भारत –ईयू एफटीए : भारतीय हस्तनिर्मित कालीन उद्योग के लिए खुले वैश्विक अवसरों के द्वार
यूरोपीय बाज़ार
में
शुल्क-मुक्त
प्रवेश
से
भदोही
से
श्रीनगर
तक
बदलेगी
कारीगरों
की
तक़दीर
सीईपीसी ने
बताया
ऐतिहासिक
समझौता
सुरेश गांधी
वाराणसी. भारत और यूरोपीय
संघ के बीच संपन्न
हुआ मुक्त व्यापार समझौता (भारत–ईयू एफटीए)
भारतीय निर्यात परिदृश्य में एक नए
युग की शुरुआत के
रूप में देखा जा
रहा है। कालीन निर्यात
संवर्धन परिषद (सीईपीसी) ने इस ऐतिहासिक
उपलब्धि का स्वागत करते
हुए कहा है कि
यह समझौता भारत के पारंपरिक,
श्रम-प्रधान और हस्तशिल्प आधारित
उद्योगों—विशेषकर हस्तनिर्मित कालीन एवं गलीचा क्षेत्र—के लिए परिवर्तनकारी
सिद्ध होगा। सीईपीसी के अनुसार, यह
समझौता विश्व के सबसे बड़े
उपभोक्ता बाज़ारों में से एक
यूरोपीय संघ तक भारतीय
उत्पादों को विशेष अधिमान्य
पहुंच प्रदान करेगा, जिससे भारतीय हस्तनिर्मित कालीन वैश्विक प्रतिस्पर्धा में एक नई
मजबूती के साथ उभरेंगे।
99 प्रतिशत से अधिक भारतीय निर्यातों को मिलेगा शुल्क-मुक्त मार्ग
16वें भारत–यूरोपीय
संघ शिखर सम्मेलन के
अवसर पर भारत सरकार
द्वारा इस ऐतिहासिक एफटीए
के संपन्न होने की औपचारिक
घोषणा की गई। समझौते
के तहत मूल्य के
आधार पर 99 प्रतिशत से अधिक भारतीय
निर्यातों को यूरोपीय संघ
में या तो पूर्ण
रूप से शुल्क-मुक्त
अथवा रियायती शुल्क के साथ प्रवेश
प्राप्त होगा। साथ ही, यूरोपीय
संघ की लगभग सभी
टैरिफ लाइनों पर भारत को
अधिमान्य बाज़ार पहुंच सुनिश्चित की गई है।
यह प्रावधान विशेष रूप से हस्तनिर्मित
कालीन, हस्तशिल्प और वस्त्र जैसे
श्रम-प्रधान क्षेत्रों के लिए निर्यात
संवर्धन का मजबूत आधार
तैयार करेगा।
प्रधानमंत्री के दूरदर्शी नेतृत्व को सीईपीसी का नमन
कालीन निर्यात संवर्धन परिषद ने इस ऐतिहासिक
उपलब्धि के लिए प्रधानमंत्री
श्री नरेन्द्र मोदी के दूरदर्शी
नेतृत्व और विकसित भारत
की परिकल्पना के प्रति उनकी
अटूट प्रतिबद्धता के लिए आभार
व्यक्त किया है। परिषद
ने वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री
श्री पीयूष गोयल तथा वस्त्र
मंत्री श्री गिरिराज सिंह
के सक्रिय, रणनीतिक और सतत प्रयासों
की भी सराहना की,
जिनके परिणामस्वरूप यह दीर्घकालिक व्यापार
समझौता अंतिम रूप ले सका।
सीईपीसी ने कहा कि
यह समझौता India@2047 के अंतर्गत भारत
के दीर्घकालिक आर्थिक दृष्टिकोण को सशक्त रूप
से प्रतिबिंबित करता है।
भदोही से वाराणसी, श्रीनगर तक कालीन उद्योग को नई संजीवनी
भारत का हस्तनिर्मित
कालीन उद्योग भदोही, मिर्ज़ापुर और वाराणसी (उत्तर
प्रदेश), पानीपत (हरियाणा), जयपुर एवं बीकानेर (राजस्थान)
तथा श्रीनगर (जम्मू-कश्मीर) जैसे परंपरागत उत्पादन
क्लस्टरों पर आधारित है।
वैश्विक आर्थिक उतार-चढ़ाव के
बावजूद यह क्षेत्र भारत
की निर्यात शक्ति का महत्वपूर्ण स्तंभ
बना हुआ है। भारत–ईयू
एफटीए के तहत शुल्क
अवरोधों के हटने से
यूरोपीय संघ में भारतीय
कालीनों की मूल्य प्रतिस्पर्धात्मकता
में उल्लेखनीय वृद्धि होगी, जिससे निर्यात विस्तार को नई गति
मिलेगी.
एमएसएमई और ग्रामीण कारीगरों के लिए नए अवसरों का सृजन
सीईपीसी ने रेखांकित किया
कि यह समझौता केवल
बड़े निर्यातकों तक सीमित नहीं
रहेगा, बल्कि सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम
उद्यमों (एमएसएमई) तथा ग्रामीण कारीगर
इकाइयों के लिए भी
विकास के नए द्वार
खोलेगा। यूरोपीय बाज़ार तक सहज पहुंच
से मूल्य प्रतिस्पर्धा में सुधार, अंतरराष्ट्रीय
आपूर्ति श्रृंखलाओं के साथ बेहतर
एकीकरण तथा रोजगार सृजन
को बल मिलेगा—विशेषकर
पारंपरिक कालीन बुनाई क्षेत्रों में महिलाओं और
युवाओं के लिए।
यूरोप के प्रीमियम बाज़ार में भारतीय हस्तशिल्प की सशक्त पहचान
परिषद के अनुसार, भारतीय
हस्तनिर्मित कालीन अपनी समृद्ध सांस्कृतिक
विरासत, उत्कृष्ट शिल्पकला और विशिष्ट डिज़ाइन
के कारण यूरोपीय संघ
के गृह-सज्जा और
लक्ज़री इंटीरियर बाज़ार के प्रीमियम वर्ग
में विशिष्ट स्थान बनाने की पूरी क्षमता
रखते हैं। सीईपीसी चेयरमैन
कैप्टन मुकेश कुमार गोम्बर, अध्यक्ष, सीईपीसी ने कहा— “भारत–यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार
समझौता हस्तनिर्मित कालीन उद्योग के लिए ऐतिहासिक
उपलब्धि है। शुल्कों के
उन्मूलन से यूरोप के
परिष्कृत बाज़ारों तक भारतीय कालीनों
की पहुंच सुदृढ़ होगी और इसका
सीधा लाभ भदोही, मिर्ज़ापुर,
वाराणसी और श्रीनगर जैसे
क्लस्टरों में कार्यरत कारीगरों
तक पहुंचेगा।” असलम महबूब, उपाध्यक्ष,
सीईपीसी ने कहा— “इस
एफटीए से निर्यात संभावनाएं
मजबूत होंगी, बेहतर मूल्य प्राप्ति सुनिश्चित होगी और यूरोपीय
खरीदारों के साथ दीर्घकालिक
साझेदारियां विकसित होंगी। भारत को सतत
और नैतिक सोर्सिंग के विश्वसनीय वैश्विक
केंद्र के रूप में
नई पहचान मिलेगी।”
निर्यात के क्षेत्र में एक नया अध्याय
कालीन निर्यात संवर्धन परिषद ने पारंपरिक और
श्रम-प्रधान उद्योगों को दीर्घकालिक लाभ
पहुंचाने वाली भारत की
व्यापार नीतियों के प्रति पूर्ण
समर्थन व्यक्त किया है। परिषद
ने भारत सरकार और
सभी हितधारकों के साथ मिलकर
भारत–ईयू एफटीए के
प्रभावी क्रियान्वयन का संकल्प दोहराया
है, ताकि इसके माध्यम
से समावेशी आर्थिक विकास और भारत की
वैश्विक निर्यात उपस्थिति को और अधिक
सशक्त बनाया जा सके।

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