Sunday, 9 November 2025

काशी की धरती से मोदी की वंदेभारत ने बनाई नई राजनीतिक पटरी

काशी की धरती से मोदी की वंदेभारत ने बनाई नई राजनीतिक पटरी 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का काशी दौरा केवल रेलवे परियोजनाओं का उद्घाटन भर नहीं था। चार वंदे भारत ट्रेनों को एक साथ हरी झंडी दिखाते हुए उन्होंने पूर्वांचल और बिहार के बीच विकास, विश्वास और राजनीतिक संदेश की एक नई धुरी स्थापित की। काशी के सांस्कृतिक महत्व और आधुनिक परिवहन ढांचे के इस संगम ने साफ संकेत दिया कि आने वाले चुनावों में विकास की राजनीति ही निर्णायक आधार बनने जा रही है. मतलब साफ है काशी के घाटों की आध्यात्मिक आभा और वंदे भारत ट्रेनों की तेज़ रफ्तार, जब ये दोनों तस्वीरें एक मंच पर दिखाई देती हैं, तो साफ होता है कि सरकार केवल शहर नहीं बदल रही, बल्कि चुनावी भूगोल और जनमानस को भी दिशा दे रही है। वाराणसी से निकला यह संदेश बिहार तक सीधी राजनीतिक तरंगें भेज रहा है 

सुरेश गांधी

गंगा किनारे गूंजती हर-हर महादेव की पुकार और प्लेटफॉर्म पर खड़ी चमकदार वंदे भारत ट्रेन, काशी में यह दृश्य केवल विकास की तस्वीर नहीं, राजनीति के नए अध्याय का संकेत भी है। प्रधानमंत्री मोदी ने पूर्वांचल से बिहार तक तेज़ कनेक्टिविटी का वादा ही नहीं, राजनीतिक उपस्थिति और भविष्य की रणनीति भी मजबूत की है। मतलब साफ है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी में चार वंदे भारत ट्रेनों का शुभारंभ कर पूर्वांचल और बिहार को नई परिवहन सुविधा की सौगात दी है। यह कदम यात्रा, पर्यटन, व्यापार और रोजगार को गति देगा। साथ ही, इसे दोनों राज्यों के राजनीतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है। खासकर, चुनावी मौसम भले आधिकारिक रूप से घोषित हो, लेकिन राजनीति की पटरियां पहले ही बदलनी शुरू हो चुकी हैं। 

वाराणसी से चार वंदे भारत ट्रेनों की घोषणा केवल कनेक्टिविटी का विस्तार है, बल्कि पूर्वांचल और बिहार में भाजपा की रणनीतिक जमीन को और मजबूत करने का कदम भी मानी जा रही है। कहा जा सकता है बनारस में चार वंदेभारत ट्रेनों को हरी झंडी दिखाए जाने की घटना ने पूर्वांचल और बिहार दोनों के राजनीतिक समीकरणों में नई चर्चा को जन्म दिया है। काशी की धरती से निकला यहविकास संदेशअब महज यात्री सुविधा नहीं रह गया, बल्कि यह चुनावी गणित, जनभावना और क्षेत्रीय आकांक्षाओं के नए संयोग का प्रतीक बनता दिख रहा है।

दरअसल, जब भी प्रधानमंत्री अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी से कोई बड़ा विकास संदेश देश को देते हैं, उसका राजनीतिक अर्थ स्वाभाविक रूप से व्यापक होता है। खासकर तब, जब पड़ोसी राज्य बिहार में बदलाव की राजनीति अपने निर्णायक मोड़ पर हो और जनमत नई दिशा खोज रहा हो। ऐसे में काशी से चली वंदेभारत की रफ़्तार अब सिर्फ़ प्लेटफॉर्मों पर नहीं, बल्कि राजनीतिक संवाद की पटरी पर भी दिखाई दे रही है। बीते दशक में भारतीय राजनीति की एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति यह रही कि विकास अब चुनावी मुद्दा मात्र नहीं, बल्कि राजनीतिक पहचान का स्थायी स्तंभ बन गया है। मोदी सरकार ने रेल, सड़क, बिजली, आवास और डिजिटलीकरण जैसी परियोजनाओं को सिर्फ प्रशासनिक कार्यक्रम नहीं रहने दिया, उन्हें जन अनुभव का हिस्सा बना दिया।

वंदेभारत इसी विकास-राजनीति का सबसे चर्चित उदाहरण है। यह तेज, साफ़, आरामदायक और आधुनिक ट्रेन केवल एक यात्री साधन नहीं, बल्किनया भारत कैसा दिखता हैइसका चेहरा है। पूर्वांचल वर्षों तकपिछड़ेक्षेत्र की छवि ढोता रहा, बीमारू, पलायनग्रस्त, रोजगारहीन, और विकास की मुख्य धारा से कटा हुआ। लेकिन यहां वंदेभारत जैसी हाई-एंड सेवा का विस्तार एक नए मनोवैज्ञानिक संदेश को जन्म देता हैःयह क्षेत्र अब केंद्र की प्राथमिकता में है।यही संदेश बिहार तक सीधा जाता है, जहां विकास की भूख और नए नेतृत्व की खोज दोनों तेज़ हैं।

पूर्वांचल : बिहार का सामाजिक-आर्थिक ताना-बाना

पूर्वांचल और बिहार भौगोलिक रूप से अलग हों, लेकिन सांस्कृतिक, भाषाई और सामाजिक रूप से गहरे जुड़े हैं। बनारस, बक्सर, आरा, छपरा, सासाराम, पटना, ये सिर्फ़ नक्शे पर शहर हैं, बल्कि साझा जीवन-धारा के पड़ाव हैं। गांवों में रिश्तेदारी है, त्योहारों में एक जैसी परंपराएं हैं, काशी की यात्रा बिहार के व्यक्ति के लिए आध्यात्मिक नहीं, पारिवारिक स्मृति है. ऐसे में बनारस से बिहार को जोड़ने वाली कोई भी परियोजना, केवल यातायात नहीं, बल्कि भावनात्मक संपर्क भी मजबूत करती है। वंदेभारत ने इस भावनात्मक रूट पर तेज़ी का प्रतीक जोड़ दिया है। और राजनीति में भावना $ सुविधा = प्रभाव, यह एक स्थायी समीकरण है। बिहार आज उस दौर में खड़ा है, जहां जनता तो पुराने नारों और पारंपरिक राजनीतियों के जाल में फंसना चाहती है, और ही प्रयोगों को पूरी तरह छोड़ने को तैयार है। विकास, रोजगार और सम्मान, इन तीन मुद्दों पर जनमत सबसे अधिक संगठित हो रहा है। वंदेभारत का विस्तार उसी दिशा में संकेत देता है कि : केंद्र बिहार को आर्थिक गलियारे से जोड़ना चाहता है. पूर्वांचल और बिहार के बीच यात्रा को तेज़ कर के व्यापार, शिक्षा और स्वास्थ्य के अवसर बढ़ाए जा रहे हैं. और यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब चुनावी माहौल धीरे-धीरे गरमाने लगा है. विपक्ष इसे सियासत कहे या चुनावी तैयारी, लेकिन यह स्पष्ट है कि जनता नतीजे देखना चाहती है, और वंदेभारत एक दृश्यमान परिणाम है।

काशी क्यों बना केंद्र?

काशी केवल प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र नहीं, यह सांस्कृतिक ऊर्जा का स्रोत है। काशी से दिया गया संदेश केवल राजनीतिक नहीं माना जाता, बल्कि वह सभ्यता और आध्यात्मिकता का भी स्वभाविक विस्तार माना जाता है। मोदी जब काशी से बोलते हैं, तो बिहार में यह संदेश सिर्फ़ राजनीतिक घोषणा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक भरोसा बनकर जाता है। और राजनीति में भरोसा सबसे दुर्लभ और सबसे प्रभावशाली तत्व होता है। मतलब साफ है यह सिर्फ़ ट्रेन नहीं, राजनीतिक नैरेटिव है. वंदेभारत के बहाने एक बड़ा नैरेटिव स्थापित किया गया है : “हमने केवल योजनाएं नहीं दीं, हमने अनुभव बदला है।यहां लोकतंत्र की भाषा बदल जाती है, सिर्फ़ घोषणाएं नहीं, अनुभव ही वोट का आधार बन रहा है। बीते कुछ समय में बिहार के युवाओं में एक गहरी बेचैनी रही है : रोज़गार की तलाश में पलायन, शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए बाहर जाना, और विकास के सपने का लगातार टलते जाना, वंदेभारत इस भावना को चुनौती देता है। यह कहता है, “बिहार से बाहर मत निकलो, भारत तुम तक रहा है।

यह संदेश मन के भीतर बहुत गहराई से उतरता है। इसका फायदा सीधे बीजेपी को मिलने वाला है, क्योंकि वह विकास को अपने मॉडल के रूप में पेश करती है, केंद्र को, क्योंकि यह उसका नेतृत्व-आधारित विकास संदेश है और स्थानीय नेतृत्व को, क्योंकि इससे संगठन को नया संवाद मिलता है. लेकिन असली फायदा जनता को तभी होगा जब, रोजगार के केंद्र बनें, नए आर्थिक क्लस्टर विकसित हों और छोटे शहरों को भी स्मार्ट कनेक्टिविटी मिले. यदि यह प्रक्रिया आगे तेज़ होती है, तो वंदेभारत एक चुनावी घटना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक मोड़ साबित होगी।

मतलब साफ है काशी से चली वंदेभारत केवल पटरियों पर दौड़ती ट्रेन नहीं है। यह पूर्वांचल और बिहार के आत्मविश्वास की नई गति है। यह बताती है कि विकास अब केवल महानगरों में सीमित नहीं रहेगा, यह गाँव, कस्बों और पारंपरिक सांस्कृतिक नगरों में भी पहुँच रहा है। जेब में टिकट का मूल्य भले यात्रियों को समझ आएं, लेकिन दिमाग में राजनीति इसके संकेतों को पढ़ने में व्यस्त है। काशी की धरती से चली इस रफ़्तार ने बिहार की राजनीति में नई पटरी बिछा दी है। अब देखना यह होगा कि इस पटरी पर लोगों की उम्मीदें तेज़ रफ्तार से आगे बढ़ती हैं या राजनीति इसे धीमा करने की कोशिश करती है। पर इतना तय है, काशी से चला संदेश अब बिहार की राजनीति की रफ़्तार तय करेगा। 

No comments:

Post a Comment

मणिकर्णिका का कायाकल्प या मानसिक गुलामी का विलाप?

मणिकर्णिका का कायाकल्प या मानसिक गुलामी का विलाप ?  काशी केवल एक शहर नहीं है। काशी भारत की आत्मा है। और मणिकर्णिका उस ...