माघ मेला : संगम की रेती पर सनातन चेतना का जीवंत उत्सव
भारत की आत्मा जब स्वयं को पहचानती है, तो वह प्रयागराज की ओर बह निकलती है। त्रिवेणी संगम की रेती पर हर वर्ष लगने वाला माघ मेला केवल श्रद्धालुओं की भीड़ या तंबुओं का अस्थायी नगर नहीं होता, बल्कि यह सनातन चेतना का वह उत्सव है, जहाँ आस्था, संयम और साधना एक साथ सांस लेते हैं। माघ मास को शास्त्रों में ‘देव मास’ कहा गया है, वह समय, जब मान्यता है कि देवता भी पृथ्वी पर उतरकर संगम में स्नान करते हैं। गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर की गई एक डुबकी केवल शरीर को नहीं, आत्मा को भी धोती है। यही कारण है कि माघ मेले में आने वाला हर श्रद्धालु अपने साथ केवल वस्त्र नहीं, बल्कि अपने पाप, पीड़ा और प्रश्न भी लेकर आता है। यहाँ मौन भी बोलता है, तपस्या भी संवाद करती है और साधारण मनुष्य भी एक क्षण के लिए स्वयं को विराट परंपरा का हिस्सा महसूस करता है। माघ मेला 2026 उसी अविरल परंपरा की कड़ी है, जो यह याद दिलाती है कि आधुनिकता की तेज़ रफ्तार में भी भारत की आत्मा आज भी संगम की ओर झुककर प्रणाम करती है, क्योंकि यहीं से शुद्धि, शांति और संतुलन का मार्ग निकलता
सुरेश गांधी
माघ मेला भारतीय
संस्कृति का वह जीवंत
अध्याय है, जहां आस्था,
साधना, तप, त्याग और
सामाजिक समरसता एक साथ प्रवाहित
होती हैं। यह केवल
अस्थायी तंबुओं और श्रद्धालुओं की
भीड़ का आयोजन नहीं,
बल्कि सनातन परंपरा की जीवित प्रयोगशाला
है। पुराणों में माघ मास
को “देव मास” कहा
गया है, वह कालखंड,
जब देवताओं का पृथ्वी पर
आगमन माना जाता है
और प्रयागराज का त्रिवेणी संगम
स्वयं स्वर्ग का प्रतिबिंब बन
जाता है। उत्तर प्रदेश
के प्रयागराज में प्रतिवर्ष आयोजित
होने वाला माघ मेला,
गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती
के पवित्र संगम तट पर
भारतीय आत्मा के शाश्वत विश्वास
को मूर्त रूप देता है. यही
कारण है कि यह
मेला सदियों से न केवल
धार्मिक आस्था का केंद्र रहा
है, बल्कि सामाजिक चेतना, सांस्कृतिक
निरंतरता और आध्यात्मिक अनुशासन
का भी प्रतीक बन
चुका है। हिंदू पंचांग
के अनुसार माघ मास को
अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी माना
गया है।
शास्त्रों में कहा गया है कि इस मास में किया गया स्नान, दान, जप और तप सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक फलदायी होता है। स्कंद पुराण, पद्म पुराण और महाभारत में प्रयाग को ‘तीर्थराज प्रयाग’ कहा गया है और यह उल्लेख मिलता है कि माघ मास में प्रयाग में स्नान करने का पुण्य अन्य सभी तीर्थों से श्रेष्ठ है।
मान्यता है कि माघ मास में देवता स्वयं पृथ्वी पर आकर संगम में स्नान करते हैं। इसी कारण प्रयागराज को देवनगरी और संगम नगरी कहा जाता है। माघ मेले के दौरान संगम तट पर प्रवाहित होने वाली श्रद्धा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धि की यात्रा होती है, जहाँ व्यक्ति अपने अहंकार, पाप और सांसारिक बंधनों से मुक्त होने का प्रयास करता है।
त्रिवेणी संगम : जहां नदियां नहीं, आस्थाएं मिलती हैं
त्रिवेणी संगम : गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती
का संगम, भारतीय आध्यात्मिक भूगोल का सबसे पवित्र
केंद्र माना जाता है।
गंगा को जीवनदायिनी, यमुना
को करुणा और सरस्वती को
ज्ञान की प्रतीक माना
गया है। इन तीनों
का संगम, जीवन, भक्ति और ज्ञान के
संतुलन का प्रतीक बन
जाता है। माघ मेले
के दौरान संगम तट पर
उमड़ने वाली भीड़ केवल
स्नान के लिए नहीं
आती, बल्कि अपने भीतर की
अशुद्धियों को धोने, जीवन
को पुनः अनुशासित करने
और आत्मिक शांति पाने की आकांक्षा
लेकर आती है।
प्रमुख स्नान पर्वः माघ मेले की आत्मा
माघ मेला 2026 में
कई प्रमुख स्नान पर्व होंगे, जिनका
धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
अत्यंत विशिष्ट है :-
पौष
पूर्णिमा
: 3 जनवरी
2026 (शनिवार)
माघ मेले का शुभारंभ।
यह दिन एक माह
की तपस्या और कल्पवास के
संकल्प का प्रतीक है।
मकर
संक्रांति
: 14 जनवरी
2026 (बुधवार)
सूर्य के मकर राशि
में प्रवेश का पर्व, जब
गंगा स्नान का विशेष पुण्य
माना जाता है।
मौनी
अमावस्या
: 18 जनवरी
2026 (रविवार)
माघ मेले का सबसे
पवित्र और भीड़भाड़ वाला
स्नान। मौन रखकर किया
गया स्नान मोक्ष का मार्ग प्रशस्त
करता है।
बसंत
पंचमी
: 23 जनवरी
2026 (शुक्रवार)
ज्ञान, कला और विद्या
की देवी सरस्वती की
आराधना का दिन।
माघी
पूर्णिमा
: 1 फरवरी
2026 (रविवार)
पूर्णिमा स्नान, दान और व्रत
का विशेष महत्व।
महाशिवरात्रि
: 15 फरवरी
2026 (रविवार)
माघ मेले का समापन,
शिव-भक्ति और वैराग्य का
पर्व।
पौष पूर्णिमा 2026ः माघ मेले की पहली डुबकी
पंचांग के अनुसार पौष
पूर्णिमा का आरंभ 2 जनवरी
2026 को शाम 6ः53 बजे
और समापन 3 जनवरी को दोपहर 3ः32
बजे होगा। इसी दिन से
माघ मेले का औपचारिक
शुभारंभ माना जाता है।
ब्रह्म मुहूर्तः सुबह 5ः25 से 6ः20
बजे, अभिजित मुहूर्तः दोपहर 12ः05 से 12ः46
बजे, इन मुहूर्तों में
किया गया स्नान-दान
विशेष पुण्य प्रदान करता है।
मौनी अमावस्या : मौन, मनन और मोक्ष
माघ मेले का
सबसे महत्वपूर्ण स्नान मौनी अमावस्या को
माना जाता है। वर्ष
2026 में यह स्नान 18 जनवरी
को होगा। धार्मिक मान्यता है कि इस
दिन मौन रहकर संगम
में स्नान करने से व्यक्ति
के पाप नष्ट होते
हैं, मानसिक शांति प्राप्त होती है और
मोक्ष का मार्ग प्रशस्त
होता है। इस दिन
संगम तट पर श्रद्धालुओं
की संख्या अपने चरम पर
होती है। प्रशासन, साधु-संत और स्वयंसेवी
संगठन मिलकर इस महास्नान को
सुव्यवस्थित और सुरक्षित बनाने
में जुटते हैं।
ब्रह्म मुहूर्तः स्नान का सर्वोत्तम समय
हिंदू धर्म में स्नान-दान और धार्मिक
अनुष्ठानों के लिए ब्रह्म
मुहूर्त को सर्वोत्तम माना
गया है। सामान्यतः यह
समय सुबह 4ः00 से 5ः30
बजे तक रहता है।
इस काल में संगम
में स्नान करने से स्नान
का फल कई गुना
बढ़ जाता है।
कल्पवासः तप, संयम और साधना की जीवनशैली
माघ मेले की
सबसे विशिष्ट परंपरा है कल्पवास। यह
केवल तंबू में रहना
नहीं, बल्कि जीवन को तपस्या
में ढालने की प्रक्रिया है।
कल्पवासी संगम की रेती
पर एक माह या
उससे अधिक समय तक
रहकर संयम, साधना और अनुशासन का
पालन करते हैं।
कल्पवास की प्रमुख विशेषताएँ
दिन
में
केवल
एक
बार
भोजन
तीन
बार
स्नानकृभोर,
दोपहर
और
संध्या
प्रभु
भक्ति,
जप,
ध्यान
और
सत्संग
शास्त्रों के अनुसार कल्पवास
की न्यूनतम अवधि एक रात्रि
हो सकती है, जबकि
3 रात्रि, 3 महीने, 6 महीने, 6 वर्ष, 12 वर्ष या आजीवन
कल्पवास का भी विधान
है।
गंगा स्नान के नियम : आचरण ही असली शुद्धि
गंगा स्नान के
दौरान 5, 7, 10 या 11 डुबकी लगाना शुभ माना गया
है। स्नान से पहले शरीर
की स्वच्छता रखें, क्योंकि गंगा मन का
मैल धोती है, शरीर
का नहीं। स्नान
के समय मन को
शांत रखें, किसी के प्रति
द्वेष न रखें। स्नान
के बाद दान-पुण्य
अवश्य करें। गंगा की स्वच्छता
और पवित्रता बनाए रखना हर
श्रद्धालु का कर्तव्य है।
प्रयागराजः तीर्थराज की अविरल परंपरा
प्रयागराज केवल एक शहर
नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता का जीवंत तीर्थ
है। कुंभ, अर्धकुंभ, माघ मेला, ये
सभी आयोजन इस बात के
प्रमाण हैं कि यहाँ
आस्था कभी समाप्त नहीं
होती। महाकुंभ 2025 में 66 करोड़ से अधिक
श्रद्धालुओं की सहभागिता ने
इसे दुनिया का सबसे बड़ा
मानव समागम बना दिया। यूनेस्को
द्वारा अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में
मान्यता प्राप्त कुंभ परंपरा का
विस्तार ही माघ मेला
है संक्षिप्त, पर उतना ही
पवित्र।
आस्था का अनवरत प्रवाह
माघ मेला 2026 केवल
एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा की निरंतर यात्रा
है। यह मेला सिखाता
है कि आधुनिकता के
शोर में भी साधना,
संयम और सामूहिक आस्था
का महत्व कम नहीं हुआ
है। त्रिवेणी संगम के तट
पर हर डुबकी, हर
मंत्र और हर मौन
क्षण इस बात का
साक्ष्य है कि सनातन
परंपरा आज भी उतनी
ही जीवंत है, जितनी सहस्राब्दियों
पहले थी। माघ मेला,
वास्तव में, भारत की
आत्मा का उत्सव है।




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