डर की धरती से जीत का कोर्ट : आजमगढ़ का सईद आलम बना बदलाव का स्मैश
जब
सिगरा
स्टेडियम,
वाराणसी
में
72वीं
सीनियर
नेशनल
वॉलीबॉल
चैंपियनशिप
के
दौरान
उत्तर
प्रदेश
की
टीम
ने
उत्तराखंड
को
पराजित
कर
क्वार्टर
फाइनल
में
प्रवेश
किया,
तब
तालियों
की
गूंज
के
बीच
एक
नाम
बार-बार
उभरकर
सामने
आया,
सईद
आलम।
यह
सिर्फ
एक
मैच
की
जीत
नहीं
थी,
बल्कि
उस
आजमगढ़
की
बदली
हुई
पहचान
की
घोषणा
थी,
जिसे
वर्षों
तक
भय,
माफिया
और
नकारात्मक
छवियों
के
चश्मे
से
देखा
जाता
रहा।
मुबारकपुर
थाना
क्षेत्र
के
बम्हौर
गांव
से
निकलकर
राष्ट्रीय
स्तर
के
वॉलीबॉल
मंच
तक
पहुंचा
सईद
आलम
आज
उस
पीढ़ी
का
प्रतिनिधि
चेहरा
बन
चुका
है,
जो
खेल
को
अपना
हथियार
और
मेहनत
को
अपनी
पहचान
बना
रही
है।
यूपी
प्रो
वॉलीबॉल
लीग
में
‘मथुरा
योद्धा’
टीम
के
लिए
खेलते
हुए
‘इमर्जिंग
प्लेयर
ऑफ
द
सीजन’
का
खिताब
जीतने
वाले
सईद
की
कहानी
सिर्फ
व्यक्तिगत
सफलता
की
नहीं,
बल्कि
पूर्वांचल
के
उन
लाखों
युवाओं
की
उम्मीद
है,
जो
अब
बंदूक
या
भय
नहीं,
बल्कि
खेल
और
परिश्रम
से
अपना
भविष्य
गढ़ना
चाहते
हैं।
वॉलीबॉल
के
कोर्ट
पर
सईद
का
हर
उछाल,
हर
स्मैश
और
हर
डिफेंस
आजमगढ़
की
मिट्टी
से
उठती
उस
नई
चेतना
का
प्रतीक
है,
जो
बताती
है,
पहचान
बदली
जा
सकती
है,
बस
दिशा
सही
होनी
चाहिए।
प्रस्तुत
है
सीनियर
रिपोर्टर
सुरेश
गांधी
से
सईद
आलम
की
खास
बातचीत
के
कुछ
अंश
:-
प्रश्न
: सईद,
सबसे
पहले
बधाई।
यूपी
प्रो
वॉलीबॉल
लीग
में
‘इमर्जिंग
प्लेयर
ऑफ
द
सीजन’
बनना
आपके
लिए
क्या
मायने
रखता
है?
उत्तर
: धन्यवाद। यह पुरस्कार मेरे
लिए सिर्फ एक ट्रॉफी नहीं,
बल्कि उस संघर्ष की
पहचान है जो मैंने
गांव की मिट्टी से
शुरू किया। जब लोग आजमगढ़
का नाम सुनते थे
तो गलत छवि सामने
आती थी, लेकिन आज
वॉलीबॉल के जरिए उसी
आजमगढ़ का नाम गर्व
से लिया जा रहा
है, यह मेरे लिए
सबसे बड़ी उपलब्धि है।
प्रश्न
: आपकी
शुरुआत
बम्हौर
गांव
से
हुई।
वहां
से
प्रो
लीग
तक
का
सफर
कैसा
रहा?
उत्तर
: बहुत कठिन, लेकिन उतना ही सुंदर।
सात साल पहले गांव
के खुले मैदान में
नंगे पैर खेलना शुरू
किया था। संसाधन नहीं
थे, लेकिन जज्बा था। बाद में
लखनऊ की एकेडमी में
प्रशिक्षण मिला। वहां अनुशासन, फिटनेस
और प्रोफेशनल खेल का मतलब
समझ में आया। गांव
से शहर और शहर
से स्टेट लेवल तक का
सफर मेहनत की कहानी है।
प्रश्न
: यूपी
प्रो
वॉलीबॉल
लीग
में
‘मथुरा
योद्धा’
के
लिए
खेलना
कैसा
अनुभव
रहा?
उत्तर
: बहुत शानदार। वहां मुझे बड़े
और अनुभवी खिलाड़ियों के साथ खेलने
का मौका मिला। मैच
का दबाव, दर्शकों की भीड़, रणनीति,
सब कुछ अलग स्तर
का था। ‘इमर्जिंग प्लेयर’
का खिताब उसी सीख और
मेहनत का परिणाम है।
उस जीत ने हमें
पहचान। आत्मविश्वास। और जिम्मेदारी दी।
‘मथुरा योद्धा’ के लिए खेलते
समय मैंने सीखा कि प्रोफेशनल
खेल में एक गलती
पूरी टीम पर भारी
पड़ सकती है। ‘इमर्जिंग
प्लेयर ऑफ द सीजन’
का पुरस्कार मेरे लिए यह
संदेश था, “तुम सही
रास्ते पर हो।”
प्रश्न
: हाल
ही
में
उत्तर
प्रदेश
टीम
ने
आपके
शानदार
प्रदर्शन
से
उत्तराखंड
को
हराकर
क्वार्टर
फाइनल
में
प्रवेश
किया।
उस
मैच
को
कैसे
याद
करेंगे?
उत्तर
: वह मैच मेरे करियर
के यादगार पलों में से
एक है। टीम ने
एकजुट होकर खेला। मेरा
फोकस सिर्फ पॉइंट्स पर नहीं, बल्कि
टीम को संतुलन देने
पर था। जब जीत
मिली और क्वार्टर फाइनल
में पहुंचे, तो लगा कि
मेहनत रंग लाई। वह
मैच सिर्फ जीत नहीं था,
वह विश्वास की परीक्षा थी।
उत्तराखंड मजबूत टीम थी। दबाव
बहुत था। लेकिन हमने
तय किया था, डरेंगे
नहीं। जब आखिरी पॉइंट
मिला और स्कोर हमारे
पक्ष में गया, तो
लगा, आज सिर्फ मैच
नहीं, इतिहास जीते हैं।
प्रश्न
: एक
खिलाड़ी
के
तौर
पर
आपका
करियर
ग्राफ
कैसे
आगे
बढ़
रहा
है?
उत्तर
: मैं खुद को अभी
सीखने की अवस्था में
मानता हूं। स्टेट लेवल
से आगे नेशनल और
फिर इंटरनेशनल स्तर मेरा सपना
है। फिटनेस, टेक्निक और मेंटल स्ट्रेंथ,
तीनों पर लगातार काम
कर रहा हूं। मेरा
लक्ष्य लंबा और स्थायी
करियर बनाना है। हालांकि नेशनल
से इंटरनेशनल तक का सफर
आसान नहीं, लेकिन असंभव भी नहीं।
प्रश्न
: आजमगढ़
की
पहचान
को
लेकर
अक्सर
नकारात्मक
बातें
होती
रही
हैं।
आप
इसे
कैसे
देखते
हैं?
उत्तर
: यह सच है कि
कभी आजमगढ़ का नाम आते
ही लोगों के मन में
डर और माफिया की
छवि बन जाती थी।
लेकिन अब समय बदल
रहा है। खेल, शिक्षा
और मेहनत से यहां के
युवा नई पहचान बना
रहे हैं। अगर आजमगढ़
से खिलाड़ी निकल रहे हैं,
तो यह सबसे बड़ा
बदलाव है।
प्रश्न
: गांव
में
आपके
स्वागत
में
भव्य
जुलूस
निकाला
गया।
उस
पल
को
कैसे
शब्द
देंगे?
उत्तर
: वह पल भावुक करने
वाला था। जिन गलियों
में मैंने खेलना सीखा, वहीं लोग फूल
बरसा रहे थे। ढोल-नगाड़ों के साथ स्वागत
हुआ। बुजुर्गों की आंखों में
आंसू थे। लगा कि
सिर्फ सईद नहीं, पूरा
गांव जीत रहा है।
यह जिम्मेदारी भी है कि
अब और अच्छा करूं।
वह सम्मान मेरे लिए पदक
से बड़ा था।
प्रश्न
: वॉलीबॉल
जैसे
खेल
में
सफलता
पाने
के
लिए
युवाओं
को
क्या
जरूरी
सीख
लेनी
चाहिए?
उत्तर
: सबसे जरूरी है धैर्य और
अनुशासन। वॉलीबॉल सिर्फ ताकत का खेल
नहीं, दिमाग और टीमवर्क का
खेल है। रोज अभ्यास,
फिटनेस और अपने खेल
की ईमानदार समीक्षा, यही सफलता की
कुंजी है। एक दिन
में स्टार नहीं बनते। रोज
पसीना बहाना पड़ता है। और
सबसे जरूरी, नशे, गलत संगत
और शॉर्टकट से दूर रहो।
प्रश्न
: क्या
आजमगढ़
जैसे
जिलों
में
खेल
प्रतिभा
को
पर्याप्त
अवसर
मिल
रहे
हैं?
उत्तर
: अवसर बढ़े हैं, लेकिन
अभी और जरूरत है।
अगर गांव-स्तर पर
एकेडमी, कोच और टूर्नामेंट
मिलें, तो यहां से
कई सईद आलम निकल
सकते हैं।
प्रश्न
: आने
वाले
समय
में
आपका
सपना
क्या
है?
उत्तर
: देश के लिए खेलना,
तिरंगा पहनकर कोर्ट पर उतरना। और
साथ ही अपने जिले-गांव के बच्चों
के लिए एक ऐसा
माहौल बनाना, जहां वे खेल
को करियर के रूप में
देख सकें। फिरहाल, वर्तमान में ख्वाहिश है
वाराणसी के 72वीं वॉलीबाल
चैम्पियनशिप का खिताब उत्तर
प्रदेश को मिले, क्योंकि
यह खेल प्रधानमंत्री नरेन्द्र
मोदी के संसदीय क्षेत्र
में खेला जा रहा
है, अगर जीत हुई
तो उनके लिए जीवन
का सबसे गौरवान्वित क्षण
होगा.
प्रश्न
: लखनऊ
एकेडमी
तक
पहुंचना
कितना
कठिन
था?
उत्तर
: बहुत कठिन। आर्थिक समस्या, घर से दूर
रहना, भाषा और माहौल,
सब नया था। कई
बार मन टूटा, लेकिन
हर बार खुद से
कहा, “अगर आज हार
मान ली, तो जिंदगी
भर पछताओगे।” लखनऊ ने मुझे
अनुशासन सिखाया। वहां समझ आया
कि वॉलीबॉल सिर्फ ताकत नहीं, दिमाग
का खेल है।
प्रश्न
: क्या
आजमगढ़
जैसे
जिलों
में
खेल
इंफ्रास्ट्रक्चर
की
कमी
है?
उत्तर
: हां, लेकिन अब सुधार हो
रहा है। अगर सरकार
और समाज मिलकर काम
करें, तो यहां से
राष्ट्रीय टीम के खिलाड़ी
निकल सकते हैं।
बेशक, आपके लगन, प्रयास
व उम्मींद को बहुत -बहुत
बधाई. आजमगढ़ की मिट्टी से
निकला यह खिलाड़ी साबित
करता है कि पहचान
बदली जा सकती है,
बशर्ते मेहनत, खेल और सकारात्मक
सोच को मौका मिले।
सईद आलम सिर्फ एक
नाम नहीं, आजमगढ़ की बदलती कहानी
हैं। मतलब साफ है
जिस आजमगढ़ को कभी डर
से जोड़ा गया, अब
वहां से जीत की
गूंज निकल रही है.
उत्तराखंड को पराजित कर
क्वार्टर फाइनल में प्रवेश के
दौरान तालियों की गड़गड़ाहट के
बीच बार-बार सईद
आलम की गूंज इस
बात का संकेत है,
आजमगढ़, जिसका नाम वर्षों तक
माफिया, आतंक और भय
के साथ जोड़ा जाता
रहा। अब उसी धरती
से सईद आलम नामक
खिलाड़ी, जो वॉलीबॉल को
हथियार बनाकर पहचान बदल रहा है।
सईद आलम आज न
सिर्फ उत्तर प्रदेश, बल्कि पूर्वांचल के लाखों युवाओं
की उम्मीद बन चुके हैं।
यह बदलाव आजमगढ़ के हर उस
युवा का है जो
अब बंदूक नहीं, बल्ला, गेंद और वॉलीबॉल
उठाना चाहता है। खेल किसी
जिले की पहचान बदल
सकता है सईद इसका
जीता-जागता उदाहरण है।

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