Friday, 2 January 2026

काशी में गेंद नहीं, भविष्य उछाला गया है

काशी में गेंद नहीं, भविष्य उछाला गया है 

काशी ने सदियों से बहुत कुछ देखा है, साम्राज्यों का उत्थान और पतन, धर्म का दर्शन और दर्शन का धर्म, घाटों पर जीवन और चिताओं पर मृत्यु। लेकिन अब काशी एक और दृश्य देख रही है, मैदान में उछलती गेंद के साथ उछलता हुआ भविष्य। प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में 4 से 11 जनवरी तक आयोजित 72वीं सीनियर राष्ट्रीय वॉलीबॉल चैंपियनशिप केवल खेल कैलेंडर की एक तिथि नहीं है। यह उस राजनीतिक, सामाजिक परिवर्तन का संकेत है, जिसमें खेल को पहली बार गंभीरता से नीति और राष्ट्रनिर्माण के विमर्श में स्थान मिला है। मतलब साफ है खेल अब हाशिये का विषय नहीं. लंबे समय तक भारतीय राजनीति में खेल एक ऐसा विषय रहा, जिसे भाषणों में सराहा गया, लेकिन नीतियों में टाल दिया गया। बजट में खेल को अक्सरबचता हुआ कॉलममाना गया। पर तस्वीर अब बदल रही है। डॉ. संपूर्णानंद स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स, सिगरा में बने अंतरराष्ट्रीय मानकों के टफलेक्स कोर्ट यह बताते हैं कि खेल अब अनुदान का विषय नहीं, निवेश का क्षेत्र बन चुका है। यह बदलाव संयोग नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिणाम है 

सुरेश गांधी  

प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में इन दिनों केवल गलियों, घाटों और मंदिरों की चर्चा नहीं है, बल्कि खेल इतिहास का एक नया अध्याय आकार ले रहा है। सदियों से अध्यात्म, दर्शन और संस्कृति की वैश्विक राजधानी रही काशी अब राष्ट्रीय खेल मानचित्र पर भी अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराने की ओर अग्रसर है। 4 से 11 जनवरी तक आयोजित होने वाली 72वीं सीनियर राष्ट्रीय वॉलीबॉल चैंपियनशिप इसी परिवर्तन का जीवंत प्रमाण है। यह आयोजन मात्र एक प्रतियोगिता नहीं, बल्कि उस सोच का विस्तार है जिसमें खेल को मनोरंजन या शौक नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की बुनियादी इकाई माना जाता है। डॉ. संपूर्णानंद स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स, सिगरा में दो अत्याधुनिक अंतरराष्ट्रीय मानकों वाले टफलेक्स कोर्ट पर खेले जाने वाले मुकाबले यह संकेत देते हैं कि अब उत्तर प्रदेश खेलों में भी आत्मनिर्भरता और वैश्विक गुणवत्ता की ओर कदम बढ़ा चुका है।

वरिष्ठ खेल पत्रकार पद्मपति शर्मा मानते हैं कि खेल को केवल स्कोरबोर्ड से पढ़ना, समाज को अधूरा समझने जैसा है। उनके शब्दों में खेल वह आईना है, जिसमें समाज अपनी सामूहिक चेतना, अनुशासन, धैर्य और संघर्ष को देखता है। जब किसी शहर में राष्ट्रीय स्तर का खेल आयोजन होता है, तो उसका प्रभाव केवल खिलाड़ियों तक सीमित नहीं रहता, वह पूरे समाज की मानसिकता को प्रभावित करता है। 

काशी जैसे शहर में, जहाँ परंपरा और परिवर्तन अक्सर आमने-सामने खड़े दिखते हैं, खेल एक सेतु का काम करता है। यह आयोजन साबित करता है कि आधुनिकता और संस्कृति एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकते हैं। लंबे समय तक उत्तर प्रदेश को प्रतिभाओं की खान तो माना गया, लेकिन खेल ढांचे की कमी एक बड़ा अवरोध रही। खिलाड़ी निकलते रहे, लेकिन उन्हें मंच और संसाधन अक्सर बाहर तलाशने पड़े। 72वीं सीनियर राष्ट्रीय वॉलीबॉल चैंपियनशिप इस धारणा को तोड़ती है। डॉ. संपूर्णानंद स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में बने टफलेक्स कोर्ट केवल तकनीकी संरचना नहीं, बल्कि खेल नीति में आए बदलाव का प्रतीक हैं। यह संदेश साफ है, अब प्रदेश सिर्फ खिलाड़ी नहीं देगा, बल्कि विश्वस्तरीय प्रतिस्पर्धा की मेज़बानी भी करेगा। 

इस आयोजन का सबसे बड़ा सामाजिक प्रभाव स्थानीय युवाओं पर पड़ेगा। जब किसी शहर का किशोर अपने ही परिसर में देश के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों को खेलते देखता है, तो उसके सपने भी राष्ट्रीय हो जाते हैं। खेल केवल प्रेरणा नहीं देता, बल्कि विकल्प देता है - करियर का, पहचान का और आत्मविश्वास का। काशी की संकरी गलियों, ग्रामीण अंचलों और स्कूलों में छिपी प्रतिभाओं के लिए यह आयोजन एक खुला निमंत्रण है कि वे भी मैदान में उतरें, अभ्यास करें और आगे बढ़ें।

जब काशी में राष्ट्रीय वॉलीबॉल चैंपियनशिप का उद्घोष होता है, तो यह सिर्फ खेल कैलेंडर की तारीख नहीं होती, यह समाज की सोच में आए बदलाव की घोषणा होती है। यह आयोजन बताता है कि परंपरा की धरती पर भविष्य का मैच खेला जा सकता है, और खेल केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि राष्ट्र की सामूहिक चेतना का विस्तार है। काशी ने एक बार फिर साबित किया है यह शहर केवल अतीत को संजोता नहीं, भविष्य को गढ़ता भी है। काशी को अक्सर परंपरा के नाम पर वर्तमान से काटकर देखने की भूल की गई। मानो यह शहर सिर्फ अतीत में जीने के लिए बना हो। लेकिन वॉलीबॉल चैंपियनशिप बताती है कि काशी केवल मोक्ष की नहीं, मोमेंटम की भी नगरी है। यहाँ मंत्र भी गूंजते हैं और मैनेजमेंट भी आकार लेता है।

यहाँ शंखनाद भी होता है और सीटी भी बजती है। 72वीं सीनियर राष्ट्रीय वॉलीबॉल चैंपियनशिप यह संकेत दे रही है कि भारत का विकास अब केवल कागज़ों और घोषणाओं में नहीं, मैदानों और युवाओं के पसीने में लिखा जा रहा है। 

यह आयोजन बताता है कि परंपरा और प्रगति में टकराव नहीं, संवाद संभव है। कहा जा सकता है काशी में इन दिनों गेंद सिर्फ हवा में नहीं है, वह संभावनाओं में है। यह आयोजन सिर्फ खेल नहीं, यह राजनीति के बदलते संस्कार, समाज के बदलते सपने और राष्ट्र के बदलते आत्मविश्वास की कहानी है। और शायद इसी को कहते हैं विकास का नया अध्याय।

राजनीति का पुराना व्याकरण कहता था, सड़क, बिजली, पानी और राशन ही विकास है। नया व्याकरण कहता है खेल, कौशल, आत्मविश्वास और अवसर भी विकास हैं। वाराणसी में राष्ट्रीय चैंपियनशिप का आयोजन इस बदले हुए व्याकरण का प्रमाण है। यह संकेत देता है कि सत्ता अब केवल वोट की नहीं, विजन की भाषा बोलने लगी है। वरिष्ठ खेल पत्रकार पद्मपति शर्मा ठीक ही कहते हैं, खेल समाज का आईना है। और राजनीति? राजनीति उस आईने के सामने खड़े होने का साहस है। जब सत्ता खेल में निवेश करती है, तो वह केवल स्टेडियम नहीं बनाती, वह युवाओं को विकल्प देती है। वह ऊर्जा को दिशा देती है। 

वह आक्रोश को अनुशासन में बदलती है। दिलचस्प यह है कि खेल जैसे सकारात्मक विषय पर भी राजनीतिक मौन अक्सर दिखाई देता है। विकास के इन नए प्रतीकों पर सवाल कम होते हैं, श्रेय लेने की होड़ भी कम रहती है। शायद इसलिए कि खेल का विकास विवाद से नहीं, परिणाम से बोलता है। 

खेल मैदान वह प्रयोगशाला है, जहाँ अनुशासन पैदा होता है, नेतृत्व गढ़ा जाता है, और हार को स्वीकार करने की संस्कृति विकसित होती है। कोई भी राष्ट्र बिना इन गुणों के मजबूत नहीं बन सकता। आज का युवा केवल नौकरी नहीं चाहता, वह पहचान चाहता है। वह मंच चाहता है। 

खेल उसे दोनों देता है। काशी में होने वाली यह चैंपियनशिप हजारों युवाओं को यह दिखाएगी कि राष्ट्रीय मंच दूर नहीं, वह अपने शहर में भी उतर सकता है।

वॉलीबॉल : गांवों से ग्लोबल कोर्ट तक

वॉलीबॉल भारत का वह खेल है जिसकी जड़ें गांवों, स्कूलों और कॉलेजों में गहराई से जुड़ी हैं। यह खेल ताकत के साथ टीमवर्क, अनुशासन और सामूहिक जिम्मेदारी सिखाता है। ऐसे समय में जब व्यक्तिगत स्टारडम खेलों पर हावी होता जा रहा है, वॉलीबॉल सामूहिक चेतना का प्रतीक बनकर उभरता है। वाराणसी में इस खेल का राष्ट्रीय आयोजन यह साबित करता है कि भारत का खेल भविष्य केवल एक-दो खेलों तक सीमित नहीं, बल्कि बहुआयामी है।

खेल और शासन : एक साझा दृष्टि

किसी भी बड़े खेल आयोजन के पीछे केवल खिलाड़ी नहीं, बल्कि शासन, प्रशासन और समाज की साझा भूमिका होती है। प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में इस तरह का आयोजन यह संकेत देता है कि खेल अब केवल विभागीय फाइलों तक सीमित विषय नहीं रहा। यह आयोजन बताता है कि जब राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक तैयारी और सामाजिक समर्थन एक साथ आते हैं, तब खेल भी विकास का इंजन बन सकता है।

खेल संस्कृति का विस्तार

खेल संस्कृति केवल स्टेडियम तक सीमित नहीं होती। यह स्कूलों के मैदान, गांवों के खुले मैदान और परिवारों की सोच में बसती है। जब राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं छोटे और मध्यम शहरों में होती हैं, तो खेल को लेकर समाज का नजरिया बदलता है। अब खेल केवल करियर का जोखिम नहीं, बल्कि सम्मानजनक भविष्य का विकल्प बनता है। यही इस चैंपियनशिप की सबसे बड़ी उपलब्धि है। वरिष्ठ पत्रकार पद्मपति शर्मा का मानना है कि ऐसे आयोजनों को केवल परिणामों की खबर बनाकर नहीं छोड़ देना चाहिए। मीडिया की भूमिका यहां और बड़ी हो जाती है, खिलाड़ियों की मेहनत, आयोजकों की तैयारी और समाज पर पड़ने वाले प्रभाव को दर्ज करना भी उतना ही जरूरी है। खेल पत्रकारिता यदि केवल जीत - हार तक सिमट गई, तो वह समाज के साथ अन्याय करेगी।

पूर्वांचल का आत्मविश्वास

यह आयोजन पूर्वांचल के लिए आत्मसम्मान का विषय है। लंबे समय तक यह क्षेत्र विकास की दौड़ में पीछे गिना गया, लेकिन खेल जैसे आयोजनों से यह धारणा बदल रही है। वाराणसी अब केवल अतीत की गौरवगाथा नहीं, बल्कि भविष्य की संभावनाओं का केंद्र बन रहा है।

अंतरराष्ट्रीय मानक, स्थानीय स्वाभिमान

टफलेक्स कोर्ट का निर्माण यह दर्शाता है कि अब स्थानीय और वैश्विक के बीच की दूरी कम हो रही है। जब खिलाड़ी उसी सतह पर खेलते हैं, जिस पर अंतरराष्ट्रीय मुकाबले होते हैं, तो उनके आत्मविश्वास में स्वाभाविक वृद्धि होती है। यह केवल तकनीकी सुधार नहीं, बल्कि मानसिक क्रांति है।

खेल से राष्ट्र निर्माण तक

खेल अनुशासन सिखाता है, हार सहना सिखाता है और जीत को विनम्रता से स्वीकार करना सिखाता है। यही गुण किसी भी सशक्त राष्ट्र की बुनियाद होते हैं। 72वीं सीनियर राष्ट्रीय वॉलीबॉल चैंपियनशिप को इसी व्यापक संदर्भ में देखना चाहिए। यह आयोजन बताता है कि भारत का भविष्य केवल कागज़ी नीतियों में नहीं, बल्कि मैदानों में भी लिखा जा रहा है।

वॉलीबॉल : एक लोकतांत्रिक खेल

वॉलीबॉल का चयन भी अपने आप में राजनीतिक अर्थ रखता है। यह खेल तो अभिजात है, ही विशुद्ध कॉर्पोरेट। यह गांवों, स्कूलों, कस्बों और अर्धशहरी भारत का खेल है। यह खेल बताता है कि टीम के बिना कोई स्टार नहीं। यह संदेश राजनीति के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है।

उत्तर प्रदेश : छवि से बाहर निकलता राज्य      

उत्तर प्रदेश को लंबे समय तक कानून व्यवस्था, जाति राजनीति और अव्यवस्था के चश्मे से देखा गया। खेल आयोजन उस छवि को चुनौती देते हैं। जब राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं यूपी में होती हैं, तो यह संदेश जाता है कि राज्य अब केवल समस्या नहीं, संभावना भी है। 

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