प्रमोशन पर विशेष सहायता दी जाएगी। वहींनिर्यात प्रोत्साहनसे एमएसएमई निर्यातकों को पूंजी तक आसान पहुंच मिलेगी, जिससे उत्पादन क्षमता और रोजगार दोनों में वृद्धि होगी। उनका कहना है कि ईपीएम से भारतीय कारपेट उद्योग को एक नया इतिहास रचने का अवसर मिला है। इससे देश के छोटे और मध्यम निर्माताओं को वैश्विक बाजार में सशक्त बनाने में मदद मिलेगी। निर्यात प्रोत्साहन योजना के तहत एमएएसएमई और छोटे निर्यातकों को सस्ते व्यापार वित्त (ट्रेड फाइनेंस) की सुविधा दी जाएगी। ब्याज सबवेंशन और क्रेडिट गारंटी से उत्पादन और निर्यात की लागत घटेगी। -कॉमर्स निर्यातकों के लिए विशेष क्रेडिट कार्ड उपलब्ध होंगे, जिससे ऑनलाइन वैश्विक बिक्री में आसानी होगी। 

ईपीएम की निर्यात दिशा योजना के तहत कारपेट उद्योग को ब्रांडिंग, पैकेजिंग और अंतरराष्ट्रीय मानक अनुपालन में सहायता मिलेगी। व्यापार मेलों और अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में भागीदारी को बढ़ावा दिया जाएगा। इसके अलावा, मार्केट इंटेलिजेंस और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों के माध्यम से निर्यातकों को वैश्विक मांग और रुझानों की जानकारी मिलेगी। इंडलैंड ट्रांसपोर्ट और वेरहाउसिंग रिइम्बर्समेंट से देश के अंदरूनी इलाकों में उत्पादन और निर्यात की लागत कम होगी। यह पहल विशेष रूप से वाराणसी, भदोही और एटा जैसे कारपेट हब्स के लिए लाभकारी साबित होगी। इस मिशन से स्थानीय कारीगरों और एमएसएमई को निर्यात ऑर्डर सुनिश्चित होंगे, रोजगार बढ़ेगा और भारत के हस्तनिर्मित कारपेट को वैश्विक पहचान मिलेगी।“  

सीईपीसी के माध्यम से निर्यातक अब डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आवेदन और सब्सिडी प्राप्त कर सकेंगे। इससे प्रक्रिया सरल, पारदर्शी और समयबद्ध होगी। मतलब साफ है ईपीएम का यह कदम भारत के हस्तनिर्मित कारपेट उद्योग के लिए ऐतिहासिक अवसर साबित होगा। छोटे और मध्यम निर्माताओं को वित्तीय और गैर-वित्तीय दोनों तरह की सहायता मिलेगी, जिससे भारतीय कारपेट वैश्विक बाजार में अपनी पकड़ मजबूत करेगा। यह समय है कि भारतीय कारपेट उद्योग ’’अपने कौशल और गुणवत्ता के माध्यम से दुनिया में अपनी छवि को और मजबूत करे। म्च्ड इसके लिए एक ऐतिहासिक अवसर लेकर आया है।

टैरिफ के बावजूद स्थिर रहा भारत का प्रदर्शन

अमेरिकी नीति के तहत टैरिफ बढ़ोतरी से कई देशों की अर्थव्यवस्थाएं डगमगाईं, मगर भारत ने विविधीकरण रणनीति अपनाई। मूडीज़ कीग्लोबल मैक्रो आउटलूक 2024 से 2027” रिपोर्ट के अनुसार, भारत की अर्थव्यवस्था अगले दो वर्षों में 6.5 प्रतिशत की दर से बढ़ेगी, जो जी-20 देशों में सबसे अधिक है। जबकि अमेरिका और यूरोप की वृद्धि दर क्रमशः 2.5 से 2.6 प्रतिशत के बीच रहने का अनुमान है। मतलब साफ है कि भारत की इस मजबूती के पीछे तीन प्रमुख कारण हैं :- 1. लगातार इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश, 2. घरेलू उपभोग में निरंतर मांग वृद्धि, 3. और निर्यात नीति में स्थिरता स्पष्टता। इसके साथ ही भारतीय रिज़र्व बैंक की संयमित मौद्रिक नीति, नियंत्रित महंगाई और निवेश माहौल में विश्वास ने भारत को बाहरी झटकों से बचाए रखा है।

आत्मनिर्भर भारत का व्यापार मॉडल

केंद्र सरकार का उद्देश्य अब केवल निर्यात बढ़ाना नहीं, बल्कि उसे स्थायी और क्षेत्रीय रूप से संतुलित बनाना है। ईपीएम में विशेष ध्यान उन जिलों पर रहेगा जो अभी तक कम निर्यात वाले क्षेत्र हैं। इन्हेंजिला निर्यात हबके रूप में विकसित किया जाएगा, ताकिलोकल से ग्लोबलका विज़न धरातल पर उतर सके। कालीन, वस्त्र, चमड़ा, इंजीनियरिंग गुड्स और समुद्री उत्पाद जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों को प्राथमिकता देकर केवल विदेशी मुद्रा अर्जित होगी बल्कि ग्रामीण और अर्ध-शहरी भारत में रोजगार सृजन को भी बल मिलेगा।

निर्यात ही नया राष्ट्रनिर्माण का इंजन

मूडीज़ की रिपोर्ट और मोदी सरकार की नीतियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले वर्षों में भारत विश्व व्यापार का एक निर्णायक खिलाड़ी बनेगा। जहां वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी और राजनीतिक तनावों से जूझ रही है, वहीं भारत ने आत्मनिर्भरता को अपनी आर्थिक ढाल बना लिया है। निर्यात अब केवल वाणिज्य का विषय नहीं, बल्कि विकसित भारत /2047 के संकल्प का अभिन्न हिस्सा है। भारत ने यह दिखा दिया है कि टैरिफ की दीवारें उसके व्यापारिक संकल्प को नहीं रोक सकतीं। आज भारतीय उत्पाद वैश्विक बाजार मेंमेक इंन इंडिया, ट्रस्टेड बाई वर्ल्डके रूप में अपनी पहचान बना रहे हैं।

निर्यात को सशक्त बनाने की रणनीति

भारत की निर्यात वृद्धि में कई संरचनात्मक बाधाएं रही हैं। इनमें वित्तीय संसाधनों की सीमित उपलब्धता, अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों का उच्च अनुपालन खर्च, ब्रांडिंग और बाजार पहुंच की कमी, और लॉजिस्टिक चुनौतियाँ शामिल हैं। ईपीएम इन सभी समस्याओं का समाधान करने के लिए तैयार किया गया है। मिशन की सफलता के लिए दो प्रमुख उप-योजनाओं का निर्माण किया गया है : निर्यात प्रामोशन, यह योजना एमएसएमईएस को सस्ते व्यापार वित्त तक पहुँच प्रदान करेगी। इसमें शामिल हैं : ब्याज सबवेंशन (इंटरेस्ट सबवेंशन) इक्सपोर्ट फैक्टरिंग और कोलेटरज गारंटीस, -कॉमर्स निर्यातकों के लिए क्रेडिट कार्ड, नए बाजारों में विस्तार के लिए क्रेडिट एन्हांसमेंट, यह पहल विशेष रूप से उन छोटे और मध्यम उद्यमों के लिए लाभकारी होगी, जो वित्तीय सीमाओं के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कदम नहीं रख पा रहे थे। निर्यात दिशा, यह योजना गैर-वित्तीय सहायता प्रदान करती है, ताकि निर्यातक बाजार में प्रतिस्पर्धी बने और अपने उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ा सकें। इसमें शामिल हैं : अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता और अनुपालन सहायता, ब्रांडिंग और पैकेजिंग सहयोग, अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेलों में भागीदारी, निर्यात गोदाम और लॉजिस्टिक्स सहायता, व्यापार खुफिया और क्षमता विकास, इस प्रकार, ईपीएम केवल वित्तीय मदद देगा, बल्कि निर्यातक की सम्पूर्ण तैयारियों, बाज़ार में दृश्यता और क्षमता निर्माण को भी सुनिश्चित करेगा।

वैश्विक व्यापार में भारत की रणनीति

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में कई देशों ने टैरिफ और व्यापार नीतियों में बदलाव किए हैं, जिससे भारतीय निर्यातक प्रभावित हुए हैं। विशेष रूप से टेक्सटाइल्स, लेदर, जेम्स और ज्वेलरी, इंजीनियरिंग गुड्स और मरीन उत्पाद क्षेत्रों को नए वैश्विक टैरिफ से चुनौती मिली है। ईपीएम के माध्यम से इन क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जाएगी ताकि : निर्यात ऑर्डर बनाए रखें, रोजगार सुरक्षित हों, नए भौगोलिक क्षेत्रों में निर्यात का विस्तार हो, यह नीति केवल वर्तमान संकट का समाधान करेगी, बल्कि भारत को एक मजबूत, निर्यात-केंद्रित अर्थव्यवस्था बनाने में भी सहायक होगी।

डिजिटल प्लेटफॉर्म और सरल प्रक्रिया

मिशन के कार्यान्वयन के लिए डायरेक्ट्रेट जनरल आफ फारेन ट्रेड (डीजीएफटी) को जिम्मेदारी दी गई है। ईपीएम के तहत सभी प्रक्रियाएं, आवेदन से लेकर अनुदान वितरण तक, एक डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से संचालित होंगी। इस डिजिटल प्रणाली से प्रक्रिया में पारदर्शिता, त्वरित निर्णय और निर्यातक के लिए आसान पहुंच सुनिश्चित होगी। बता दें, पहले भारत में निर्यात प्रोत्साहन के लिए कई अलग-अलग योजनाएं थीं, जैसे इंटरेस्ट इक्वालिसेशन स्कीम (आईएस) और मार्केट एसेस इनिसिएटिव (एमएआई) इन योजनाओं के खंडित होने के कारण लाभार्थियों तक मदद पहुँचने में कई बाधाएँ आती थीं। ईपीएम इन सबको एकीकृत कर एक आउटकम बेस्ड और प्रभावी ढांचा प्रस्तुत करता है।

एमएसएमई और स्थानीय रोजगार का सशक्तिकरण

भारत की अर्थव्यवस्था में एमएसएमई सेक्टर की भूमिका केंद्रीय है। देश के लगभग 63 मिलियन एमएसएमई रोजगार प्रदान करते हैं और निर्यात का महत्वपूर्ण हिस्सा योगदान करते हैं। एमएसएमई इस वर्ग को लक्षित कर उन्हें सस्ते वित्त, बाजार तक पहुंच और वैश्विक मानकों के अनुरूप तैयारी में सहायता करेगा। इसके अलावा, मिशन गैर-पारंपरिक जिलों और कम निर्यात वाले क्षेत्रों को भी लाभान्वित करेगा। इससे केवल रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था भी सुदृढ़ होगी।

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