गणतंत्र दिवस : संविधान के नाम पर सत्ता, और सत्ता के साए में संविधान
26 जनवरी भारत का सबसे पवित्र राजनीतिक दिन है। यह दिन न तो सरकार का उत्सव है, न ही किसी दल की उपलब्धियों का मंच। यह दिन है, संविधान का। लेकिन आज, 77वें गणतंत्र दिवस पर खड़े होकर सबसे असहज सवाल यही है क्या सत्ता आज भी संविधान के अधीन है, या संविधान सत्ता के अनुसार ढलता जा रहा है? कर्तव्य पथ पर टैंक, मिसाइलें और झांकियां होंगी। भाषणों में राष्ट्र, गौरव और विकसित भारत के दावे होंगे। लेकिन गणतंत्र दिवस का असली अर्थ परेड से बाहर, संसद, न्यायपालिका, मीडिया और नागरिक जीवन में तय होता है. हिंदी पट्टी में जाति राजनीति खत्म नहीं हुई, उसने रूप बदला है। अब खुली जातीय गोलबंदी की जगह प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व, लक्षित योजनाएँ, भावनात्मक अपील ने ले ली है। उत्तर प्रदेश और हिंदी पट्टी का युवा राष्ट्रवादी अपील से जुड़ रहा है, लेकिन रोजगार उसका सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है। सरकारी भर्ती, परीक्षाओं की पारदर्शिता और निजी क्षेत्र की संभावनाएँ, ये मुद्दे अभी भी राजनीतिक विमर्श में हाशिये पर हैं। गणतंत्र दिवस यह याद दिलाता है कि भावनात्मक गर्व पेट नहीं भरता, नीति भरती है। भारत का लोकतंत्र जिस दिशा में जाएगा, उसकी पटकथा हिंदी पट्टी में ही लिखी जाएगी। अगर यहाँ सत्ता संतुलित रही, विपक्ष मजबूत हुआ और संस्थाएँ स्वतंत्र रहीं, तो गणतंत्र सुरक्षित रहेगा। लेकिन यदि बहुमत ही सत्य बन गया, असहमति अपराध समझी गई और संविधान को प्रतीक भर बना दिया गया तो खतरा केवल राजनीति को नहीं, गणराज्य को होगा। हिंदी पट्टी आज भारत का चुनावी मैदान नहीं, लोकतंत्र की प्रयोगशाला है। और प्रयोगशालाओं में अगर सावधानी न हो, तो विस्फोट होते हैं
सुरेश गांधी
26 जनवरी 1950 को भारत में
सत्ता ने पहली बार
जनता के सामने सिर
झुकाया था। राजा नहीं,
जनता सर्वोच्च हुई। धर्म नहीं,
संविधान सर्वोपरि हुआ। भावनाओं से
नहीं, कानून से शासन तय
हुआ। डॉ. आंबेडकर का
संविधान सत्ता को ताकत नहीं,
सीमा देता है। यही
वजह है कि संविधान
सत्ता को असहज करता
है, और शायद इसी
कारण उसे बार-बार
कमज़ोर, बोझिल या पुराना बताने
की कोशिशें होती रहती हैं।
आज 2026 में सवाल सीधा
है क्या हम संविधान
को मार्गदर्शक मान रहे हैं
या केवल औपचारिक बाधा?
भारत आज एक मजबूत
सरकार के दौर में
है। तेज़ फैसले, केंद्रीकृत
सत्ता, स्पष्ट नेतृत्व, इन सबको विकास
और स्थिरता का प्रतीक बताया
जाता है। लेकिन इतिहास
सिखाता है, मजबूत सरकार
हमेशा मजबूत लोकतंत्र की गारंटी नहीं
होती। जब संसद में
बहस सिमटती जाए, जब कानून
बिना व्यापक चर्चा के पारित हों,
जब असहमति को देशविरोध से
जोड़ा जाए, तो गणतंत्र
की नींव हिलती है,
चाहे सरकार कितनी भी लोकप्रिय क्यों
न हो। गणतंत्र दिवस
हमें याद दिलाता है
कि लोकतंत्र का मतलब सिर्फ
जीतना नहीं, सुनना भी है। मतलब
साफ है गणतंत्र दिवस
भारतीय राजनीति के लिए उत्सव
नहीं, आकलन का दिन
होना चाहिए। यह वह क्षण
है जब देश यह
देखता है कि सत्ता
की दिशा संविधान के
अनुरूप है या संविधान
सत्ता के दबाव में।
2026 में यह सवाल पहले
से अधिक प्रासंगिक है,
क्योंकि भारत एक ऐसे
राजनीतिक दौर में है
जहाँ शक्ति का केंद्रीकरण, निर्णायक
नेतृत्व और राष्ट्रवादी विमर्श
राजनीति के केंद्र में
हैं, जबकि संस्थागत संतुलन,
विपक्ष की भूमिका और
असहमति की जगह सिमटती
दिखाई देती है।
बहुमत की राजनीति और संविधान की सीमाएं
भारतीय लोकतंत्र बहुमत से चलता है,
लेकिन संविधान अल्पमत की ढाल है।
मौजूदा राजनीति में बहुमत को
ही नैतिक श्रेष्ठता का प्रमाण मानने
की प्रवृत्ति बढ़ी है। इससे
राजनीति का स्वर बदलता
है, विरोध को बाधा और
आलोचना को नकारात्मकता कहा
जाने लगता है। राजनीतिक
विश्लेषण बताता है कि अल्पसंख्यक
अधिकारों की चर्चा “तुष्टिकरण”
में बदल जाती है,
सामाजिक विविधता की बात “एकरूप
राष्ट्रवाद” से दबती है,
असहमति “राष्ट्रविरोधी नैरेटिव” के घेरे में
आती है, यह प्रवृत्ति
लोकतंत्र को चुनावी जीत
तक सीमित कर देती है,
जबकि गणतंत्र का अर्थ निरंतर
सहमति-निर्माण है। क्या सरकार
से सवाल पूछना राष्ट्रद्रोह
है? क्या आलोचना को
कुचलना ही सुशासन है?
गणतंत्र दिवस 2026 इन सवालों से
बचने का नहीं, इनका
सामना करने का दिन
है।
संस्थाएं : सजावटी स्तंभ या लोकतंत्र के प्रहरी?
कर्तव्य पथ : शक्ति का प्रदर्शन या नैरेटिव की परेड?
विदेश नीति का संदेश और घरेलू सच्चाई
2026 में यूरोपीय संघ
के शीर्ष नेताओं की मौजूदगी बताती
है कि भारत खुद
को वैश्विक नेतृत्व के केंद्र में
देख रहा है। यह
कूटनीतिक सफलता है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय
मंच पर लोकतंत्र का
दावा तभी विश्वसनीय होता
है, जब घरेलू स्तर
पर भी लोकतांत्रिक मूल्य
सुरक्षित हों। दुनिया भारत
से उसकी ताकत नहीं,
उसके लोकतंत्र का उदाहरण चाहती
है।
संघवाद : साझेदारी या अधीनता?
गणतंत्र संघीय है, कागज़ पर।
व्यवहार में केंद्र और
राज्यों के रिश्ते लगातार
तनावपूर्ण रहे हैं। राज्यों
की वित्तीय निर्भरता, राज्यपालों की सक्रिय राजनीति,
केंद्र की एजेंसियों की
दखलअंदाज़ी, यह सब संघीय
भावना को कमजोर करता
है। गणतंत्र दिवस राज्यों को
याद दिलाता है कि वे
केवल प्रशासकीय इकाइयां नहीं, संविधान के साझेदार हैं।
मीडिया और नागरिक : लोकतंत्र की आखिरी दीवार
जब संस्थाएं कमजोर
पड़ती हैं, तब मीडिया
और नागरिक ही लोकतंत्र को
बचाते हैं। लेकिन आज
मीडिया का बड़ा हिस्सा
सत्ता के करीब है,
और नागरिकों को ट्रोल संस्कृति
में उलझाया जा रहा है।
जहाँ सवाल पूछने वालों
को डर लगे, वहाँ
गणतंत्र औपचारिक रह जाता है।
गणतंत्र दिवस नागरिकों को
याद दिलाता है कि लोकतंत्र
केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं,
यह जनता का रोज़
का कर्तव्य है।
युवा भारतः राष्ट्रवाद या जिम्मेदार नागरिकता?
युवा भारत जोशीला
है, लेकिन सवाल यह है
क्या उसे सिर्फ नारे
दिए जा रहे हैं
या समझ भी? राष्ट्रवाद
संविधान से ऊपर नहीं
होता। देशभक्ति सवालों से डरती नहीं।
गणतंत्र दिवस युवाओं को
यह सिखाने का दिन है
कि सच्चा राष्ट्रवाद सत्ता से नहीं, संविधान
से निष्ठा रखता है।
गणतंत्र दिवस एक चेतावनी है
26 जनवरी उत्सव का दिन है,
लेकिन उससे पहले आत्ममंथन
का दिन होना चाहिए।
संविधान कोई पूजा की
वस्तु नहीं, वह रोज़ के
इस्तेमाल का दस्तावेज़ है।
अगर सत्ता सवालों से भागे, संस्थाएं
चुप रहें, नागरिक उदासीन हो जाएं, तो
गणतंत्र सिर्फ कैलेंडर में रह जाएगा।
गणतंत्र दिवस 2026 हमें याद दिलाता
है लोकतंत्र विरासत नहीं, जिम्मेदारी है। और यह
जिम्मेदारी हर 26 जनवरी नहीं, हर दिन निभानी
होती है।
मजबूत केंद्र बनाम संतुलित लोकतंत्र
पिछले एक दशक में
भारतीय राजनीति ने “मजबूत केंद्र”
को स्थिरता और विकास का
पर्याय बना दिया है।
तेज़ फैसले, स्पष्ट नेतृत्व और केंद्रीकृत नीति-निर्माण ने शासन को
गति दी है, यह
एक तथ्य है। पर
लोकतंत्र केवल गति से
नहीं, संतुलन से चलता है।
राजनीतिक विश्लेषण का मूल प्रश्न
यह है : क्या निर्णायक
नेतृत्व के नाम पर
संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता कमज़ोर
हुई है? क्या संसद
नीति-निर्माण का मंच है
या केवल अनुमोदन की
संस्था? जब विधेयक सीमित
बहस में पारित हों,
जब अध्यादेश सामान्य रास्ता बनें, और जब संसदीय
समितियाँ हाशिये पर चली जाएँ,
तो यह केवल प्रशासनिक
शैली नहीं, लोकतांत्रिक संस्कृति का बदलाव है।
कमजोर संख्या, मजबूत भूमिका?
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में विपक्ष संख्यात्मक
रूप से कमजोर है।
लेकिन लोकतंत्र में विपक्ष का
महत्व संख्या से नहीं, भूमिका
से तय होता है।
दुर्भाग्य यह है कि
विपक्ष की हर आपत्ति
को “विकास विरोध” या “नकारात्मक राजनीति”
बताकर खारिज करने की प्रवृत्ति
बढ़ी है। विपक्ष को
हाशिये पर रखना अल्पकालिक
रूप से सुविधाजनक हो
सकता है लेकिन दीर्घकाल
में यह नीति-निर्माण
को एकांगी बनाता है, और सत्ता
को आत्ममुग्धता की ओर ले
जाता है. गणतंत्र दिवस
की आत्मा विपक्ष की मौजूदगी से
ही सुरक्षित रहती है।
राष्ट्रवाद का राजनीतिक इस्तेमाल
राष्ट्रवाद भारतीय राजनीति का सबसे शक्तिशाली
औज़ार बन चुका है।
इसका सकारात्मक पक्ष यह है
कि राष्ट्रीय हित और आत्मसम्मान
पर जोर बढ़ा है।
लेकिन नकारात्मक पक्ष यह है
कि हर सवाल को
राष्ट्रवाद की कसौटी पर
परखा जाने लगा है।
राष्ट्रवाद जब बहस को
रोकने लगे, तो वह
लोकतंत्र का मित्र नहीं
रहता, संविधान के ऊपर राष्ट्रवाद
रखने की प्रवृत्ति खतरनाक
है. क्योंकि राष्ट्र की परिभाषा संविधान
से ही तय होती
है. गणतंत्र दिवस याद दिलाता
है कि राष्ट्रवाद संविधान
से बाहर नहीं, उसी
के भीतर फलता-फूलता
है।
गणतंत्र की राजनीति, राजनीति का गणतंत्र
भारत का लोकतंत्र
खतरे में है, यह
कहना अतिशयोक्ति हो सकती है।
लेकिन यह कहना गलत
नहीं होगा कि लोकतंत्र
कठिन दौर में है।
गणतंत्र दिवस 2026 का राजनीतिक संदेश
साफ है : मजबूत सरकार
जरूरी है, लेकिन मजबूत
संस्थाएँ उससे भी ज्यादा,
बहुमत जरूरी है, लेकिन संवैधानिक
सीमाएँ अनिवार्य, राष्ट्रवाद जरूरी है, लेकिन नागरिक
स्वतंत्रता के साथ, गणतंत्र
किसी एक चुनाव से
नहीं, रोज़ के लोकतांत्रिक
व्यवहार से जिंदा रहता
है। और यही भारत
की राजनीति के लिए सबसे
बड़ा इम्तिहान है।
सत्ता का केंद्र, लोकतंत्र की कसौटी
अगर दिल्ली भारत
की सत्ता का शिखर है,
तो उत्तर प्रदेश और हिंदी पट्टी
उसकी रीढ़ हैं। देश
की राजनीति की दिशा, भाषा
और भाव, सबका सबसे
गहरा असर यहीं से
तय होता है। इसलिए
गणतंत्र दिवस के मौके
पर अगर भारतीय लोकतंत्र
का असली आकलन करना
हो, तो उसे कर्तव्य
पथ से नहीं, लखनऊ,
पटना, भोपाल और जयपुर की
राजनीति से समझना होगा।
आज हिंदी पट्टी केवल चुनावी गणित
नहीं, बल्कि नैरेटिव की प्रयोगशाला बन
चुकी है, यहीं तय
होता है कि राष्ट्रवाद
कैसा होगा, विकास की भाषा क्या
होगी और असहमति की
सीमा कहाँ खिंचेगी।
बहुमत की राजनीति और सत्ता का केंद्रीकरण
उत्तर प्रदेश की राजनीति आज
“डबल इंजन सरकार” के
मॉडल पर टिकी है,
केंद्र और राज्य, दोनों
में एक ही दल
की सत्ता। इससे निर्णय तेज़
हुए हैं, योजनाओं का
क्रियान्वयन सुधरा है, लेकिन इसके
साथ सत्ता का अभूतपूर्व केंद्रीकरण
भी हुआ है। प्रशासन
और राजनीति की रेखाएँ धुंधली
हुई हैं, निर्णय ऊपर
से नीचे आते हैं,
संवाद नीचे से ऊपर
नहीं जाता, असहमति को अक्सर “व्यवस्था
विरोध” के रूप में
देखा जाता है, गणतंत्र
की आत्मा स्थानीय स्वायत्तता में बसती है,
लेकिन यूपी की राजनीति
तेजी से कमांड-एंड-कंट्रोल मॉडल की ओर
बढ़ी है।
योगी मॉडलः सुशासन या सख्त सत्ता?
योगी आदित्यनाथ का
प्रशासनिक मॉडल हिंदी पट्टी
की राजनीति का सबसे प्रभावशाली
प्रयोग है। कानून-व्यवस्था,
माफिया नियंत्रण और तेज़ कार्रवाई,
इन बिंदुओं पर सरकार ने
लोकप्रियता हासिल की है। लेकिन
दूसरा पक्ष यह पूछता
है : क्या कानून का
राज समान रूप से
लागू हो रहा है?
क्या प्रशासनिक सख्ती और न्यायिक प्रक्रिया
के बीच संतुलन बना
हुआ है? जब शासन
“कठोरता” को अपनी पहचान
बना ले, तो संवैधानिक
प्रक्रिया को अतिरिक्त सावधानी
की जरूरत होती है, वरना
गणतंत्र अनुशासन में बदल जाता
है।
पहचान की राजनीति का नया चेहरा
हिंदी पट्टी में राष्ट्रवाद भावनात्मक
भी है और राजनीतिक
भी। मंदिर, परंपरा, गौरव और सांस्कृतिक
पुनरुत्थान, ये मुद्दे चुनावी
विमर्श के केंद्र में
हैं। सांस्कृतिक मुद्दे विकास की भाषा पर
भारी पड़ते हैं, सामाजिक
न्याय की बहस पहचान
की राजनीति में सिमटती है,
धर्मनिरपेक्षता को अक्सर संदेह
की दृष्टि से देखा जाता
है, राष्ट्रवाद जब संविधान की
भाषा से हटकर भावनाओं
की भाषा बोलने लगे,
तो लोकतंत्र असंतुलित होता है।
विपक्ष का संकट : नेतृत्व, नैरेटिव और जमीन
उत्तर प्रदेश और हिंदी पट्टी
में विपक्ष की सबसे बड़ी
चुनौती संख्या नहीं, दिशा है। कांग्रेस
संगठनात्मक रूप से कमजोर,
सपा-बसपा जातीय समीकरण
में उलझी, क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय नैरेटिव
से कटे हुए, इसका
परिणाम यह है कि
सत्ता के सामने कोई
सशक्त वैकल्पिक विमर्श खड़ा नहीं हो
पा रहा। गणतंत्र की
दृष्टि से यह स्थिति
खतरनाक है, क्योंकि बिना
विकल्प के लोकतंत्र, एकपक्षीय
शासन में बदल जाता
है।





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