Tuesday, 20 January 2026

जब धरती ओढ़े पीतवसन और मन करे सरस्वती वंदन

पीली ऋतु में ज्ञान का प्रकाश : बसंत पंचमी, सरस्वती और भारत की चेतना

जब धरती ओढ़े पीतवसन और मन करे सरस्वती वंदन 

मुझको अगम स्वर ज्ञान दो, मां सरस्वती! वरदान दो।।जिस उत्साह और उल्लास के साथ मनुष्य ने जीवन में परिवर्तन का स्वागत किया, वही उत्सव कालांतर में पर्व और परंपरा बन गए। बसंत पंचमी उसी सुखद परिवर्तन का सांस्कृतिक उत्सव है। यह केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत नहीं, बल्कि प्रकृति, ज्ञान, कला, संगीत और भारतीय चेतना के नवजागरण का पर्व है। शीत की कठोरता ढलने लगती है, धरती पीली आभा ओढ़ लेती है और मनुष्य के भीतर सीखने-समझने की नई ललक जन्म लेती है। बसंत पंचमी माघ शुक्ल पंचमी को आती है। इस साल यह पर्व 23 जनवरी (शुक्रवार) को मनाया जाएगा। पंचमी तिथि का सूर्योदयकाल में विद्यमान होना इस तिथि को और अधिक फलदायी बनाता है। भारतीय कालगणना में यह सूक्ष्मता केवल गणित नहीं, बल्कि जीवन के अनुशासन का प्रतीक है, हम समय को केवल गिनें, बल्कि समझें। खास यह है कि इस वर्ष बसंत पंचमी पर उत्तर भद्रपदा नक्षत्र और शिव योग का संयोग बनता है, जो ज्ञान, स्थिरता, मनोबल और साधना के लिए अनुकूल माना गया है। यह संयोग बताता है कि यह दिन केवल बाह्य उल्लास का नहीं, बल्कि आंतरिक अनुशासन और बौद्धिक साधना का भी है। विद्यारंभ, कला-अभ्यास, लेखन, संगीत-साधना, इन सभी के लिए यह काल विशेष फलदायी है 

सुरेश गांधी

भारतीय परंपरा में पर्व केवल धरती पर नहीं मनाए जाते, आकाश भी उसमें सहभागी होता है। बसंत पंचमी उन्हीं पर्वो में से एक है, जो सिर्फ भारत की सांस्कृतिक चेतना बल्कि समय के साथ बहती हुई सभ्यता की आत्मा का उत्सव हैं। यह ऋतु का आगमन भर नहीं, बल्कि ज्ञान, विवेक, सौंदर्य और सृजन के पुनर्जागरण का उत्सव है। बसंत पंचमी परिवर्तन का पर्व है, ऋतु का, मन का और चेतना का। यह केवल मौसम बदलने की सूचना नहीं, बल्कि प्रकृति, संस्कृति और ज्ञान के सामूहिक जागरण का संकेत है। पीली आभा में लिपटी धरती, सरसों की धानी चादर, झरते फूल, गुनगुनाती हवा और लोकगीतों में तैरती फाग की तान, सब मिलकर बताते हैं कि बसंत चुका है। 

माघ शुक्ल पंचमी को मनाया जाने वाला यह पर्व शीत की कठोरता के बाद जीवन में आने वाली कोमलता का संकेत देता है, जब धरती पीले फूलों से सजती है, खेतों में सरसों लहलहाती है और मनुष्य के अंतःकरण में सीखने की नई तृष्णा जाग उठती है। यह सिखाती है कि राष्ट्र की वास्तविक शक्ति हथियारों या संपत्ति में नहीं, बल्कि ज्ञान, विवेक और संस्कार में निहित है। जहां सरस्वती का वास होता है, वहां लक्ष्मी और शक्ति स्वतः विराजमान होती हैं। पीली धूप, झरते फूल और वीणा की मधुर तान के बीच भारत हर वर्ष यह संकल्प दोहराता है, वह अज्ञान से ज्ञान, अंधकार से प्रकाश और अराजकता से अनुशासन की ओर निरंतर अग्रसर रहेगा।

इस वर्ष में पंचमी तिथि 23 जनवरी को अर्धरात्रि 2 बजकर 28 मिनट से प्रारंभ होकर 24 जनवरी को अर्धरात्रि 1 बजकर 46 मिनट तक रहेगी। इस दिन सरस्वती पूजा का सर्वाधिक शुभ समय प्रातः 7 बजकर 15 मिनट से दोपहर 12 बजकर 50 मिनट तक माना गया है। मान्यता है कि इस काल में पूजा, विद्यारंभ और विद्या-साधना करने से श्रेष्ठ फल प्राप्त होते हैं। भारतीय कालगणना में यह केवल समय का निर्धारण नहीं, बल्कि जीवन के अनुशासन और संतुलन का प्रतीक है, शुभ कार्य शुभ समय में हों।

ऋतु का आगमन, प्रकृति का उत्सव

बसंत पंचमी के साथ ही बसंत ऋतु का आगमन माना जाता है। सरसों की धानी चादर, पीले फूलों की झरन, गुनगुनाती हवाएं और लोकगीतों की तान, सब मिलकर बताते हैं कि प्रकृति नवयौवना हो उठी है।सरसैया फुलवा झर लागा, फागुन में बाबा देवर लागा’, ऐसे बोलों के साथ गांवों में फाग की परंपरा आरंभ होती है, जो अगले चालीस दिनों तक लोकजीवन में उल्लास घोलती रहती है।

ज्ञान, कला और वाणी की देवी : मां सरस्वती

बसंत पंचमी का मूल स्वर मां सरस्वती की आराधना है। पौराणिक मान्यता के अनुसार इसी दिन ब्रह्मा जी ने सत्वगुण से देवी सरस्वती को प्रकट किया। कमलासन पर विराजमान, चार भुजाओं में वीणा, पुस्तक, माला और वरमुद्रा, यह स्वरूप भारतीय सभ्यता में ज्ञान की पूर्ण परिकल्पना है। कथाओं में आता है कि सृष्टि की रचना के बाद ब्रह्मा जी ने जब अपनी बनाई दुनिया को नीरव पाया, तब भगवान विष्णु के परामर्श पर सरस्वती का आह्वान किया। जैसे ही माता ने वीणा के तार छुए, सृष्टि में पहला स्वर गूंजा। हवाओं को सरसराहट, नदियों को कलकल और जीवों को वाणी मिली। तभी से माता वागेश्वरी और वीणापाणि कहलायीं।

विद्यारंभ : अक्षर से जीवन की यात्रा

बसंत पंचमी को विद्यारंभ संस्कार का विशेष महत्व है। बच्चे के हाथ में पहली बार कलम पकड़वाना केवल पढ़ाई की शुरुआत नहीं, बल्कि संस्कृति और संस्कार का हस्तांतरण है। यह संदेश है कि सीखना जीवनभर चलने वाली यात्रा है। आज के समय में, जब शिक्षा को केवल नौकरी का साधन बना दिया गया है, विद्यारंभ हमें याद दिलाता है कि शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य बनाना है, केवल कर्मचारी या रोजगार नहीं।

पीला रंग : आशा, समृद्धि और ज्ञान

बसंत पंचमी पर पीला रंग केवल परिधान या प्रसाद तक सीमित नहीं। यह सूर्य, अन्न, समृद्धि और विवेक का प्रतीक है। मां सरस्वती को पीले पुष्प, पीले वस्त्र, हल्दी और केसर प्रिय हैं। खीर, पीले चावल और हलुवा भोग में अर्पित किए जाते हैं। मान्यता है कि इस दिन मां को कलम अर्पित कर उसी से कार्य आरंभ करना विद्या और वाणी में सिद्धि देता है। सरसों के खेत, टेसू के फूल, केसरिया आकाश, सब मिलकर जीवन में नई ऊर्जा का संचार करते हैं। पीला रंग यह भी बताता है कि जीवन में आनंद चमक-दमक से नहीं, बल्कि सरलता से आता है। जहाँ हर पीला फूल यह कहता है कि सीखना कभी खत्म नहीं होता, और हर वीणा की तान यह स्मरण कराती है कि वाणी जब संयमित होती है, तभी वह सरस्वती बनती है।

विविधता में एकता

उत्तर भारत में पतंगों से भरा आकाश, पश्चिम बंगाल में भव्य सरस्वती पूजा पंडाल, बिहार-पूर्वांचल में बसंती गीत, राजस्थान में लोकनृत्य, बसंत पंचमी भारत की सांस्कृतिक बहुलता का उत्सव है। यह पर्व बताता है कि भाषा, वेश और रीति भले अलग हों, पर संवेदना एक है। यही भारत की ताकत हैकृविविधता में समरसता।

शुभ कार्यों का श्रेष्ठ दिवस

पुराणों में बसंत पंचमी को नवीन कार्यों के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। विद्यारंभ, नवीन विद्या ग्रहण, गृह प्रवेश, लेखन, संगीत और कला-साधना. इस दिन भगवान विष्णु, कामदेव और रति की भी पूजा होती है। सूर्य के कुंभ राशि में प्रवेश के साथ मधुमास आरंभ होता है। शुक्र ग्रह का प्रभाव बढ़ता है, जिससे वातावरण सौंदर्य, प्रेम और सृजन से भर उठता है।

श्रीकृष्ण, सरस्वती और बसंत

भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं, “ऋतूनां कुसुमाकरः”, ऋतुओं में मैं वसंत हूं। इसी कारण मथुरा-वृंदावन और ब्रज क्षेत्र में बसंत पंचमी विशेष उल्लास से मनाई जाती है। मान्यता है कि मां सरस्वती की प्रथम पूजा श्रीकृष्ण और ब्रह्मा जी ने की। श्रीकृष्ण ने देवी को वरदान दिया कि माघ शुक्ल पंचमी को उनका पूजन करने से विद्या की सिद्धि होगी।

शक्ति के विविध स्वरूप

मत्स्यपुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण, स्कंद पुराण और मार्कण्डेय पुराण में देवी सरस्वती को शारदा, भारती, वाग्देवी, हंसवाहिनी, प्रज्ञापारमिता जैसे नामों से स्मरण किया गया है। दुर्गा सप्तशती में महासरस्वती को आदिशक्ति का स्वरूप माना गया है। शास्त्रों में यह भी उल्लेख है कि वसंत पंचमी के दिन नील सरस्वती का पूजन करने से धन और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।

वीरता और बलिदान

बसंत पंचमी का संबंध पृथ्वीराज चौहान के आत्मबलिदान से भी जुड़ा है। 1192 ईस्वी में इसी दिन उन्होंने शब्दभेदी बाण से मोहम्मद गौरी का अंत किया। इसी तिथि को लाहौर के वीर हकीकत का बलिदान भी स्मरणीय है, जिन्होंने धर्म और स्वाभिमान की रक्षा के लिए बाल अवस्था में प्राण न्यौछावर कर दिए। आज भी लाहौर में बसंत पंचमी पर पतंगें उड़ाकर उनकी स्मृति को नमन किया जाता है।

ज्योतिष और साधना

ज्योतिष में विद्या का संबंध पंचम भाव से माना गया है। जिनकी शिक्षा में बाधाएं आती हैं, वे बसंत पंचमी को मां सरस्वती की साधना कर लाभ प्राप्त कर सकते हैं। इस दिन मंत्र-जप, अध्ययन और ध्यान विशेष फलदायी माना गया है,

या कुन्देन्दु तुषारहार धवला...”

शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमाम्...”

ज्ञान ही राष्ट्र की असली पूंजी

बसंत पंचमी का केंद्र माँ सरस्वती हैं, ज्ञान, वाणी, संगीत और कला की अधिष्ठात्री देवी। श्वेत वस्त्र, वीणा, पुस्तक और कमल, ये सब केवल प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय दृष्टि में ज्ञान के चार स्तंभ हैंः शुद्धता, साधना, अध्ययन और सौंदर्य। सरस्वती पूजा का अर्थ केवल देवी-आराधना नहीं, बल्कि यह स्वीकारोक्ति है कि ज्ञान के बिना शक्ति अंधी है और विवेक के बिना प्रगति खोखली। आज जब सूचना का अंबार है, पर ज्ञान दुर्लभ होता जा रहा है; जब बोलने की स्वतंत्रता है, पर वाणी में संयम नहीं, तब सरस्वती का स्मरण हमें शब्दों की जिम्मेदारी और विचारों की मर्यादा सिखाता है।

कृषि और प्रकृति : धरती का धन्यवाद

बसंत पंचमी किसान के लिए भी विशेष है। यह रबी फसल के अच्छे संकेतों का पर्व है। प्रकृति के साथ संवाद करने वाली भारतीय परंपरा में यह दिन धरती के प्रति कृतज्ञता का भी है। आज जब पर्यावरण संकट गहराता जा रहा है, बसंत पंचमी हमें प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का पाठ पढ़ाती हैकृशोषण का नहीं, संरक्षण का।

शिक्षा, संस्कृति और संकट

आज का भारत तेज़ी से बदल रहा है। तकनीक ने जीवन को आसान बनाया है, पर मन को जटिल भी। शिक्षा व्यवसाय बन रही है, भाषा में कटुता बढ़ रही है और कला हाशिये पर जा रही है। ऐसे समय में बसंत पंचमी हमें ठहरकर सोचने को कहती है कि क्या हम ज्ञान की पूजा कर रहे हैं या केवल सूचना की खपत? सरस्वती का आवाहन हमें यह भी सिखाता है कि राष्ट्र की उन्नति केवल आर्थिक सूचकों से नहीं, बल्कि बौद्धिक ईमानदारी, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और नैतिक विवेक से होती है।

काशी से कलकत्ता तकः एक सांस्कृतिक धारा

काशी, जहांकाश्यां मरणान् मुक्तिकी अवधारणा है, और कलकत्ता, जहां सरस्वती पूजा सामाजिक उत्सव बन जाती है, दोनों ध्रुवों के बीच बहती है भारत की सांस्कृतिक गंगा। बसंत पंचमी इस धारा का संगम है, जहाँ अध्यात्म और आधुनिकता एक-दूसरे से संवाद करते हैं।

पूजा-विधिः अनुशासन और सौंदर्य

बसंत पंचमी की पूजा सरल है, पर अर्थगर्भित। स्वच्छता, पीले वस्त्र, पुस्तकें और वाद्य यंत्र, ये सब बतलाते हैं कि ज्ञान की साधना में अनुशासन और सौंदर्य दोनों आवश्यक हैं। प्रसाद में केसरिया हलवा या पीले पकवान केवल स्वाद नहीं, बल्कि उत्सव की मिठास हैं।

युवा पीढ़ी और संदेश

आज की युवा पीढ़ी के लिए बसंत पंचमी एक प्रश्न भी है, क्या हम सीखने के लिए जिज्ञासु हैं? क्या हम असहमति को संवाद में बदल सकते हैं? क्या हम अपनी भाषा, कला और परंपरा पर गर्व कर सकते हैं? यदि हाँ, तो बसंत पंचमी केवल कैलेंडर का पर्व नहीं, बल्कि भविष्य की तैयारी है।

श्रीकृष्ण और सरस्वती की प्रथम पूजा

भगवद्गीता के दशम अध्याय में श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘ऋतूनां कुसुमाकरःऋतुओं में मैं वसंत हूं। इसी कारण मथुरा और ब्रज क्षेत्र में बसंत पंचमी विशेष उल्लास से मनाई जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार, मां सरस्वती की प्रथम पूजा श्रीकृष्ण और ब्रह्मा जी ने की। श्रीकृष्ण ने देवी को वरदान दिया कि माघ शुक्ल पंचमी को उनका पूजन करने से विद्या की सिद्धि होगी। तभी से यह दिन सरस्वती पूजा का महापर्व बन गया।

शक्ति के विविध रूप और शास्त्रीय मान्यताएं

मत्स्यपुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण, स्कंद पुराण और मार्कण्डेय पुराण में देवी सरस्वती को शारदा, भारती, वाग्देवी, हंसवाहिनी, प्रज्ञापारमिता जैसे नामों से स्मरण किया गया है। दुर्गा सप्तशती में महासरस्वती को आदिशक्ति का स्वरूप माना गया है। मान्यता है कि वसंत पंचमी के दिन नील सरस्वती का पूजन करने से धन और समृद्धि के मार्ग प्रशस्त होते हैं।

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