मणिकर्णिका का कायाकल्प या मानसिक गुलामी का विलाप?
काशी
केवल
एक
शहर
नहीं
है।
काशी
भारत
की
आत्मा
है।
और
मणिकर्णिका
उस
आत्मा
की
वह
धधकती
चेतना
है,
जहां
जीवन
अपनी
सारी
अकड़
छोड़कर
मृत्यु
के
सामने
नतमस्तक
हो
जाता
है।
जहां
राजा-रंक,
अमीर-गरीब,
ज्ञानी-अज्ञानी,
सब
एक
ही
चिता
की
अग्नि
में
बराबर
हो
जाते
हैं।
यही
मणिकर्णिका
आज
विवाद
के
केंद्र
में
है।
और
यह
विवाद
विकास
का
नहीं
है।
यह
विवाद
सनातन
के
पुनरुत्थान
से
उपजे
भय
का
है।
विरोध
नहीं,
छटपटाहट
है,
जो
लोग
आज
मणिकर्णिका
के
कायाकल्प
पर
छाती
पीट
रहे
हैं,
वे
यह
साबित
करने
में
जुटे
हैं
कि
अव्यवस्था
ही
परंपरा
है.
गंदगी
ही
आस्था
है.
अमानवीय
स्थिति
ही
संस्कृति
है.
यह
विचार
न
केवल
अपमानजनक
है,
बल्कि
सनातन
को
नीचा
दिखाने
की
गहरी
साज़िश
का
हिस्सा
है।
ऐसे
में
बड़ा
सवाल
तो
यही
है,
क्या
परंपरा
का
अर्थ
पीड़ा
है?
क्या
आस्था
का
अर्थ
असुविधा
है?
क्या
धर्म
का
अर्थ
अव्यवस्था
है?
अगर
ऐसा
है,
तो
फिर
इन
विरोधियों
ने
अपने
निजी
जीवन
में
यह
दर्शन
क्यों
नहीं
अपनाया?
खुद
के
लिए
आधुनिकता,
सनातन
के
लिए
सड़ांध,
यही
वह
बिंदु
है
जहां
इनकी
दोगली
मानसिकता
नंगी
हो
जाती
है।
जिनके
दादा-परदादाओं
ने
मिट्टी,
गारे
और
खपरैल
से
घर
बनाए
थे,
उन्होंने
सबसे
पहले
वही
घर
तोड़े।
तुलसी
चौरा
हटाया।
आंगन
पाटा।
गोशाला
बेची।
और
बदले
में
खड़े
कर
दिए,
कंक्रीट
के
महल,
संगमरमर
की
फर्श,
वेस्टर्न
टॉयलेट,
शीशे
की
दीवारें,
महँगी
लाइटिंग
और
बाहर
खड़ी
करोड़ों
की
गाड़ियां,
घोड़े
और
बैलगाड़ी
उन्हें
पिछड़े
लगने
लगे,
लेकिन
जब
सनातन
तीर्थों
की
बारी
आती
है,
तो
वही
लोग
“परंपरा
बचाओ”
का
झंडा
उठा
लेते
हैं।
क्योंकि
सनातन
का
सम्मान
इन्हें
चुभता
है...
सुरेश गांधी
गंगा तट पर
स्थित इस विश्वप्रसिद्ध महाश्मशान
की तस्वीर तेज़ी से बदल
रही है और इसके
पुनर्निर्माण का मॉडल सामने
आने के बाद लोगों
की जिज्ञासा और बढ़ गई
है, आखिर नया मणिकर्णिका
घाट कैसा होगा और
इसमें शवयात्रियों व परिजनों के
लिए क्या-क्या सुविधाएं
होंगी? तकरीबन 17.56 करोड़ रुपये की
लागत से मणिकर्णिका घाट
को नया और सुव्यवस्थित
स्वरूप दिया जा रहा
है। वर्तमान में घाट की
पुरानी सीढ़ियों पर स्ट्रेचर के
समतलीकरण का कार्य चल
रहा है ताकि शवयात्रियों
को कठिनाइयों का सामना न
करना पड़े। परियोजना के
तहत घाट पर व्यूइंग
गैलरी, रैंप, और बैठने की
समुचित व्यवस्था विकसित की जा रही
है। इसके साथ ही
पर्याप्त लाइटिंग, वेटिंग रूम, शौचालय, पेयजल,
वेडिंग ज़ोन और लकड़ी
के भंडारण के लिए विशेष
स्थान निर्धारित किए जा रहे
हैं। घाट और आसपास
की गलियों को गंदगी से
मुक्त रखने के लिए
आधुनिक ड्रेनेज सिस्टम विकसित किया जा रहा
है, ताकि सीवेज का
पानी खुले में न
बहे।
परियोजना पूर्ण होने के बाद
प्रतिदिन 100 से 150 शवों का अंतिम
संस्कार सुव्यवस्थित ढंग से किया
जा सकेगा। मतलब साफ है
यह केवल विकास परियोजना
नहीं है, यह वैचारिक
पुनर्जागरण है। यह संदेश
है कि सनातन अब
शर्म से सिर झुकाकर
नहीं जिएगा। वह अपने तीर्थों
को सहेजेगा, सँवारेगा और गर्व से
प्रस्तुत करेगा। अब फैसला साफ
होना चाहिए, देश को तय
करना होगा, क्या कुछ नेता
और वैचारिक गिरोह यह तय करेंगे
कि हमारी आस्था कैसी दिखे? या
फिर करोड़ों सनातनियों की भावना के
अनुसार तीर्थों का विकास होगा?
मणिकर्णिका किसी पार्टी की
नहीं, किसी नेता की
नहीं, यह भारत की
आत्मा का हिस्सा है।
जो लोग आज इसके
उत्थान से डर रहे
हैं, वे डरते रहें।
काशी रही है, काशी
है, काशी रहेगी। काशी
की आत्मा मणिकर्णिका केवल एक श्मशान
नहीं, बल्कि सनातन दर्शन का जीवंत प्रमाण
है, जहाँ मृत्यु भी
उत्सव है और अंत
भी मोक्ष का द्वार। किंतु
विडंबना यह है कि
आज इसी मणिकर्णिका के
स्वरूप सुधार पर सबसे ऊँची
आवाज़ वही लोग उठा
रहे हैं, जिनका विरोध
सनातन से कम और
दोगलेपन से अधिक उपजा
हुआ प्रतीत होता है।
खुद के लिए आधुनिकता सही, सनातन के लिए नहीं?
जब बाबा विश्वनाथ
की सदियों पुरानी तंग, दमघोंटू गलियों
से मुक्ति दिलाकर भव्य कॉरिडोर बनाया
गया, तब भी यही
वर्ग चीख़ उठा। जब
मणिकर्णिका की अव्यवस्था, गंदगी
और अमानवीय हालात को हटाकर उसे
गरिमा, स्वच्छता और दिव्यता दी
जा रही है, तब
भी इन्हें “परंपरा ख़तरे में” दिखने लगती
है। प्रश्न सीधा है क्या
आधुनिकता का अधिकार केवल
निजी जीवन तक सीमित
है? क्या सनातन के
पौराणिक स्थल सड़ांध, अव्यवस्था
और अवमानना के प्रतीक बने
रहें, ताकि तथाकथित प्रगतिशील
उन पर व्यंग्य कर
सकें? दरअसल, इनका असली डर
यह है कि अगर
सनातन अपने भव्य स्वरूप
में लौट आया, तो
उनकी वर्षों की वैचारिक खेती
उजड़ जाएगी। वे चाहते हैं
कि हम आधुनिक कपड़े
पहनें, आधुनिक गाड़ियाँ चलाएँ, आधुनिक सुख-सुविधाएँ लें,
लेकिन हमारी आस्था, हमारे तीर्थ और हमारी परंपराएँ
उसी सड़ी-गली व्यवस्था
में कैद रहें।
आस्था करोड़ों की है, सुधार अपराध नहीं
मणिकर्णिका किसी एक समुदाय
या वर्ग की नहीं,
करोड़ों सनातनियों की आस्था का
केंद्र है। वहाँ स्वच्छता,
सुव्यवस्था और सम्मानजनक ढाँचा
देना न तो परंपरा
का अपमान है और न
ही इतिहास का विनाश, बल्कि
यह उस परंपरा को
आने वाली पीढ़ियों के
लिए सहेजने का प्रयास है।
जो लोग दशकों तक
अवैध निर्माण, गंदगी और अराजकता पर
मौन साधे रहे, आज
उन्हें अचानक “संवेदनशीलता” याद आ रही
है। सच यह है
कि यह विरोध विकास
का नहीं, नियंत्रण खोने का है।
निर्णय स्पष्ट होना चाहिए, समाज
और सरकार दोनों को यह तय
करना होगा कि क्या
कुछ मुट्ठीभर वैचारिक विरोधी सनातन स्थलों के कायाकल्प में
बाधा बनते रहेंगे, या
फिर जनभावना और आस्था के
अनुरूप निर्णायक कदम उठाए जाएंगे।
काशी ने युगों-युगों
में देखा है, जो
परिवर्तन का विरोध करता
है, वह अंततः समय
के मलबे में दब
जाता है। मणिकर्णिका भी
देख रही है, और
इतिहास भी। क्योंकि काशी
में केवल शरीर जलते
हैं असत्य, पाखंड और दोगलापन अंततः
खुद भस्म हो जाते
हैं।
राजनीतिक चेहरे, एक ही मानसिकता
इस पूरे विरोध
में कुछ नाम बार-बार उभरते हैं
- अखिलेश यादव, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी। इनमें विचारधाराएं अलग दिख सकती
हैं, लेकिन सनातन को लेकर असहजता
एक जैसी है। देश
की गाढ़ी कमाई से
करोड़ों के बंगले, शाही
फार्महाउस, वीआईपी सुरक्षा, विदेशी जीवनशैली, सब इन्हें स्वीकार्य
है। लेकिन, काशी का विकास
इन्हें खटकता है, मणिकर्णिका का
सम्मान इन्हें अखरता है, बाबा विश्वनाथ
कॉरिडोर इन्हें “राजनीतिक स्टंट” लगता है. सवाल
यह है, जो खुद
महलों में रहते हैं,
वे यह तय करने
वाले कौन होते हैं
कि देवस्थल कैसे रहें? क्या
देश की आस्था केवल
तब तक ठीक है,
जब तक वह टूटी-फूटी, अव्यवस्थित और उपहास का
विषय बनी रहे?
डोमराजा परिवार की भूमिका और सुविधाएँ
काशी में सदियों
से डोमराजा परिवार ही महाश्मशान पर
मुखाग्नि देता आया है।
परियोजना के तहत डोमराजा
परिवार और उनसे जुड़े
लोगों के लिए भी
बेहतर, सुरक्षित और सम्मानजनक सुविधाएँ
विकसित की जा रही
हैं, ताकि परंपरा और
आधुनिक व्यवस्था के बीच संतुलन
बना रहे।
हंगामा और सरकार का स्पष्ट संदेश
हाल के दिनों
में इस परियोजना को
लेकर कुछ विरोध और
हंगामा भी देखने को
मिला। हालांकि योगी सरकार ने
स्पष्ट कर दिया है
कि विकास के नाम पर
आस्था से कोई समझौता
नहीं होगा। न तो किसी
मंदिर को हटाया जाएगा
और न ही मणिकर्णिका
की पौराणिक पहचान को क्षति पहुँचाई
जाएगी।
काशी, मोक्ष और पुराणों की दृष्टि
काशी और मणिकर्णिका
से जुड़ी मान्यताओं का
उल्लेख स्कंदपुराण के काशी खंड
में मिलता है। इसमें बताया
गया है कि काशी
शिव और शक्ति का
आनंद स्थान है, जिसे शिव
ने ‘आनंदवन’ कहा। प्रलय के
समय भी यह क्षेत्र
अविनाशी रहता है, इसलिए
इसे अविमुक्त क्षेत्र कहा गया। पौराणिक
कथा के अनुसार भगवान
शिव के कानों के
मणिजटित कुंडल यहां गिरने से
इस तीर्थ का नाम मणिकर्णिका
पड़ा। मान्यता है कि यहां
मृत्यु को प्राप्त व्यक्ति
को शिव स्वयं तारक
मंत्र देकर मोक्ष प्रदान
करते हैं।
काशी करवट और संत साहित्य
इतिहास में ‘काशी करवट’
जैसी परंपराएं भी प्रचलित रहीं,
जिनका उल्लेख भक्ति काल के संतों
- कबीर, रविदास, मीरा, सूरदास, दादू दयाल और
सूफी संत रज्जबकृकी रचनाओं
में मिलता है। हालांकि महात्मा
कबीर ने ऐसी रूढ़
मान्यताओं की खुलकर आलोचना
की और कर्म को
प्रधान बताया। यही कारण है
कि उन्होंने काशी छोड़कर मगहर
में देह त्याग किया।
महाश्मशान : काशी का नाभिकेंद्र
मणिकर्णिका को काशी का
नाभिकेंद्र कहा जाता है।
मान्यता है कि विश्व
का नाभि भारत, भारत
का नाभि काशी और
काशी का नाभिकेंद्र मणिकर्णिका
है। चीनी यात्री ह्वेनसांग
और इत्सिंग, मुगलकालीन व अंग्रेज यात्रियों
ने भी अपने विवरणों
में लिखा है कि
मणिकर्णिका घाट पर दिन-रात चिताएं जलती
रहती हैं, यह परंपरा
सदियों से अविच्छिन्न है।
परंपरा और आधुनिकता का संगम
नया मणिकर्णिका घाट
परंपरा को मिटाने का
नहीं, बल्कि उसे गरिमा, सुविधा
और पर्यावरणीय चेतना के साथ आगे
ले जाने का प्रयास
है। यह परियोजना बताती
है कि सनातन परंपरा
स्थिर नहीं, बल्कि समय के साथ
संवेदनशील और विवेकपूर्ण विकास
को स्वीकार करने वाली जीवंत
परंपरा है।
एआई : तकनीक नहीं, नया हथियार
इस बार विरोध
का तरीका बदला गया है।
अब सड़क पर नारे
नहीं, अब एआई जनरेटेड
वीडियो, एडिटेड तस्वीरें, भ्रामक ऑडिट क्लिप्स और
भावनात्मक बैकग्राउंड म्यूज़िक का सहारा लिया
जा रहा है। कुछ
सेकेंड का वीडियो दिखाकर
कहा जा रहा है
“देखो, मणिकर्णिका की आत्मा कुचली
जा रही है।” लेकिन
यह नहीं बताया जाता
कि पहले वहां कैसी
अव्यवस्था थी, कैसे शवों
के साथ अमानवीय व्यवहार
होता था, कैसे शोकाकुल
परिजन असहाय खड़े रहते थे,
कैसे गंदगी और अवैध कब्ज़ों
ने घाट को जकड़
रखा था, यह डिजिटल
दुष्प्रचार है। यह सच
नहीं दिखाता, यह एजेंडा परोसता
है। आज एआई उनके
लिए वही काम कर
रहा है, जो कभी
झूठे इतिहासकार और प्रोपेगैंडा लेखक
किया करते थे। मकसद
साफ है, मणिकर्णिका को
“असंवेदनशील”, “अमानवीय”, “परंपरा-विरोधी” दिखाना। आज का बड़ा
प्रश्न यह है, क्या
सत्य अब आस्था तय
करेगी या एल्गोरिद्म? अगर
कल एआई यह दिखा
दे कि मंदिर भीड़भाड़
वाले हैं, घाट अव्यवस्थित
हैं, पर्व “अवैज्ञानिक” हैं, तो क्या
हम सब कुछ बंद
कर देंगे? तकनीक का काम सच
दिखाना है, एजेंडा चलाना
नहीं। लेकिन सनातन-विरोधी मानसिकता के लिए एआई
नया हथियार है, कम जोखिम,
ज्यादा ज़हर।
सनातन को शर्मिंदा देखने की आदत
सच्चाई यह है कि
दशकों तक एक वर्ग
को यह सिखाया गया,
मंदिर पिछड़ेपन का प्रतीक हैं,
घाट गंदगी का प्रतीक हैं,
तीर्थ अव्यवस्था का प्रतीक हैं
और जब विदेशी कैमरे
आएँ, तो हम खुद
ही हँसें और कहें, “हाँ,
यही है हमारी संस्कृति।”
अब जब सरकार और
समाज मिलकर इस अपमान को
सम्मान में बदल रहे
हैं, तो इनकी वैचारिक
दुकानें बंद हो रही
हैं। इसीलिए शोर है। इसीलिए
रोना है। इसीलिए एआई
का सहारा है।
मणिकर्णिकाः सुधार क्यों ज़रूरी था
मणिकर्णिका में सुधार कोई
विलास नहीं था। यह
मानवीय आवश्यकता थी। अंतिम संस्कार
गरिमा के साथ हो,
शोकाकुल परिवार को सुविधा मिले,
पंडा, डोम समाज सम्मान
के साथ काम करे,
स्वच्छता और व्यवस्था हो,
अग्नि, जल और मार्ग
सुरक्षित हों, क्या यह
सब मांगना पाप है? या
फिर सनातन से जुड़े लोगों
को जानबूझकर कष्ट में रखना
ही कुछ लोगों की
राजनीति है?
विरोध का असली कारण
असल समस्या यह नहीं है कि मणिकर्णिका बदली जा रही है। असल समस्या यह है कि अब अव्यवस्था से लाभ नहीं मिलेगा, अब अवैध कब्ज़े नहीं चलेंगे, अब भावनात्मक शोषण नहीं होगा, अब सनातन गर्व के साथ खड़ा दिखेगा, और यह दृश्य कुछ लोगों को बर्दाश्त नहीं। काशी ने सब देखा है काशी ने आक्रमण देखे। काशी ने उपेक्षा देखी। काशी ने राजनीतिक तिरस्कार देखा। लेकिन हर बार काशी उठी। और इस बार भी उठ रही है। यह केवल निर्माण नहीं है, यह वैचारिक मुक्ति है। अब स्पष्ट संदेश ज़रूरी है देश को तय करना होगा, क्या कुछ एआई वीडियो हमारी आस्था तय करेंगे? क्या कुछ नेता यह तय करेंगे कि हमारे तीर्थ कैसे दिखें? या फिर करोड़ों सनातनियों की भावना. निर्णय का आधार बनेगी? मतलब साफ है मणिकर्णिका पर केवल शरीर नहीं जलते, वहाँ झूठ जलता है, पाखंड जलता है, एजेंडा जलता है, और अंततः मानसिक गुलामी भी भस्म हो जाती है। काशी थी। काशी है। काशी रहेगी। और जो सनातन के उत्थान से डरते हैं, वे इतिहास के उसी राख में मिलेंगे, जिसे मणिकर्णिका हर दिन साक्षी भाव से देखती है।
परंपरा का अर्थ जड़ता नहीं
मणिकर्णिका की पहचान सदियों
से चली आ रही
है, पर यह पहचान
कभी जड़ नहीं रही।
काशी स्वयं ‘अविमुक्त’ है, जिसे शिव
ने कभी छोड़ा नहीं।
स्कंदपुराण के काशी खंड
में वर्णित आनंदवन की कथा बताती
है कि यह क्षेत्र
प्रलय में भी नष्ट
नहीं होता, क्योंकि यह शिव और
शक्ति का आनंद स्थान
है। ऐसे में यह
मान लेना कि मणिकर्णिका
केवल उसी रूप में
पवित्र है, जिसमें अव्यवस्था,
अंधकार और असुविधा हो,
परंपरा का सरलीकरण ही
नहीं, उसका अपमान भी
है। परंपरा वह नहीं जो
समय से डर जाए,
परंपरा वह है जो
समय को आत्मसात कर
ले। रैंप, बैठने की व्यवस्था, प्रकाश,
पेयजल, शौचालय, वेटिंग रूम और सुव्यवस्थित
दाह स्थल, ये सुविधाएँ विलास
नहीं हैं। ये उस
गरिमा की पुनर्स्थापना हैं,
जो मृत्यु के क्षण में
भी मनुष्य का अधिकार है।
नए मणिकर्णिका घाट पर प्रस्तावित
एलिवेटेड शवदाह संरचनाएं, जहां कम लकड़ी
के उपयोग से पूर्ण शास्त्रीय
विधि-विधान के साथ अंतिम
संस्कार संभव होगा, यह
संकेत है कि सनातन
केवल आस्था नहीं, पर्यावरणीय विवेक भी है। जिस
दर्शन ने पंचतत्व की
बात की, वह प्रकृति
के विनाश का समर्थक कैसे
हो सकता है? परंपरा
और पर्यावरण का यह संतुलन
ही सनातन की मौलिक शक्ति
है। आज भी चिताएँ
जलेंगी। आज भी मंत्र
गूँजेंगे। आज भी गंगा
बहेगी। बस फर्क इतना
होगा कि अब यह
सब गरिमा, प्रकाश और व्यवस्था के
साथ होगा।
परंपरा का भविष्य
मणिकर्णिका घाट का पुनर्निर्माण
यह प्रश्न नहीं उठाता कि
परंपरा बचेगी या नहीं। यह
प्रश्न उठाता है कि क्या
हम परंपरा को केवल स्मृति
बनाकर छोड़ देंगे, या
उसे समय के साथ
चलने योग्य बनाएँगे? सनातन कभी संग्रहालय नहीं
रहा। वह सदैव जीवित
रहा है, बहता हुआ,
बदलता हुआ, और फिर
भी अपने मूल में
अडिग। मणिकर्णिका का नया स्वरूप
इसी सत्य की पुनर्पुष्टि
है। क्योंकि काशी में मृत्यु
भी ठहरती नहीं, और परंपरा भी।




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