रंगभरी एकादशी पर शिव और कृष्ण परंपरा का संगम
काशी में ब्रज के रंग : जन्मभूमि से विश्वनाथ धाम तक पहुंचेगी भक्ति की गुलाल यात्रा
ब्रज की
फाग
से
गूंजेगा
बाबा
विश्वनाथ
का
दरबार
सुरेश गांधी
वाराणसी। सनातन परंपरा में आस्था और
उत्सव का अद्भुत संगम
इस वर्ष रंगभरी एकादशी
पर एक बार फिर
देखने को मिलेगा, जब
श्री कृष्ण जन्मभूमि से भक्ति और
रंगों से सजी गुलाल
यात्रा काशी विश्वनाथ धाम
के लिए प्रस्थान करेगी।
ब्रज और काशी की
सांस्कृतिक एकात्मता का यह आध्यात्मिक
सेतु 27 फरवरी को रंगभरी एकादशी
के अवसर पर अपने
चरम पर होगा।
मथुरा की श्रीकृष्ण जन्मभूमि
से निकलने वाली यह परंपरागत
गुलाल यात्रा केवल रंगों का
उत्सव नहीं, बल्कि शिव और कृष्ण
भक्ति के आध्यात्मिक मिलन
का प्रतीक बन चुकी है।
संस्थान के सचिव कपिल
शर्मा ने बताया कि
विगत वर्ष की भांति
इस बार भी सवा
मन गुजिया प्रसाद, गुलाल, नील गुलाल, फल-पुष्प और ब्रज की
सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ शोभायात्रा
भव्य रूप में काशी
के लिए रवाना होगी।
रंगभरी एकादशी को काशी में
बाबा विश्वनाथ की होली का
विशेष महत्व है। मान्यता है
कि इसी दिन भगवान
शिव, माता पार्वती को
गौना के बाद पहली
बार काशी लाते हैं
और पूरा नगर रंगों
में सराबोर हो उठता है।
इस परंपरा में जब ब्रज
की लठामार, पुष्प और गुलाल होली
का रंग जुड़ता है,
तो उत्सव का आध्यात्मिक विस्तार
और भी विराट हो
जाता है। 26 फरवरी को प्रातः हरिनाम
संकीर्तन और मंगलध्वनि के
मध्य ठाकुर श्रीकेशवदेव मंदिर परिसर से गुलाल यात्रा
प्रारंभ होगी, जो सुसज्जित वाहन
से वाराणसी के लिए रवाना
होगी।
अगले दिन रंगभरी
एकादशी पर ब्रज से
आए कलाकार फाग, नृत्य और
पुष्पवर्षा के साथ बाबा
विश्वनाथ के दरबार में
भक्ति का रंग बिखेरेंगे।
विशेष बात यह है कि
पहली बार ब्रज के
ग्वाल-गोपी स्वरूप कलाकार
काशी विश्वनाथ धाम के प्रांगण
में पुष्प होली और गुलाल
होली का जीवंत प्रदर्शन
करेंगे। नील गुलाल और
भस्म की शिव परंपरा
के साथ ब्रज की
रसमय फाग का यह
संगम श्रद्धालुओं को अद्वितीय आध्यात्मिक
अनुभूति कराएगा।
श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान ने
काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के सहयोग के
लिए आभार व्यक्त करते
हुए इसे सनातन सांस्कृतिक
एकता की दिशा में
महत्वपूर्ण पहल बताया है।
संस्थान का उद्देश्य देश
के प्रमुख मंदिरों के बीच धार्मिक-सांस्कृतिक सहभागिता को बढ़ाना है,
ताकि आस्था का यह रंग
पूरे भारत को एक
सूत्र में बांध सके।
रंगभरी एकादशी पर जब काशी
में ब्रज का रंग
घुलेगा, तब यह केवल
होली का उत्सव नहीं,
बल्कि परंपरा, संस्कृति और भक्ति के
विराट समागम का जीवंत दृश्य
होगा।



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