बजट 2026–27: राहत, रोज़गार और भरोसे के बीच भारत की आर्थिक दिशा की अग्निपरीक्षा
भारत एक बार फिर बजट के उस मोड़ पर खड़ा है, जहाँ उम्मीदें भी हैं और आशंकाएँ भी। बजट 2026–27 सिर्फ़ आय-व्यय का ब्योरा नहीं, बल्कि यह तय करने वाला दस्तावेज़ है कि महंगाई से जूझता आम आदमी, रोज़गार की तलाश में भटकता युवा, लागत और दाम के दबाव में किसान और निवेश का रास्ता देखता उद्योग—सबके हिस्से में कितनी राहत आएगी। तेज़ आर्थिक वृद्धि के दावों के बीच ज़मीनी हकीकत यह है कि जेब पर दबाव बढ़ा है और भरोसा डगमगाया है। ऐसे में इस बजट से कर राहत, रोज़गार सृजन, ग्रामीण मजबूती और उद्योग को स्पष्ट नीतिगत संकेत की उम्मीद है। सरकार के सामने चुनौती है—राजकोषीय संतुलन बनाए रखते हुए विकास को समावेशी बनाना। यह बजट तय करेगा कि विकास सिर्फ़ आंकड़ों में रहेगा या आम जीवन में महसूस भी होगा..
सुरेश गांधी
हर साल फरवरी
का पहला सप्ताह देश
की आर्थिक नब्ज़ टटोलने का समय होता
है। संसद में पेश
होने वाला आम बजट
सिर्फ़ सरकार की आय-व्यय
तालिका नहीं होता, बल्कि
यह उस सोच का
आईना होता है, जिससे
आने वाले वर्षों का
भारत गढ़ा जाना है।
बजट 2026–27 भी इसी कसौटी
पर खड़ा है—जहाँ
एक ओर वैश्विक अनिश्चितताओं
का दबाव है, तो
दूसरी ओर देश के
भीतर महंगाई, रोज़गार, आय असमानता और
विकास की आकांक्षाएँ। यह
बजट ऐसे समय आ
रहा है जब भारत
दुनिया की तेज़ी से
बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है,
लेकिन आम आदमी की
जेब अब भी हल्की
महसूस हो रही है।
ऐसे में सवाल यही
है—क्या यह बजट
सिर्फ़ आर्थिक वृद्धि के आंकड़े गिनाएगा
या उस वृद्धि को
आम जीवन में महसूस
कराने की दिशा में
ठोस कदम उठाएगा?
सरकारी दावों के मुताबिक भारत की जीडीपी वृद्धि दर दुनिया में अग्रणी बनी हुई है। इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल अर्थव्यवस्था और निवेश के मोर्चे पर भारत ने बीते वर्षों में उल्लेखनीय प्रगति की है। लेकिन इसके समानांतर एक सच्चाई यह भी है कि: महंगाई ने घरेलू बजट बिगाड़ा है, स्वास्थ्य और शिक्षा पर खर्च लगातार बढ़ा है, रोजगार के अवसर अपेक्षा के अनुरूप नहीं बढ़े मध्यम वर्ग पर कर और कर्ज़ दोनों का दबाव है. इसी दोहरी सच्चाई के बीच बजट 2026–27 से यह अपेक्षा है कि वह आंकड़ों की सफलता और ज़मीनी सच्चाई के बीच की दूरी को पाटने का प्रयास करेगा।
किसी भी बजट की सफलता का पैमाना शेयर बाज़ार की प्रतिक्रिया से नहीं, बल्कि रसोई और घर के खर्च से तय होता है। आम आदमी के लिए बजट का मतलब सीधा है—क्या इस साल ज़िंदगी थोड़ी आसान होगी? बीते वर्षों में मध्यम वर्ग वह तबका रहा है जिसने कर भी दिया, खर्च भी किया और अर्थव्यवस्था को संभाले रखा। लेकिन बदले में उसे राहत कम और दबाव ज़्यादा महसूस हुआ। इस बजट से मध्यम वर्ग को उम्मीद है: आयकर स्लैब में वास्तविक सुधार, स्टैंडर्ड डिडक्शन में बढ़ोतरी, नई कर व्यवस्था को और सरल व आकर्षक बनाना, स्वास्थ्य बीमा और शिक्षा खर्च में कर राहत. यदि सरकार इन मोर्चों पर ठोस कदम उठाती है, तो इसका सीधा असर खपत पर पड़ेगा। जब जेब में पैसा बचेगा, तो बाज़ार चलेगा—और बाज़ार चलेगा, तो उद्योग भी आगे बढ़ेगा।
महंगाई आज सिर्फ़ आर्थिक नहीं, सामाजिक मुद्दा बन चुकी है। दूध, दाल, सब्ज़ी, दवा और शिक्षा—हर चीज़ महंगी हुई है। लेकिन आमदनी उसी रफ्तार से नहीं बढ़ी। बजट से अपेक्षा है कि आवश्यक वस्तुओं पर कर भार कम हो. आपूर्ति श्रृंखला को मज़बूत किया जाए. ईंधन और परिवहन लागत को नियंत्रित करने के उपाय हों. महंगाई पर नियंत्रण न सिर्फ़ आर्थिक स्थिरता, बल्कि सामाजिक संतोष के लिए भी ज़रूरी है। भारत युवा देश है, लेकिन यह युवा शक्ति तभी वरदान बनेगी जब उसे अवसर मिलें। आज की सबसे बड़ी चिंता यही है कि पढ़ाई के बाद नौकरी कहाँ है?
अब तक के बजटों में स्किल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया जैसे कार्यक्रमों का ज़िक्र हुआ है, लेकिन ज़मीनी असर सीमित रहा है। बजट 2026–27 से उम्मीद है कि: एमएसई सेक्टर को वास्तविक प्रोत्साहन. स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा मैन्युफैक्चरिंग में बड़े पैमाने पर निवेश. स्टार्टअप्स के लिए टैक्स और फंडिंग में सहूलियत. जब तक छोटे और मध्यम उद्योग मज़बूत नहीं होंगे, तब तक बड़े पैमाने पर रोज़गार पैदा नहीं हो सकता।
भारत की आत्मा आज भी गांवों में बसती है। किसान अगर परेशान है, तो शहर भी चैन में नहीं रह सकता। खेती : लागत, दाम और सम्मान. किसान की समस्या सिर्फ़ उत्पादन की नहीं, बल्कि लागत और उचित मूल्य की है। बजट से अपेक्षा है : कृषि निवेश बढ़े. सिंचाई और भंडारण पर ज़ोर. फसल बीमा और समर्थन मूल्य को मज़बूती. ग्रामीण बुनियादी ढांचे का विस्तार : ग्रामीण अर्थव्यवस्था में जान आएगी, तो देश की समग्र मांग भी बढ़ेगी। महिलाएं: अर्थव्यवस्था की अनदेखी ताकत. महिला सशक्तिकरण अब सिर्फ़ सामाजिक मुद्दा नहीं, बल्कि आर्थिक अनिवार्यता है। जब महिलाएं कमाती हैं, तो पूरा परिवार आगे बढ़ता है।
महिला उद्यमिता को प्रोत्साहन. स्वयं सहायता समूहों के लिए आसान कर्ज. कामकाजी महिलाओं के लिए सुविधाएं. स्वास्थ्य और मातृत्व सेवाओं में निवेश. यह निवेश सिर्फ़ खर्च नहीं, बल्कि भविष्य की पूंजी है। कोविड ने यह साफ़ कर दिया कि स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत न हो, तो अर्थव्यवस्था भी चरमरा जाती है। शिक्षा के बिना कौशल और रोजगार की कल्पना भी अधूरी है। शिक्षा में गुणवत्ता सुधार. डिजिटल शिक्षा और ग्रामीण स्कूलों पर फोकस. यह खर्च नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की बुनियाद है।
उद्योग जगत बजट से सिर्फ़ रियायत नहीं, बल्कि स्थिर और स्पष्ट नीति चाहता है। इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेश : सड़क, रेलवे, लॉजिस्टिक्स, ऊर्जा—ये वो क्षेत्र हैं जहाँ निवेश से सीधा रोजगार और विकास मिलता है। बजट से अपेक्षा है कि: पूंजीगत व्यय में निरंतरता. निजी निवेश को आकर्षित करने के उपाय. निर्यात को बढ़ावा. एमएसएमई और स्टार्टअप. एमएसएमई देश की रीढ़ हैं, लेकिन कर्ज़ और नियमों के बोझ से जूझ रहे हैं। बजट अगर इन्हें सांस लेने की जगह देता है, तो अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार मिल सकती है।
भारत डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। बजट से उम्मीद है कि: टेक्नोलॉजी स्टार्टअप्स को सहारा, साइबर सुरक्षा और डेटा नीति में स्पष्टता, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार. सरकार के सामने चुनौती है—राहत भी देनी है और घाटा भी नहीं बढ़ाना। यह संतुलन आसान नहीं, लेकिन यहीं वित्तीय प्रबंधन की परीक्षा है। बजट 2026–27 सिर्फ़ एक वित्तीय दस्तावेज़ नहीं, बल्कि यह तय करेगा कि आने वाले वर्षों में भारत की विकास यात्रा कितनी समावेशी होगी। अगर यह बजट आम आदमी की राहत, युवाओं के रोज़गार, किसानों की मजबूती और उद्योग के भरोसे—इन चारों को साध पाता है, तो यह याद रखा जाएगा। लेकिन अगर यह केवल आंकड़ों और घोषणाओं तक सीमित रह गया, तो यह भी उम्मीदों की लंबी सूची में एक और नाम बनकर रह जाएगा। देश को आज ऐसे बजट की ज़रूरत है, जो सिर्फ़ विकास की बात न करे, बल्कि विकास को घर-घर तक पहुँचाए।


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